कमीशन के धंधे पर चलती है डॉक्टर की जिंदगी

कमीशन के धंधे पर चलती है डॉक्टर की जिंदगी सस्ती होने के बावजूद जेनेरिक दवाओं को नहीं देते बढ़ावा

कमीशन के धंधे पर चलती है डॉक्टर की जिंदगी

स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो उन्नाव

डॉक्टर यानी धरती का भगवान। मगर कुछ लालची सरकारी डॉक्टर फार्मा कंपनियों के साथ मिलकर मरीजों की जेब पर डाका डालने में जुटे रहते हैं। इस धंधे में सरकारी और प्राइवेट दोनों ही डॉक्टर्स शामिल हैं। ईमानदारी से मिलने वाली प्रैक्टिस की फीस या सरकार से मिलने वाली तनख्वाह उन्हें हमेशा कम लगती है। इसीलिये वे मार्केट में सस्ती दवाओं की उपलब्ध होने के बावजूद महंगी दवाएं ही निर्धारित करते हैं।

और जेनेरिक दवाओं को कभी बढ़ावा नहीं देते।  50 परसेंट तक कमीशन  उमाशंकर दीक्षित सरकारी जिला अस्पताल के इन भगवानों का यह हाल है कि कुछ गिनी-चुनी कंपनियों की ही दवाएं लिखने के लिए वे मोटा कमीशन वसूलते हैं। एक कंपनी के एमआर ने बताया कि वह पहले एक नई लोकल कंपनी में कार्यरत थे तो दवाएं बेचने का टारगेट मिलता था। वह सरकारी और प्राइवेट दोनों ही डॉक्टर्स के पास जाते थे। दवा उतनी इफेक्टिव नहीं थी और नाम भी नया था, इसलिए 90 परसेंट डॉक्टर तुरंत अपने मुनाफे की बात करते थे।

इसके लिए उन्हें 10 से लेकर 50 परसेंट तक कमीशन देना होता है। बिना कमीशन नई कंपनी मार्केट में ठहर नहीं सकती।  महंगे गिफ्ट से महंगी गाडियों तक की डिमांड  एक मल्टीनेशनल फार्मा कंपनी के अधिकारी के अनुसार बड़ी कंपनियों को अपने प्रोडक्ट को मार्केट में बेचने के लिए दवा की कीमत का बड़ा हिस्सा डॉक्टर्स को देना पड़ता है। बड़ी कंपनियां मोटा मुनाफा कमाती हैं तो इसके लिए वे डॉक्टर्स को भी बड़ा हिस्सा देने को तैयार रहती हैं। इसमें कंपनियां डॉक्टर्स को महंगे गिफ्ट से लेकर कैश तक देती हैं।

डॉक्टर्स को बड़ी लग्जरी गाडि़यां, विदेशों की सैर, घर के लिए महंगे गिफ्ट्स और उनके घर पर होने वाली किसी भी पार्टी का सारा खर्च ये कंपनियां उठाने को तैयार रहती हैं। डॉक्टर का जितना बड़ा नाम होगा, उसको फार्मा कंपनियों से मिलने वाली सुविधाएं भी उतनी ही अधिक होंगी।  कंपनियों को करोड़ों का मुनाफा  एक बड़ी कंपनी के अधिकारी के अनुसार अगर डॉक्टर को कमीशन व अन्य सुविधाएं नहीं देंगे तो दवा बेचना मुश्किल हो जाता है। मार्केट में एक ही दवा 5 रुपए से लेकर 50 रुपए तक में उपलब्ध होती है।

अलग-अलग कंपनियों की दवाओं के रेट्स अलग होते हैं। डॉक्टर के रेट के कमीशन के हिसाब से कंपनियां अपनी दवाएं बेच लेती हैं। उमाशंकर दीक्षित जिला अस्पताल में तैनात डॉ विकास सचान, डॉ मनोज, डॉ तुषार चौरसिया, डॉ कौशेलेनद्र कुमार जैसे कई डॉक्टर ऐसे हैं, जिनका सीधे बड़ी कंपनियों से टाइअप होता है। दवाओं के लिहाज से डॉक्टरों का हर एक प्रिस्क्रिप्शन बिका होता है।

एक ऊंची बोली लगती है दवाईयों के पर्चे में दर्ज होने वाली दवाओं की फेहरिस्त की। उमाशंकर दीक्षित जिला अस्पताल के डॉक्टर ऐसे ही हैं। वे एमआर या लोकल मैनेजर से बात भी नहीं करते। सीधे कंपनी का आदमी आता है और डीलिंग करते हैं। उनके मेडिकल स्टोर भी फिक्स होते हैं। बाकायदा लिखा होता है कि उनकी दवाएं किन मेडिकल स्टोर्स पर मिल सकती है। बस वे अपने नाम का फायदा उठाते हैं और मरीजों को चूना लगाते हैं।  

