कोविड -19 महामारी, 21 वीं शताब्दी की सर्वाधिक विषाक्त और घातक अकाल साबित हुई है। हालांकि…

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कोविड -19 महामारी, 21 वीं शताब्दी की सर्वाधिक विषाक्त और घातक अकाल साबित हुई है। हालांकि इस प्रकार के अकाल समय – समय पर दस्तक देते रहे। लेकिन वैश्विक मन्दी की छाया से न विकासशील देश बच पाए और ना ही विकसित  । 

स्थिति को देखते ही गजानन मुक्तिबोध साहब की पंक्तिया भी यकायक संज्ञान में आती हैं-शून्यों से घिरी हुई पीड़ा ही सत्य है
शेष सब अवास्तव अयथार्थ मिथ्या है भ्रम है
सत्य केवल एक जो कि
दुःखों का क्रम है

वैश्विक महाशक्ति की ओर अग्रसर भारत भी इससे अछूता नही रहा। जैसाकि अर्थशास्त्र के ज्ञाता एडम स्मिथ ने कहां है -“कि अर्थशास्त्र धन का विज्ञान है और यही धन हमारे रोजमर्रा जीवन के लिए उत्तरदायी है”

भारत इस वक्त आर्थिक मंदी की चपेट में है। पिछले चार महीने में पूर्णबंदी(लाॅकडाउन) की वजह से आर्थिक हालात और बिगड़ गए। देश में उद्योग-धंधे ठप पड़ गए।
नतीजा बेरोजगारी में बढ़ोत्तरी के रूप में सामने आया। यूं तो भारत बेरोजगारी की समस्या से पहले से ही जूझ रहा है, लेकिन इन दिनों हालात ज्यादा विकट हो गए हैं।हालात ये हैं कि न्यू स्टार्टअपस के पास इन्फ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी हो गई है। धन की आवश्यकता इस क्षेत्रक के लिए बुनियादी ढांचा है। वित्तीय संकट से निपटने के लिए फरवरी महीने मे बजट को प्रस्तुत करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राजकोषीय घाटे को बढ़ाने का साहसी निर्णय लिया और नया आयकर जारी करके मझोले उदधमियो को नए सिरे से शुरुआत करने को कहा था। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन(ILA), भारत सरकार और विभिन्न एजेंसियों के ताजा सर्वेक्षण और रिपोर्ट इस ओर इशारा करते हैं कि देश में बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ा है।और साथ ही इसका नकारात्मक असर मानसिक तनाव, आत्महत्या के अनेक रूप में देखने को मिला।

बेरोजगारी को लेकर सेंटर फॉर मॉनिटरेंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआइई) के आंकड़े भी बेहद चौकाने वाले हैं। ताजा आंकडों  के अनुसार बेरोजगारी की दर 23.4 फीसद हो गई है।
इस प्रसंग में जॉन कैनेथ गेलब्रेथ का कथन है कि– “भारत में कामकाज की अराजकता है” बिल्कुल सटीक मालूम पड़ता है।भारत सर्वाधिक युवाओ का देश है। लेकिन औपचारिक शिक्षा वर्तमान समय में रोजगारपरक के बजाय व्यवधान उत्पन्न कर रही है। आज 80% से अधिक शिक्षित युवा तकनीकि दुनिया से अनभिज्ञ है। ऐसे मे कोरोना संकट से निपटना और चुनौतीपूर्ण है।

सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार कोरोना महामारी को फैलने से रोकने के लिए की गई पूर्णबंदी की वजह से लगभग 12 करोड़ नौकरियां चली गई हैं। कोरोना संकट से पहले भारत में कुल
रोजगार आबादी 40.4 करोड़ थी, जो इस संकट के बाद घट कर 28.5 करोड़ रह गई है। और अभी भी लाखों-करोड़ों की संख्या में ऐसे रोजगार हैं जिसमेे अभी स्पष्ट रूप से कहना आसान नही है । 
फिलहाल डब्लूएचओ की मानें तो कोविड-19 के संकट का अभी सबसे बुरा दौर आना बाकी है।

