सत्ता का स्वर्ग……………… लेखक – जावैद अब्दुल्लाह, अध्यक्ष- वर्ल्ड नेचुरल डेमोक्रेसी

सत्ता- का -स्वर्ग-.................. लेखक - जावैद अब्दुल्लाह, अध्यक्ष- वर्ल्ड- नेचुरल -डेमोक्रेसी-
सात मई सन दो हज़ार, जब पुतिन ने अपना पहला राष्ट्रपति कार्यकाल सम्भाला, तब से पुतिन रूस की पहचान बन चुके हैं । इससे पहले जोज़ेफ़ वी. स्टालिन हैं जो दो दशक तक सत्ता में क़ाबिज़ रहे

स्वतंत्र प्रभात वाराणसी

जनाब पुतिन के चौथे राष्ट्रपति कार्यकाल की अवधि पूरी हो रही है

सात मई सन दो हज़ार, जब पुतिन ने अपना पहला राष्ट्रपति कार्यकाल सम्भाला, तब से पुतिन रूस की पहचान बन चुके हैं । इससे पहले जोज़ेफ़ वी. स्टालिन हैं जो दो दशक तक सत्ता में क़ाबिज़ रहे । रुसी भाषा के अलावा जर्मन और अंग्रेज़ी भाषा के जानकर, मार्शल आर्ट में माहिर, जुड़ो में पटकनी देने वाले, बाइक राइडर, फ़ाइटर जेट की सैर, घोड़ सवारी, कभी साईबेरिया में पानी में ग़ोता लगाते हुये तो कभी खुले बदन मछलियाँ पकड़ते हुये देखा जाना, पुतिन का अपना अद्वितीय अंदाज़ है । इसमें कुछ बुरा भी नहीं है । इन सब आदतों से कम से कम आपको यह याद रहता है कि आप अभी भी आदमी ही हैं ।

लेकिन मैं यहाँ रूस की बातें क्यों कर रहा हूँ । दरअसल रूस मेरे बचपन में बसा एक मनमोहक देश रहा है। कच्ची मिटटी की मोटी दीवारों के पीछे, तंगदस्ती में भी मस्ती से भरा मेरा बचपन, इस धरती पर उन भाग्यशाली घरों में से एक रहा है, जहाँ बर्तन और सामान से कहीं ज़्यादा किताबें थीं । यह सब मेरे अब्बी (पिता जी) का सरमाया था । इन किताबों में बहुत सी किताबें ‘मीर प्रकाशन’ मास्को रूस से छपी हुई थीं । मैं देश के नेताओं को बाद में जान पाया लेकिन व्लादिमीर लेनिन को पहले जान गया था । बाद के दिनों में लियो टॉलस्टॉय की कहानी ‘द थ्री क्वेश्चन्स’,या स्वयं उनके जीवन का अंतिम पड़ाव ‘एस्टापोवो रेलवे स्टेशन’, या फिर ज़ार, बोल्शेविक पार्टी, अक्टूबर क्रांति का इतिहास, अलविदा के लिये ‘दस्विदानिया’ शब्द, या ख्वाजा अहमद अब्बास निर्देशित पहली भारतीय फ़िल्म ‘धरती के लाल’, जो भारत से बाहर रिलीज़ हुई और 1949 में सोवियत संघ में प्रदर्शित हुई ।

फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की द्वारा लिखा गया महान उपन्यास ‘दि इडियट’ हो, या ‘सर पे लाल टोपी रूसी’ शैलेन्द्र और शंकर द्वारा रचित मशूहर हिन्दी गीत, दुनिया के सबसे बड़े देश के रूप में बिना रटाये याद हो जाने वाला सामान्य ज्ञान हो, या फिर अंतरिक्ष में जाने वाला वो पहला आदमी यूरी गगारिन वगैरह-वगैरह । सभी अल्हड़ अबोध बचपन के साथी रहे हैं । आज उन किताबों में से केवल एफ़. कोरोवकिन की “हिस्ट्री ऑफ़ ऐनशिएंट वर्ल्ड” जो प्रोग्रेस पब्लिशर्स मास्को से छपी है, उन दिनों की याद के तौर पर अब भी मेरे पास मौजूद है । यही नहीं, नेगटिव-पॉज़िटिव लिबर्टी की बात की जाये तो फिर इसायह बर्लिन से मिलना ही होगा जिनका जन्म भी रूस में हुआ ।  

