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                <title>opinion article - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>विश्व जनसंख्या दिवस: संख्या नहीं संतुलन है सबसे बड़ी चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">हर वर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस हमें केवल बढ़ती आबादी के आंकड़ों की याद नहीं दिलाता, बल्कि यह सोचने का अवसर भी देता है कि जनसंख्या किसी देश के लिए बोझ है या सबसे बड़ी ताकत। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश के पास अपनी आबादी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास और संसाधनों की कितनी प्रभावी व्यवस्था है। वर्ष 1990 में जब विश्व जनसंख्या दिवस पहली बार व्यापक रूप से मनाया गया था, तब दुनिया की आबादी लगभग 5.3 अरब थी। आज यह 8 अरब से अधिक हो चुकी है। इन तीन दशकों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183103/population-day-balance-is-the-biggest-challenge-not-numbers"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(2).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">हर वर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस हमें केवल बढ़ती आबादी के आंकड़ों की याद नहीं दिलाता, बल्कि यह सोचने का अवसर भी देता है कि जनसंख्या किसी देश के लिए बोझ है या सबसे बड़ी ताकत। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश के पास अपनी आबादी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास और संसाधनों की कितनी प्रभावी व्यवस्था है। वर्ष 1990 में जब विश्व जनसंख्या दिवस पहली बार व्यापक रूप से मनाया गया था, तब दुनिया की आबादी लगभग 5.3 अरब थी। आज यह 8 अरब से अधिक हो चुकी है। इन तीन दशकों में विश्व की जनसंख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, लेकिन इसके साथ ही एक नया संकट भी सामने आया है। कई देशों में आबादी तेजी से बढ़ रही है, जबकि अनेक विकसित देशों में जन्मदर इतनी कम हो गई है कि वहां जनसंख्या घटने और समाज के बूढ़ा होने की चुनौती पैदा हो गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत आज दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार देश की जनसंख्या लगभग 1.46 से 1.47 अरब के बीच पहुंच चुकी है। हालांकि अच्छी बात यह है कि भारत की वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर लगातार घट रही है और कुल प्रजनन दर भी प्रतिस्थापन स्तर के आसपास या उससे नीचे आ गई है। इसका अर्थ यह है कि अब भारत अनियंत्रित जनसंख्या विस्फोट के दौर से निकलकर जनसंख्या संतुलन के एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है। इसलिए आज आवश्यकता केवल जनसंख्या नियंत्रण की नहीं, बल्कि दूरदर्शी जनसंख्या प्रबंधन की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बीते दशकों में जनसंख्या तेजी से बढ़ने के पीछे कई कारण रहे। चिकित्सा सुविधाओं में सुधार, टीकाकरण, बेहतर अस्पताल, स्वच्छता और पोषण के कारण मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आई। शिशु एवं मातृ मृत्यु दर भी घटी, जिससे अधिक बच्चे जीवित रहने लगे। दूसरी ओर लंबे समय तक जन्मदर अपेक्षाकृत ऊंची बनी रही। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की कमी, परिवार नियोजन के प्रति सीमित जागरूकता, बाल विवाह, पुत्र प्राप्ति की सामाजिक मानसिकता, गरीबी, बड़े परिवार को सामाजिक प्रतिष्ठा मानने जैसी धारणाओं ने भी जनसंख्या वृद्धि को बढ़ावा दिया। कई परिवारों में बच्चे भविष्य की आर्थिक सुरक्षा और श्रम शक्ति के रूप में देखे जाते रहे, जिससे परिवार का आकार बड़ा होता गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव केवल लोगों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा असर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, जल, खाद्यान्न, ऊर्जा, परिवहन और पर्यावरण पर पड़ता है। यदि जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास से अधिक तेज हो जाए तो विकास योजनाओं का लाभ प्रत्येक व्यक्ति तक समान रूप से नहीं पहुंच पाता। सरकारें सड़क, अस्पताल, विद्यालय और अन्य बुनियादी सुविधाएं विकसित करती हैं, लेकिन बढ़ती आबादी के कारण उनकी मांग लगातार बढ़ती रहती है। परिणामस्वरूप संसाधनों पर दबाव बढ़ जाता है और विकास का लाभ अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि जनसंख्या का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी देश की आबादी में युवाओं का अनुपात अधिक हो तो वह देश आर्थिक दृष्टि से तेजी से आगे बढ़ सकता है। भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी कार्यशील आयु वर्ग में है। यही भारत का सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय लाभांश है। यदि इन युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक कौशल, रोजगार और उद्यमिता के अवसर मिलें तो भारत विश्व अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कार्यशक्ति बन सकता है। यही कारण है कि आज अनेक विकसित देश भारतीय इंजीनियरों, डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों और अन्य पेशेवरों की ओर उम्मीद से देख रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">दुनिया का जनसांख्यिकीय परिदृश्य तेजी से बदल रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जापान, दक्षिण कोरिया, इटली, जर्मनी और चीन जैसे देशों में जन्मदर लगातार घट रही है। कई देशों में स्थिति ऐसी हो गई है कि वहां जनसंख्या को बनाए रखने के लिए सरकारें लोगों को अधिक बच्चे पैदा करने पर आर्थिक प्रोत्साहन, कर में छूट, नकद सहायता, मुफ्त शिक्षा और अन्य सुविधाएं दे रही हैं। इन देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती वृद्ध होती आबादी और घटती कार्यशील जनसंख्या है। कम युवा होने के कारण उद्योगों, अस्पतालों और सेवा क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी महसूस होने लगी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत के लिए यह स्थिति एक महत्वपूर्ण सीख है। लंबे समय तक "हम दो हमारे दो" का संदेश सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया गया और इसका सकारात्मक परिणाम भी सामने आया। आज देश की प्रजनन दर काफी कम हो चुकी है। इसलिए भविष्य की नीतियां बनाते समय केवल जनसंख्या घटाने पर जोर देना उचित नहीं होगा। यदि जन्मदर लगातार बहुत नीचे चली गई तो आने वाले दशकों में भारत भी वृद्ध होती आबादी की चुनौती का सामना कर सकता है। विशेषज्ञ पहले ही संकेत दे चुके हैं कि यदि संतुलन नहीं बनाया गया तो भारत अमीर बनने से पहले बूढ़ा हो सकता है। इसका अर्थ यह है कि आर्थिक विकास की गति उस स्तर तक पहुंचने से पहले ही बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ने लगेगी और कार्यशील आबादी का अनुपात घट जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;">इसलिए अब आवश्यकता संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश में ऐसी नीतियां बननी चाहिए जो छोटे और जिम्मेदार परिवार को प्रोत्साहित करें, लेकिन साथ ही अत्यधिक गिरती जन्मदर को भी रोका जा सके। परिवार नियोजन का उद्देश्य केवल बच्चों की संख्या कम करना नहीं, बल्कि स्वस्थ, शिक्षित और सक्षम परिवार बनाना होना चाहिए। प्रत्येक बच्चे को बेहतर पोषण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और सुरक्षित भविष्य उपलब्ध कराना ही वास्तविक जनसंख्या नीति की सफलता होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल आबादी नहीं, बल्कि मानव संसाधन के प्रभावी उपयोग की है। यदि करोड़ों युवा बेरोजगार रहेंगे तो जनसांख्यिकीय लाभांश बोझ बन जाएगा। वहीं यदि उन्हें आधुनिक तकनीक, डिजिटल कौशल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विनिर्माण, अनुसंधान, कृषि और सेवा क्षेत्रों में अवसर मिलेंगे तो यही युवा भारत को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बना सकते हैं। आने वाले वर्षों में वैश्विक श्रम बाजार में भारत की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होगी क्योंकि विकसित देशों में कार्यबल लगातार घट रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जनसंख्या और पर्यावरण के बीच भी गहरा संबंध है। बढ़ती आबादी के कारण जल संकट, प्रदूषण, जंगलों की कटाई, कृषि भूमि पर दबाव और ऊर्जा की मांग बढ़ती है। इसलिए सतत विकास की अवधारणा के अनुरूप ऐसी विकास नीतियां आवश्यक हैं जिनमें संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग हो और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संपदा सुरक्षित रह सके। जनसंख्या प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व जनसंख्या दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि केवल लोगों की संख्या बढ़ना या घटना ही महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और समान अवसर उपलब्ध हों। भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति है। यदि यह शक्ति सही दिशा में आगे बढ़ी तो देश आर्थिक महाशक्ति बनने की क्षमता रखता है। लेकिन यदि शिक्षा, रोजगार और संसाधनों का संतुलित विकास नहीं हुआ तो यही अवसर चुनौती में बदल सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता भय या उत्साह में किसी एक छोर पर खड़े होने की नहीं, बल्कि संतुलित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की है। जनसंख्या न तो केवल समस्या है और न ही केवल संपत्ति। वह एक ऐसी शक्ति है जिसे सही नीति, दूरदर्शी योजना और प्रभावी प्रबंधन के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा आधार बनाया जा सकता है। विश्व जनसंख्या दिवस हमें यही संदेश देता है कि भविष्य की सफलता केवल जनसंख्या की संख्या से नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता, उत्पादकता और संतुलित विकास से तय होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 21:27:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>हर बच्चा भविष्य का पृष्ठ : लेकिन हम पन्ने भर रहे हैं या लिख रहे हैं?</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर जन्म नई संभावना लेकर आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हर संभावना उपलब्धि में नहीं बदलती। यही प्रश्न विश्व जनसंख्या दिवस हमारे सामने खड़ा करता है। किसी भी राष्ट्र का भविष्य जनगणना की तालिकाओं में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उन चेहरों में लिखा होता है जिन्हें हम अक्सर केवल संख्या मान लेते हैं। एक नवजात शिशु किसी परिवार का नया सदस्य भर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि देश के भविष्य का पहला पृष्ठ होता है। विडंबना यह है कि उस पृष्ठ पर भविष्य लिखने की तैयारी किए बिना हम हर वर्ष नई प्रतियां जोड़ते जा रहे हैं। इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183101/every-child-is-a-page-of-the-future-but-we"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/world-population-day.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर जन्म नई संभावना लेकर आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हर संभावना उपलब्धि में नहीं बदलती। यही प्रश्न विश्व जनसंख्या दिवस हमारे सामने खड़ा करता है। किसी भी राष्ट्र का भविष्य जनगणना की तालिकाओं में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उन चेहरों में लिखा होता है जिन्हें हम अक्सर केवल संख्या मान लेते हैं। एक नवजात शिशु किसी परिवार का नया सदस्य भर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि देश के भविष्य का पहला पृष्ठ होता है। विडंबना यह है कि उस पृष्ठ पर भविष्य लिखने की तैयारी किए बिना हम हर वर्ष नई प्रतियां जोड़ते जा रहे हैं। इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि भारत में कितने लोग हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह है कि उनमें कितनी संभावनाओं को अवसर मिला और कितनों को परिस्थितियों के भरोसे छोड़ दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज भारत </span>1.47 <span lang="hi" xml:lang="hi">अरब से अधिक लोगों के साथ दुनिया का सबसे बड़ा जनसमूह है। इसे केवल भीड़ कहना उतनी ही बड़ी भूल होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितनी बिना तैयारी के इसे शक्ति मान लेना। संख्या न वरदान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न अभिशाप</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह केवल संभावनाओं का भंडार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका मूल्य इस बात से तय होता है कि राष्ट्र उसकी ऊर्जा को किस दिशा में ले जाता है। भारत की लगभग </span>65 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत आबादी </span>35 <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ष से कम आयु की है। अनेक विकसित देश घटती जन्म दर और वृद्ध होती आबादी की चुनौती से जूझ रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि हमारे पास युवा शक्ति का अवसर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो इतिहास बार-बार नहीं देता। किंतु अवसर तभी उपलब्धि बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब उसके पीछे दूरदर्शी व्यवस्था हो। केवल युवाओं की संख्या से राष्ट्र समृद्ध नहीं होता</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौशल और रोजगार का सुदृढ़ आधार भी उतना ही आवश्यक है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहीं सबसे बड़ी विडंबना है। युवाओं की ऊर्जा प्रचुर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसे दिशा देने वाली व्यवस्था अब भी अपेक्षाओं से पीछे है। शिक्षा डिग्री दे रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दक्षता नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर समान नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार की आकांक्षाएं बढ़ रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अवसर उसी गति से नहीं। परिणामस्वरूप युवा निराशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असुरक्षा और दिशाहीनता के बीच अपने महत्वपूर्ण वर्ष गंवा देते हैं। यह केवल व्यक्तिगत नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय हानि है। जिस ऊर्जा से नवाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसंधान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग और सामाजिक परिवर्तन संभव थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पलायन और असंतोष में बदल जाती है। जनसंख्या का वास्तविक संकट यहीं से प्रारंभ होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब समय है कि बहस जनसंख्या नियंत्रण से आगे बढ़कर जनसंख्या की गुणवत्ता पर केंद्रित हो। किसी बच्चे का जन्म केवल जैविक घटना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। उसे स्वस्थ शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणवत्तापूर्ण शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक कौशल और सम्मानजनक अवसर देना ही वास्तविक परिवार नियोजन है। शहरों में महंगाई और करियर की चुनौतियों ने बच्चों का पालन-पोषण महंगी जिम्मेदारी बना दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं गांवों में अवसरों का अभाव युवाओं को शहरों की ओर धकेल रहा है। परिणामस्वरूप गांव खाली हो रहे हैं और शहर अनियोजित विस्तार व भीड़ के दबाव से जूझ रहे हैं। इसलिए जनसंख्या नीति का संबंध केवल जन्म दर से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौशल विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार और संतुलित क्षेत्रीय विकास से होना चाहिए। तभी हर नया नागरिक देश की संपत्ति बनेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोझ नहीं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज का युवा जीवित रहने के लिए नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सम्मानजनक और सार्थक जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है। उसकी आकांक्षाओं में अच्छी नौकरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षित भविष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छ पर्यावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समान अवसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नवाचार और व्यक्तिगत विकास शामिल हैं। यदि ये अपेक्षाएं अधूरी रहीं तो आने वाले वर्षों में जन्म दर स्वाभाविक रूप से प्रभावित होगी और हमारे सामने भी वही स्थिति आ सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे आज कई विकसित राष्ट्र गुजर रहे हैं। इसलिए विश्व जनसंख्या दिवस का संदेश परिवार नियोजन तक सीमित नहीं रह सकता। इसे युवा सशक्तिकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लैंगिक समानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिला शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य सुरक्षा और सतत विकास के व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ना होगा। जब प्रत्येक युवा अपनी क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ सकेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी जनसंख्या राष्ट्रीय संपदा बनेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यावरण और संसाधनों को लेकर हमारी सोच भी बदलनी होगी। यह कहना आसान है कि बढ़ती आबादी संसाधनों पर दबाव बढ़ा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु यह आधा सत्य है। वास्तविक प्रश्न यह है कि उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कैसे हो रहा है। असंतुलित उपभोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपव्यय और विकास की असमान शैली कई बार जनसंख्या से अधिक नुकसान पहुंचाती है। यदि तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नवाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नवीकरणीय ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मार्ट शहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक कृषि और संसाधनों के विवेकपूर्ण प्रबंधन को प्राथमिकता मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बड़ी आबादी भी सतत विकास की साझेदार बन सकती है। केवल जनसंख्या को दोष देकर नीतिगत कमजोरियों और सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्ति नहीं मिल सकती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत जैसा विविधताओं से भरा देश एक जैसी नीति से नहीं चल सकता। अलग-अलग राज्यों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षेत्रों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृतियों और आर्थिक परिस्थितियों की अपनी चुनौतियां हैं। इसलिए जनसंख्या प्रबंधन स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप लचीला होना चाहिए। शिक्षा में निवेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिला सशक्तिकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कौशल विकास और रोजगार सृजन—यही भविष्य के भारत के आधार स्तंभ हैं। इतिहास साक्षी है कि जब भी भारतीय मानव संसाधन को सही दिशा मिली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसने असंभव को संभव बनाया। स्वतंत्रता आंदोलन से सूचना प्रौद्योगिकी और स्टार्टअप क्रांति तक हर उपलब्धि के पीछे संख्या नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रशिक्षित और प्रेरित मानव शक्ति ही निर्णायक रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व जनसंख्या दिवस हमें नई दृष्टि अपनाने का अवसर देता है। हमें लोगों की गिनती से आगे बढ़कर उनमें छिपी संभावनाओं को पहचानना होगा। देश की सबसे बड़ी पूंजी उसके खनिज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इमारतें या बजट नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसके नागरिक होते हैं। यदि हर बच्चे की शिक्षा में निवेश होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर युवा को अवसर मिलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर महिला सुरक्षित और सशक्त होगी तथा हर क्षेत्र संतुलित विकास का सहभागी बनेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भारत केवल दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला राष्ट्र नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सक्षम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्ध और प्रभावशाली राष्ट्र के रूप में पहचाना जाएगा। तब विश्व जनसंख्या दिवस केवल औपचारिक तिथि नहीं रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक बनेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें हर जन्म को बढ़ती संख्या नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य की संभावना माना जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 21:23:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बच्चों की चहकती ज़िंदगी पर पड़ रहा विकास का काला साया</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब किसी शहर से बच्चों की खिलखिलाहट गुम होने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझ लेना चाहिए कि वहां विकास ने दिशा खो दी है। किसी समाज की असली समृद्धि उसकी ऊँची इमारतों में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बच्चों के हिस्से आए खुले आसमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाली और सुरक्षित खेल-स्थलों में दिखाई देती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्भाग्य से शहर जितनी तेजी से फैल रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वजनिक पार्क और खेल के मैदान उतनी ही तेजी से सिमट रहे हैं। जहां कभी नंगे पांव दौड़ता बचपन सपने संजोता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां आज सूखी जमीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टूटे झूले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जंग लगी फिसलपट्टियां और कंक्रीट का</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183099/the-dark-shadow-of-development-is-falling-on-the-vibrant"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(1)5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब किसी शहर से बच्चों की खिलखिलाहट गुम होने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझ लेना चाहिए कि वहां विकास ने दिशा खो दी है। किसी समाज की असली समृद्धि उसकी ऊँची इमारतों में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बच्चों के हिस्से आए खुले आसमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाली और सुरक्षित खेल-स्थलों में दिखाई देती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्भाग्य से शहर जितनी तेजी से फैल रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वजनिक पार्क और खेल के मैदान उतनी ही तेजी से सिमट रहे हैं। जहां कभी नंगे पांव दौड़ता बचपन सपने संजोता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां आज सूखी जमीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टूटे झूले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जंग लगी फिसलपट्टियां और कंक्रीट का फैलता साम्राज्य खड़ा है। यह केवल सौंदर्य का ह्रास नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों पर मौन प्रहार है। यदि बचपन से खेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति और खुलापन छीन लिया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसकी कीमत केवल बच्चे नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरा समाज चुकाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कंक्रीट की हर नई दीवार हरियाली की कीमत पर खड़ी होती है। बीते दो दशकों में अनियोजित शहरीकरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासनिक उदासीनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रष्टाचार और नागरिक चुप्पी ने सार्वजनिक पार्कों को उपेक्षित कर दिया। कई महानगरों में प्रति बच्चे उपलब्ध खेल क्षेत्र आधे से भी कम रह गया है। नतीजा—बचपन स्क्रीन में कैद है। शारीरिक गतिविधियां घटने से मोटापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकेलापन और व्यवहारगत समस्याएं बढ़ रही हैं। प्रकृति से कटता बचपन तकनीक में दक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर शरीर से दुर्बल और मन से असंतुलित होता जा रहा है। यह समाज के भविष्य की गंभीर चेतावनी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बचपन की पहली पाठशाला किसी इमारत में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुले आकाश के नीचे बसती है। पार्क केवल खेल का मैदान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तित्व निर्माण की प्रयोगशाला हैं। यहीं बच्चे मित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुशासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हार-जीत का संतुलन और प्रकृति से रिश्ता सीखते हैं। मिट्टी की सोंधी गंध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेड़ों की छांव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पक्षियों का कलरव और साथियों का साथ वे संस्कार देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कोई स्क्रीन या बंद कमरा नहीं दे सकता। पार्क खत्म होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बचपन का यह अध्याय अधूरा रह जाता है। सबसे अधिक मार सामान्य और मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके पास निजी क्लब या महंगे प्ले जोन का विकल्प नहीं होता। उनके बच्चे गलियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छतों और व्यस्त सड़कों पर खेलने को विवश हैं। खेल का अधिकार भी अब आर्थिक असमानता की भेंट चढ़ रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे भयावह स्थिति तब होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब बच्चों के लिए बनी जगहें ही असुरक्षित हो जाएं। जो पार्क बचे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी हालत लगातार बिगड़ रही है। रखरखाव का बजट आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उसका बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार या अधूरे कार्यों में सिमट जाता है। टूटे झूले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जंग लगी फिसलपट्टियां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गंदे पानी के गड्ढे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूखी घास और कचरा अब सामान्य दृश्य हैं। अनेक स्थानों पर अतिक्रमण ने पार्कों की जमीन निगल ली है। कहीं राजनीतिक आयोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं अस्थायी निर्माण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो रात होते ही कई पार्क असामाजिक तत्वों और शराबियों के अड्डे बन जाते हैं। नतीजा यह है कि जहां बच्चों को सबसे सुरक्षित होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं जाने से परिवार कतराने लगे हैं। किसी संवेदनशील समाज के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर उजड़ा पार्क योजनाओं नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईमानदार इच्छाशक्ति की मांग करता है। यह संकट असाध्य नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि सरकारें इसे सौंदर्यीकरण नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बच्चों के अधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रश्न मानें। प्रत्येक शहर में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>"<span lang="hi" xml:lang="hi">पार्क पुनर्जागरण मिशन"</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत पुराने पार्कों का वैज्ञानिक पुनर्विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षित खेल उपकरण और नियमित रखरखाव की जवाबदेही तय हो। हर नए आवासीय प्रकल्प में </span>18 <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>20 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत क्षेत्र हरित पार्क और खेल क्षेत्र के लिए कानूनी रूप से आरक्षित हो। डिजिटल निगरानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक ऑडिट और वित्तीय पारदर्शिता से सुनिश्चित किया जाए कि पार्कों का बजट कागजों पर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धरातल पर दिखे। विकास की हर योजना में बच्चों का खेल क्षेत्र अंतिम नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहला अधिकार होना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारें अकेले बचपन नहीं बचा सकतीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज को भी आगे आना होगा। किसी मोहल्ले का पार्क तभी जीवित रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब लोग उसे अपना मानें। स्थानीय निवासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयंसेवी संस्थाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वरिष्ठ नागरिक और युवा मिलकर पार्कों को गोद लें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्षारोपण और निगरानी की जिम्मेदारी निभाएं। शिक्षा व्यवस्था भी सहभागी बने। विद्यालयों में प्रत्येक सप्ताह</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>"<span lang="hi" xml:lang="hi">पार्क डे"</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां बच्चे खेल के साथ प्रकृति को समझें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यावरण संरक्षण सीखें और खुली हवा में सामूहिक गतिविधियों का अनुभव करें। अभिभावकों को भी समझना होगा कि बच्चों का सर्वांगीण विकास केवल कोचिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंक और डिजिटल उपकरणों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि खुले मैदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिट्टी की सोंधी खुशबू और प्रकृति के सान्निध्य से भी होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कानून तभी सार्थक होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वे कागज से उतरकर जनजीवन की रक्षा करें। सार्वजनिक पार्कों को</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शून्य सहनशीलता क्षेत्र</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">घोषित किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां अतिक्रमण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यावसायिक उपयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीतिक आयोजन और असामाजिक गतिविधियों की कोई जगह न हो। ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कठोर दंड और अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। नगर निकायों का निरीक्षण औपचारिकता न रहे</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक पार्क की स्थिति सार्वजनिक पोर्टल पर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि नागरिक भी निगरानी कर सकें। प्रशासन की दृढ़ता और समाज की सजगता से ही पार्कों की गरिमा लौटेगी। अन्यथा विकास की चकाचौंध में बचपन का उजाला खोता रहेगा और हम आंकड़ों में प्रगति तलाशते रह जाएंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब बच्चों से खुला आकाश छिनने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझ लीजिए समाज का भविष्य सिमट रहा है। जिसने खुले मैदान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेड़ों की छांव और प्रकृति की गोद में जीवन नहीं सीखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनशील समाज की अपेक्षा कैसे की जा सकती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पार्क विलासिता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर बच्चे का मौलिक अधिकार हैं। यदि आज हम उसके हिस्से का आकाश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाली और खेल छीन रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कल उससे रचनात्मकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनशीलता और सामाजिक संतुलन की अपेक्षा का नैतिक अधिकार भी खो देंगे। इसलिए सार्वजनिक पार्कों की रक्षा केवल पर्यावरण नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र निर्माण का संकल्प है। जहां पार्कों में बचपन की हंसी गूंजती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं सशक्त भविष्य जन्म लेता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 21:19:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ग्रामीण भारत की शिक्षा और स्वास्थ्य को ऊर्जा दे सकते हैं सोलर प्लांट</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> भारत वर्ष </span>2047 <span lang="hi" xml:lang="hi">तक विकसित और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री नरेंद्र मोदी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के नेतृत्व में डिजिटल इंडिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरित ऊर्जा और आधुनिक शिक्षा जैसे अनेक महत्वाकांक्षी अभियान चलाए जा रहे हैं। लेकिन इन सभी योजनाओं की सफलता का आधार एक ही है निर्बाध बिजली आपूर्ति।