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                <title>Motivational Article - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>मैम, मुझे आपके बाल बहुत पसंद हैं.. और सब कुछ बदल गया</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ फैसले दिमाग में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्यता की भीगी तहों में जन्म लेते हैं। वे तर्क से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनदेखे दर्द की प्रतिध्वनि से आकार लेते हैं और फिर एक जीवन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असंख्य संवेदनाओं का अर्थ बदल देते हैं। ऐसा ही एक क्षण मध्य प्रदेश प्रशासनिक सेवा की अधिकारी और वर्तमान में सिंगरौली नगर निगम की आयुक्त (कमिश्नर) सविता प्रधान के जीवन में आया। सोशल मीडिया पर अंतिम चरण से जूझ रही एक बच्ची की सहज पंक्ति—“मैम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे आपके बाल बहुत पसंद हैं”—इन सात शब्दों ने वर्षों से बंद स्मृतियों के द्वार खोल दिए।</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184617/maam-i-love-your-hair-and-everything-changed"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1.-prof.-rkjain.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ फैसले दिमाग में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्यता की भीगी तहों में जन्म लेते हैं। वे तर्क से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनदेखे दर्द की प्रतिध्वनि से आकार लेते हैं और फिर एक जीवन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असंख्य संवेदनाओं का अर्थ बदल देते हैं। ऐसा ही एक क्षण मध्य प्रदेश प्रशासनिक सेवा की अधिकारी और वर्तमान में सिंगरौली नगर निगम की आयुक्त (कमिश्नर) सविता प्रधान के जीवन में आया। सोशल मीडिया पर अंतिम चरण से जूझ रही एक बच्ची की सहज पंक्ति—“मैम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे आपके बाल बहुत पसंद हैं”—इन सात शब्दों ने वर्षों से बंद स्मृतियों के द्वार खोल दिए। उनकी माँ तीन बार कैंसर से लड़ी थीं। कीमोथेरेपी के बाद सिर का सूनापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईने में अपरिचित चेहरा और भीतर चुपचाप दरकता आत्मसम्मान—यह सब उनके लिए सुनी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जी हुई सच्चाइयाँ थीं। इसलिए वह वाक्य प्रशंसा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीड़ा की मौन पुकार था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने पहले उनके अंतर्मन को भिगो दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान वह नहीं होती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे वह अपने पास रखता है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे वह बिना हिचक किसी और के लिए छोड़ देता है। दो दिन बाद जब सविता प्रधान के लंबे बाल ज़मीन पर गिरे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब केवल केश नहीं कटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाहरी सौंदर्य का अदृश्य मुकुट भी उतर गया। उन्हीं बालों से बनी विग उस बच्ची तक पहुँची</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके लिए आईना अब तक बीमारी का दूसरा नाम था। सविता प्रधान ने सार्वजनिक रूप से लिखा कि असली सुंदरता बालों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आभूषणों या बाहरी आडंबर में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविश्वास में बसती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे बिना झिझक इसी रूप में कार्यालय जाएँगी। उस दिन उनका साफ माथा केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं रहा</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पूरे शहर के सामने मौन संदेश बन गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने बता दिया कि स्वेच्छा से किया गया त्याग उपदेश नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेरणा बन जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की सबसे अनमोल पूँजी सुख नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह पीड़ा है जो मनुष्य को दूसरों के आँसू पढ़ना सिखा देती है। सविता प्रधान की यात्रा सहज नहीं थी। बाल विवाह की अँधेरी गलियों से निकलकर उन्होंने घरेलू हिंसा की यातनाएँ झेली थीं। जीवन ने उन्हें बार-बार गिराया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर हर बार वे अधिक दृढ़ होकर उठीं। मध्य प्रदेश प्रशासनिक सेवा तक पहुँचना केवल प्रतियोगी परीक्षा में सफलता नहीं था</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह टूटे आत्मविश्वास के पुनर्जन्म का इतिहास था। शायद इसी कारण वे समझ सकीं कि रोशनी का अर्थ केवल स्वयं प्रकाशित होना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि किसी और के अँधेरे में अपनी लौ पहुँचा देना भी है। तभी एक बच्ची की पीड़ा उन्हें अपनी पीड़ा से अलग नहीं लगी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वही साझा दर्द करुणा बनकर उनके निर्णय में उतर आया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि लोग बुराई पर विश्वास