पोल के बाद अब एक्जिट पोल के ढोल

पोल के बाद अब एक्जिट पोल के ढोल

भारत भी विचित्र किन्तु सत्य देश है।  इस देश में हर विषय के विशेषज्ञ और भविष्यवक्ता मौजूद हैं ।  हाथ की लकीरें और ललाट पढ़कर भविष्य बताने वाले ही नहीं अपितु ईवीएम मशीनों में  बंद मतों की गणना से पहले ही ये लोग बता सकते हैं कि  कौन जीत रहा  है और कौन हार रहा है।  इस विज्ञान को ' एक्जिट पोल ' कहा जाता है। एक्जिट पोल को मै ' पोल के बाद का ढोल ' कहता हूँ । जो मजबूरन बजाया जाता है ताकि चुनावी रण में थके-हारे लोग नतीजे आने से पहले कुछ तो भांगड़ा कर लें।

लोकतंत्र की रक्षा और तानाशाही से मुक्ति के लिए हुए सात चरणों के मतदान के समाप्त होने से पहले ही इस देश में पहली बार सत्तारूढ़ दल ने 9 जून को प्रधानमंत्री  के रूप में तीसरी बार श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी के शपथ ग्रहण की तैयारियां कर लीं हैं। इन खबरों में यदि रत्ती भर भी सत्यता है तो दो ही बातें हो सकतीं हैं कि  या तो सत्तारूढ़ भाजपा ने पूरे आत्मविश्वास के साथ सत्ता प्रतिष्ठान विरोधी गुस्से को शांत  करने में सफलता हासिल की है या फिर दाल में काला है। यानी ईवीएम मशीनें सत्तारूढ़ दल के इशारे पर नतीजे उगलने वालीं हैं। यदि ये सही नहीं है तो कोई दल इतना उतावला कैसे हो सकता है कि  वो शपथग्रहण समारोह की तैयारियां कर ले ?

जाहिर है कि  चुनाव में जो मैदान में था वो जीतेगा भी और हारेगा भी। चुनाव परिणामों को लेकर हम और हमारा समाज खास तौर पर हमारा गोदी मीडिया इतना उतावला है कि  इधर मतदान समाप्त होगा और उधर सभी टीवी चैनल भावी सरकार को लेकर अपना ज्ञान उगलना शुरू कर देंगे ।  वोटर के मन में क्या है  ये भाजपा के अलावा कोई दूसरा दल नहीं जानता। अगर जानता तो क्या बात थी। वैसे भी किसके मन में क्या है , ये जानना आसान काम नहीं है ? एक्जिट पोल सही होते हैं या गलत ये पूरा देश और इस तरह के पोल करने वाले भली-भांति  न सिर्फ जानते हैं बल्कि नतीजों का रुझान बताते हुए झिझकते भी हैं। लेकिन कभी-कभी धूल में लाठी चल भी जाती है।

यकीन मानिये कि मै भी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की ही तरह एक्जिट पोल्स पर कभी ध्यान नहीं  देता और अपने ज्ञान-ध्यान में लगा रहता  हू। माननीय मोदी जी भी चुनावी रैलियों और रोड शो से फारिग होकर कन्याकुमारी स्थित विवेकानन्द स्मारक शिला पर ध्यान लगाने पहुँच गए थे।  विपक्ष ने उनके ध्यान को सजीव प्रसारित करने के खिलाफ केंचुआ की शरण ली थी ,विपक्ष को आशंका है कि माननीय ध्यान के जरिये देश की उस  जनता को भ्रमित कर सकते हैं जो कि  अंतिम और सातवें चरण में मतदान करने वाली है। मुझे लगता है कि  माननीय के योग=ध्यान पर ध्यान नहीं देना चाहिए। वे जो करते हैं राष्ट्रहित में करते हैं। यदि उनका और उनकी पार्टी का चुनावी गणित सही बैठता है तो उन्हें सत्ता से कोई भी हटा नहीं सकता।

