सुलेमानी कि मौत पर अमेरिका के विरुद्ध एक हुए ईरान और इराक

स्वतंत्र प्रभात –

जैसा कि सभी जानते है कि ईरान के जनरल कासिम सुलेमानी को हवाई हमले में मारकर अमेरिका ने पूरी दुनिया में हलचल पैदा कर दी है। ईरान ने बदला लेने कि कसम खायी है क्यूँकि देश के दूसरे सबसे ताकतवर शख्स की अमेरिका के हाथों हत्या कर दी गयी। ईरान के इस रुख के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ कठोरतम एक्शन की धमकी दे रहे हैं। इस बीच इराक ने अमेरिका को बड़ा झटका दिया है।

अभी इराक की संसद में एक प्रस्ताव पास किया गया है। यह प्रस्ताव रखा गया है कि विदेशी सैनिकों को इराक की धरती से बाहर किया जाए। जैसे ही यह प्रस्ताव पास हुआ डोनाल्ड ट्रंप भड़क गए और उन्होंने इराक को भी नहीं बख्शा। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अगर इराक ने अमेरिकी सेना को बाहर जाने के लिए बाध्य किया तो उस पर ऐसे प्रतिबंध लगाए जाएंगे जिसका सामना उसने कभी नहीं किया होगा।

सबसे दिलचस्प बात यहाँ ये है कि अमेरिका के करीबी रहे इराक की सरकार ट्रंप की धमकियों के बावजूद न सिर्फ सुलेमानी की हत्या की आलोचना कर रही है, बल्कि उसकी संसद ने अमेरिकी सैनिकों को इराक की धरती से बाहर करने का प्रस्ताव पास कर प्रत्यक्ष तौर पर ईरान की मदद की हुंकार भी भर दी है। ऐसे में अगर इराकी संसद में पास किया गया प्रस्ताव अमल में लाया जाता है और इराक की सरकार अमेरिकी सैनिकों को अपनी धरती से हटा देती है तो ईरान से जंग के मुहाने पर खड़े ट्रंप के लिए गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।

क्या घिर जाएगा अमेरिका !

अगर ऐसा होता है तो इराक पूरी तरह से अपनी धरती और आसमान को अमेरिका के लिए बंद करने का निर्णय लेगा तो ट्रंप प्रशासन के लिए युद्ध की स्थिति में ईरान पर अटैक उतना आसान नहीं होगा। अगर भौगोलिक नजरिए से देखा जाए तो ईरान की सीमा से सटे सबसे नजदीकी और बड़े देश इराक, पाकिस्तान, तुर्की और अफगानिस्तान हैं। हैरानी की बात ये है कि पाकिस्तान ने भी अमेरिका को आंख दिखानी शुरू कर दी हैं और पाकिस्तानी सेना ने साफ कहा है कि वह किसी भी देश को युद्ध के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देगा। तुर्की ने भी कासिम सुलेमानी की मौत को सही नहीं ठहराया है। ऐसे में ईरान से सटे देशों में अमेरिका के पास मदद के लिए फिलहाल खुलेतौर पर सऊदी अरब खड़ा नजर आ रहा है।

जानिए, ईरान का साथ क्यों दे रहा इराक?

सबसे ज्यादा हैरानी की बात ये है कि पूरी दुनिया में जिस ईरान और इराक की दुश्मनी हमेशा से चर्चा का विषय रहती है, वही दोनों देश कासिम सुलेमानी की मौत के बाद एक मंच पर आते दिखाई दे रहे हैं। 80 के दशक में हुआ ईरान-इराक का युद्ध आज भी दुनिया की चर्चित घटनाओं में शुमार किया जाता है। 2003 में हत्या के पहले तक सद्दाम हुसैन के नेतृत्व में इराक हमेशा ईरान के खिलाफ खड़ा रहा। इसके बाद इराक में जब ISIS ने जन्म लिया तो उससे लड़ने के लिए अमेरिकी फौज इराक में उतर गई। और इराक पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर हो गया।

अभी ताजा हालात ये हैं कि इराक से ISIS का समाप्त हो चुका है, और यहां तक कि अबु बकर अल बगदादी को भी अमेरिका ने मार गिराया है। फिलहाल, अमेरिकी सेना इराक के सैनिकों को ट्रेनिंग दे रही है, लेकिन कासिम सुलेमानी की मौत पर इराक अमेरिका के सामने आकर खड़ा हो गया है। फिलहाल, पांच हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक इराक में हैं।

पीएम अल महदी हैं वजह?

इस पूरे मामले में यहां के प्रधानमंत्री अब्दुल अल महदी को भी माना जा रहा है। ईरान दुनिया का इकलौता शिया मुस्लिम बहुल देश है, जहां की सत्ता हमेशा शियाओं के हाथों में रहती है। जबकि इराक में शिया-सुन्नी की लगभग बराबर आबादी होने के बावजूद यहां सुन्नी शासकों का राज रहा है। सद्दान हुसैन खुद एक सुन्नी मुसलमान थे। जबकि मौजूदा प्रधानमंत्री अब्दुल अल महदी न सिर्फ शिया मुस्लिम हैं, बल्कि वो ईरान के इस्लामिक रिपब्लिक की विचारधारा के भी समर्थक हैं। अब्दुल महदी के पिता खुद एक शिया धर्मगुरु रहे हैं।

कासिम सुलेमानी की मौत सिर्फ ईरान के किसी जनरल की हत्या नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया का शिया समुदाय अमेरिका की इस कार्रवाई का विरोध कर रहा है। इराक में भी जब कासिम सुलेमानी का जनाजा निकाला गया तो वहां की सड़कों पर जनसैलाब देखा गया। इस तरह कासिम सुलेमानी की मौत शिया समुदाय के लिए एक भावनात्मक मुद्दे के तौर पर भी देखी जा रही है। शायद यही वजह है कि रविवार को इराक की संसद में भी इसका असर दिखाई दिया जब इराक की धरती से अमेरिकी सैनिकों को वापस भेजने का प्रस्ताव पास किया गया।

प्रधानमंत्री अब्दुल अली महदी ने खुद संसद में कहा कि सरकार के पास दो विकल्प हैं, पहला ये कि इराक से विदेशी सैनिकों को हटाया जाए और दूसरा ये कि विदेशी सैनिकों को सिर्फ इराकी सेना की ट्रेनिंग तक सीमित रखा जाए। ये दो विकल्प बताते हुए महदी ने कहा, ‘प्रधानमंत्री और सुरक्षाबलों का सुप्रीम कमांडर होने के नाते मैंने पहला विकल्प चुनने के लिए कहा।’

हालांकि, ऐसा करना इराक के लिए आसान भी नहीं होगा। यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है और यूएस आर्मी की मौजूदगी पर इस प्रस्ताव का कोई असर नहीं पड़ेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर विदेशी सैनिकों को इराक बाहर करना चाहता है तो इसके लिए उसे नया बिल लाना होगा और समझौता खत्म करना होगा। अब सबकी नजर इस बात पर है कि अब्दुल अल महदी ने विदेशी सैनिकों को बाहर करने का जो विकल्प चुना है, उस पर अमल कब तक हो पाता है।