विश्व साक्षरता दिवस :: ना कोई योजना ,ना कोई पहल कैसे मिटेगा फिर निरक्षरता का कंलक

विश्व साक्षरता दिवस :: ना कोई योजना ,ना कोई पहल कैसे मिटेगा फिर निरक्षरता का कंलक

◆निरक्षरों के जीवन मे साक्षरता की जोत जलाने वाला साक्षर भारत मिशन कर दिया था मार्च 2018 मे बंद
◆देश के 3 लाख 20 हजार साक्षरता कर्मचारी देख रहे है पुनः बहाली की आश
◆आजादी के बाद देश में साक्षरता दर 57 फीसदी तक बढ़ी
◆यूनेस्को के मुताबिक भारत में सबसे ज्यादा अनपढ़ लोग
◆भारत में लगभग 28 करोड़ लोग अशिक्षित
भगवत कौशिक।
 8 सितंबर यानी विश्व साक्षरता दिवस। विश्व में शिक्षा के महत्व के दर्शाने और निरक्षरता को समाप्त करने के उद्देश्य से 17 नवंबर 1965 को यह निर्णय लिया गया, कि प्रत्येक वर्ष 8 सि‍तंबर को विश्व साक्षरता दिवस के रूप मे मनाया जाएगा। तभी से हर वर्ष 8 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस मनाया जाता है।

■साक्षरता का अर्थ-
साक्षरता सिर्फ किताबी शिक्षा प्राप्त करने तक ही सीमित नहीं होती बल्कि साक्षरता का तात्पर्य लोगों में उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूकता लाकर सामाजिक विकास का आधार बनाना है। साक्षरता गरीबी उन्मूलन, लिंग अनुपात सुधारने, भ्रष्टाचार और आतंकवाद से निपटने में सहायक और समर्थ है।आज विश्व में साक्षरता दर सुधरी जरूर है फिर भी शत-प्रतिशत से यह कोसों दूर है।
भारत में साक्षरता दर के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले होने के साथ-साथ काफी परेशान करने वाले हैं। यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट के अनुसार भारत को वर्ष 2050 में प्राइमरी शिक्षा, 2060 में माध्यमिक शिक्षा और 2085 में उच्च माध्यमिक शिक्षा का वैश्विक लक्ष्य हासिल करने में कामयाब होगा। 
■ वर्ष 2018 मे साक्षर भारत मिशन हुआ बंद –
2011 की जनसंख्या के बाद देश के 25 राज्यों व एक केंद्र शाशित प्रदेश के 365 जिलो के 4263 ब्लाकों की 157875 ग्राम पंचायतों जहां महिला साक्षरता दर 50 प्रतिशत से कम थी वहा साक्षर भारत मिशन के तहत पढना लिखना कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए ,लेकिन  मार्च 2018 मे साक्षर भारत मिशन को बंद कर दिया गया तब से देश मे निरक्षरों को साक्षर बनाने की कोई कार्ययोजना शुरू नहीं हो पाई।
■ देश के 3 लाख 20 हजार पूर्व साक्षरता कर्मचारी जोट रहे है पुनः नियुक्ति की आश –
साक्षर भारत मिशन को बंद करने के बाद इसमे काम करने वाले शिक्षा प्रेरक, ब्लाक संमन्यवक व अन्य कर्मचारीयों को सरकार ने मार्च 2018 मे घर का रास्ता दिखा दिया वहीं हरियाणा जैसे राज्य ने तो वर्ष 2017 मे ही बजट ना होने का हवाला देकर कर्मचारियों को घर का रास्ता दिखा दिया।तभी ये साक्षरता यौद्धा अपनी बहाली की मांगो को लेकर आंदोलन कर रहे है।
■ क्या कहते है साक्षरता यौद्धा –
◆इस बारे मे अखिल भारतीय साक्षरता संघ के राष्ट्रीय प्रवक्ता भगवत कौशिक ने बताया कि देश की साक्षरता दर को बढाने मे शिक्षा प्रेरको का योगदान अतुलनीय है।लेकिन सरकार ने पांच साल कार्य करवाकर इन प्रेरकों को घर का रास्ता दिखा दिया।शिक्षा प्रेरक सरकार से मांग करते है कि देश मे निरक्षरता को जड से मिटाने के लिए पुनः साक्षरता कार्यक्रम शुरू करके साक्षरता कर्मचारियों को बहाल करना चाहिए।
◆वहीं प्रेरक संघ हरियाणा के राज्य प्रधान कर्ण सिंह नारनौल ने बताया कि आज हरियाणा सहित देश के लाखों शिक्षा प्रेरक दर दर की ठोंकरे खाने पर मजबूर है।हम सरकार से पुनः बहाली की मांग करते है।शिक्षा प्रेरको की बदौलत ही सरकार ने साक्षरता परीक्षा मे चीन के विश्व रिकॉर्ड को तोडकर नंबर वन का स्थान हासिल किया । जन धन खातें व स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाने में शिक्षा प्रेरको की अहम भूमिका रही है।

