समझ लो, लात के दुश्मन, कभी ना, बात मानेंगे !

समझ-लो,-लात-के-दुश्मन,-कभी-ना,-बात-मानेंगे

समझ लो, लात के दुश्मन,
कभी ना, बात मानेंगे !
कभी लद्दाख, कभी सिक्किम,
पर कायर, हाथ डालेंगे !!
हमें है, जागते रहना,
जिमपिंग, सुअर का बच्चा है !
चाहे गोदी में, भर लो तुम,
नहीं नीयत का, अच्छा है !!
उसको उठाकर, पटक दो जो,
तब भी वह, चिखे-चिल्लायेगा !
यदि चाहो तुम, सहलाना,
उल्टे, तुम्हे ही, काट खाएगा !!
हमारे वीर-बलिदानी, है सींचा,
लहू से गलवान, की, घाटी !
जिमपिंग, हट जाओ तुम पीछे,
वर्ना, मयस्सर ना, तुम्हें माटी !!
कहे अमरेश, सुनों बुजदिल,
है भारत, नाम, दानी का !
है, हशरत, काटूं तेरा मस्तक,
या, सजा दूं, कालापानी का !!
– रचना,
अमरेश कुमार सिंह,
(पूर्व रेडियो-दूरदर्शन,आर्टिस्ट)

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