कर लेते हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना यह है कि उन्हें अच्छाई पर भरोसा नहीं होता। सविता प्रधान का बदला हुआ रूप सामने आते ही सवाल उठने लगे—क्या परिवार में कोई शोक हुआ है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या कोई निजी संकट है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या इसके पीछे कोई छिपा कारण है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने सहजता से कहा कि सब कुछ कुशल-मंगल है और यह कदम पूरी तरह उनकी अपनी इच्छा का है। उनका उत्तर केवल अफवाहों का खंडन नहीं था</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">उसने उस सोच को भी बेनकाब कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हर सद्भावना में स्वार्थ तलाशती है। उन्होंने शब्दों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने आचरण से सिद्ध किया कि करुणा को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर दिन दफ्तरों के दरवाज़े खुलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बहुत कम दिनों में किसी दिल का दरवाज़ा खुलता है। जिस दिन ऐसा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था कागज़ों से निकलकर इंसानियत की भाषा बोलने लगती है। सविता प्रधान का बदला चेहरा भी हर सुबह मौन संदेश बनकर कार्यालय पहुँचा होगा। उन्होंने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने कर्मों से बता दिया कि अधिकारी केवल नियमों और फाइलों के लिए नहीं होते</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वे उन अनदेखे आँसुओं के लिए भी होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो किसी सरकारी दस्तावेज़ में दर्ज नहीं होते। एक छोटी बच्ची की मासूम इच्छा ने प्रशासन और समाज के बीच खड़ी कठोर दीवार में संवेदना की ऐसी दरार बना दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ से दया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनापन और विश्वास की रोशनी भीतर उतर आई। उसी क्षण पद का वैभव पीछे छूट गया और मनुष्यता सबसे आगे खड़ी दिखाई दी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की सबसे बड़ी विरासत संपत्ति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना होती है। जो मनुष्य अपने दर्द को दूसरों के आँसू पोंछने की शक्ति बना लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय उसके लिए अलग इतिहास लिखता है। सविता प्रधान की माँ का तीन बार कैंसर से संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं उनका कठिन जीवन और फिर एक अनजान बच्ची के लिए अपने बाल समर्पित कर देना—ये तीनों घटनाएँ अलग-अलग नहीं हैं। ये एक ही जीवन-दर्शन के सूत्र हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बताते हैं कि पीड़ा यदि मनुष्य को कठोर न बनाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वही उसे असाधारण बना देती है। चरित्र वही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो परिस्थितियों के थपेड़ों से नहीं बदलता</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बाल कट जाने पर भी कम नहीं होता और पद छूट जाने पर भी समाप्त नहीं होता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्यता का सबसे उजला क्षण वह होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब कोई अपना सबसे प्रिय किसी अनजान की उम्मीद के नाम कर देता है। सविता प्रधान का निर्णय भी ऐसा ही क्षण है। यह केवल एक बच्ची के चेहरे पर मुस्कान लौटाने की घटना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे तंत्र के सामने रखा आईना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें व्यवस्था अपना मानवीय चेहरा देख सकती है। नियम आवश्यक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन संवेदना उससे भी अधिक। कागज़ निर्णय लिख सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी टूटे मन में जीने का साहस नहीं। सविता प्रधान ने सिद्ध कर दिया कि सत्ता का सर्वोच्च रूप आदेश देना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं का एक अंश किसी और के जीवन को समर्पित करना है। अब जब वह बच्ची आईने के सामने खड़ी होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके सिर पर केवल विग नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी अजनबी के विश्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ममता और आत्मबल का स्पर्श भी होगा। शायद वही स्पर्श उसे जीवन भर यह भरोसा देगा कि दुनिया आज भी सुंदर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि कुछ लोग अपने हिस्से की चमक बाँटकर दूसरों के जीवन में उजाला लिखना जानते हैं।