लेखकीय संघर्ष में कोई बाइपास नहीं होता

shimla

पुस्तक-समीक्षा

जिसे आज ‘पहाड़ों की रानी’ कहा जाता है, वह कभी उत्तरी भारत के इस हिमालयी राज्य का एक छोटा-सा गाँव हुआ करता था। अँग्रेज़ों को इस पहाड़ी क्षेत्र में अपने देश की तस्वीर दिखती थी। उन्हें यह जगह इतनी पसंद आई की उन्होंने इसे हू-ब-हू इंग्लैंड के शहर की शक्ल देने की भरपूर कोशिश की। इस तरह सन् 1830 में ‘शिमला’ को एक शहर की तरह बसाने की क़वायद शुरू हुई। तब से लेकर आज तक यह पर्यटकों के अतिरिक्त अनेकानेक रूपों में लेखकों, कलाकारों, शोधकर्ताओं को आकर्षित करता रहा है। यह चित्रकार अमृता शेरगिल, लेखक निर्मल वर्मा समेत दर्जनों विख्यात कलाधर्मियों का प्रवास व सृजनस्थली रहा है। इस शहर का जादू इस क़दर रचनाकारों के सर चढ़कर बोलता रहा है कि अनेकानेक उपन्यासों और कहानियों में यह शहर स्वयं ही एक अमूर्त पात्र की तरह उभरता है।

प्रमोद रंजन की नई किताब इसी शहर का एक निजी वृत्तांत है, जिसकी प्रस्तुत समीक्षा  शिमला में पिछले कुछ वर्षो से प्रवास कर रही मॉरीशस की हिन्दी अध्येता, आलोचक देविना अक्षयवर ने लिखी है :


‘शिमला डायरी’ : लेखकीय संघर्ष में कोई बाइपास नहीं होता

डॉ. देविना अक्षयवर                                                                                                             

शिमला! ‘क्वीन ऑफ़ द हिल्स!’ अँग्रेज़ों के ज़माने से ही इस नाम से प्रसिद्ध यह शहर अपने प्राकृतिक सौंदर्य, शीत जलवायु और ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विशेषताओं के चलते एक महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल रहा है। अमूमन हम शिमला को भी इसी रूप में जानते हैं और यही समझते हैं कि यह शहर तो मौज-मस्ती करने के लिए एक नायाब जगह है। लेकिन जब एक लेखक शिमला की घाटियों पर बसी एक व्यापक जन-आबादी को एक प्रबुद्ध लेंस से देखता है,  तो वह अपने पाठकों का ध्यान शिमला, ख़ासकर माल रोड के निचले हिस्से, लोअर बाज़ार, लक्कड़ बाज़ार, तिब्बती कॉलोनी के गली-कूचों की तरफ़ भी खींचता है, जहाँ प्रायः पर्यटकों की निगाह नहीं पड़ती। जहाँ छोटे-छोटे कमरों में, सीमित पानी-बिजली और अन्य मूलभूत सुविधाओं में एक श्रमिक वर्ग भी रहता है, जो आर्थिक संकट के चलते अपनी आजीविका कमाने के लिए, अपने प्रदेशों से पहाड़ों की रानी तक आकर प्रवास करने के लिए विवश हुआ है।

प्रमोद रंजन ने हाल में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘शिमला-डायरी’ में ऐसी अनेक अलक्षित ज़िन्दगियों का वर्णन किया है।

शिमला और हिमाचल से प्रमोद रंजन का गहरा नाता रहा है। वे अपनी युवावस्था के दिनों में यहाँ जीविका की तलाश में आए थे। पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा वर्ष 2003 से 2006 के बीच हिमाचल-प्रवास के दौरान लिखी गई उनकी निजी डायरी है। जैसा कि रंजन स्वयं मानते हैं कि यह उनकी मनःस्थितियों का ‘विरेचन’ भी है और साथ ही साथ ‘तात्कालिक मनोभावों, घटनाओं व परिवेशगत प्रभावों की प्राथमिकी’ भी। लेकिन इस प्राथमिकी में उन्होंने जितनी गहराई से समाज-व्यवस्था, मानव-मनोविज्ञान, राजनीतिक पाखंड आदि के अनेकानेक सूक्ष्म बिन्दुओं को दर्ज किया है, वह न सिर्फ़ भाषा के स्तर पर अद्भभुत है, बल्कि एक कालखंड का जीवंत इतिहास भी बन गया है।