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के महानगरों और बड़े शहरों में बिजली की उपलब्धता अपेक्षाकृत बेहतर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए वहां डिजिटल शिक्षा और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लोगों तक पहुँच रहा है। इसके विपरीत तहसील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेज और अस्पताल आज</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182800/solar-plants-can-provide-energy-to-the-education-and-health"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/image1170x530cropped.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> भारत वर्ष </span>2047 <span lang="hi" xml:lang="hi">तक विकसित और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्री नरेंद्र मोदी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के नेतृत्व में डिजिटल इंडिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरित ऊर्जा और आधुनिक शिक्षा जैसे अनेक महत्वाकांक्षी अभियान चलाए जा रहे हैं। लेकिन इन सभी योजनाओं की सफलता का आधार एक ही है निर्बाध बिजली आपूर्ति।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के महानगरों और बड़े शहरों में बिजली की उपलब्धता अपेक्षाकृत बेहतर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए वहां डिजिटल शिक्षा और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लोगों तक पहुँच रहा है। इसके विपरीत तहसील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेज और अस्पताल आज भी बिजली की अनियमित आपूर्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कम वोल्टेज और बार-बार होने वाली तकनीकी खराबियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में स्मार्ट क्लास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल लैब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कंप्यूटर शिक्षा और आधुनिक चिकित्सा उपकरण केवल सरकारी योजनाओं की फाइलों तक सीमित होकर रह जाते हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना यह भी है कि एक ओर सरकार सरकारी संस्थानों को हाईटेक बनाने पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं दूसरी ओर इन संस्थानों के सुचारू संचालन के लिए सबसे आवश्यक संसाधन बिजली की स्थायी व्यवस्था अब तक नहीं हो सकी है। बिना बिजली के डिजिटल शिक्षा और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं की कल्पना अधूरी है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी स्थिति में सरकार को एक दूरदर्शी निर्णय लेते हुए देश के सभी शासकीय स्कूलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेजों और अस्पतालों में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रूफटॉप सोलर प्लांट</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थापित करने की राष्ट्रीय योजना लागू करनी चाहिए। यह केवल वैकल्पिक ऊर्जा का उपाय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य और ऊर्जा आत्मनिर्भरता को एक साथ मजबूत करने वाला ऐतिहासिक कदम होगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सोलर प्लांट स्थापित होने से इन संस्थानों को दिनभर निर्बाध बिजली मिलेगी। विद्यार्थियों की पढ़ाई बिना व्यवधान जारी रहेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मार्ट क्लास और कंप्यूटर लैब प्रभावी ढंग से संचालित हो सकेंगी तथा अस्पतालों में जीवन रक्षक उपकरण बिजली संकट से प्रभावित नहीं होंगे। इतना ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार का हर वर्ष बिजली बिलों पर होने वाला करोड़ों रुपये का व्यय भी काफी हद तक कम हो जाएगा। इससे पर्यावरण संरक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्बन उत्सर्जन में कमी और स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को भी अभूतपूर्व बढ़ावा मिलेगा।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आज आवश्यकता केवल योजनाएं बनाने की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उन्हें धरातल पर टिकाऊ बनाने की है। </span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि सरकार वास्तव में विकसित भारत का सपना साकार करना चाहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ग्रामीण शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाना होगा। शासकीय स्कूलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेजों और अस्पतालों में सोलर प्लांट लगाने की पहल इसी दिशा में एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हो सकती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विकसित भारत की मजबूत नींव तभी रखी जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब गांव का विद्यालय और अस्पताल भी शहरों की तरह रोशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक और ऊर्जा संपन्न होंगे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अरविंद रावल</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 22:24:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>इकसठ की उम्र में तीसरा निकाह </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">आज आपको अभिनेता आमिर खान का टीवी शो सत्यमेव जयते  याद दिलाते हैं जिसमें वह हिन्दू मान्यताओं को केंद्र में रखते हुए आलोचना कर अपना ज्ञान बांटते थे  और सामाजिक न्याय एवं विज्ञान की व्याख्या करते नहीं थकते। वहीं आमिर खान ने एक वालीबुड फिल्म पीके बनायी और इसके जरिए हिन्दू धर्म की आस्था और श्रद्धा पर काफी उल्टा सीधा मनमाना फिल्माया और देवी देवताओं का मजाक उड़ाया लेकिन सेकुलरिज्म के नाम पर बहुसंख्यकों के धर्म और आस्था पर चोट करने के कल्चर को पैदा करने वाली तत्कालीन सरकार और उसके अधीनस्थ सेंसर बोर्ड ने फिल्म पर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182782/third-marriage-at-the-age-of-sixty-one"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hmxd-0-boaafk6i.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
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<div style="text-align:justify;">आज आपको अभिनेता आमिर खान का टीवी शो सत्यमेव जयते  याद दिलाते हैं जिसमें वह हिन्दू मान्यताओं को केंद्र में रखते हुए आलोचना कर अपना ज्ञान बांटते थे  और सामाजिक न्याय एवं विज्ञान की व्याख्या करते नहीं थकते। वहीं आमिर खान ने एक वालीबुड फिल्म पीके बनायी और इसके जरिए हिन्दू धर्म की आस्था और श्रद्धा पर काफी उल्टा सीधा मनमाना फिल्माया और देवी देवताओं का मजाक उड़ाया लेकिन सेकुलरिज्म के नाम पर बहुसंख्यकों के धर्म और आस्था पर चोट करने के कल्चर को पैदा करने वाली तत्कालीन सरकार और उसके अधीनस्थ सेंसर बोर्ड ने फिल्म पर आई आपत्तियों को दरकिनार कर फिल्म को प्रदर्शन की मंजूरी दी थी।</div>
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<div style="text-align:justify;">दरअसल अक्सर आरोप लगाया गया है कि आमिर पूरी तरह तास्सुबी और जेहादी जहनियत वाला अभिनेता है। इसने हिन्दू मान्यताओं पर तो प्रहार किया मजाक उड़ाया अनाप शनाप फिल्मांकन किया लेकिन कभी अपने इस्लाम धर्म के सम्बन्ध में एक शब्द एक दृश्य एक कमेंट तक कभी नहीं किया। इस जैहादी ने सभी हिन्दू युवतियों से निकाह किया। और तलाक दे दिया। इन से पैदा बच्चों के मुस्लिम नाम रखकर मुसलिम मजहब दिया। </div>