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 22:05:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>दुनिया की नजरों में मुस्कुराती, भीतर पिता से ताकत लेती बेटी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष बाहर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीतर शुरू होता है—जहाँ निर्णयों की भीड़ में आत्मविश्वास मौन हो जाता है और रिश्तों की अपेक्षाएँ मन पर दबाव बनकर धीरे-धीरे कसने लगती हैं। विवाह के बाद स्त्री-जीवन में यह भार और गहरा हो जाता है—कभी शब्दों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी मौन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी जिम्मेदारियों के नाम पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कभी “समझदारी” की कठोर परिभाषाओं में। बाहर से सब सामान्य लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर भीतर हर दिन एक नई परीक्षा जैसा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका प्रश्नपत्र बदलता रहता है और उत्तर पहले से तय मान लिए जाते</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181465/smiling-daughter-in-the-eyes-of-the-world-taking-strength"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2)1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष बाहर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीतर शुरू होता है—जहाँ निर्णयों की भीड़ में आत्मविश्वास मौन हो जाता है और रिश्तों की अपेक्षाएँ मन पर दबाव बनकर धीरे-धीरे कसने लगती हैं। विवाह के बाद स्त्री-जीवन में यह भार और गहरा हो जाता है—कभी शब्दों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी मौन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी जिम्मेदारियों के नाम पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कभी “समझदारी” की कठोर परिभाषाओं में। बाहर से सब सामान्य लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर भीतर हर दिन एक नई परीक्षा जैसा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका प्रश्नपत्र बदलता रहता है और उत्तर पहले से तय मान लिए जाते हैं। ऐसे में अपनी इच्छाओं और दूसरों की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना भी एक निरंतर संघर्ष बन जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पिता का अदृश्य सहारा</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे समय में सबसे बड़ा सहारा कोई सामने खड़ा व्यक्ति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर बसा वह अदृश्य संस्कार होता है जो पिता ने बिना औपचारिक उपदेश के अपने आचरण से दिया होता है। उनके शब्द जीवन गढ़ने वाले सूत्र थे—“धैर्य रखो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब अच्छा होगा</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">अपने मन की राह पर अडिग रहो</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म ही पहचान है</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">सहनशीलता को ताकत बनाओ</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर पर विश्वास रखो</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ों का सम्मान और छोटों से स्नेह रखो</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य और ईमानदारी थामे रहो</span>,” <span lang="hi" xml:lang="hi">और “कठिन समय में हिम्मत मत छोड़ो।” विवाह के बाद जब जीवन जिम्मेदारियों और संघर्षों से भरता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब यही सूत्र भीतर से उठकर व्यक्ति को स्थिर रखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सही निर्णय की शक्ति देते हैं और कठिन मोड़ों पर टूटने से बचाकर आगे बढ़ने का साहस देते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मसम्मान का कवच</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विवाह के बाद स्त्री के सामने सबसे बड़ा संघर्ष केवल बदलती परिस्थितियों का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपनी पहचान को बनाए रखने का होता है—अनेक भूमिकाओं और अपेक्षाओं के बीच स्वयं को पीछे छूटने से बचाने का। ऐसे समय में पिता की शिक्षा एक अदृश्य कवच बनकर साथ रहती है। जब निर्णय भावनाओं में उलझता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनकी सिखाई तर्कशीलता मार्ग दिखाती है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">जब रिश्ता दबाव बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनके संस्कारों से उपजा आत्मसम्मान दृढ़ करता है। यह कोई बाहरी सहारा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर का अनुशासन और चेतना है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन में संतुलन की सीख</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गृहस्थ जीवन की सबसे कठिन परीक्षा संघर्ष नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संतुलन है—सपनों और जिम्मेदारियों के बीच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौन और अभिव्यक्ति के बीच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धैर्य और प्रतिरोध के बीच। ऐसे में पिता की सीख केवल मार्गदर्शन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर का संतुलन बन जाती है। उन्होंने सिखाया कि झुकना कमजोरी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर टूटना स्वीकार्य नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">समझौता जीवन का हिस्सा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर आत्मसम्मान कभी समझौते की वस्तु नहीं बन सकता। यही दृष्टि विवाह में स्त्री को केवल रिश्ते निभाने वाली नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि स्वयं को अक्षुण्ण रखने वाली शक्ति देती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मौन में पिता की स्मृति</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कई बार जीवन ऐसे मोड़ पर आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ रिश्तों में शब्द बोझ बन जाते हैं और मौन और भारी हो जाता है। ऐसे क्षणों में पिता की स्मृति सहारे की तरह नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर गूँजती शांत चेतना की तरह होती है—जो याद दिलाती है कि हर प्रतिक्रिया आवश्यक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर हर निर्णय विवेकपूर्ण होना चाहिए। तब वह बेटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अब पत्नी बन चुकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने भीतर उस परिचित स्वर को फिर सुनती है—“सब कुछ बचाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सबसे पहले स्वयं को मत खोना।”</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिरता का जीवन-सूत्र</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब सामाजिक अपेक्षाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक दायित्व और व्यक्तिगत आकांक्षाएँ एक साथ सामने खड़ी हो जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब जीवन मानो तीन दिशाओं में खिंचते हुए संघर्ष का रूप ले लेता है। ऐसे समय में पिता की शिक्षा सबसे गहरी भूमिका निभाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वह केवल भावनाओं को नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विचारों को भी स्थिरता प्रदान करती है। पिता ने यह नहीं सिखाया होता कि कठिनाइयों में टूट पड़ना या हार मान लेना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह कि कठिनाइयों के बीच भी स्वयं को समझना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहचानना और अपने भीतर की आवाज़ को सुनना कभी नहीं छोड़ना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षाओं की पूर्व-तैयारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समय के साथ यह गहराई से समझ आने लगता है कि पिता केवल एक व्यक्ति नहीं थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे जीवन की हर अनदेखी परीक्षा के लिए की गई एक तैयारी थे। विवाह के बाद जब परिस्थितियाँ नए प्रश्न और नई चुनौतियाँ सामने रखती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनकी सीखें किसी पुस्तक के पन्नों की तरह नहीं खुलतीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर की चेतना बनकर सक्रिय हो उठती हैं। हर कठिन निर्णय के क्षण में उनका कोई वाक्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई दृष्टिकोण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई मूल्य या फिर उनका मौन ही अदृश्य शक्ति बनकर साथ खड़ा दिखाई देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुपस्थिति में उपस्थिति</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धीरे-धीरे यह बोध और गहरा होता जाता है कि पिता भले ही इस दुनिया में नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनकी सबसे सशक्त उपस्थिति उनकी अनुपस्थिति में ही जीवित है। वे अब केवल एक आवाज़ नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विवेक बन चुके हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वे अब सलाह नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि निर्णयों की स्पष्टता हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वे अब साथ चलने वाले व्यक्ति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर का आत्मबल हैं। विवाह के संघर्षों में जब परिस्थितियाँ और लोग समझौतों की सीमाएँ बढ़ाने लगते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब पिता की सीख भीतर एक अंतिम मर्यादा-रेखा खींच देती है—जिसके आगे आत्मसम्मान कभी मौन नहीं रहता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समय के साथ यह स्पष्ट हो जाता है कि पिता केवल एक संबंध नहीं थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जीवन की अदृश्य रीढ़ थे। उनके बिना भी जीवन आगे बढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनके संस्कार हर कठिन मोड़ पर संभाल लेते हैं और गिरने नहीं देते। चाहे संघर्ष कितने भी जटिल हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिता की सीख यही दृढ़ता देती है— टूट जाना कोई विकल्प नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और स्वयं को खो देना किसी भी समस्या का समाधान नहीं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यही उनकी सबसे गहरी विरासत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो आँसुओं में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि साहस और आत्मबल बनकर जीवनभर साथ रहती है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 17:59:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>आत्मनिर्भरता स्वाभिमानी राष्ट्र का प्रतीक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">स्वावलंबन या आत्मनिर्भरता ही मनुष्य को स्वाधीन बनाने की प्रेरणा देती है। आत्मनिर्भरता की स्थिति में व्यक्ति अपनी इच्छाओं अपनी सुविधा अनुसार पूरा कर सकता है, इसके लिए दूसरों की तरफ मुंह ताकने की जरूरत नहीं पड़ती है। आत्मनिर्भरता केवल मनुष्य के लिए व्यक्तिगत रूप से ही जरूरी नहीं है, बल्कि राष्ट्र के लिए भी अति आवश्यक है ।