सारिका भूषण की कविताएं…….

कविताएं…….

कर्मपथ
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कुछ
कंकड़ मिलेंगे
तुम्हें
रास्तों पर
शूल की तरह
चुभेंगे भी
कुछ दूर तक
मैं
तुम्हें बचाती रहूंगी
फिर तो
अकेले ही चलना पड़ेगा
कभी
मखमली घास भी मिलेगी
लहूलुहान तुम्हारे पांवों को
तब मिलेगा मरहम
पर
उन कंकड़ों से भरे कर्मपथ पर
चलने के बाद ही
तुम जी सकोगी ज़िन्दगी
महसूस कर सकोगी
छोटी – छोटी
सफलताएँ
बातें कर सकोगी
ख़ुद से
ख़ुदा से
और
खिलखिलाती
ज़िन्दगी से ।

आज़ादी के मायने
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( 1 )

हाथों में झंडा लिए
नारे लिखा डंडा लिए
वह
तड़के उठकर ही
आज़ादी की जुलूस में
बड़े जोश से बढ़ती जा रही है
तभी
पल्लू से छिपा
सीने से लगा
उसका मोबाईल बजने लगता है
और लगातार बजता ही रहता है
वह
पसीने – पसीने हो जाती है
और अपनी आज़ादी ढूंढने लगती है
ठेकेदार और घरबार के बीच !

( 2 )

किसी शोरूम के
बंद शीशों के पीछे से
झाँकती उस मूर्ति की सुंदरता
उसे
कुछ अपनी सी लगती है
वह एकटक देखने लगती है
और अपनी आजादी ढूंढने लगती है
एक शोरूम और अपने बेडरूम के बीच !

तेरे बग़ैर
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हां !
मुझे रहना होगा
मुझे जीना होगा
साँसें भी लेनी होगी
इसी परिवेश में
इसी जद्दोजहद में
मांग में सिंदूर भर कर
हाथों में चूड़ियां पहनकर
कई रंगों की साड़ियाँ पहनकर
तेरे बग़ैर
हां ! पाषाण बनकर
तेरे बग़ैर
क्योंकि
मैंने देखा है तुम्हें
तिरंगे में लिपटा हुआ
महसूस किया है
छाती पर गोली
माथे पर वतन की मिट्टी
लगने की तुम्हारी खुशी को
जो
मेरे , हमारे अबोध शिशु
और बिस्तर पकड़े
तुम्हारा राह ताकते
बूढ़ी हड्डियों के
जीने के लिए काफी है ।

सुंदरता
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सुना है
बहुत सुंदर है वो
और
बड़ा गुमान है
उसे
अपनी सुंदरता पर ।
खुद को तराशने के लिए
कुछ न कुछ
कम ही पड़ जाते थे
उसकी
कोमल काया की तारीफ
सभी किया करते थे
बस
कमरे में लगा
उसका एक
आईना छोड़कर ।

-सारिका भूषण
कवयित्री , लेखिका एवं लघुकथाकार
राँची , झारखंड

 

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