पूर्णबंदी लागू करते वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने सभी नियोक्ताओं से अपील की थी कि-” वे कामगारों की छंटनी न करें और उनका वेतन न काटें। लेकिन इस अपील का कोई फायदा नहीं हुआ और करोड़ों लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा । आर्थिक मंदी के दौर मेें यह दोहरा प्रहार साबित हुआ। श्रमिक मजदूरों का इतनी बड़ी तादाद में पलायन करना आर्थिक अवसरो की भारी कमी दिखाता है।  प्रसिद्ध कवि ब्रेख्त प्रवासी मजदूरों के बारे में कहते हैं कि-
“प्रवासी मजदूरों के बारे में कोई अंतिम बात कहना अभी मुश्किल है”
वैसे तो हालात कोविड-19 से पहले ही भी अच्छे नहीं थे। भारतीय अर्थव्यवस्था 45 साल के न्यूनतम स्तर पर थी। वास्तविक जीडीपी के आधार पर देखें। तो यह 11 साल के न्यूनतम स्तर पर थी।
हमारे देश में लगभग 27% लोग ऐसे हैं जो दो समय का भोजन भी नहीं कर पाते। और 22% लोग बीपीएल कार्ड धारक हैं यानि गरीबी रेखा से भी नीचे।

कोरोना महामारी ने हमारे स्वास्थ्य विभाग की भी पोल खोल कर रख दी। ध्यातव्य है कि सकल घरेलू उत्पाद का केवल 1% ही स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है । जबकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार मंत्रालय (NHFM) के द्वारा स्वस्थ समाज के लिए सकल घरेलू उत्पाद का 6% खर्च करना अनिवार्य बताया है। 

प्राथमिक सेक्टर पर कोविड-19 का प्रभाव —

अब से करीब 4 महीने पहले 1 फरवरी को वित्त मंत्री सीतारमण जी ने संसद में बजट पेश किया और उस समय —
सीतारमण ने एक कविता का हवाला दिया – प्यारे वतन।

प्यारे वतन का मतलब अप्रत्यक्ष रूप से ग्रामीण समुदाय के लिए था । जैसा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू “भारत एक खोज” में लिखते हैं कि भारत क्या है ? तो उन्हें सुनने वाले लोग कहते हैं कि भारत एक राष्ट्र है, एक देश है और भी जाने क्या-क्या कहते हैं ? लेकिन जवाहरलाल नेहरू उन्हें वही रोकतें हैं और कहते हैं नहीं।
भारत इस देश के प्रत्येक तत्व में उपस्थित है यानी मैं स्वयं एक भारत हूँ। आप एक भारत है। यहां की संस्कृति और समाज का प्रत्येक अंग भारतवर्ष का निर्माण करता है। इन्हीं के मिलने से बनता है एक

 अखंड भारत का सपना आजादी से पूर्व भले ही पूरा नहीं हो सका। लेकिन आजादी के बाद भारत वर्ष को अखंड बनाने के लिए जितने प्रयास किए गए वे सराहनीय हैं।  जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री बनते प्रथम पंचवर्षीय योजना के दौरान ग्रामीण विकास पर अत्यधिक बल दिया गया जिसमें कुएं ,नहर ,नदी परियोजनाओं का निर्माण कार्य किया गया।
उस समय भारतवर्ष में  भूमिहीन वर्गों के लिए आचार्य विनोबा भावे उनका हक दिलाने की पूरी कोशिश कर रहे थे।

मगर यह दुख पूर्ण बात है कि 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी हम प्रथम सेक्टर यानी सैक्टर यानी कृषि क्षेत्र को  का विषय नहीं बना पाए।
कृषि क्षेत्र में विकास बहुत ही मंद गति से हुआ यानी हम कह सकते हैं कि विकास बिल्कुल भी नहीं हुआ। हां कुछ परियोजनाएं जरूर इसके लिए चलाई गई, लेकिन उनके क्रियान्वयन के लिए  कोई आवश्यक कदम नहीं उठाए गए इसको केवल औपचारिकता के तौर पर ही लिया गया।

आर्थिक वृद्धि दर कम होने की वजह से सन 1990 के दशक में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह आए उसमें विदेशी निवेश की हमें बहुत ज्यादा आवश्यकता थी और हमने डब्ल्यूटीओ(WTO) के दबाव में आकर उदारता की सीढ़ी को अपनाया यानी हमें अपने एफडीआई के नियमों में बहुत बड़ा बदलाव करना पड़ा।
और इसका सबसे ज्यादा लाभ उद्योग और सेवा क्षेत्र को मिला लेकिन कृषि क्षेत्र को  इससे सबसे बड़ा आघात लगा।