तो बस यूँही दिल ने कहा कि जिस मुल्क की किताबों में बचपन की गलियाँ गुज़री हैं, देखा जाये कि आज वो मुल्क कहाँ से गुज़र रहा है । दरअसल बात यह है कि 2024 में जनाब पुतिन के चौथे राष्ट्रपति कार्यकाल की अवधि पूरी हो रही है । शायद इसलिये, वो समय से पहले ही समय के बाद तक बने रहने की सोचने लगे हैं । दुनिया भर में कहीं-कहीं यह आलोचनायें भी हो रही हैं कि पुतिन क़ानून में कुछ फेर-बदलकर यानि संविधान में सुधार कर अगले 16 साल तक राष्ट्रपति बने रहना चाहते हैं । किसी ने कहा कि वो तो सारा जीवन ही राष्ट्रपति बना रहना चाहता है । अलग-अलग प्रतिक्रियाओं में किसी ने यह भी चुटकी ली कि पुतिन तो सौ साल तक रूस के राष्ट्रपति रहना चाहते हैं । मज़े की बात यह है कि इसके लिये उन्हें जनसमर्थन भी प्राप्त हो ही जायेगा ।  

कुछ दिनों पहले मैंने नॉन-वायलेंस इन्टरनेशनल (आर्गेनाईज़ेशन) से क्लैरे मिल्स का भेजा हुआ ईमेल पढ़ा । ईमेल का विषय दुनिया में अलग-अलग देशों में हो रहे प्रोटेस्ट के बारे में था । उसी में एक दिलचस्प स्टोरी मिली । एक रूसी कार्यकर्ता जिसका नाम सोन्या उल्लेशेवा है, उसने कुछ खिलौनों की तस्वीरें पोस्ट कीं, जिसमें रूसी संविधान में प्रस्तावित बदलावों का विरोध करते हुये दिखलाया गया है, जो वर्तमान राष्ट्रपति पुतिन के कार्यालय में दो अतिरिक्त छह साल के कार्यकाल की अनुमति प्रदान कर देगा । सत्ता के चरित्र को दर्शाते हुये आदमी नुमाँ खिलौनों में एक पर लिखा था, “यह जनमत संग्रह हमसे अधिक नक़ली है ।”
 प्लास्टिक के बने खिलौनों के माध्यम से जतलाया गया विरोध का यह तरीक़ा काफ़ी अलग और असली था । यह देखकर मुझे याद  आया, “विनाश के कगार पर हम केवल सृजन कर सकते हैं ।  हालाँकि सृजन की प्रक्रिया अपने-आप में एक लम्बा और कठिन अध्वसाय है, लेकिन आदमी की प्रगति का अंदाज़ा हम उसकी सृजन-क्षमता से ही कर सकते हैं । इतिहास के आँकड़ों से नहीं ।” – (जियां ग्रेनिये की पुस्तक अल्बेयर कामू से उद्धृत) । इस ईमेल को पढ़ने के बाद मैं थोड़ा अन्दर तक उतर गया । काफ़ी सोचता रहा । अन्त में मेरा सवाल मुझसे ही सवाल करने लगा । जो काफ़ी अलग भी था और बुनियादी भी । जो सरकार या नागरिक; किसी को विभाजित करके नहीं देखता बल्कि मानव समाज और सभ्यता को एक कर के देखता है ।

चलिये आज अपने आपकी रिपोर्टिंग करते हैं और देखते हैं कि सभ्यता के स्वभाव का स्वाद क्या है । सरकार के मिजाज़ की तो हमने बहुत पड़ताल की है और रात-दिन करते ही रहते हैं । आज हम अपने नागरिक होने और मात्र एक अच्छा नागरिक बने रहने की इच्छा और स्कोप को टटोलते हैं । जिस तरह देशों की सरकारें, सरकार होने और बने रहने का कोई मौक़ा छोड़ना नहीं चाहती हैं और अमरत्व को प्राप्त करना चाहती हैं । वैसे ही हम नागरिक क्या सदा नागरिक होने और बने रहना चाहते हैं ? क्या हम नागरिक से सरकार में शिफ्ट होने का एक भी मौक़े का त्याग करते हैं ? या फिर यह सारी आलोचनायें केवल भाषायी खेल है या असंतुष्ट लालायित चेतना की अभिव्यक्ति या फिर अपना नम्बर न आने की कुंठित भड़ास; कि कोई दो दशकों से राष्ट्रपति है और मैं एक दिन के लिये भी राष्ट्रपति नहीं हूँ ।  

