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                <title>Nationalism - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>बांसी नगर में हर घर तिरंगा पदयात्रा का आगाज</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>बांसी (सिद्धार्थनगर)।</strong> स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देशभक्ति की भावना को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से बुधवार को बांसी नगर में ‘हर घर तिरंगा’ पदयात्रा का भव्य आगाज हुआ। राप्ती नदी के किनारे स्थित हनुमान मंदिर से शुरू हुई पदयात्रा नगर के विभिन्न मार्गों से होते हुए माधव बाबू पार्क तिराहा पहुंची, जहां पदयात्रा एक सभा में परिवर्तित हो गई।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">हाथों में तिरंगा लेकर बड़ी संख्या में राष्ट्रप्रेमी नागरिक पदयात्रा में शामिल हुए। पूरे मार्ग में भारत माता की जय और वंदे मातरम् के नारों से माहौल देशभक्ति से सराबोर रहा। लोगों ने तिरंगे के प्रति सम्मान और देश</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185189/tricolor-march-starts-from-every-house-in-bansi-nagar"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1786546106063.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>बांसी (सिद्धार्थनगर)।</strong> स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देशभक्ति की भावना को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से बुधवार को बांसी नगर में ‘हर घर तिरंगा’ पदयात्रा का भव्य आगाज हुआ। राप्ती नदी के किनारे स्थित हनुमान मंदिर से शुरू हुई पदयात्रा नगर के विभिन्न मार्गों से होते हुए माधव बाबू पार्क तिराहा पहुंची, जहां पदयात्रा एक सभा में परिवर्तित हो गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाथों में तिरंगा लेकर बड़ी संख्या में राष्ट्रप्रेमी नागरिक पदयात्रा में शामिल हुए। पूरे मार्ग में भारत माता की जय और वंदे मातरम् के नारों से माहौल देशभक्ति से सराबोर रहा। लोगों ने तिरंगे के प्रति सम्मान और देश के प्रति अपनी निष्ठा का संदेश दिया।पदयात्रा में विधायक बांसी राजा जयप्रताप सिंह, अमय पाण्डेय, पूनम जायसवाल, सरोज जायसवाल, गौरीशंकर अग्रहरि, रामशरन मौर्य, हरगोविंद साहू, कुबेर बारी, विष्णु जायसवाल, संजय श्रीवास्तव, अनुपमा सिंह दूबे, मनीषा निषाद, सनी जायसवाल, बजरंगी वर्मा सहित बड़ी संख्या में अन्य राष्ट्रप्रेमी लोग शामिल रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पश्चिमी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 21:40:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>भारत की एकता और प्रगति के प्रति समर्पित एक जीवन-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182749/a-life-dedicated-to-the-unity-and-progress-of-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/whatsapp-image-2026-07-05-at-17.40.45.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद जी ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका संकल्प और सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी। जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे। इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप थे। शिक्षाविदों के एक सम्मेलन में डॉ. मुखर्जी ने कहा था, ‘’शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना गलत है। हमें विद्यार्थियों को ऐसे तैयार करना होगा ताकि वे नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। हमारी स्वशासी संस्थाओं जैसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो सकें। इसके साथ ही वे वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें।’’</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने नेतृत्व में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें लाइब्रेरी की सुविधाओं में सुधार, विज्ञान में रिसर्च को बढ़ावा देना, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करना शामिल था। उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना विकसित हो, इसके लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न 'दीपक' यानि मिट्टी का दीया रखा गया। एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनका विजन बहुत विराट था। वे उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वे वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे। उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल की। इसके माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे।  </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहां मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूं। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को  निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे।  </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">75 वर्ष पहले पंडित नेहरू पहला संविधान संशोधन लेकर आए। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया। तब डॉ. मुखर्जी इसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे। वे भली-भांति समझ चुके थे कि कांग्रेस किस हद तक जा सकती है। समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई। जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा। इतना ही नहीं, 50 वर्ष पहले 42वां संविधान संशोधन अधिनियम लाकर एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर कुठाराघात किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों को भोजन मिल सके, जिसके लिए कई कैंटीन और रिलीफ सेंटर शुरू किए गए। एक ओर वे लोगों की पीड़ा से बहुत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से अत्यंत आक्रोशित भी थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए पंचाशेर मन्वंतर नाम की एक किताब भी लिखी। 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया था, ‘’आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।’’ आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उस भारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<blockquote class="format1"><strong>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी</strong></blockquote>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 17:49:56 +0530</pubDate>
