हम इतना नीचे लुढ़के जितना पहले कभी नहीं फिसले

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स्वतंत्र प्रभात

आज स्थिति यह है कि भारत कोविड -19 की वैक्सीन बनाने की तैयारी में तकनीकी क्षेत्र में कामयाबी हासिल करने की कोशिश कर रहा है।दरअसल जब कोरोना अपनी प्रारम्भिक अवस्था में था तब सम्पूर्ण विश्व भारत के तरफ़ आशा भरी निगाहों से देख रहा था लेकिन उस वक्त भारत में कोरोना का प्रकोप कोई ज्यादा नहीं था।  पर अब हम  जिस तेजी के साथ सर्वाधिक पीड़ित देश होने की ओर बढ़ रहे हैं तो हम इस दाग को केवल वैक्सीन को विकसित करके ही मिटा सकते हैं। जाहिर है भारत को अपनी वैक्सीन भी विकसित करनी होगी और बड़े पैमाने पर उसका उत्पादन भी करना होगा।यह बताने की जरूरत नहीं है कि हम एक ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जहां तरह-तरह के संकटों से हम घिरे हुए हैं। यह गतिरोध कब खत्म होगा तथा इन संकटों का सामना करने के लिए इसकी क्या किमत चुकानी पड़ सकती हैं कोई नहीं जानता। क्योंकि यह महामारी अभी तक लाइलाज है और संसार की समूची व्यवस्था इससे आक्रांत है।

एक तो हम पहले से ही खास्ता हाल में थे और दूसरा जैसे कि कोविड-19 ने हमें एक ऐसे ढलान पर लाकर खड़ा करके पीछे से धक्का लगा रखा हो। नतीजतन हम इतना नीचे लुढ़के जितना पहले कभी नहीं फिसले थे। अर्थात हमारी देश की अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी दर अत्यन्त भयावह स्तर पर  जा गिरी  है तथा आने वाले समय में यह अर्थव्यवस्था बड़े ही बुरे चक्र में फंसने जा रही है ।इसमें कोई सन्देह नहीं कि आर्थिक स्थिति का जो भी रूप बिगड़े हैं उनके पीछे कोरोना संकट एक बड़ा कारण रहा है। परन्तु यह अवश्य ध्यान देने योग्य बात है कि इस आर्थिक तबाही का कारण केवल कोरोना महामारी ही नहीं है बल्कि इस आर्थिक संकट की वजह सरकार की नाकाम नीतियां हैं। सरकार ने इस महामारी का बहाना बनाकर अपनी विफलताओं पर पर्दा डालने में जुटी हैं भले ही कोरोना ने बेशक उसमें घी डालने का काम किया है । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी अर्थव्यवस्था कोविड-19 के पहले से ही सबसे ख़राब स्थिति में थी।

हम जो संकट देख रहे हैं उसके शिकंजे में हमारी पूरी अर्थव्यवस्था है । वास्तविकता यह है कि जितनी हानि  कोरोना वायरस जैसी वैश्विक महामारी ने देश को नहीं पहुंचाई है उससे  कहीं ज्यादा इस समय आर्थिक तंगी से हो रही है।इसके लिए बहुत गहराई में जाने की जरूरत नहीं है खुली आंखों से देश की आर्थिक हालात को देखा-समझा जा सकता है।यह स्पष्ट है कि अब हमें अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए और अधिक जोर लगाना पड़ेगा। वैसे भी हमें कोविड-19 पर और अधिक प्रभावी नियंत्रण पाने के लिए  एवं इसकी प्रकृति को समझने के लिए अध्ययन व अनुसंधान के साथ दो कदम आगे सोचने की जरूरत है।  हम जानते है कि इन्सान अपने हालात के साथ तेजी से तालमेल बिठा लेता है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इस महामारी की गम्भीरता कम हो गई है या इसे लेकर किसी तरह की लापरवाही को नजरंदाज कर दिया जाए।सच में पूछा जाए तो कोविड-19 ने  न केवल हमारे जीने के सलीके और आदतों को बदला है अपितु  हमारे सोचने का तरीका भी बदल डाला है।

कोरोना के इस दौर में बुरी स्थिति सिर्फ हमारी ही नहीं बल्कि ऐसे कई देश की है जो इस लड़ाई को बड़ी सूझ-बूझ और सही रणनीति के साथ लड़ रहे हैं।परन्तु अफ़सोस यह है कि इतना सब करने के बावजूद कोरोना के मामलों में  आज हमारा देश  दुनियां में दूसरे स्थान पर है। जबकि हमारे देश ने इस महामारी के दौरान दुनियां के साथ अपनी एकजुटता भी दिखाई है और जरूरतमंदों को सुविधा मुहैया कराई है लेकिन दुःख इस बात का है कि जरूरतमंदों की परेशानी और चिंता का बहुत फायदा उठाया गया है।कोरोना मरीजों को अस्पताल पहुंचाते हुए जिस तरह से लुटा जा रहा है यह कोई छिपी बात नहीं है।कोरोना के समय में विशेषज्ञों द्वारा जो दिशा -निर्देश जारी किए गए हैं उसकी अवहेलना भी साफतौर पर दिखाई देती हैं। 

खास तौर पर जिन देशों ने संक्रमण से बचाव के उपायों के साथ शुरूआती दौर में ही ज्यादा से ज्यादा जांच का रास्ता अपनाया वे आज बेहतर स्थिति में है। लेकिन हमारे देश के लिए राहत की एक बात यह है कि संक्रमितों की मृत्यु दर नीचे आ गई है और रिकवरी रेट बढ़ रहा है।हाल के दिनों में सुधरते आंकड़ों का एक बड़ा असर यह पड़ा है कि लोगों के अन्दर हालात के तेजी से सामान्य होने की संभावना और उम्मीद बढ़ी है।हालांकि महामारी से हमारी लड़ाई अभी काफी कठिन मोड़ पर है। यह बहुत ही चिंताजनक विषय है अगर हालात जल्द नहीं सुधरे तो आने वाले दिनों में हमें भयानक स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए अभी काफी सावधानी बरतने की आवश्यकता है तथा सरकार को सुनियोजित रणनीति बनाकर काम करने की आवश्यकता है।आज आवश्यकता है कि हम परिस्थिति की गम्भीरता को समझते हुए अपने विवेक का पूर्ण इस्तेमाल करें और सरकार द्वारा जारी सभी दिशा-निर्देशों का अक्षरशः पालन करें।महामारी के खत्म होने के बाद भी दुनियां को स्वास्थ्य के और बड़े संकट का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि जीवन चलने का ही नाम है। मसलें मुश्किलें एवं संघर्ष मानव जीवन का एक हिस्सा है।