कल्पना कीजिये, क्या हो ! यदि रूस में पुतिन उसी संविधान में बदलाव लाकर यह घोषणा कर दें कि रूस के आम नागरिकों में से जो लोग अगले सोलह साल के लिये राष्ट्रपति बनना चाहते हैं वे अपना आवेदन भेज सकते हैं । इतना छोड़िये, केवल इतना ही ऐलान कर दें कि जो लोग भी एक दिन के लिये रूस का राष्ट्रपति बनना चाहते हैं, वे आवेदन कर सकते हैं । समानता के आधार पर लकी ड्रॉ के ज़रिये उम्मीदवार का नाम निकाला जायेगा और प्रत्येक वीकेंड में बारी-बारी से सभी को अगले सोलह साल तक राष्ट्रपति बनने दिया जायेगा ।

तो क्या लगता है, पुतिन महोदय को कितने आवेदन प्राप्त होंगे ? क्या रूस का एक भी नागरिक सरकार में जाने और राष्ट्रपति बनने की इच्छा से अपने आपको रोक पायेगा ? यानी जो केवल और केवल  एक नागरिक हो और इस इस घोषणा के बाद भी केवल एक अच्छा नागरिक बने रहने की ही इच्छा रखता हो, ऐसे लोग मिल पाएंगे ? साथ में वो लोग भी, जो पुतिन पर ‘सौ साल’ की या उम्र भर राष्ट्रपति बनने जैसी आलोचना कर कर रहे हैं.. वो लोग ! क्या वे वीकेंड में एक दिन का राष्ट्रपति बनने के लिये आवेदन देने से ख़ुद को रोक पायेंगे ? शायद हाँ । शायद नहीं । शायद कुछ कहा नहीं जा सकता।
तो जब इन सवालों का यक़ीन के साथ कोई जवाब नहीं दिया जा सकता है तो फिर क्या फ़र्क़ है किसी के सौ साल की आयु तक राष्ट्रपति बनने की इच्छा में और किसी के एक दिन का राष्ट्रपति बनने की इच्छा में ? अगर यही काल्पनिक चरित्र हमारे वास्तविक मन का सच है, तो मुझे बतायें कि इसमें ‘नागरिक तत्व’ या एक निष्पक्ष दर्शक’ वाला स्वभाव कहाँ है ? और जनता अवाम होने के नाते विपक्ष की भूमिका कहाँ बची ? मालूम हुआ कि केवल नागरिक रहना कोई नहीं चाहता ।

लिहाज़ा स्वेच्छा से ‘केवल नागरिक’ कोई रहा ही नहीं ।  सभी सरकार हो चुके हैं और सरकार में जाने को नागरिक की अन्तिम निधि मान चुके हैं । यानी सत्ता और सरकार बनने का सपना संसार का सार्वभौमिक स्वभाव बन चुका है । कोई सारी उम्र राष्ट्रपति बने रहने के लिये जी रहा है । कोई राष्ट्रपति बनने के लिये सारी उम्र मर रहा है । बात राष्ट्रपति की नहीं है । बात सत्ता के स्वर्ग में निवास करने की है । अपने-अपने ढंग से सत्ता के स्वर्ग में सभी ठहरना चाहते हैं । फिर वो एक दिन के लिये ही क्यों न हो ? शायद इसी कारण नरक की नागरिकता भी सह ले रहे हैं । जी ले रहे हैं । क्योंकि हमारे लिये सत्ता का स्वर्ग सबसे बड़ा सौभाग्य है, और सबसे बड़ा सौभाग्य सबका नहीं होता । खेद प्रकट करता हूँ इस हाइपोथीसिस के लिये । पर अपने स्व के प्रति इंसाफ़ का अंश मात्र भी बचा है, तो हमारे लिये एक सवाल रह जाता है ।

यह कि नरक की नागरिकता में हम इसलिये जी रहे हैं क्योंकि अभी या कभी.. सत्ता के स्वर्ग में जाने का अवसर नहीं मिला है । उसके गलियारे से निकटता बनाने का रास्ता नहीं मिला है । मैंने यह इसलिये कहा, क्योंकि जब आप सत्ता को (सम्पूर्ण या अंशपूर्ण) स्वर्ग समझ रहे हैं तो (केवल) नागरिकता स्वतः नरक बन गयी । अब धीर धरकर देखिये तो मन का एक कोना कुछ कह रहा है । क्या यह तथ्य हमारे अन्दर स्पष्ट है कि हम नरक के नागरिक हैं या नागरिकता को नारकीय समझते हैं ? जब तक कि हमने सत्ता का स्वाद न चखा हो । सत्ता के स्वर्ग का चरण स्पर्श न किया हो । 
एक नागरिक, सरकार में आने के बाद कितना आसक्तिपूर्ण हो जाता है इस बात से फ़र्क़ पड़ता है, यह बात तो अपनी जगह सही है ।