डायरी के अतिरिक्त इस किताब में लेखक द्वारा लिखे गये कई आलोचनात्मक लेखों, कहानियों, कविताओं तथा हिमाचल प्रदेश के सुदूर क्षेत्रों के दौरों का दिलचस्प, ज्ञानवर्धक एवं तथाकथित आधुनिक दुनिया के लिए विचारोत्तेजक विषयों के संदर्भ में प्रचलित मौखिक इतिहास का भी संचय है। इस इतिहास में वे हिमाचल के सुदूर क्षेत्रों में प्रचलित ‘बहु-पति विवाह प्रथा’ में स्त्री-पुरूष संबंधों की जटिलताओं तथा हिमालयी बौद्ध धर्म के कर्मकांडी स्वरूप समेत बहु-सांस्कृतिक भारत की एक दुर्लभ बानगी का झरोखा पाठकों के सामने खोलते हैं।

किताब में लेखक की निजी डायरी ‘हम तो स्वप्नों की तलाश में गए थे, पहाड़ों की ओर’ शीर्षक से संकलित है। यूँ तो लेखक इसे हिमाचल प्रदेश की राजधानी में बसे एक युवा पत्रकार की हैसियत से लिखता है, जो अनेक सपनों के साथ अपने सुदूर प्रदेश, बिहार से आया है। लेकिन जैसे-जैसे वे पत्रकारिता की दुनिया की निचली तहों तक पहुँचते जाते हैं, उनका मोहभंग होता जाता है। एक लेखक के लिए पत्रकारिता और रचनात्मकता वैसे ही हैं, जैसे कि व्यास या सतलज नदी के दोनों किनारे, जो साथ-साथ तो चल सकते हैं, लेकिन एकमेक नहीं हो सकते। पत्रकारिता में व्यस्त लेखक की स्थिति को लेखक यूँ दर्शाते हैं – “करीं काम जो बेगारी, तब्बो हाथ न बिगारी।” लेखक आजीविका के निमित्त पत्रकारिता का हिस्सा तो बनता है, लेकिन उसमें अपनी रचनात्मकता का ख़ुराक ढूँढ़ने के अथक प्रयासों के बाद मायूस ही होता है। इसका ज्वलंत उदाहरण प्रमोद रंजन अपनी किताब के कहानी वाले भाग में ‘रामकीरत की रीढ़’ नामक अपनी कहानी के माध्यम से देते हैं। इस कहानी में वे बताते हैं कि किस प्रकार पत्रकार बिरादरी उन केकड़ों की तरह है जो अपने क्रकचों से समाज के कमज़ोर तबक़े को निशाना बनाते हैं, जबकि वास्तव में अपने निजी और व्यावसायिक जीवन में वे रीढ़विहीन होते हैं।

डायरी-लेखन के ज़रिये प्रमोद रंजन एक बुद्धिजीवी पत्रकार की बुनियादी चिन्ता दर्शाते हुए अनेक समसामयिक मुद्दों को रेखांकित करते हैं, मसलन- बग़ैर धर्म के नैतिकता की तलाश, धार्मिकता बनाम साम्प्रदायिकता का प्रश्न, अख़बारों की सनसनी बढ़ाने वाले अश्लील चित्र, सपनों का विज्ञान, बेरोज़गारी, आजीविका की तलाश में प्रवास, तीज-त्योहारों का औचित्य तथा प्रदेश, क्षेत्र भाषा वर्ण एवं जाति आदि के आधार पर भेद-भाव।

डायरी होने के बावजूद इसमें की गई साहित्यिक आलोचनाएँ और सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणियाँ बहुत सुचिन्तित हैं तथा चीज़ों को नये परिप्रेक्ष्य में देखने के लिए विवश करती हैं। जिन जटिलताओं से वर्तमान भारतीय समाज जूझ रहा है, उनमें से एक है ‘साम्प्रदायिकता’, जिसे लेखक समाज को लीलने वाली बीमारी मानता है। दरअसल, यह समस्या समसामयिक न होकर सर्वकालिक है, जिसमें हाल के वर्षों में तेज़ी से इज़ाफ़ा हुआ है। लेकिन कई वर्ष पहले की डायरी में इसका एक ठोस कारण देते हुए लेखक अपनी डायरी में दर्ज करते हैं – “सांप्रदायिक ख़बरों का छपना उतना बुरा नहीं है, जितना कि ख़बरों का सांप्रदायिक होना।” वे बड़ी बेबाकी से यह तथ्य रखते हैं कि आजकल के हिन्दी अख़बारों में तटस्थ लेखकीय सामग्री का दिवालियापन छाया हुआ है। इसी के चलते पाठक वर्ग के सामने किसी भी मुद्दे पर तटस्थ होकर सोचने- विचारने का अवसर ही नहीं छोड़ा जा रहा।

