लहरा रहा है, हिन्दी का परचम

स्वतंत्र प्रभात :-
    भाषा भावों की संवाहक होती है। मैंने पाया है कि हमारे देश मे,कहीं का भी व्यक्ति हो,हिंदी बोलते समय उसके चेहरे के भाव बहुत सहज हो जाते हैं।
दक्षिण के राज्यों में जब भी गया हूँ तो यही पाया है कि हम उत्तर भारतीयों से बात करते हुए उनके भाव या तो उनकी क्षेत्रीय भाषा में या केवल हिंदी में ही सरल ,सहज लगते हैं।हालांकि कहा जा सकता है कि विदेशी भाषा विशेष के प्रभाव में स्थिति बहुत अच्छी नही है पर मेरा मानना है कि बहुत खराब भी नही है।कई किन्तु,परन्तुओं के बावजूद ,कई झटके खाने के बावजूद, राजभाषा हिंदी का परचम लहरा रहा है।
भारत के बाहर आयोजित होने वाले विश्व हिंदी संम्मेलन,महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय द्वारा एम बी ए का हिंदी में पाठ्यक्रम प्रारम्भ करना,  कई चर्चित लेखकों की हिंदी रचनाओं का क्षेत्रीय से लेकर विदेशी भाषाओं में लगातार अनुवाद,गूगल पर हिंदी के ब्लॉगर्स की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि जैसे  कई तथ्य इस क्षेत्र की  निराशा में जुगनू बनकर  तो चमक ही रहे हैं, एक नई भोर की ओर भी संकेत कर रहे हैं अन्यथा “वाशिंगटन पोस्ट “ जैसा अखबार यह न कहता कि 2050 तक हिंदी पूरे विश्व के अधिकांश अभिव्यक्ति के क्षेत्र पर हावी होने वाली है।
हमे केवल यह प्रयास करना है कि हमारी राजभाषा का शब्द भंडार और बढ़े,नए शब्दों से हिंदी समृद्ध हो ,नए शब्दों का अविष्कार हो, उन्हें लगातार उच्चारित कर आमजन का शब्द बनाया जाए,प्रयत्न किया जाए कि अपने लेखन में हिंदी शब्दों का यथासम्भव प्रयोग हो।

-सन्तोष सुपेकर  (लघुकथाकार, कवि, 31 सुदामा नगर, उज्जैन) मध्यप्रदेश

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