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                <title>शौर्य दिवस' पर गूंजी सशस्त्र सलामी, 'विस्मृति से स्मृति' तक पहुंचा इतिहास</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857 की अमर गाथा और गुमनाम शहीदों की स्मृति को समर्पित तीन दिवसीय "महुआ डाबर महोत्सव-2026" का समापन बुधवार को ऐतिहासिक क्रांति स्थल पर गरिमामय कार्यक्रमों के साथ हुआ। महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा आयोजित महोत्सव का तीसरा एवं अंतिम दिन 'शौर्य दिवस' के रूप में मनाया गया।</div><div style="text-align:justify;">इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 10 जून 1857 को महुआ डाबर के वीर पुरखों ने 6 ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों को मार गिराकर ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचार के विरुद्ध निर्णायक विद्रोह का बिगुल फूंका था। इसी घटना के प्रतिशोध में 3 जुलाई को अंग्रेजों</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181124/armed-salute-echoed-on-bravery-day-history-reached-memory-from"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260613-wa0087.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857 की अमर गाथा और गुमनाम शहीदों की स्मृति को समर्पित तीन दिवसीय "महुआ डाबर महोत्सव-2026" का समापन बुधवार को ऐतिहासिक क्रांति स्थल पर गरिमामय कार्यक्रमों के साथ हुआ। महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा आयोजित महोत्सव का तीसरा एवं अंतिम दिन 'शौर्य दिवस' के रूप में मनाया गया।</div><div style="text-align:justify;">इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 10 जून 1857 को महुआ डाबर के वीर पुरखों ने 6 ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों को मार गिराकर ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचार के विरुद्ध निर्णायक विद्रोह का बिगुल फूंका था। इसी घटना के प्रतिशोध में 3 जुलाई को अंग्रेजों ने पूरे गांव को जलाकर लगभग 5000 नागरिकों का नरसंहार किया और महुआ डाबर को 'गैर-चिरागी' घोषित कर दिया था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">'शौर्य दिवस' के अवसर पर प्रातः 8 बजे क्रांति स्थल पर अमर क्रांतिवीरों की स्मृति में राजकीय सम्मान के साथ सशस्त्र सलामी दी गई। सलामी गारद दल में उपनिरीक्षक नन्हेलाल के नेतृत्व में मुख्य आरक्षी गुलाब चौधरी, संतोष सिंह, प्रभुनाथ चौरसिया, आरक्षी संजीत कुमार यादव, मनोज कुमार, पुष्कर यादव, राजन कुमार, मोहम्मद शकील और रणविजय शामिल रहे। इस दौरान बहादुर चौकी प्रभारी तेज प्रताप सिंह, उपनिरीक्षक विपिन कुमार भट्ट, आरक्षी सचिन यादव, आशीष कुमार राजपूत सहित भारी पुलिस बल मुस्तैद रहा।</div><div style="text-align:justify;">समारोह में भाग लेने आए सैकड़ों लोगों ने महुआ डाबर संग्रहालय का अवलोकन किया। संग्रहालय में रखी 'ट्रेजरी ऑफ नॉलेज' दिखाते हुए निदेशक डॉ. शाह आलम राना ने कहा कि आज आप यहां 'विस्मृति से स्मृति' तक की यात्रा पर हैं। उत्खनन में मिली जली हुई ईंटें, सिक्के, औजार, 1857 के मुकदमों की कार्यवाही और दुर्लभ पुस्तकें दशकों की तपस्या का फल हैं। यह संग्रहालय 5000 शहीदों की स्मृति का जीवंत दस्तावेज है।</div><div style="text-align:justify;">समापन सत्र में 'विरासत संरक्षण संकल्प सभा' का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त करते हुए आमजन के पास संरक्षित ब्रिटिशकालीन धरोहरों को महुआ डाबर संग्रहालय को सौंपकर इस ऐतिहासिक धरोहर को और समृद्ध बनाने की अपील की। साथ ही भावी पीढ़ियों को स्वतंत्रता संग्राम के इस गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का आह्वान किया।</div><div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के अंतिम चरण में महोत्सव को सफल बनाने में योगदान देने वाली उत्कृष्ट प्रतिभाओं, लोक कलाकारों, स्वयंसेवकों एवं सहयोगियों को अंगवस्त्र और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। महुआ डाबर की शहीद गाथा पर आधारित लोकगीतों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने माहौल को भावुक कर दिया।</div><div style="text-align:justify;">अंत में दीप प्रज्वलन कर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। राष्ट्रगान के साथ तीन दिवसीय  गरिमापूर्ण समापन हो गया।</div><div style="text-align:justify;">इस ऐतिहासिक आयोजन में क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों, इतिहास प्रेमियों, शोधार्थियों, युवाओं एवं समाजसेवियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना योगदान दिया।</div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 18:52:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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