 याद कीजिये कि जब भाजपा 2019  के आम चुनाव में प्रति बूथ 20  नए मतदाता जोड़कर अनेक राज्यों में विपक्ष का सूपड़ा साफ कर सकती है  तो 2024 के चुनाव में  भाजपा  प्रति बूथ 370  नए मतदाता जोड़कर  400  पार क्यों नहीं कर सकती ? भाजपा को 400  पार करने से कोई नहीं रोक सकता बल्कि उसके हर सांसद को कम से कम पांच लाख से जीत भी दिला सकता है। कलिकाल की राजनीति में जो कामरुप है, जो जातुधान है उसकी माया की काट किसी कि पास नहीं होती शायद। ये माया अपने आप कट जाये तो और बात है। मायामृग ही युद्ध का कारण बनता है।

इस चुनाव में भी सत्तारूढ़ दल सत्ता की सीता के  लिए खुद ही सोने कि हिरण छोड़ रहा है और खुद   ही उसका शिकार  भी कर रहा है। भाजपा ने उन सभी राज्यों में जाकर शिकारगाह बनाने की कोशिश की जहाँ उसे पांव रखने की भी जगह नहीं थी।  ;भाजपा ' दक्षिण में साफ़ और उत्तर में हाफ ' के विपक्ष के नारे को  गलत साबित करना चाहती है। इसके लिए उसने जोखिम पर जोखिम लिए है।  दिखाने के लिए भाजपा ने अपनी मातृ संस्था आरएसएस से भी कन्नी काट ली है ,क्योंकि भाजपा के जन्म से पहले 1977  में जो विपक्षी गठबंधन बना था वो दोहरी सदस्य्ता के नाम पर टूट गया था।  
एक्जिट पोल कितने सच ,कितने झूठ होते हैं इसके बारे में उनके अतीत को खंगालने की जरूरत है।

 जहँ तक मुझे याद आता है  कि भारत  में आजादी के बाद दूसरे आम चुनाव के दौरान साल 1957 में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन की ओर से पहली बार इसके मुखिया एरिक डी कॉस्टा ने सर्वे किया था।  हालांकि, तब इसे एग्जिट पोल नहीं माना गया था।  औपचारिक रूप से  1980 और 1984 में डॉक्टर प्रणय रॉय की अगुवाई में सर्वे किया गया। साल 1996 में भारत में एग्जिट पोल की शुरुआत सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) ने की थी।  तब पत्रकार नलिनी सिंह ने दूरदर्शन के लिए एग्जिट पोल कराया था, जिसके लिए सीएसडीएस ने आंकड़े जुटाए थे. इस पोल में बताया गया था कि भाजपा लोकसभा चुनाव जीतेगी और ऐसा ही हुआ. इसी के बाद से देश में एग्जिट पोल का चलन बढ़ गया।  साल 1998 में निजी न्यूज चैनल ने पहली बार एग्जिट पोल का प्रसारण किया था।

नतीजे आने कि पहले नतीजों कि आसपास पहुँचने की  शुरुआत का श्रेय  संयुक्त राज्य अमेरिका को जाता है। साल 1936 में सबसे पहले अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन ने चुनावी सर्वे किया था।  तब पहली बार मतदान कर निकले मतदाताओं से पूछा गया था कि उन्होंने राष्ट्रपति पद के किस उम्मीदवार को वोट दिया है ? जैसा कि  मैंने पहले ही कहा की एक्जिट पोल धूल में थी चलने जैसा है ।  कभी -कभी ये 80  फीसदी तक सही निकलते हैं और कभी रत्ती भर भी नहीं। तो आने वाले तीन दिनों तक आप भी इस एक्जिट पोल से उड़ते हुए गुबार देखिये। अफ़साने सुनिए ,हकीकत का पता तो 4 जून 2024  की दोपहर तक ही चल पायेगा।
 राकेश अचल

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