मीडिया और लोकतंत्र के बेहतर संतुलन से समाज को नई दिशा
मीडिया समाज व सरकार के बीच विवेक का सेतु
मीडिया का भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका हैl लोकतांत्रिक समाज में मीडिया की भूमिका केवल सूचना पहुँचाने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह समाज की चेतना को दिशा देने, सत्ता को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करने और जनमानस के विवेक को जाग्रत रखने का दायित्व भी निभाता है। मीडिया वस्तुतः वह आईना है, जिसमें समाज स्वयं को देखता है और सरकार अपनी छवि पहचानती है। इसीलिए मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका इन तीनों स्तंभों की गतिविधियों पर सतत निगरानी रखता है।
पिछले दो तीन दशकों में मीडिया के स्वरूप में अभूतपूर्व परिवर्तन आया है। प्रिंट मीडिया से आगे बढ़कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, फिर डिजिटल और सोशल मीडिया तक की यात्रा ने सूचना को अत्यंत सुलभ बना दिया है। टेलीविजन, सिनेमा, इंटरनेट, फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसे मंच आज गाँव–गाँव तक अपनी पहुँच बना चुके हैं। परिणामस्वरूप समाज के रहन–सहन, भाषा, व्यवहार, सोच और जीवनशैली पर मीडिया का गहरा प्रभाव पड़ा है। विशेषकर युवा वर्ग, महिलाएँ और बच्चे इस प्रभाव के सबसे संवेदनशील केंद्र बन गए हैं।
मीडिया की शक्ति का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वह जनमत का निर्माण करने में सक्षम है। जनमत के निर्माण से ही समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है चाहे वह जनक्रांति हो या लोकतांत्रिक सुधार। इतिहास गवाह है कि मीडिया के दबाव और खुलासों के कारण कई देशों में सरकारें बदलीं और सत्ता के समीकरण उलट गए। भारत में भी चारा घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोयला घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, मैच फिक्सिंग जैसे अनेक मामलों में मीडिया ने भ्रष्टाचार के पर्दे हटाकर सत्ता को जवाबदेह बनाया।
यूरोप के प्रसिद्ध पत्रकार जिम मॉरिसन का कथन—“जनसंचार माध्यमों पर नियंत्रण करना बुद्धि पर नियंत्रण करना है” मीडिया की शक्ति को रेखांकित करता है। इसी तरह नेपोलियन बोनापार्ट का यह कथन भी ऐतिहासिक है कि “मैं लाखों संगीनों की अपेक्षा तीन विरोधी समाचार पत्रों से अधिक डरता हूँ।” ये वक्तव्य सिद्ध करते हैं कि मीडिया केवल सूचना नहीं, बल्कि सत्ता का संतुलन है।
परंतु आधुनिक मीडिया का दूसरा पक्ष भी उतना ही चिंताजनक है। ग्लैमर, टीआरपी की होड़, सनसनी और पीत पत्रकारिता ने मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। पेड न्यूज़, विज्ञापन आधारित कंटेंट और कॉर्पोरेट स्वामित्व ने मीडिया को कई बार जनहित से दूर कर दिया है। आज भारत के अधिकांश बड़े मीडिया संस्थानों का स्वामित्व बड़े औद्योगिक घरानों के हाथ में है, जिनके व्यावसायिक हित कई बार निष्पक्ष पत्रकारिता के मार्ग में बाधा बनते हैं।
सरकारें भी मीडिया प्रबंधन पर भारी धनराशि खर्च कर अपनी छवि गढ़ने का प्रयास करती हैं। विज्ञापन, सरकारी प्रचार और सूचना नियंत्रण के माध्यम से मीडिया को प्रभावित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। दूसरी ओर, मीडिया संस्थानों की आर्थिक मजबूरियाँ भी वास्तविक हैं—क्योंकि मीडिया चलाना अत्यधिक पूंजी, तकनीक और मानव संसाधन की माँग करता है। ऐसे में व्यावसायिक दबाव और नैतिक दायित्व के बीच संतुलन बनाना मीडिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
इसके बावजूद, मीडिया का दायित्व समाप्त नहीं होता। लोकतंत्र में निष्पक्ष, निर्भीक और जिम्मेदार मीडिया ही जनता का वास्तविक मार्गदर्शक बन सकता है। मीडिया का कार्य केवल मनोरंजन या सनसनी फैलाना नहीं, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करना है। चुनाव के समय तो मीडिया की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, क्योंकि वही जनता को नीतियों, विचारधाराओं और नैतिक मूल्यों से अवगत कराता है।
आज जब समाज तीव्र आधुनिकता के दौर से गुजर रहा है, तब मीडिया को केवल आधुनिकता का वाहक नहीं, बल्कि संवेदनशीलता का संरक्षक भी बनना होगा। आधुनिकता यदि मानवीय मूल्यों से कट जाए, तो वह केवल उपभोक्तावाद बनकर रह जाती है। मीडिया को यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक और सूचना की गति के साथ-साथ विवेक, संवाद और सत्य की गति भी बनी रहे।
अंततः कहा जा सकता है कि एक स्वतंत्र राष्ट्र में स्वतंत्र, सशक्त और उत्तरदायी मीडिया की नितांत आवश्यकता है। मीडिया यदि लोकतंत्र का प्रहरी है, तो उसे स्वयं भी नैतिक अनुशासन और आत्मालोचना के दायरे में रहना होगा। जब मीडिया समाज की आवाज़ बने, सरकार को जवाबदेह बनाए और सत्य के पक्ष में निर्भीकता से खड़ा हो—तभी वह अपने चौथे स्तंभ होने की गरिमा को सार्थक कर सकता है।
संजीव ठाकुर

Comment List