दरअसल स्वतंत्र, रचनात्मक लेखन और पत्रकारिता के बीच बुनियादी फ़र्क़ भी यही है कि स्वतंत्र लेखक किसी भी मुद्दे पर अपने स्वतंत्र विचार रख सकता है, लेकिन पत्रकार के निजी विचारों पर एक ख़ास व्यवस्था और उस व्यवस्था को मज़बूती से क़ायम करने वाली विचारधारा का दबाव तथा दबदबा रहता है। इसीलिए एक पत्रकार, जो कि साथ ही साथ रचनाकार भी बनना चाहता है, उसके लिए पेशे और रुझान के बीच एक अंतर्विरोध की स्थिति पैदा हो जाती है। एक ऐसी रस्साकशी, जिससे मुक्त हो पाना बेहद कठिन है। अंतत: लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि “लेखक और व्यवस्था मात्र का सम्बन्ध द्वंद्वात्मक ही हो सकता है, इनमें तारतम्य या समन्वय की गुंज़ाइश नहीं होती।”

अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में आने वाली चुनौतियों को सम्बोधित करते हुए श्री रंजन कई मनोवैज्ञानिक स्थितियों से गुज़रते हैं। कभी वे अपनी बेरोज़गारी और आर्थिक संकट से जूझते हैं, कभी वे परिवार के प्रति अपना उत्तरदायित्व न निभा पाने की आत्म-ग्लानि महसूस करते हैं। कभी बर्फ़ के फ़ाहों में उन्हें प्रकृति का जीवन-राग सुनाई देता है तो कभी वही बर्फ़ मृत्यु की शिथिलता का एहसास कराती है। अपने इन्हीं निजी अनुभवों की आँच में तपने के लिए लेखक कभी स्वयं कूद जाता है तो कभी उनसे दूरी बनाने का भी प्रयास करता है। अपनी डायरी के प्रथम पन्ने में वे एक बहुत ही दिलचस्प अनुभव साझा करते हैं – “मैं अब तक जहाँ-जहाँ भी रहा हूँ, बाइपास सड़क पर ही रहा हूँ। पटना में घर बाइपास पर, शिमला में ‘कच्ची घाटी’  बाइपास, और अब यह कमरा, दफ़्तर… सब एक बार फिर बाइपास पर ही है…।”  बाइपास! लेखक का जीवन ही किसी-न-किसी बाइपास से गुज़रता हुआ जान पड़ता है। उनकी जीवन-यात्रा जहाँ कहीं उबाऊ-सी जान पड़ने लगती है, वे किसी न किसी बाइपास का सहारा ले लेते हैं। कभी एकांत में जाकर, कभी सामाजिक होने के ख़याल से अपनी ही तरह के लोगों की तलाश करके, कभी आत्माभिव्यक्ति के लिए पत्रकारिता का चुनाव करके, तो कभी स्वतंत्र लेखन के लिए प्रकृति की शांत छाया में पनाह लेकर। इस आत्माभिव्यक्ति के बीच लेखक गाहे-बगाहे अपने बाइपास के हमराहियों से भी क्षण-भर के लिए मुख़ातिब होते हैं, कभी अरुण कमल, कभी रघुवीर सहाय, कभी कुमार अंबुज, कभी कुँवर नारायण तो कभी ख़ुद प्रमोद रंजन! लेकिन अंतत: वे पाते हैं कि न तो जीवन-संघर्ष का कोई बाइपास है, न ही लेखकीय संघर्ष का।

किताब में प्रकाशित ‘डायरी’ के अंत में वे अख़बारों की नौकरी को अलविदा कह देते हैं।
डायरी का यह अंतिम भाग प्रमोद के उस विकट, कठोर और ख़तरनाक निर्णय के बारे में दर्शाता है, जिसे हर उस लेखक को लेना चाहिए, जो अपने “स्व-भाव” को पाना चाहता है।