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<div style="text-align:justify;">बॉलीवुड के ये स्वयंभू मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान तीसरी बार अपना घर बसाने जा रहे हैं. 61 साल की उम्र में वो अपनी गर्लफ्रेंड गौरी स्प्रैट संग शादी करेंगे, जिनकी उनसे काफी पुरानी दोस्ती रही. आमिर और गौरी पिछले कुछ सालों से एक-दूसरे को डेट कर रहे थे, मगर अब उन्होंने एक होने का फैसला किया है. 5 जुलाई, संडे को उनकी अपने ही घर में रजिस्टर्ड मैरिज होगी. आमिर के मुताबिक, वो एक छोटा सा सेलिब्रेशन रखेंगे, जिसमें उनके करीबी दोस्त और परिवार वाले ही मौजूद रहेंगे.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान ने अपनी पहली शादी साल 1986 में रीना दत्ता से की थी। इस शादी से उनके दो बच्चे- जुनैद खान और आइरा खान हैं। आपसी सहमति से साल 2002 में दोनों का तलाक हो गया था। उन्होंने साल 2005 में फिल्म निर्देशक किरण राव से दूसरी शादी की। इस जोड़े का एक बेटा, आजाद राव खान है। साल 2021 में दोनों ने तलाक ले लिया, लेकिन वे आज भी अच्छे दोस्त हैं।आमिर खान 5 जुलाई 2026 को अपनी पार्टनर गौरी स्प्रैट (गौरी खान) के साथ तीसरी शादी कर रहे है। यह एक बहुत ही सादा और निजी समारोह होगा , जिसमें उनके घर पर केवल करीबी परिवार और दोस्त ही शामिल होंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आमिर खान की होने वाली पार्टनर (और तीसरी पत्नी) गौरी स्प्रैट  किसी एक विशेष रूढ़िवादी धर्म को मानने के बजाय एक विविध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आती है। उनका परिवार बहु-सांस्कृतिक (मल्टी-कल्चरल) है - उनकी मां तमिल मूल की हैं और पिता ब्रिटिश-आयरिश मूल के है। उनके दादा फिलिप स्प्रैट ब्रिटिश लेखक और भारत के स्वतंत्रता सेनानी थे, जो 1920 के दशक में भारत आए थे। गौरी स्प्रैट वर्तमान में 47 वर्ष की हैं, जिनका जन्म 21 अगस्त 1978 को बेंगलुरु, कर्नाटक में हुआ था। गौरी स्प्रैट के बारे में कुछ मुख्य जानकारी वह 61 वर्षीय अभिनेता आमिर खान से उम्र में 14 साल छोटी है. वह बेंगलुरु की एक उद्यमी  और फैशन-लाइफस्टाइल प्रोफेशनल है। पारिवारिक पृष्ठभूमि: उनकी मां तमिलियन और पिता आयरिश मूल के हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आमिर खान की तीसरी शादी को लेकर फैंस और फिल्म इंडस्ट्री में काफी उत्सुकता है.  मिली जानकारी के मुताबिक, सुपरस्टार की शादी में 150 के आसपास मेहमान होने की संभावना है. एक करीबी सूत्रों का कहना है, शादी में करीब 100 से 150 मेहमान शामिल होंगे. इसमें दोनों परिवारों के लोग, करीबी दोस्त और फिल्म इंडस्ट्री के कुछ खास लोग ही मौजूद रहेंगे. आमिर और गौरी ने खुद मेहमानों की लिस्ट तैयार की है और शादी के लंच का मेन्यू भी अपनी पसंद से चुना है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सवाल फिर वही है कि आज तक आमिर खान उन मामलों पर क्यों नहीं बोलते जहां मुस्लिम पुरुष हिंदू महिलाओं को रिश्तों में फंसाने के लिए अपनी पहचान छुपाते हैं, जिससे जबरन धर्म परिवर्तन और धोखा होता है? साथ ही, वे अपने ही समुदाय के उन सदस्यों को सलाह क्यों नहीं देते जिन्होंने मुस्लिम लड़कियों से प्यार करने के लिए हिंदू लड़कों की हत्या कर दी ? बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान  मुख्य रूप से उनके सामाजिक-राजनीतिक बयानों, फिल्मों में धार्मिक चित्रण, और उनकी व्यक्तिगत पसंदों को लेकर विवादास्पद रहें है। उन्हें अपने करियर में कई बार तीखी प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा है।</div>
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<div style="text-align:justify;">आपको याद दिला दें असहिष्णुता पर दिया गया बयान मुख्य विवाद का कारण बना था। साल 2015 में आमिर खान ने देश में बढ़ती असहिष्णुता पर एक बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि उनकी तत्कालीन पत्नी किरण राव को बच्चों की सुरक्षा के लिए भारत में डर लगता है और उन्होंने देश छोड़ने तक का विचार किया था।आलोचना का कारण: इस बयान को बड़े पैमाने पर 'राष्ट्र-विरोधी' और देश की छवि खराब करने वाला माना गया। इसके बाद उन्हें अतुल्य भारत इंक्रडिबल इंडिया Incredible India के ब्रांड एंबेसडर पद से भी हटा दिया गया था। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी तरह फिल्मों में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप'पीके'  फिल्म विवाद की जनक बनी। साल 2014 में आई फिल्म 'पीके' में हिंदू देवी-देवताओं और धार्मिक कर्मकांडों के चित्रण को लेकर उनकी भारी आलोचना हुई। आलोचकों और कई संगठनों ने उन पर 'हिंदू विरोधी' होने और 'लव जिहाद' को बढ़ावा देने के आरोप लगाए।बैंक विज्ञापन विवाद: साल 2022 में एक निजी बैंक के विज्ञापन में शादी के बाद दूल्हे को दुल्हन के घर जाते हुए दिखाया गया था, जिसे पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों के खिलाफ बताकर उनकी आलोचना की गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल ही में तुर्किए  के राष्ट्रपति और प्रथम महिला से मुलाकात कर अंतरराष्ट्रीय विवाद में भी आमिर खान का नाम जुड़ गया। साल 2020 में अपनी फिल्म की शूटिंग के दौरान आमिर खान ने तुर्किए (तुर्की) के राष्ट्रपति रेसेप तय्यिप एर्दोगन की पत्नी (प्रथम महिला) से मुलाकात की थी।आलोचना का कारण: तुर्किए द्वारा कश्मीर और अन्य भू-राजनीतिक मुद्दों पर भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक रुख रखने के कारण, भारतीय नेटिजन्स ने आमिर की इस मुलाकात को असंवेदनशील माना और सोशल मीडिया पर उनकी फिल्मों के बहिष्कार की मांग की। राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में भागीदारीनर्मदा बचाओ आंदोलन: साल 2006 में उन्होंने मेधा पाटकर के 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' का समर्थन किया था, जो गुजरात में बांध निर्माण के खिलाफ था। इसके कारण गुजरात में उनकी फिल्म 'फना' का भारी विरोध और बहिष्कार हुआ था। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फिल्म 'पीके' में, एक लालची पुजारी द्वारा दान पेटी से पैसे इकट्ठा करना, भगवान शिव के वेश में एक अभिनेता का डर के मारे भाग जाना, पत्थरों पर सिंदूर लगाकर लोगों को मूर्ख बनाना और हिंदू संतों को धोखेबाज के रूप में चित्रित करना, ये सभी दृश्य हिंदू धर्म को बदनाम करने वाले तरीके से दिखाए गए थे। यह दावा करना कि फिल्म 'पीके', जिसमें हिंदू धर्म की महानता को दर्शाने वाला एक भी दृश्य नहीं है, बल्कि धर्म का उपहास किया गया है, हिंदू विरोधी नहीं है, आमिर खान की बेईमानी और बेशर्मी का स्पष्ट उदाहरण है!</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">टीवी शो में ज्ञान बांटने और बड़ी वैचारिकी व्यक्त करने वाला व्यक्ति निजी जीवन में कितना अलग और स्वार्थी व नारी शोषक हो सकता है इसका अंदाजा लगा पाना कितना कठिन हो सकता है और रील लाइफ व रियल लाइफ का अन्तर इससे समझा जा सकता है। कहा गया है कि "हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी /जिसको भी देखना है कई बार देखिए।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 22:06:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तनाव के बढ़ते कारण और संतुलित जीवन की आवश्यकता</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">आज का युग विज्ञान तकनीक और भौतिक सुविधाओं का युग है। मनुष्य ने विकास के अनेक नए आयाम स्थापित किए हैं। इसके बावजूद उसका जीवन पहले की अपेक्षा अधिक तनावपूर्ण होता जा रहा है। बाहरी सुख सुविधाओं की वृद्धि के साथ मन की शांति घटती जा रही है। चिंता असंतोष प्रतिस्पर्धा महत्त्वाकांक्षा और जीवनशैली में आए असंतुलन ने मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बना दिया है। तनाव अब केवल किसी एक वर्ग की समस्या नहीं रहा बल्कि यह समाज के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बन गया है। यदि समय रहते इसके कारणों को नहीं समझा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182702/reasons-for-increasing-stress-and-need-for-a-balanced-life"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(1).