“तुम यहां अपवाद हो”

लेखिका-सीता सिंह “अंशु” अधिवक्ता

कहने को तो ये शब्द किसी के द्वारा कटाक्ष में कहे गए , मगर इस एक शब्द ने मेरे अब तक के सम्पूर्ण जीवन के यथार्थ से आज मेरा सात्क्षत्कार करा दिया साथ ही पूरा इतिहास भूगोल उलट-पुलट कर भी रख दिया…..और अंततः अंतरात्मा ने भी स्वीकारोक्ति दे ही दी कि मैं अपवाद ही हूँ …. मैं अपवाद आज से नही बल्कि बचपन से ही हूँ 6 -7 साल की उम्र में जब मेरी माँ कैंसर से मरी तो नात रिश्तेदार और पड़ोसी तरश खाते और बोलते ओह ! छोट छोट बच्चा छोड़ के मर गयी ऐसा किसी ने नही सुना था अब तक ,

कोई शरीर को छू कर हाथ फेर कर बोलता “टुवर टावर हो गईलजा बाबू …..तब भी मैं अपवाद थी क्योंकि पास पड़ोस नात रिश्तेदार में किसी की माँ कैंसर से नही मरी थी वो भी छोटे छोटे बच्चे छोड़ कर. ….. अपवाद मैं तब भी जब कक्षा 3 में पढ़ती थी और क्लास भर में सबसे लंबी होने के बाद भी हिंदी (सभी विषय मे कमजोर थी)पढ़ने नही आती थी…….बैक बेंच पर खड़े रहने की शर्म से खुद के लिए ट्यूशन टीचर रखना और खुद की पिटाई के लिए स्टडी टेबल पर डंडा भी खुद ही रखना भी अपवाद था..

मैं तब भी अपवाद थी जब पारिवारिक कलह झेलते-झेलते ,अंदर ही अंदर घुटते-घुटते 6 साल बाद पिता जी भी गुजर गए लोग कहते थे बाबू साहब लाखो करोडो की संपत्ति बिजनेस व्यापार खडा किये लेकिन बच्चियों के लिए कुछ नही किये (जाने लोगों को क्या चाहिए था) लोग हमारी परिस्थितयों पे मज़े लेते थे……..

सबसे बड़ा अपवाद मैं तब रही जब पहली बार मैंने 1998 में अपने सगे रक्त सम्बन्धीयों द्वारा बचपन से किये जा रहे शारीरिक प्रताड़ना व मानसिक उत्पीड़न के खिलाफ पहली बार आवाज उठाई और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक दावा शेरपा सर को दरखास्त दी……..तब मेरे पूरे खानदान पूरे समाज में भूचाल आ गया था मगर कभी किसी ने नही पूछा था कि ऐसा क्यों किया तब पैसा, दारू ,बोटी बड़ी ताकतवर थी………उत्पीड़क शहंशाह , समाज मूकदर्शक, और रिश्तेदार मतलब परस्त बने रहे…….उस वक्त में उस उम्र में थाने में खड़े होकर अपनी बात/व्यथा कहना, किसी अपवाद से कम नही था, अतिशय उत्पीड़न व प्रताड़ना, अतिशय लांक्षन, अतिशय संघर्ष ने मुझे हमेशा अपवाद बनाये रखा……

मेरे एक और अपवाद की कहानी 2001 से शुरू हुई जब “शिक्षा मेरे लिए भिक्षा” समान होती चली गयी उदित नारायण पोस्ट ग्रेजुएट कालेज में ….मेरे साथ की लड़कियां ग्रेजुएशन करके शादी- व्याह करके बाल-बच्चों वाली हो गयी और मैं अपनी शिक्षा के लिए संघर्ष पे संघर्ष करती रह गयी।

2001 से 2008 तक “हाइपर एग्जाम फोबिया” (एक ऐसी मनोदशा जिसने मेरे अतिशय संघर्षमय जीवन के कारण मुझे अपना ग्रास बना लिया था और तनाव के कारण परीक्षा के समय बुरी तरह बीमार कर देता था)…5 साल नियमित फार्म भरना, नोट्स बनाना,पढ़ना फिर भी परीक्षा ना दे पाना और बिना फेल हुए 3 साल की डिग्री 8 साल पाना अपवाद नही तो क्या था।

अंततः खुद का मनोविज्ञान समझने के लिए कॉलेज बदलना मनोविज्ञान पढ़ना ,खुद को समझना, दोस्तों परिचितों की मदद लेना, उस उम्र में NCC जॉइन कर बतौर सीनियर अंडर अफसर अपनी उम्र से छोटी उम्र की लड़कियों को ड्रिल कराना / ट्रेकिंग पर जाना वो भी पैंट शर्ट (यूनिफार्म) पहनकर अपवाद ही तो था मेरे लिए
2008 में वकालत की पढ़ाई छोड़ना विवाह करना0पहले से भी ज्यादा विपरीत परिस्थितियो में फिर से वकालत की पढ़ाई करना… वकील बनना….राजनीति से नफरत होने के बाबजूद राजनीति में आ जाना ……..और अपनी पहचान खुद बनाना ……सब कुछ अपवाद ही तो है…..

मैं तब भी अपवाद थी मैं आज भी अपवाद हूँ , भविष्य ???….

मैं अपने पूरे जीवन हमेशा असफल रही,लेकिन मेरे जीवन की असफलताओं में इतनी ताकत कभी नही रही कि वो मुझे रोक दें,या फिर मेरे आत्मबल को तोड़ दें, ……..

ऐसा भी नही था कि असफलताएँ मुझे तोड़ती नही थी मुझे रुलाती नही थी,मुझे बेबस या लाचार नही करती थी, या लोग मेरे पैर नही खिंचते थे या मैंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नही मारी ??

मगर मैंने कभी खुद से हार नही मानी, संघर्ष किया……
औऱ आज मैं कह सकती हूँ मेरी असफलताएँ ही मेरी मार्गदशक थी/हैं और मेरी असफलताओं ने ही मुझे मजबूत बनाया मुझे खड़ा किया।

मगर मुझे एक बात समझ नही आई कि मेरी सफलता या मेरी असफलता लोगों के मानमर्दन कारण कब बन गयी या उनके अहम या सम्मान से कब जुड़ गई,

खैर ! मैं अपवाद हूँ मुझे यह सहर्ष स्वीकार्य है
एक पल के लिए भले ही कटाक्ष ने मेरे आखों में आँसू दिये हो …..मगर मेरे यथार्थ से मेरा सात्क्षत्कार तो करा ही दिया।

अब सोच रही हूँ कि मैं अपवाद होकर ऐसी हूँ तो सामान्य होकर मैं कैसी होती ???

यकीन मानें हौसलों में भी इतना हौसला नही कि मेरा हौसला तोड़ दें……।
“थैंक यू जिंदगी”

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