एक स्वतंत्र राष्ट्र अपनी जनता को अपनी क्षमता के अनुसार सारी सुविधाएं तथा अन्य जीवन उपयोगी साधन उपलब्ध करा सकता है। भारत स्वतंत्रता के बाद हरित क्रांति सातवें दशक के प्रारंभ के बाद ही खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन सका, इसके</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181459/self-reliance-is-a-symbol-of-a-self-respecting-nation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(1)1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">स्वावलंबन या आत्मनिर्भरता ही मनुष्य को स्वाधीन बनाने की प्रेरणा देती है। आत्मनिर्भरता की स्थिति में व्यक्ति अपनी इच्छाओं अपनी सुविधा अनुसार पूरा कर सकता है, इसके लिए दूसरों की तरफ मुंह ताकने की जरूरत नहीं पड़ती है। आत्मनिर्भरता केवल मनुष्य के लिए व्यक्तिगत रूप से ही जरूरी नहीं है, बल्कि राष्ट्र के लिए भी अति आवश्यक है ।एक स्वतंत्र राष्ट्र अपनी जनता को अपनी क्षमता के अनुसार सारी सुविधाएं तथा अन्य जीवन उपयोगी साधन उपलब्ध करा सकता है। भारत स्वतंत्रता के बाद हरित क्रांति सातवें दशक के प्रारंभ के बाद ही खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन सका, इसके साथ ही भारत में खुशहाली की स्वाभाविक तौर पर वृद्धि हुई, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी कहा था कि "एक राष्ट्र की शक्ति उसकी आत्मनिर्भरता में है दूसरों से उधार लेकर काम चलाने में नहीं",पाकिस्तान की स्थिति बिल्कुल ऐसी ही है वह अभी तक स्वतंत्रता के बाद से 75 वर्ष के बाद भी संपूर्ण रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है, वह कर्जे से डूब गया है और अपने देश में खर्चा चलाने के लिए पूरी दुनिया से उधार मांगते हुए घूम रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान आत्मनिर्भर नहीं होने का एवं उधार की जिंदगी जीने का एक बहुत बड़ा उदाहरण है। जबकि भारत देश विज्ञान, टेक्नोलॉजी, मेडिकल साइंस,इंजीनियरिंग और कृषि सेवा, खनिज,स्पेस रिसर्च में पूर्णता आत्मनिर्भर होकर विकसित देशों के बराबर खड़ा हुआ है। यह देशवासियों और देश के लिए अत्यंत गौरव का विषय है। आत्मनिर्भरता या स्वावलंबन किसी भी देश की प्रगति विकास तथा और उसके नागरिकों की जिंदगी की जिजीविषा है जिससे वह संघर्ष कर आगे बढ़ता है। इतिहास गवाह है कि किसी भी महान लेखक को महान बनने तक निरंतर मेहनत कर किताबें लिखने का का श्रम करना पड़ा एवं आत्मनिर्भरता की स्थिति में विचार कर अपने विचारों को लिपिबद्ध करना पड़ा तब जाकर वह महानता की श्रेणी को प्राप्त कर सका। इसी तरह कोई छात्र अपने जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता है तो उसे स्वयं परीक्षा में शामिल होना पड़ेगा एवं परीक्षा में मनोवांछित सफलता प्राप्त कर उसे स्वयं अध्ययन करना होगा। इसी प्रकार जीवन के हर क्षेत्र में भी मनुष्य को आत्मनिर्भर होकर मेहनत कर दीक्षित सफलता प्राप्त करनी पड़ेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारा देश भारत भी आजादी के बाद से आत्मनिर्भरता की ओर अग्रेषित हुआ आज स्थिति यह है कि वह विश्व में विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आ खड़ा हुआ है। तमाम महापुरुषों के जीवन से भी हमें आत्मनिर्भरता तथा स्वावलंबन की शिक्षा मिलती रहती है।महात्मा गांधी अपना कार्य स्वयं किया करते थे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी "दैव दैव आलसी" पुकारा है, तब जाकर उनकी जिंदगी पटरी पर आई और हमें परिश्रम कर आत्म निर्भर होने की शिक्षा प्रदान की थी। दूसरों पर निर्भरता हमें दूसरों का अनुसरण करने के लिए मजबूर करती है। दूसरों पर निर्भर होने से हमें के अनुरूप ही जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ता है। पराधीनता हमारा आत्मविश्वास सृजनशीलता सोचने की शक्ति को नष्ट कर देती है। गुलामी एक अभिशाप होती है, आत्मनिर्भरता की कमी हमें किंकर्तव्यविमूढ़ बना देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरों की कृपा पर जीने वाला व्यक्ति जीवन के अक्षय आनंद से वंचित रहता है। खुद के परिश्रम श्रम से आगे बढ़ने वाला देश या व्यक्ति या समाज सदैव प्रफुल्लित आत्म विश्वासी तथा विकास की ओर सदैव अग्रसर रहता है। हमें सदैव अपने अंदर के आत्मविश्वास, छिपी हुई क्षमताओं मनोबल का सहारा लेकर आत्मनिर्भर या स्वावलंबी बनने का प्रयास हमेशा करते रहना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य को मनुष्य होने का अधिकार प्राप्त होता है। पराधीन देश सामान्य व्यक्ति सदैव पशु तुल्य होते हैं। जिनका अपना कोई विचार या व्यक्तित्व नहीं हो सकता है। कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता - राम सहायक उनके होते, जो होते हैं, आप सहायक, हम सबको स्वयं पर भरोसा रखना आत्मबल बढ़ाने तथा आत्मनिर्भर होने की प्रेरणा देती रहती हैं।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 17:45:45 +0530</pubDate>
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