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">आज का युग विज्ञान तकनीक और भौतिक सुविधाओं का युग है। मनुष्य ने विकास के अनेक नए आयाम स्थापित किए हैं। इसके बावजूद उसका जीवन पहले की अपेक्षा अधिक तनावपूर्ण होता जा रहा है। बाहरी सुख सुविधाओं की वृद्धि के साथ मन की शांति घटती जा रही है। चिंता असंतोष प्रतिस्पर्धा महत्त्वाकांक्षा और जीवनशैली में आए असंतुलन ने मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बना दिया है। तनाव अब केवल किसी एक वर्ग की समस्या नहीं रहा बल्कि यह समाज के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बन गया है। यदि समय रहते इसके कारणों को नहीं समझा गया तो यह व्यक्ति परिवार और समाज तीनों के लिए गंभीर संकट का रूप ले सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तनाव का सबसे बड़ा कारण दूषित वातावरण और प्रदूषण है। बढ़ता शोर वायु प्रदूषण और अव्यवस्थित जीवन मनुष्य के साथ साथ पशुओं को भी प्रभावित कर रहा है। लगातार शोर और प्रदूषण से शरीर और मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। शांत और स्वच्छ वातावरण मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसलिए पर्यावरण की रक्षा केवल प्रकृति की सुरक्षा नहीं बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा भी है। महत्त्वाकांक्षा जीवन में प्रगति का आधार है लेकिन जब यह असीमित हो जाती है तब यही तनाव का सबसे बड़ा कारण बनती है। प्रत्येक व्यक्ति सम्मान सफलता और प्रतिष्ठा चाहता है। जब उसकी इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं तब वह निराशा और तनाव से घिर जाता है। दूसरों से आगे निकलने की अंधी दौड़ मनुष्य को संतोष से दूर ले जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वह वर्तमान की उपलब्धियों का आनंद लेने के बजाय भविष्य की कल्पनाओं में उलझा रहता है। यही असंतोष धीरे धीरे उसके जीवन की शांति समाप्त कर देता है। एक किसान की कथा इस सत्य को स्पष्ट करती है। किसान को जितनी भूमि मिलती गई उसकी इच्छा उतनी ही बढ़ती गई। अंत में अधिक भूमि पाने की लालसा में वह लगातार दौड़ता रहा और थककर उसकी मृत्यु हो गई। यह कहानी बताती है कि अनियंत्रित महत्त्वाकांक्षा अंततः जीवन का सुख और शांति दोनों छीन लेती है। आज का मनुष्य भी बिना लक्ष्य और संतोष के इसी प्रकार भाग रहा है। उसे यह सोचने का समय नहीं है कि उसकी दौड़ का उद्देश्य क्या है।</div>
<div style="text-align:justify;">अत्यधिक चिंता और निरर्थक चिंतन भी तनाव का बड़ा कारण है। जो व्यक्ति हर समय भविष्य की आशंकाओं और कल्पनाओं में डूबा रहता है उसका मन कभी शांत नहीं रह सकता। लगातार सोचते रहने से मानसिक ऊर्जा नष्ट होती है और व्यक्ति अवसाद तथा अनेक मानसिक रोगों का शिकार हो जाता है। इसलिए आवश्यक है कि मनुष्य केवल उतना ही चिंतन करे जितना आवश्यक हो और शेष समय सकारात्मक कार्यों में लगाए।क्रोध ईर्ष्या प्रतिशोध और नकारात्मक भावनाएँ भी तनाव को बढ़ाती हैं। जब मनुष्य दूसरों के प्रति द्वेष रखता है तब उसका मन निरंतर अशांत रहता है। प्रतिशोध की भावना वर्षों तक मनुष्य की ऊर्जा को नष्ट करती रहती है। इसके विपरीत क्षमा सहनशीलता और सद्भाव मन को हल्का बनाते हैं तथा तनाव को दूर करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज समाज में नैतिक मूल्यों का भी तेजी से पतन हो रहा है। लोग अपने अधिकारों की बात तो करते हैं लेकिन अपने कर्तव्यों को भूलते जा रहे हैं। दूसरों की आलोचना करना और स्वयं को श्रेष्ठ मानना सामान्य प्रवृत्ति बन गई है। जब व्यक्ति स्वयं को सुधारने के बजाय दूसरों को बदलने का प्रयास करता है तब उसके भीतर असंतोष और तनाव जन्म लेता है। वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से होती है। आत्मानुशासन ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मन का अनुशासन तनाव से मुक्ति का सबसे प्रभावी उपाय है। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं विचारों और व्यवहार पर नियंत्रण रखता है वह कठिन परिस्थितियों में भी शांत रहता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति दूसरों पर शासन करना चाहता है वह स्वयं चिंता और असुरक्षा से घिरा रहता है। इसलिए आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण जीवन को संतुलित और सुखी बनाते हैं। भोजन का मन और शरीर दोनों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। असंतुलित अशुद्ध और तामसिक भोजन शरीर में अनेक विकार उत्पन्न करता है जिससे मानसिक तनाव भी बढ़ता है। भोजन हमेशा शांत मन से संयमपूर्वक और उचित मात्रा में करना चाहिए। ग्रामीण जीवन का उदाहरण बताता है कि सरल सात्त्विक भोजन और नियमित दिनचर्या व्यक्ति को अधिक स्वस्थ और तनावमुक्त बनाए रखती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शारीरिक स्थिति और जीवनशैली भी तनाव को प्रभावित करती है। गलत ढंग से बैठना लगातार काम करते रहना या अत्यधिक विश्राम करना दोनों ही शरीर के लिए हानिकारक हैं। शरीर में ऊर्जा और रक्त का संतुलित प्रवाह तभी संभव है जब व्यक्ति सही मुद्रा में बैठे नियमित व्यायाम करे और पर्याप्त विश्राम भी ले। इसी प्रकार पर्याप्त और नियमित नींद मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। नींद की कमी से चिड़चिड़ापन थकान और तनाव बढ़ता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आर्थिक असुरक्षा भी तनाव का एक बड़ा कारण बन गई है। बढ़ती महँगाई बेरोजगारी और अधिक धन कमाने की होड़ ने मनुष्य के जीवन को बेचैन बना दिया है। धन आवश्यक है लेकिन जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं। यदि मनुष्य संतोष ईमानदारी और सादगी को अपनाए तो आर्थिक चुनौतियों का सामना भी अधिक धैर्य और आत्मविश्वास के साथ कर सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;">तनाव से मुक्त जीवन का आधार संतुलन है। इच्छाओं में संतुलन विचारों में संतुलन भोजन में संतुलन कार्य और विश्राम में संतुलन तथा जीवन मूल्यों में संतुलन ही स्वस्थ और सुखी जीवन का मार्ग है। मनुष्य यदि वर्तमान में जीना सीखे सकारात्मक सोच अपनाए प्रकृति के निकट रहे और आत्मानुशासन का पालन करे तो वह तनाव पर काफी हद तक विजय प्राप्त कर सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः कहा जा सकता है कि तनाव किसी एक कारण से उत्पन्न नहीं होता बल्कि अनेक छोटी छोटी असंतुलित आदतों और विचारों का परिणाम होता है। इसलिए केवल बाहरी परिस्थितियों को बदलने से समाधान संभव नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य अपने भीतर संतोष संयम सद्भाव और सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास करे। जब मन संतुलित होगा तब जीवन भी संतुलित होगा और तभी वास्तविक सुख शांति तथा सफलता प्राप्त की जा सकेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 19:32:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>वसुधैव कुटुम्बकम भारत की वैश्विक धारणा और भावना</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति का मूल दर्शन केवल अपने परिवार या राष्ट्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने संपूर्ण मानवता को एक परिवार मानने की उदात्त दृष्टि प्रदान की है। उपनिषदों का प्रसिद्ध वाक्य "वसुधैव कुटुम्बकम्" केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन जीने की ऐसी शैली है जिसमें समस्त सृष्टि के प्रति आत्मीयता, करुणा, सह-अस्तित्व और समरसता का भाव निहित है। आज जब दुनिया स्वार्थ, हिंसा, युद्ध, आर्थिक असमानता और सामाजिक विघटन जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब यह भारतीय जीवन-दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य की महानता उसके धन के परिमाण से नहीं,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182700/global-perception-and-sentiment-of-vasudhaiva-kutumbakam-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति का मूल दर्शन केवल अपने परिवार या राष्ट्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने संपूर्ण मानवता को एक परिवार मानने की उदात्त दृष्टि प्रदान