1990-9134.0
2000-200124.7
2006-0719.55

और अब 2020 आते-आते विकास दर मे कृषि क्षेत्र की भागीदारी केवल 15 % के आसपास  लटक कर रह गई है ।
भले ही इंडिया कृषि क्षेत्र पर आधारित ना हो लेकिन भारत की ज्यादातर जनसंख्या रोजगार संसाधन, कृषि पर आधारित है।
देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद में भारतीय ग्रामीण प्रति आस्था की हिस्सेदारी 48 फीसद है लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था देश की 70% आबादी की पालनहार है तभी तमाम अर्थशास्त्री कृषि में लगी बड़ी और गैरजरूरी आबादी को दूसरे क्षेत्रों से जोड़ने की बात करते हैं।

यदि अर्थशास्त्री की इस बात को मान भी लिया जाए तो क्या हम कृषि क्षेत्र मे बेहतर अवसर प्राप्त कर पायेंगे ?
सबसे अहम बात है क्या भारत का युवा आज  कृषि क्षेत्र को भविष्य मे लेकर अपेक्षित है?
आज फार्मिंग से संबंधित ऐसे 80-90% युवा हैं जो एग्रीकल्चर विषय से संबंधित कोर्स कर रहे हैं। इसके बावजूद वर्तमान मे लगभग 0.4 मिलियन छात्र एग्रीकल्चर से विश्वविद्यालय मे अध्ययनरत हैं।

लेकिन मुश्किल से 0.1 मिलियन छात्र ही स्नातक हैं। उनमे से ज्यादातर लगभग 70 से 80%  बैकिंग क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।

महात्मा गाँधी अपने पत्र “हिन्द स्वराज ” मे लिखते हैं –

भारत का शिक्षित युवा भविष्य मे कृषि क्षेत्र मे भविष्य बनाना नही चाहता। यदि कोई युवा अच्छा पढ़ा-लिखा है तो निश्चित रूप से वो शहर मे रोजगार के अवसर तलाशेगा । अतः हमारी शिक्षा तब तक व्यर्थ है जब तक हम स्वरोजगार के अवसर न ढूंढ पाए।”आज उसी आत्मनिर्भरता को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेे दोहराया है । जिसकी शुरुआत कृषि , एमएसएमई, मत्स्य उत्पादन से होती है। बीते कुछ दिनों पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “21वीं सदी को भारत की सदी” बताया।
 इस क्षेत्र में लगभग कुल आबादी की 60% जनसंख्या कार्यरत है। लेकिन इसका कुल जीडीपी में योगदान केवल 15 % है। इतनी बड़ी संख्या अनिश्चित क्षेत्रक मेें कार्यरत है जहां से मांग-आपूर्ति की श्रृंखला का उदय होता हैं। मान लीजिए यदि निर्धारित किसी खेती के लिए 4 मजदूरों की आवश्यकता है लेकिन वहां उसमें परिवार के 7 सदस्य कार्यरत हैं तो इस प्रकार मजदूरो की मांग कम है लेकिन हम खेत को आपूर्ति ज्यादा मात्रा में दे रहे हैं तब इसे ही “प्रच्छन्न बेरोजगारी” कहते हैं। और आज तो प्रच्छन्न बेरोजगारी कृषि क्षेत्र मे बहुत व्यापक हो चुकी है।

कृषि क्षेत्र में अब तक कोई भी आमूलचूल परिवर्तन दिखाई नहीं दिया है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि कृषि क्षेत्र को 70 साल के बाद भी समवर्ती सूची में शामिल नहीं किया गया। इसी कारण कृषि क्षेत्र केेंद्र सरकार की मुख्य सूची से विरत है। यदि हम पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं तब सबसे पहली हमारी  प्राथमिकता  कृषि क्षेत्र को सबल बनाने के लिए इसे समवर्ती सूची मे शामिल करना होना चाहिए।

एमएसएमई सेक्टर पर कोविड-19 का असर —

दूसरी और बात करें तो अनौपचारिक क्षेत्र में लोगों की 93 % से ज्यादा भागीदारी है लेकिन अशिक्षा, कुशलता और सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी भी सरकार यह प्रशासन की नहीं होती।