लेकिन उससे पहले एक और सच है जिससे फ़र्क़ ही नहीं पड़ता बल्कि दुनिया और इंसानियत का आज, कल और आनेवाला कल तय होता है । वो सच यह कि एक नागरिक केवल नागरिक रहते हुये केवल नागरिक होने को अर्थात नागरिकता को नारकीय और सत्ता को स्वर्ग न समझे । इस झूठे आकर्षण से हमेशा बचे । दरअसल हमने ग़लत सबक़ सीखा है । याद रखिये, सरकार जैसी भी हो, सनकी या सुशील, सौ दिन के लिये या सौ साल के लिये; मैं समझता हूँ संसार को इससे कोई ख़ास अन्तर नहीं पड़ेगा । संसार को फ़र्क़ पड़ता है तो अवाम से । यानि आपसे । छुपा हुआ सच यही है कि नागरिक का स्वभाव संसार का सबसे विशाल स्वरुप है । मैं फिर दोहराता हूँ- “नागरिक का स्वभाव संसार का सबसे विशाल स्वरुप है ।” आपको अपने स्वरुप का सम्मान करना सीखना चाहिये ।

जो आपने नहीं किया । यदि किया होता तो क्या मजाल थी कि कोई पुतिन दो दशक से सत्ता के सिहांसन पर विराज पाते और आज वो आगे भी विराजने की सोच रहे हैं । क्यों कोई ऐसा कर पाता है इस पर आपको ख़ुद सोचना चाहिये । फिर भी आपके पास दुनिया को बेहतर बनाने की सबसे बड़ी सम्भावना इसी (वैज्ञानिक) समझ को विकसित करने में है कि सरकार कितनी क्रूर है यह देखना ज़रूरी है लेकिन उससे कहीं ज़्यादा यह ज़रूरी है कि हम कितने विनम्र हुये हैं ? हमने अपने विवेक पर कितना काम किया है । नागरिक होने और बने रहने के लिये अनासक्त होकर सत्ता भाव का कितना त्याग किया है । याद रखिये, नागरिकता निरपेक्ष स्वरुप है । सरकार सापेक्ष स्वरुप । सरकार होना सीमित होना है । नागरिक होना सर्वभौमिक होना है । आप सरकार बनाते हैं आपको सरकार नहीं बनाती । बना ही नहीं सकती । क्योंकि आपका होना ही नागरिक होना है । नागरिकता ‘नागरिकता’ को समझने से पहले ही आपको मिल जाती है । यह जन्म सिद्ध है ।

जबकि सरकार कर्मसिद्ध । नागरिकता का सम्बन्ध अस्तित्व से है न कि इसका सम्बन्ध ज्ञान की समझ से । हाँ, यह आपकी अव्यक्त अबोध की बोध में अभिव्यक्ति ज़रूर है । जबकि सरकार एक कृत्रिम संस्था है । एक सहयोगी संस्था है । निर्भर और आश्रित संस्था है । ढाई हज़ार साल से आपको क्या घोल कर पिलाया गया यह मैं नहीं जानता, लेकिन ‘सत्य’ दस हज़ार वर्ष पहले सामने आ जाता या वो आज सुबह ही सामने आया हो, उसका महत्त्व कम नहीं होता । आपका स्वरुप इसके अलावा और कुछ नहीं है कि इस पल इस जीवन में इस धरती पर इस ब्रह्माण्ड ‘होना’ ही ‘नागरिकता’ है । आप जहाँ भी हैं, जिस गाँव जिस राज्य जिस प्रान्त जिस देश और जिस ग्रह पर हैं, वो सभी इस ब्रह्माण्ड का अंश है । आपका अंश है । किसी सरकार का नहीं । इस अंश में सरकार का कोई अस्तित्व नहीं है । कोई भूमिका नहीं है । कोई हस्तक्षेप नहीं है । हो ही नहीं सकता । सर्वशक्तिमान के बाद इस धरती पर नागरिक की शक्ति सबसे बड़ी ब्रह्मांडीय शक्ति है और नागरिक की शक्ति है नागरिक का होना 

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