द्रोपदी मुर्मू की दरियादिली को प्रणाम

द्रोपदी मुर्मू की दरियादिली को प्रणाम

राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू की दरियादिली को प्रणाम। उन्होंने नव नियुक्त प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई  दामोदर दास मोदी को शपथ ग्रहण से पहले दही-चीनी खिलाकर उनका स्वागत किया। ये काम राष्ट्रपति भवन में पहली बार हुआ है। इसे आगे भी जारी रहना चाहिए। दुनिया जानती है कि शगुन और अशगुन के बारे में पुरुषों से ज्यादा महिलाएं जानतीं हैं और उनका ख्याल भी रखतीं है।  राष्ट्रपति ने पिछले दो साल में पूर्ववर्ती सरकार द्वारा किये गए अपमान को ख़ामोशी के साथ पिया लेकिन उफ़ तक नहीं की। और जब मौक़ा आया तब भी अपने ममत्व पर अदावत को हावी नहीं होने दिया।
निस्संदेह द्रोपदी जी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने जा रहे नरेंद्र भाई दामोदर दस मोदी की खोज   थीं ,लेकिन उन्होंने राष्ट्रपति को राष्ट्रपति की तरह कभी सम्मान नहीं दिया। श्रीमती मुर्मू ने 25  जुलाई 2022  से लेकर अब तक अपमान के कितने घूँट पिए इसकी गिनती की जाये तो सूची बहुत लम्बी हो जाएगी। यदि उनकी जगह डॉ ज्ञानी जेल सिंह जैसा राष्ट्रपति होता तो प्रधानमंत्री को उनकी हैसियत दिखा देता ,लेकिन द्रोपदी जी ने ये नहीं किया।

द्रोपदी के सम्मान का चीर हर मौके पर खींचा जाता रहा। यदि देशवासियों को याद हो नयी संसद भवन के शिलान्यास का मौका,यद् हो नयी संसद भवन के लोकार्पण का मौक़ा और यदि याद हो हाल ही में पूर्व उप प्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी जी को ' भारतरत्न ' सौंपे जाने का मौक़ा तो आप समझ जायेंगे कि मै अपनी बात पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर नहीं कह रहा बल्कि इसके जीवंत प्रमाण मौजूद हैं। देश में ऐसा पहली बार हुआ जब कि राष्ट्रपति का राजनीतिक इस्तेमाल भी बेहयाई के साथ किया गया। आम चुनावों से पहले हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में और आम चुनावों में भी।  राष्ट्रपति जी को देश के तमाम आदिवासी अंचलों में भाजपा के कायकर्ता की तरह भेजा गया। श्रीमती द्रोपदी मुर्मू एक बार भी मना नहीं कर पायीं ,हालाँकि उनकी इस उदारता या विवशता की वजह से राष्ट्रपति पद का सम्मान जरूर कम हुआ। मेरे इस उल्लेख से भक्त मण्डली मुझे पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल  के कार्यकाल की याद जरूर दिलाएंगी  ,लेकिन मै स्पष्ट कर दूँ कि श्रीमती   पाटिल का वैसा अपमान कभी नहीं किया गया जैसा की श्रीमती मुर्मू का हुआ।

मुझे जहाँ तक याद आता है कि प्रधानमंत्री रहते हुए हमारे होनहार प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी अपनी असंख्य विदेश यात्राओं पर जाने या वापस लौटने के बाद एक बार भी शिष्टाचारवश राष्ट्रपति से भेंट करने नहीं गए। उनकी ऐसी कम ही तस्वीरें उपलब्ध हैं। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने जनधन से जितनी दुनिया घूमीं उसका दसांश  भी राष्ट्रपति जी के हिस्से में नहीं आया। लेकिन मैडम मुर्मू ने उफ़ तक नहीं की। भारत का सौभाग्य है कि उसे श्रीमती मुर्मू जैसी सहनशील और ममत्व से भरी राष्ट्रपति हासिल हुई। इसके लिए नादामो का धन्यवाद जरूर किया जा सकता है।
राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू एक पारिवारिक और संस्कारित महिला है। वे जानतीं है कि ख़ुशी के मौके पर नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी को दही-चीनी खिलने वाला दुनिया में कोई नहीं बचा। उनकी माँ का भी स्वर्गवास हो चुका है ।  पत्नी को वे त्याग चुके हैं। भाई-भाभियों से उनके रिश्ते मधुर नहीं हैं। ऐसे में नादामो निराश हो सकते हैं ,इसलिए मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन  की तमाम स्थापित परम्पराओं को ताक पर रखते हुए नए प्रधानमंत्री को दही-चीनी खिलाकर एक शुभ कार्य किया। अब तक नए प्रधानमंत्री को केवल गुलदस्ते देने का चलन था।