■ भारत में क्‍या है स्‍थिति-
◆2018 में जारी एमएचआरडी की शैक्षिक सांख्यिकी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की साक्षरता दर 69.1% है। यह नंबर गांव और शहर दोनों को मिलाकर है। ग्रामीण भारत में साक्षरता दर 64.7 पर्सेंट है जिसमें महिलाओं का लिटरेसी रेट 56.8% तो पुरुषों का 72.3% है। बात करें शहरी भारत की तो इसमें साक्षरता दर 79.5 पर्सेंट है जिसमें 74.8% महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं। वहीं, 83.7 पुरुष पढ़े-लिखे हैं।
◆वैश्विक निगरानी रिपोर्ट के अनुसार हर पांच में से एक पुरुष और दो तिहाई महिलाएं अनपढ़ है। जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 82.1 फीसदी पुरुष और 64.4 फीसदी महिलाएं ही साक्षर हैं। साक्षरता का यह आंकड़ा पिछले दस वर्षों में बढ़ा तो है लेकिन इसकी खास बात है कि साक्षरता दर में महिलाओं का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है।
अगर हम आजादी से वर्तमान साक्षरता दर का आंकलन करें तो स्थिति थोड़ी बेहतर हैं। आजादी के बाद से देश में साक्षरता का ग्राफ 57 प्रतिशत बढ़ा है लेकिन इसके बावजूद भी हम वैश्विक स्तर पर काफी पिछड़े हैं।  एक जानकारी के अनुसार भारत की साक्षरता दर विश्व की साक्षरता दर 84% से बेहद कम है। हालांकि देश में शुरू किए गए सर्व शिक्षा अभियान और साक्षर भारत के जरिए इस दिशा में सार्थक कदम उठाए जा गए हैं। वर्ष 2011 में हुई जनगणना के अनुसार भारत में साक्षरता दर 75.06% है। वहीं, आजादी के दौरान यानि वर्ष 1947 में यह महज 18 फीसदी थी। इस तरह हम कह सकते हैं कि हमारी स्थिति पहले के मुकाबले थोड़ी बेहतर हुई है। 

■ साक्षरता दर में भी लैंगिक असमानता –
देश में महिलाओं और पुरुषों के बीच सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में भेदभाव किया जाता रहा है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि महिलाएं शिक्षा के क्षेत्र में भी भेदभाव का सामना करती हैं। देश में महिलाओं की तुलना में पुरुष अधिक साक्षर हैं। पुरुषों की साक्षरता दर 82.14 फीसदी है। वहीं महिलाओं की साक्षरता दर 65.46 फीसदी है। अगर पड़ोसी देशों की बात करें तो उनमें भारत की स्थिति सबसे बेहतर है। वहीं विकसित देशों के मुकाबले भारत एक पिछड़ा देश ही है।
■ पड़ोसी देशों के मुकाबले भारत की साक्षरता दर की स्थिति अच्छी-
साक्षरता दर के मामले में भारत की स्थिति पड़ोसी देशों से थोड़ी अच्छी है। भले ही भारत साक्षरता दर के मामले में विकसित देशों की सूची में बहुत पीछे हैं, लेकिन विकासशील देशों की सूची में उसकी स्थिति बेहतर है। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में जहां 79% पुरुष 61% महिला और 71% युवा साक्षर हैं, वहीं भारत में इसके मुकाबले पुरुष 88%, महिला 74% और युवा पीढ़ी 81% साक्षर हैं। अगर हम अपने एक और पड़ोसी देश यानि नेपाल की बात करें तो यह मुल्क भारत से बराबरी जरूर कर रहा है। यहां पुरुष 88%, महिलाएं 78% और युवा पीढ़ी 83 % साक्षर है। 
वहीं, गरीब देश माने जाने वाला भूटान भी भारत से ज्यादा पीछे नहीं है। यहां 80% पुरुष, 68% महिलाएं और 74% युवा साक्षर हैं। वही, साक्षरता दर के मामले में बांग्लादेश की हालत बहुत अच्छे नहीं है फिर भी वो भारत से बहुत ज्यादा पीछे नही है। यहां पुरुषों की साक्षरता दर 75%, महिलाओं की 78% और युवाओं की 77% है।

लेकिन इन सब के बावजूद “दिल्ली अभी दूर” ही दिख रही है। देश के बच्चे आज भी स्कूलों की बजाय चाय या कारखाने में देखे जाते हैं. देश में शिक्षा का कानून तो लागू कर दिया गया है पर उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों जहां गरीबी अधिक है वहां इसके सफल होने में काफी मुश्किलें आ सकती हैं।
देश में कम साक्षरता दर का एक कारण शिक्षा प्राप्त लोगों का भी बेरोजगार होना है। एक गरीब आदमी जब एक साक्षर आदमी को नौकरी की तलाश में भटकते हुए देखता है तो वह सोचता है कि इससे बढ़िया तो मैं हूं जो बिना पढ़े कम से कम काम तो कर रहा हूं और वह अपनी इसी सोच के साथ अपने बच्चों को भी शिक्षा की जगह काम करना सिखाता है. हमारे यहां की शिक्षा व्यवस्था में प्रयोगवादी सोच की कमी है. यहां थ्योरी तो बहुत ही बढ़िया ढंग से पढ़ा दी जाती है पर उसे असल जिंदगी में कैसे अमल लाया जाए यह सिखाने में चूक हो जाती है। जो बच्चे इंजीनियरिंग या कोई कोर्स आदि कर लेते हैं वह तो सफल हो जाते हैं पर जिसने बी.ए. आदि की डिग्री ली हो उसके लिए राहें कठिन होती हैं. देश की सरकार को समझना होगा कि सिर्फ साक्षर बनाने से लोगों का पेट नहीं भरेगा बल्कि शिक्षा के साथ कुछ ऐसा भी सिखाना होगा जिससे बच्चे आगे जाकर अपना पेट पाल सकें।
आज विश्व आगे बढ़ता जा रहा है और अगर भारत को भी प्रगति की राह पर कदम से कदम मिलाकर चलना है तो साक्षरता दर में वृद्धि करनी ही होगी।

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