लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व निर्वाचित शक्ति का सिर्फ 13.63फीसद ।

लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व निर्वाचित शक्ति का सिर्फ 13.63फीसद ।

लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे आ चुके हैं और इसी के साथ संसद में बैठने वाले 543 सांसदों की तस्वीर भी साफ हो गई है।इन चुनावों में भारत की आधी आबादी यानी महिलाओं की उम्मीदवारी भी अब तक की सबसे बड़ी भागीदारी थी। ये पहला ऐसा मौका था, जब सबसे ज्यादा 797 महिला प्रत्याशी मैदान पर थीं.हालांकि सिर्फ 75 महिलाएं ही चुनाव जीत सकीं, जो पिछले 2019 लोकसभा चुनाव से तीन कम हैं।तब 78 महिलाएं संसद पहुंची थीं।
 
इन राज्यों में एक भी महिला प्रत्यासी नही जीत सकी।
चुनाव के नतीज़ों पर गौर करें तो, इस बार देश के 8 राज्यों- केरल, अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मणिपुर, मेघालय, नगालैंड, मिजोरम और सिक्किम से एक भी महिला प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत सकी है. वहीं, पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक 10 सीटों पर महिला उम्मीदवारों को जीत मिली है। इस बार राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक पार्टियों की बात करें, तो 2024 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 16 प्रतिशत महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया था, वहीं कांग्रेस की ओर से 13 प्रतिशत उम्मीदवार महिलाएं थीं। आम आदमी पार्टी ने किसी भी महिला उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा था।
 
चुनाव नतीज़ों में भाजपा की 69 महिला उम्मीदवारों में से 31 ने जीत हासिल की। वहीं कांग्रेस की 41 महिला उम्मीदवार मैदान में थीं, जिनमें से 13 को जीत मिली। वहीं अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की 12 महिला उम्मीदवारों में से 10 ने जीत हासिल की। समाजवादी पार्टी की ओर से 5 महिलाएं इस बार सांसद  चुनी गई हैं।
आरक्षित सीटों की बात करें, तो इस बार कुल 131 आरक्षित सीटों में से 18 पर महिला उम्मीदवार चुनी गई हैं। इसमें अनुसूचित जाति (एससी) समुदायों के लिए आरक्षित 84 सीटों में से 13 प्रतिशत सीटों पर महिलाओं ने जीत हासिल की, जबकि 47 अनुसूचित जनजाति (एसटी) आरक्षित सीटों में से 15 प्रतिशत सीटें महिला उम्मीदवारों के खाते में गईं।
 
इस बार 74 महिला सांसद चुनी गई।किंतु कई देशों से अभी भी पीछे।
लोकसभा2024 के चुनाव में  74 महिला सांसद चुनी गयी  है, जो 2019 की तुलना में चार कम और 1952 में भारत के पहले चुनावों की तुलना में 52 अधिक हैं। ये 74 महिलाएं निचले सदन की निर्वाचित शक्ति का सिर्फ 13.63% हिस्सा बनाती हैं, जो अगले परिसीमन अभ्यास के बाद महिलाओं के लिए आरक्षित 33% से बहुत कम है।
 
1952 में निचले सदन में महिलाओं की संख्या सिर्फ़ 4.41% थी। एक दशक बाद हुए चुनाव में यह संख्या बढ़कर 6% से ज़्यादा हो गई, लेकिन 1971 में भारत की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में फिर से 4% से नीचे आ गई । तब से, महिलाओं के प्रतिनिधित्व में धीमी, लेकिन स्थिर वृद्धि हुई है (कुछ अपवादों के साथ), जो 2009 में 10% के आंकड़े को पार कर गई और 2019 में 14.36% पर पहुंच गई। भारत अभी भी कई देशों से पीछे है - दक्षिण अफ्रीका में 46% सांसद, यूनाईटेड किंगडम  में 35% और अमेरिका  में 29% महिलाएँ हैं।
 
बीजेपी से 31 कांग्रेस से 13 तो टीएमसी से 10महिला सांसद चुनी गई।
2024 में, महिला लोकसभा सांसद 14 पार्टियों से चुनी गयी  हैं। 31 महिला सांसदों के साथ भाजपा इस सूची में सबसे आगे है, उसके बाद कांग्रेस (13), टीएमसी (11), एसपी (5), डीएमके (3), और चिराग पासवान के नेतृत्व वाली एलजेपीआरवी और जेडी(यू) दोनों में से दो-दो हैं। सात पार्टियों में से प्रत्येक में एक महिला सांसद हैं। लोकसभा में दोहरे अंकों वाली महिला सांसदों वाली 3 पार्टियों में, टीएमसी का अनुपात सबसे अधिक (37.93%) है, उसके बाद कांग्रेस (13.13%) और बीजेपी (12.92%) हैं। निर्वाचित 74 महिला सांसदों में से 43 पहली बार सांसद बनी हैं, और एक (राजद की मीसा भारती) पहली बार लोकसभा सांसद बनी हैं। यह सदन में नए लोगों के कुल प्रतिशत (59% बनाम 52%) से अधिक है।
 