कुछ डॉक्टर ऐसे भी  मगर जिला अस्पताल में तैनात डॉ शोभित अग्निहोत्री,डॉ फैसल जुबैर,डॉ एस के पांडे जैसे कई डॉक्टर भी हैं, जो मरीजों के लिए सस्ती से सस्ती दवाएं लिखते हैं। लाखों के कमीशन से उन्हें कोई मतलब नहीं है। एमआर हो या साथी डॉक्टर किसी के दबाव से उन पर असर नहीं पड़ता। भले ही उस कंपनी के लोग उन्हें जानते हों या न जानते हों। सिर्फ कमीशन के नाम पर दवाएं बेचने वाले कंपनियों के दलाल डॉ शोभित अग्निहोत्री,डॉ फैसल जुबैर ,डॉ एस के पांडे जैसे डॉक्टर्स के पास जाने से घबराते हैं। या फिर अपने फॉर्मूला की जानकारी देकर भाग आते हैं।  

विश्वास बिकाऊ है  सब्जी मंडी स्थित फारुकी क्लीनिक के डॉक्टर जमाल फारुकी के अनुसार यहां जनता दवाओं के प्रति ज्यादा जागरूक नहीं है। मरीज व परिजनों को अपने डॉक्टर पर ही विश्वास होता है। वे आंख मूंदकर डॉक्टर की कही हर बात को मान लेते हैं और जो दवा लिखी जाती है उसे ही खरीदते हैं। भले ही डॉक्टर ने कितनी भी महंगी दवा क्यों न लिखी हो? हालांकि, मार्केट में दवाएं ऐसी ऐसी मौजूद हैं कि एक एंटीबायोटिक टेबलेट किसी एक कंपनी की 20 रुपए की है तो दूसरी ब्रांडेड कंपनी की वही एंटीबायोटिक दवा और सेम कम्पोजिशन के साथ 50 रुपये में बिकती है।  

कई गुना अधिक है दाम  ब्रांडेड दवाओं के रेट्स जेनेरिक दवाओं से 2 से 15 गुना तक अधिक होते हैं। उदाहरण के तौर पर डायक्लोफेनिक एसआर- 100 एमजी (एक पॉपुलर पेनकिलर) का 10 टेबलेट का रेट 51.91 रुपए है जबकि जेनेरिक में इसी दवा के रेट 3.35 रुपए है। वहीं, एक 100 एमएल की कफ सीरप की ब्रांडेड कंपनी की कॉस्ट 33 रुपए है तो वहीं जेनेरिक में इसी फॉर्मूले की सीरप की कॉस्ट सिर्फ 13.30 रुपए है। ऐसी सैकड़ों दवाएं हैं जिनकी कई गुना कीमत मरीजों से ऐठी जाती है। लेकिन डॉक्टर ब्रांडेड दवाएं ही डॉक्टर निर्धारित करते हैं। सरकार भी मानती है कि ब्रांडेड दवाओं के रेट प्रमोशनल आफर्स के कारण महंगे होते हैं।  

ब्रांडेड दवाओं का मतलब  फार्मा कंपनियां नई दवाएं खोजती हैं तो उन्हें पेटेंट कराती है। यह पेटेंट हर जगह लागू होता है और कोई दूसरा उस कंपनी की बिना अनुमति के उस दवा को उसी फॉर्मूले पर नहीं बना सकता। पेटेंट का एक निश्चित समय होता है उसके बाद सरकार अन्य कंपनियों के लिए उस दवा बनाने का अधिकार दे देती है। पेटेंट अवधि समाप्त होने पर एक कंपनी का एकाधिकार समाप्त हो जाता है।

अलग-अलग कंपनियां जब एक ही दवा बनाती हैं, तो वही दवा सस्ती हो जाती है।  दवा के प्रभाव की जांच करने का नियम नहीं  ढुलमुल नियमों के कारण ही मरीजों को सही दवाएं नही मिल पाती हैं। जानकारी के मुताबिक हमारे यहां दवाओं के प्रभाव जांच करने का कोई नियम नहीं है। सरकार के नियम से तो दवाएं सही बनती है लेकिन जब दवाएं बज़ारों में आती हैं तो घटिया किस्म की दवाओं को भी सप्लाई कर दिया जाता है। न तो नेशनल लेवल पर और न ही स्टेट लेवल पर दवाओं को चेक करने का कोई मशीन है।

 जेनरिक दवाओं का कांसेप्ट तो अच्छा है लेकिन स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की मिली भगत से 10 रुपए वाली जेनरिक दवा पर 50 रुपए एमआरपी डालकर बेचा जाता है। वहीं ब्रांडेड में 28 रुपए वाली दवा का प्रिंट रेट 30 से 35 ही होता है। उन्होंने बताया कि जब तक दवाओं की गुणवत्ता पर कंट्रोल नहीं होगा मरीजों को सस्ती दवाएं मिलनी मुश्किल हैं। फार्मा कंपनियों और डॉक्टर्स मरीजों को ऐसे ही चूना लगाते रहेंगे।

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