नशे का साम्राज्य ध्वस्त करने की निर्णायक जंग: ड्रग कार्टेल्स पर केंद्र का बड़ा प्रहार

युवाधन को बचाने का राष्ट्रीय संकल्प

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भारत में मादक पदार्थों के खिलाफ लड़ाई अब एक नए और अधिक आक्रामक चरण में प्रवेश कर चुकी है। जिस तरह देश ने बीते वर्षों में नक्सलवाद के खिलाफ एक समन्वित और रणनीतिक अभियान चलाकर कई इलाकों को हिंसा के दायरे से बाहर निकाला, उसी तर्ज पर अब ड्रग्स नेटवर्क को जड़ से खत्म करने की व्यापक तैयारी की जा रही है। यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि देश के भविष्य,उसके युवाओं को बचाने का सवाल बन चुका है। इसी दृष्टि से केंद्र सरकार और विभिन्न एजेंसियों ने मिलकर एक ऐसा अभियान शुरू किया है, जिसका उद्देश्य न केवल ड्रग्स की सप्लाई रोकना है, बल्कि उन पूरे नेटवर्क्स को ध्वस्त करना है जो इस अवैध कारोबार को संचालित करते हैं।
 
इस लड़ाई का नेतृत्व (एनसीबी) कर रही है, जो अन्य केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के साथ मिलकर देशभर में समन्वित कार्रवाई कर रही है। इस अभियान के तहत अब सिर्फ छोटे तस्करों या स्थानीय सप्लायर्स को पकड़ना ही लक्ष्य नहीं है, बल्कि उन बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्टेल्स और सिंडिकेट्स को निशाना बनाया जा रहा है जो इस पूरे नेटवर्क के असली संचालक हैं। यह रणनीति स्पष्ट करती है कि सरकार अब ‘सप्लाई चेन’ के हर स्तर को तोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है।
 
सूत्रों के अनुसार, राज्यों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय शीर्ष दस ड्रग कार्टेल्स की पहचान करें और उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करें। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ड्रग्स का नेटवर्क अब अत्यधिक संगठित और तकनीकी रूप से उन्नत हो चुका है। तस्कर अब डार्कनेट, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म और क्रिप्टोकरेंसी का उपयोग कर रहे हैं, जिससे उनकी गतिविधियों को ट्रैक करना चुनौतीपूर्ण हो गया है। हालांकि, एजेंसियां भी अब अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर इन डिजिटल नेटवर्क्स पर पैनी नजर रख रही हैं।
 
भारत में ड्रग्स की तस्करी के प्रमुख मार्गों पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या कितनी व्यापक और जटिल है। अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र से आने वाला ‘डेथ क्रिसेंट’ नेटवर्क हेरोइन की बड़ी मात्रा भारत तक पहुंचाता है। यह सप्लाई समुद्री मार्गों, रेगिस्तानी इलाकों, नदियों और अब ड्रोन के माध्यम से भी की जा रही है। विशेष रूप से पंजाब, जम्मू-कश्मीर, गुजरात और राजस्थान जैसे सीमावर्ती राज्य इस तस्करी के प्रमुख मार्ग बन चुके हैं। ड्रोन के जरिए सीमा पार से ड्रग्स गिराने की घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है।
 
पूर्वोत्तर राज्यों में म्यांमार के रास्ते आने वाले ड्रग्स का प्रवाह भी एक बड़ी समस्या है। वहीं गुजरात का समुद्री तट अंतरराष्ट्रीय तस्करी के लिए एक महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार बन गया है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य बड़े उपभोक्ता और वितरण केंद्र के रूप में उभर रहे हैं। इस पूरे परिदृश्य से यह स्पष्ट है कि ड्रग्स का नेटवर्क देश के कई हिस्सों में गहराई तक फैल चुका है, जिसे खत्म करने के लिए बहुस्तरीय रणनीति की आवश्यकता है।
 
सरकार की इस नई रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब ध्यान केवल तस्करी रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के भीतर चल रही अवैध ड्रग लैब्स और सिंथेटिक ड्रग्स के उत्पादन को भी खत्म करना है। सिंथेटिक ड्रग्स का खतरा इसलिए अधिक है क्योंकि इन्हें आसानी से छिपाकर तैयार किया जा सकता है और इनकी मांग भी तेजी से बढ़ रही है, खासकर शहरी युवाओं के बीच।
 