 2024 में लगभग 10प्रतिसत महिला उम्मीदवार थी।
2024 के लोकसभा चुनाव में खड़े हुए कुल 8,360 उम्मीदवारों में से लगभग 10% महिलाएँ थीं। समय के साथ यह संख्या भी बढ़ी है - 1957 में यह 3% थी। यह पहली बार है जब महिला उम्मीदवारों का अनुपात 10% तक पहुँच गया है। भाजपा के लगभग 16% उम्मीदवार महिलाएँ थीं, जबकि कांग्रेस के 13% उम्मीदवार महिलाएँ थीं - दोनों ही कुल औसत से ज़्यादा हैं।
गौरतलब है कि मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के आखिरी समय में संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया था।जिसके अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटों पर आरक्षण का प्रावधान है। हालांकि ये कब से लागू होगा इसकी अभी कोई ठोस जानकारी नहीं है।
 
ये हमारे समाज की विडंबना ही है कि आधी आबादी को राजनीतिक पार्टियां चुनाव में उम्मीदवार बनाने से कतराती हैं। कई जगह दिग्गजों के खिलाफ सिर्फ नाम के लिए उन्हें खड़ा कर दिया जाता है। पार्टियां महिलाओं को लेकर तमाम वादे तो करती हैं, लेकिन जब अमल की बात आती है, तो इससे कोसों दूर नज़र आती हैं।
 
 
पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना भी महिलाओ के लिए बाधा।
भारतीय राजनीति में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की कमी का एक प्रमुख कारण पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना में गहराई से समाया हुआ है। इसने एक धारणा को जन्म दिया है कि राजनीति एक "पुरुषों का काम" है और महिलाएँ नेतृत्व की भूमिकाओं के लिए उपयुक्त नहीं हैं। इसके अतिरिक्त, महिलाओं से अक्सर घर की देखभाल और बच्चों की परवरिश जैसी अपनी पारंपरिक भूमिकाओं पर ध्यान केंद्रित करने की अपेक्षा की जाती है, जिससे उनके लिए राजनीतिक करियर बनाने के लिए बहुत कम जगह बचती है।
 
महिलाओं के सामने एक और महत्वपूर्ण बाधा वित्तीय संसाधनों तक पहुँच की कमी है। महिला उम्मीदवारों के लिए अभियान वित्तपोषण अक्सर एक बड़ा मुद्दा होता है, क्योंकि उन्हें अक्सर पुरुषों के समान वित्तपोषण के अवसर नहीं मिल पाते हैं। इससे उनके लिए प्रभावी अभियान शुरू करना और चुनाव जीतना मुश्किल हो जाता है। भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की यात्रा एक लंबी और जटिल यात्रा रही है, जिसमें प्रगति और असफलता दोनों ही शामिल हैं।
 
भारत में, 73वें और 74वें संविधान संशोधन के तहत पंचायतों और नगर पालिकाओं में महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण प्रदान किया गया है। ये संशोधन 1992 में पारित किए गए थे और इनका उद्देश्य स्थानीय सरकार को सशक्त बनाना और महिलाओं को उनके समुदायों के शासन में अधिक अधिकार देना था।
 
73वें संविधान संशोधन के तहत, पंचायतों (ग्राम परिषदों) को गांव, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर महिलाओं के लिए सभी सीटों में से एक तिहाई सीटें आरक्षित करनी होती हैं। इसका मतलब है कि प्रत्येक पंचायत में कुल सीटों की कम से कम एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, और इन सीटों पर केवल महिला उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकती हैं।
 
इसी तरह, 74वें संविधान संशोधन के तहत नगर पालिकाओं (नगर परिषदों) को भी वार्ड स्तर पर महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करनी होंगी। इसका मतलब है कि प्रत्येक नगर पालिका में कुल सीटों में से कम से कम एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं और इन सीटों पर केवल महिला उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकती हैं।
इन आरक्षणों का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना है कि महिलाओं की आवाज़ सुनी जाए और उनकी ज़रूरतों को ध्यान में रखा जाए।
 
गौरतलब है कि संवैधानिक जनादेश के बावजूद, कुछ राज्यों में व्यवहार में आरक्षण का कार्यान्वयन अपर्याप्त रहा है। 
धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध अधिनियम, 1955 का उद्देश्य चुनावों के दौरान महिला उम्मीदवारों के खिलाफ भेदभाव को रोकना है। महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत का खराब रिकॉर्ड विश्व आर्थिक मंच के वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक 2021 से स्पष्ट रूप से उजागर होता है, जहाँ यह 156 देशों में 28 पायदान नीचे खिसककर 140वें स्थान पर आ गया है। भारत दक्षिण एशिया में तीसरा सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला देश है, जो केवल पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान से आगे है, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और भूटान से पीछे है। सबसे बड़ी गिरावट राजनीतिक सशक्तिकरण उप-सूचकांक में है, जहाँ भारत पिछले साल के 18वें स्थान से गिरकर 51वें स्थान पर आ गया है।
 
यह विफलता राजनीति से आगे बढ़कर समुदाय के दृष्टिकोण तक भी जाती है। पितृसत्तात्मक मानसिकता अभी भी स्पष्ट है, और उदाहरण के लिए, राजनीति में महिलाओं के बारे में अपमानजनक टिप्पणियाँ सोशल मीडिया पर आम हैं। 
पिछले साल प्रकाशित एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में महिला राजनेताओं को ट्विटर पर किस तरह के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। चुनाव लड़ने वाली महिलाओं पर अक्सर लैंगिक भेदभाव वाली टिप्पणियाँ की जाती हैं , चाहे वे उनके रूप-रंग, पहनावे या अनुभव के बारे में हों।इसके अलावा राजनीति में आने वाली महिलाओं को अक्सर यौन शोषण का भी शिकार होना पड़ता है।

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