राजनीति
पारिवारिक कलह से रिश्तों का रोज़ होता पतन
यह स्थिति हर धर्म, हर वर्ग और हर व्यक्ति को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है
भारत जनसंख्या की दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा देश है, लेकिन देश में बढ़ते अपराध—विशेषकर घरेलू और पारिवारिक हिंसा के जघन्य मामलों—में निरंतर वृद्धि होना एक सभ्य समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। आज के आधुनिक दौर में जब भी हम समाचार पत्रों या न्यूज़ चैनलों से रूबरू होते हैं, तो राजनीति से इतर आपराधिक घटनाओं और पारिवारिक कलह से जुड़ी खबरों का प्रतिशत लगातार बढ़ता दिखाई देता है।
मीडिया द्वारा इन घटनाओं को प्रमुखता से दिखाना अब मजबूरी बन गई है, क्योंकि देश के लगभग हर धर्म, वर्ग और समाज में पारिवारिक हिंसा का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है, जो कई बार जघन्य अपराधों का रूप ले लेता है। भारत विश्व को शांति, प्रेम और भाईचारे का संदेश देने वाला देश माना जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि हमारे अपने ही परिवारों में रिश्तों के बीच दूरियाँ इतनी बढ़ती जा रही हैं कि साथ बैठकर भोजन करना भी कठिन होता जा रहा है। सिर्फ भाई-भाई के रिश्ते ही नहीं, बल्कि पति-पत्नी के संबंधों में भी जिस गति से अलगाव बढ़ रहा है और उसके भयावह परिणाम सामने आ रहे हैं, वह पूरे समाज के लिए गहन चिंतन का विषय है। यह स्थिति हर धर्म, हर वर्ग और हर व्यक्ति को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।
आधुनिकता की दौड़ में हमने नई पीढ़ी को महंगी शिक्षा और भौतिक सुख-सुविधाएँ तो भरपूर दी हैं, लेकिन उन्हें सहनशीलता, धैर्य, अपनत्व, विनम्
जो घटनाएँ आज हम समाचारों में देख-सुन रहे हैं, वे कल किसी भी परिवार की वास्तविकता बन सकती हैं। कहीं पैसों के विवाद, कहीं अवैध संबंधों की आशंका, कहीं कर्ज का दबाव, तो कहीं नशे की लत या पारिवारिक हस्तक्षेप—इन सभी कारणों से महानगरों से लेकर गाँवों तक रिश्तों का पतन तेजी से बढ़ रहा है। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि कई बार कम उम्र और कम समझ वाले लोग भी संदेह या आवेग में आकर अपने ही जीवनसाथी की हत्या जैसे जघन्य अपराध कर बैठते हैं। वहीं, कर्ज और पारिवारिक तनाव से परेशान होकर अपने ही मासूम बच्चों की हत्या कर आत्महत्या करने की घटनाएँ भी समाज को झकझोर देती हैं।
यह भी एक कटु सत्य है कि पारिवारिक कलह अब केवल आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग तक सीमित नहीं रही। जहाँ गरीब परिवारों में इसे आर्थिक तंगी का परिणाम माना जाता है, वहीं संपन्न और भौतिक रूप से समृद्ध घरों से उठती कलह की आवाजें रिश्तों के आंतरिक विघटन की ओर संकेत करती हैं। हर दिन अवैध संबंधों की शंका और अविश्वास के चलते प्रेम, विश्वास और अपनत्व जैसे रिश्तों का गला घोंटने की घटनाएँ सामने आ रही हैं। ऐसे में समाज के हर वर्ग को पारिवारिक मूल्यों के संरक्षण और रिश्तों की गरिमा बनाए रखने के लिए गंभीरता से विचार करना होगा। यदि हम परिवार की खुशहाली, सौहार्द और विश्वास को बनाए रखना चाहते हैं, तो मजबूत और संतुलित दाम्पत्य जीवन पर सामूहिक मंथन समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।
अरविंद रावल


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