पिछले कुछ वर्षों में एजेंसियों द्वारा की गई कार्रवाई के आंकड़े इस अभियान की गंभीरता और प्रभावशीलता को दर्शाते हैं। वर्ष 2025 में एनसीबी ने 1.33 लाख किलो से अधिक नशीले पदार्थ जब्त किए, जिनकी कीमत 1980 करोड़ रुपये से ज्यादा आंकी गई। इसके अलावा, 3889 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 77 हजार किलो से ज्यादा ड्रग्स को नष्ट किया गया। वर्ष 2024 में भी बड़ी मात्रा में ड्रग्स जब्त किए गए थे, जो यह दिखाता है कि एजेंसियां लगातार सक्रिय हैं और बड़े पैमाने पर कार्रवाई कर रही हैं।
 
यदि पिछले पांच वर्षों के रुझानों को देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि ड्रग्स की जब्ती में लगातार वृद्धि हुई है। इसका एक अर्थ यह भी है कि तस्करी के प्रयास बढ़े हैं, लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि एजेंसियों की पकड़ और क्षमता भी मजबूत हुई है। बड़ी-बड़ी खेपों का पकड़ा जाना यह दर्शाता है कि अब नेटवर्क के ऊपरी स्तर तक पहुंच बनाई जा रही है, जिससे इस अवैध व्यापार को आर्थिक रूप से भारी नुकसान हो रहा है।
 
यह आर्थिक नुकसान ही इस लड़ाई का एक महत्वपूर्ण पहलू है। जब करोड़ों और अरबों रुपये की ड्रग्स खेप पकड़ी जाती है, तो इससे न केवल तस्करों की कमर टूटती है, बल्कि उनके पूरे नेटवर्क की वित्तीय संरचना भी कमजोर हो जाती है। यही कारण है कि सरकार अब ‘फॉलो द मनी’ यानी धन के प्रवाह को ट्रैक करने पर भी विशेष ध्यान दे रही है, ताकि इस कारोबार से जुड़े हर व्यक्ति को कानून के दायरे में लाया जा सके।
 
ड्रग्स के खिलाफ यह अभियान केवल कानून लागू करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब बड़ी मात्रा में ड्रग्स पकड़ी जाती है, तो यह सीधे तौर पर उन लाखों युवाओं तक नशे की पहुंच को रोकता है, जिन्हें इस जाल में फंसाने की कोशिश की जा रही होती है। इस प्रकार, हर जब्ती केवल एक कानूनी सफलता नहीं, बल्कि एक सामाजिक विजय भी है।
 
भारत जैसे युवा देश में, जहां बड़ी आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, ड्रग्स का खतरा और भी गंभीर हो जाता है। नशा न केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि उसके परिवार, समाज और अंततः राष्ट्र की प्रगति पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। इसलिए, ड्रग्स के खिलाफ यह लड़ाई केवल सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की भागीदारी की मांग करती है।
 
केंद्र सरकार का यह स्पष्ट संदेश है कि नशे के कारोबार को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। गृह मंत्रालय द्वारा लगातार समीक्षा बैठकें आयोजित की जा रही हैं, जिनमें राज्यों को सख्त निर्देश दिए जा रहे हैं कि वे इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभाएं। विशेष रूप से सीमावर्ती राज्यों में निगरानी और खुफिया तंत्र को मजबूत किया जा रहा है, ताकि तस्करी के हर प्रयास को समय रहते रोका जा सके।
 
इस पूरे अभियान का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि अब यह एक ‘मिशन मोड’ में चलाया जा रहा है। जिस प्रकार नक्सलमुक्त भारत अभियान ने एक स्पष्ट लक्ष्य और रणनीति के साथ काम किया, उसी प्रकार नशामुक्त भारत का लक्ष्य भी अब स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है। यह एक लंबी और चुनौतीपूर्ण लड़ाई जरूर है, लेकिन जिस प्रकार से एजेंसियां समन्वित और तकनीकी रूप से उन्नत तरीके से काम कर रही हैं, उससे यह उम्मीद मजबूत होती है कि आने वाले वर्षों में इस समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकेगा।
 
अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि ड्रग्स के खिलाफ यह जंग केवल अपराध के खिलाफ नहीं, बल्कि भविष्य को बचाने की जंग है। हर जब्त की गई खेप, हर ध्वस्त किया गया नेटवर्क, और हर पकड़ा गया तस्कर इस बात का प्रमाण है कि देश अपने युवाओं को नशे के अंधकार से बाहर निकालने के लिए प्रतिबद्ध है। यदि इसी दृढ़ता और समन्वय के साथ यह अभियान जारी रहता है, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत न केवल नक्सलमुक्त, बल्कि नशामुक्त राष्ट्र के रूप में भी दुनिया के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करेगा।
 
कांतिलाल मांडोत

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