वही हमारे पास 46.5 करोड़ लोगों का कार्य बल है इसमें से लगभग 41.5 करोड़ व्यक्ति अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं जहां पर कोई सामाजिक सुरक्षा लाभ उपलब्ध नहीं है।

वर्तमान में 44 केंद्रीय श्रम कानून हैं और 150 राज्य श्रम कानून हैं लेकिन वर्तमान की मांग है कि हम इसमें आवश्यक सुधार करें जिससे एमएसएमई सेक्टर को बढ़ावा मिल सके क्योंकि भारत में केयर रेटिंग के मुताबिक एमएसएमई सेक्टर 30 पर्सेंट से ज्यादा योगदान करता है और यदि माल निर्यात के मामले मे बात करें तो उसकी भागीदारी 48 % है वही लगभग 11 करोड कार्यबल इसमें शामिल है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी के अनुसार आज भारत में 24 % से अधिक बेरोजगारी दर हो चुकी है यानी हर चौथा व्यक्ति यहां बेरोजगार है इसलिए श्रम सुधारों की मांग बहुत लंबे समय से उठती रही है।

औद्योगिक संगठन (NASSCOM) के ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक बीते 3 महीनो मे ही नई कंपनियो की 90% कमाई के सारे स्रोत सूखने के कारण या तो कम्पनी बन्द हो गई या बन्द होने के कगार पर है।
साल 2016 से ऐसे कामकाज करने वाली कम्पनी के लिए शोध कम्पनी ट्रैक्सन टेक्नोलॉजी ने बन्द हो रही कम्पनी के लिए “डैडपुल” शब्द इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।

अगस्त 2020 से मार्च 2021 तक की विकास दर को शून्य मानने का कारण यह है कि पिछले 4 वर्षो में हमारी जीडीपी लगातार गिर रही है। वर्ष 2017 मे यह 10% थी , 2018 में 8% ,वर्ष 2019 में 5% और अब घटकर इस वर्ष(2020) में 4% हो गई। यह विकास दर पिछले 11 साल के सबसे न्यूनतम स्तर पर है। 

वही अब प्रसिद्ध वैश्विक आर्थिक संगठन एजेंसी और वरिष्ठ बुद्धिजीवी अर्थशास्त्रियो ने अनुमान लगाया है कि कोविड -19 की चुनौतीपूर्ण समय के बीच वित्त वर्ष 2020 -2021 में वृद्धि दर ऋणात्मक रहने वाली है।विश्‍वव्‍यापी कोरोना महामारी के चलते देशभर में लागू लॉकडॉउन के चलते बने हालात के बीच पीएम नरेंद्र मोदी के 20 हजार करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा के दूसरे दिन बुधवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसमएई) समेत उद्यमों को बिना गारंटी वाले 3 लाख करोड़ रुपए के कर्ज की सुविधा देने की घोषणा की थी ।

पिछले कुछ समय में जो राहत पैकेज सरकार के द्वारा उद्यमियों को दिये गए हैं उससे यह तो उम्मीद तो जगी है कि कारोबार फिर से पटरी पर आ सकता है। लेकिन यह सरकार और उद्योगपतियों के लिए बड़ी चुनौती है।

1 जून को केंद्र सरकार ने 2 लाख से अधिक कुटीर , लघु एवं माध्यम उद्योगों(एमएसएमई) के लिए 20 लाख करोड़ और रेहड़ी -पटरी वालो के लिए 10 हजार करोड़ राहत पैकेज के रूप मे देने की मंजूरी दे दी है।

साथ ही अच्छा प्रदर्शन कर रहे एमएसएमई को ओर मजबूत करने के इरादे से 50 हजार करोड़ की मंजूरी भी प्रदान कर दी है।जिससे बाजार में तरलता(इक्विटी) आए, और एमएसएमई सेक्टर को स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होने का मौका मिल सके। तथा फिर से जन-जीवन सामान्य हो सके।

कहते हैं हर चुनौती आविष्कार को जन्म देती है”

जिदंगी की भागदौड़ मे मनुष्य कितना व्यस्त हो चुका था उनके लिए अली अहमद जलीली ने कभी एक शेर कहा था—

लाई है किस मकाम पे ये जिंदगी मुझे 

महसूस हो रही है खुद अपनी कमी मुझे! !

प्रत्यक्ष मिश्रा  (लेखक,पत्रकार)

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