कौन ईमानदार (लघुकथा)

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स्वतंत्र प्रभात :
सीमा, घर में घुसते ही सीधे माँ के कमरे में चली गयी  और थोड़ी ही देर में ‘भाभी.. भाभी… ‘ आवाज़ लगाने लगी।  रसोई छोड निधि घबड़ाकर सीधे माँ के कमरें में भागी, क्योंकि उसको मालूम था कि अभी घर में हंगामा होने वाला है। वह बड़ी नन्द जो आई है!
“भाभी माँ का डाईपर तो बदल दिया करो! इस तरह किसी लाचार व्यक्ति को परेशान करना ठीक नहीं! ” नन्दी की कर्कश आवाज को सुन वह सासू माँ का डाईपर बदलने को आगे बढ़ी, तो देखा चादर और गद्दा भी न जाने कैसे गंदा हो चुका था। माँ के भारी शरीर को उठाकर चद्दर बदलना उसके अकेले  वश में कहाँ? अतः वह नन्दी से सहायता मांगने के लिये पीछे मुड़ी तो देखा वह आँगन में खड़ी मुन्ने से कह रही थी, “बेटा मैं तो नहाकर आई हूँ… जा, ज़रा माँ की सहायता कर! ” निधि चुपचाप अकेले ही सासू माँ की सेवा में जुट गयी।
-रचना सक्सेना (प्रयागराज)

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