मुर्मू के हाथों दही-चीनी खाते हुए माननीय मोदी जी को कैसा अनुभव हुआ ,ये तो हमें नहीं पता लेकिन हमें अपने   बचपन में दही-चीनी ,दही -पड़े खाने की तमाम  घटनाएं याद हैं।  दही-चीनी  परंपरा हुआ करती थी।  जब भी कोई अच्‍छे काम के ल‍िए बाहर जाता, नानी-दादी या मां उसे दही-चीनी ख‍िलाया करती थीं। हमें तो  परीक्षा में जाने से पहले उन्‍हें दही-चीनी ख‍िलाया जाता था। लोगों में ऐसी मान्‍यता थी क‍ि क‍िसी भी शुभ कार्य से पहले दही-चीनी का सेवन शुभ होता है। आपको बता दें की दही-चीन का रिश्ता ठीक चोली-दामन जैसा है। दही-चीनी का धार्मिक महत्व भी है और वैज्ञानिक महत्व भी।
राष्ट्रपति जी द्वारा नए प्र्धानमंत्र को दही -चीनी   खिलाने की घटना के बहाने  आपको बता दें कि  ये समिश्रण शुभता का प्रतीक है।  दही और चीनी दोनों को शुभ माना जाता है. दही को पवित्रता और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है, जबकि चीनी मधुरता और सफलता का प्रतीक है।

ज्योतिष शास्त्र में, दही चंद्रमा और चीनी शुक्र ग्रह से संबंधित है।  शुभ कार्य से पहले इन ग्रहों का अनुकूल प्रभाव प्राप्त करने के लिए दही-चीनी खाई जाती है.हिंदू धर्म के कई धार्मिक ग्रंथों में दही-चीनी का महत्व बताया गया है. उदाहरण के लिए, स्कंद पुराण में कहा गया है कि "शुभ कार्य से पहले दही-चीनी खाने से कार्य में सफलता मिलती है."ये लक्ष्मी और गणेश का प्रिय प्रसाद भी माना जाता है।
हमारे गांव के वैद्य  जी कहते थे कि  दही और चीनी दोनों ही पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं. दही में प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन होते हैं, जबकि चीनी ऊर्जा प्रदान करती है।  शुभ कार्य से पहले इन पोषक तत्वों से शरीर को ऊर्जा और शक्ति मिलती है । दही पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में मदद करता है।  शुभ कार्य से पहले दही-चीनी खाने से पेट हल्का रहता है और कार्य करने में आसानी होती है।
दही में प्रोबायोटिक्स होते हैं जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं।  शुभ कार्य से पहले दही-चीनी खाने से शरीर को बीमारियों से बचाने में मदद मिलती है।

हमारे चिकत्स्क स्वर्गीय अष्ठाना जी कहते थे कि  दही-चीनी खाने से मन शांत और एकाग्र होता है, जिससे कार्य करने में सफलता मिलने की संभावना बढ़ जाती है।  दही-चीनी खाने से व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ता है, जिससे वह कार्य को बेहतर तरीके से कर पाता है । दही-चीनी खाने से व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है सो अलग ,जिससे वह कार्य को उत्साह और जोश के साथ कर पाता है। राष्ट्रपति जी भली भांति जानतीं है कि माननीय   नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी जिन परिस्थितियों में प्र्धानमंत्री का पद सम्हलने जा रहे हैं उन हालात में उनके लिए दही-चीनी कितना जरूरी है ! उम्मीद की जाना चाहिए कि माननीय मोदी जी के भीतर भरा विष- रस इस दही-चीनी से समाप्त नहीं तो कम से कम थोड़ा क्षीण तो होगा ही । वे अदावत की राजनीती से सद्भाव की राजनीति की और अग्रसर होंगे।

हमारी भी कामना है कि वे बैशाखियों पर खड़े होकर सरकार चलाएं या किसी और तरीके से लेकिन अपने तीसरे कार्यकालमें ' आपरेशन लोटस ' या  'ऑपरेशन झाड़ू ' न चलाएं ।  ईडी,सीबीआई को तोता-मैना न बनायें। संवैधानिक संस्थाओं के मान-मर्यादा का ख्याल रखें । न्यायपालिका की सुने  उसे सम्मान दें और कम से कम राष्ट्रपति जी का   पूरा-पूरा सम्मान करें ।  वे जब खड़ीं हों तो उनके सामने खड़े रहें ,बैठें नहीं।  उन्हें शिलान्यास और लोकार्पण  समारोहों में उतना ही महत्व दें जितना की एक राष्ट्रपति को मिलना चाहिये ।  राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में दखल बिलकुल न करें तो और बेहतर है।

राकेश अचल

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