डायरी वाले भाग के अंतिम दिन – 1 मार्च, 2006 को प्रमोद लिखते हैं :
“शाम उतर रही है। रक्ताभ सूर्य अभी-अभी खिड़की के सामने वाले मकानों की ओट में चला गया। पहाड़ के शिखरों पर अभी लाल शेष है। धीरे-धीरे वह ग़ायब होगा। रात की शांति उतरती जाएगी… [शिमला से प्रकाशित सांध्य दैनिक] भारतेन्दु शिखर के साथ पूरा हुआ क्षेत्रीय पत्रकारिता, कथित मुख्यधारा की पत्रकारिता का मेरा चक्र आज पूरा हुआ। …तमाम विकल्पहीनता, दु:संभावनाओं के बावजूद इन अख़बारों की नौकरी छोड़ देने का मेरा निर्णय ठीक है। हालाँकि आज मदन कश्यप जी का पत्र मिला है। लिखते हैं, “मेरी राय मानिए, तो अभी नौकरी नहीं छोड़िए। मैं यह प्रयोग कर चुका हूँ और भुगत चुका हूँ”। पता है, मैं भी भुगतूँगा, लेकिन उस व्यवस्था के साथ कैसे रहा जा सकता है, जो मेरी मानसिक, शारीरिक बनावट को विषैला बनाती जा रही थी? …आज मुक्ति का पहला दिना था। शाम ढल चुकी है। रात का धुँधलका उतरने लगा है। धीरे-धीरे शांति उतरेगी। तन-मन में उनका विष धीरे-धीरे कम होता जाएगा। जल्दी ही सुबह होगी, मैं अपने स्व-भाव में लौट सकूँगा।”

पत्रकार, लेखक और शोधकर्ता, इन तीनों भूमिकाओं के बीच एक ख़ास रिश्ता होता है। बिना एक हुए दूसरा संपूर्ण हो ही नहीं सकता! इसका प्रमाण प्रमोद रंजन ख़ुद हैं। हिमाचल में रहते हुए उन्होंने जिस बारीक़ी से शिमला और उसके आस-पास के इलाक़ों का जायज़ा एक पत्रकार के रूप में लिया, उससे कहीं ज़्यादा चुनौतीपूर्ण काम वे कई सालों बाद – वर्ष 2017 और 2018 में हिमाचल प्रदेश के सीमान्त क्षेत्रों- लाहौल-स्फीति, चम्बा घाटी आदि के दौरे के ज़़रिये करते हैं। इस बार वे केवल एक लेखक या पत्रकार की भूमिका में नहीं, बल्कि एक शोधकर्ता के रूप में नज़र आते हैं। जिन क्षेत्रों को बौद्ध संस्कृति से पोषित, शांतिप्रिय और भेद-भाव की संस्कृति से रहित माना जाता है, वहाँ लेखक उस आदि संस्कृति की खोह तक पहुँचते हैं और निष्कर्ष के तौर पर यही पाते हैं कि चाहे पहाड़ी समाज की देव संस्कृति हो या फिर बौद्ध संस्कृति, सभी में कहीं-न-कहीं जातिगत वर्गीकरण के चलते आचरणगत भेद-भाव मौजूद है। इसी तरह स्त्रियों की स्वतंत्रता की आड़ में छुपी ‘बहु-विवाह प्रथा’ भी परिवार जैसी संस्था, उसके साथ संपत्ति पर एकछत्राधिकार और जाति व्यवस्था की नींव को मज़बूती प्रदान करती दिखती है, जो स्त्रियों के शोषण का सामान्यीकरण कर देती है! सदियों से चलते आ रहे इस ‘नैरेटिव’ के लिए लेखक अंततः एक ‘काउंटर नैरेटिव’ ढूँढ़ निकालता है!

पाठकों के लिए ‘शिमला डायरी’ भूमंडलीकृत तथा भूमंडलीकरण के दौर से गुज़रते भारत की कुछ ख़ास झाँकियाँ प्रस्तुत करती है। यह भूमंडलीकरण जितना आर्थिक स्तर पर घटता है, उतना ही सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर भी। वर्तमान समय में हम इन झाँकियों से नज़र नहीं फेर सकते।

पुस्तक : शिमला-डायरी
लेखक : प्रमोद रंजन