की है। उपनिषदों का प्रसिद्ध वाक्य "वसुधैव कुटुम्बकम्" केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन जीने की ऐसी शैली है जिसमें समस्त सृष्टि के प्रति आत्मीयता, करुणा, सह-अस्तित्व और समरसता का भाव निहित है। आज जब दुनिया स्वार्थ, हिंसा, युद्ध, आर्थिक असमानता और सामाजिक विघटन जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब यह भारतीय जीवन-दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य की महानता उसके धन के परिमाण से नहीं, बल्कि उसके हृदय की विशालता से आँकी जाती है। किसी धनी व्यक्ति द्वारा अपनी विपुल संपत्ति का थोड़ा-सा भाग दान करना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है, किंतु उससे कहीं अधिक महान वह व्यक्ति है, जिसके पास सीमित संसाधन होने के बावजूद वह अपनी आवश्यकताओं में कटौती कर किसी जरूरतमंद की सहायता करता है। यही वास्तविक परोपकार है। संत कबीर ने कहा है वृक्ष कबहुँ नहीं फल भखै, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर, अर्थात प्रकृति का प्रत्येक तत्व दूसरों के लिए जीना सिखाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जियो और जीने दो का सिद्धांत तथा वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना जिस समाज में सशक्त होती है, उस समाज की प्रगति को कोई रोक नहीं सकता। ऐसे समाज में विश्वास, सहयोग, नैतिकता और संवेदनशीलता का वातावरण निर्मित होता है। महात्मा गांधी का कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि स्वयं को पाने का सर्वोत्तम तरीका है कि स्वयं को दूसरों की सेवा में खो दिया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य का जीवन उत्साह, संघर्ष और निरंतर विकास की यात्रा है। जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक है और विकास की संभावनाएँ भी परिवर्तन के साथ ही जन्म लेती हैं। जो व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ समाज और मानवता के कल्याण के लिए जीता है, वही जीवन की वास्तविक सार्थकता को प्राप्त करता है। स्वामी विवेकानंद का यह प्रेरक संदेश प्रत्येक व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक है— उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">शास्त्रों में पुनर्जन्म की अवधारणा का विस्तार से वर्णन मिलता है। अनेक लोग यह मानते हैं कि इस जन्म के शुभ कर्म अगले जन्म को श्रेष्ठ बनाते हैं। यह आस्था भारतीय अध्यात्म का महत्वपूर्ण पक्ष है। किंतु यदि दार्शनिक दृष्टि से विचार करें तो वर्तमान जीवन ही हमारे हाथ में उपलब्ध सबसे बड़ा सत्य है। भविष्य या अगले जन्म की कल्पनाओं में वर्तमान के कर्तव्यों की उपेक्षा करना उचित नहीं कहा जा सकता। इसलिए आवश्यक है कि हम इसी जीवन को उत्कृष्ट बनाएं, इसी जीवन में मानवता के लिए उपयोगी कार्य करें और समाज के लिए ऐसी विरासत छोड़ जाएँ, जो आने वाली पीढ़ियों का मार्ग आलोकित करे।</p>
<p style="text-align:justify;">जीवन के उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकते हैं। कोई आर्थिक समृद्धि चाहता है, कोई राजनीति में प्रतिष्ठा, कोई विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धि, कोई साहित्य, कला, संस्कृति, शिक्षा या व्यवसाय में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहता है। लक्ष्य चाहे जो भी हो, उसकी प्राप्ति के लिए अपनाए गए साधनों की शुद्धता ही व्यक्ति के चरित्र का वास्तविक परिचय देती है। महात्मा गांधी का यह विचार सदैव स्मरणीय है साध्य जितना पवित्र हो, साधन भी उतने ही पवित्र होने चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य को अपने जीवन में साहस, संयम, आत्मविश्वास, अनुशासन और तपस्या के साथ आगे बढ़ना चाहिए। असफलता से घबराने के स्थान पर उसे सीख के रूप में स्वीकार करना चाहिए। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम कहा करते थे कि सपने वे नहीं होते जो सोते समय आते हैं, सपने वे होते हैं जो आपको सोने नहीं देते। यही स्वप्न जब कठोर परिश्रम और सकारात्मक चिंतन से जुड़ते हैं, तब वे समाज के लिए प्रेरणा बन जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मानवीय संवेदनाएँ ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ बनाती हैं। यदि जीवन केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं तक सीमित रह जाए तो उसकी सार्थकता अधूरी रह जाती है। सच्चा जीवन वही है जो अपने तन, मन और धन का कुछ अंश समाज के वंचित, पीड़ित और असहाय वर्ग के उत्थान के लिए समर्पित कर सके। गौतम बुद्ध ने कहा था— हजारों दीपक एक दीपक से जल सकते हैं, फिर भी उस दीपक का प्रकाश कम नहीं होता। ठीक उसी प्रकार दूसरों के जीवन में आशा का प्रकाश फैलाने से हमारा जीवन और अधिक प्रकाशित होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अनेक चिंतकों ने जीवन को रंगमंच की संज्ञा दी है। हम सभी विभिन्न भूमिकाएँ निभाते हुए अपने जीवन का अभिनय करते हैं। किंतु इन भूमिकाओं की सफलता हमारे पद, प्रतिष्ठा या वैभव से नहीं, बल्कि हमारी सच्चाई, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और मानवीय व्यवहार से निर्धारित होती है। यही गुण व्यक्ति को समाज में स्थायी सम्मान दिलाते हैं। सफलता और असफलता जीवन के दो अविभाज्य पक्ष हैं। जो व्यक्ति सफलता में विनम्र और असफलता में धैर्यवान रहता है, वही वास्तव में परिपक्व व्यक्तित्व का स्वामी होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लोभ, लालच, अहंकार और असीमित इच्छाएँ मनुष्य को भीतर से खोखला बना देती हैं, जबकि संतोष, संयम और नैतिकता उसे आत्मिक समृद्धि प्रदान करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि आर्थिक उन्नति का प्रयास छोड़ दिया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि आध्यात्मिक मूल्यों, सांस्कृतिक चेतना और आर्थिक प्रगति के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। यही संतुलित दृष्टिकोण एक स्वस्थ समाज का निर्माण करता है। जीवन का प्रत्येक क्षण परिवर्तनशील है। परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। किंतु परिवर्तन का अर्थ भाग्यवाद नहीं है। भाग्य और कर्म दोनों समानांतर चलने वाली प्रक्रियाएँ हैं। भाग्य परिस्थितियाँ दे सकता है, परंतु कर्म उन परिस्थितियों का परिणाम बदलने की क्षमता रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भगवद्गीता का प्रसिद्ध संदेश है कि कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन,आज भी मनुष्य को निष्काम कर्म की प्रेरणा देता है। जब व्यक्ति कर्म को अपना धर्म मान लेता है और परिणामों की अत्यधिक चिंता से मुक्त होकर कार्य करता है, तब उसके भीतर निराशा की संभावनाएँ स्वतः कम होने लगती हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों से आगे बढ़कर वैश्विक मानवता के हित में सोचने की आदत विकसित करे। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का कुछ अंश समाज के लिए समर्पित कर दे, तो गरीबी, भेदभाव, हिंसा और असमानता जैसी अनेक समस्याओं का समाधान स्वतः संभव हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यही "वसुधैव कुटुम्बकम्" का वास्तविक स्वरूप है— जहाँ समस्त मानवता एक परिवार है और प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी है। जीवन की सफलता केवल लंबा जीवन जीने में नहीं, बल्कि उपयोगी जीवन जीने में है। यदि हमारा जीवन किसी एक व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान ला सके, किसी निराश मन में आशा जगा सके और समाज में सद्भाव, करुणा तथा मानवता के बीज बो सके, तभी हमारा जन्म सार्थक कहलाएगा। यही भारतीय संस्कृति का संदेश है, यही मानव जीवन का परम उद्देश्य है और यही "वसुधैव कुटुम्बकम्" की सच्ची साधना है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/182700/global-perception-and-sentiment-of-vasudhaiva-kutumbakam-india</link>
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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 19:28:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राम के नाम पर सत्ता पाए अब उन्हीं के घर में चढ़ावे की भारी चोरी क्या बीजेपी कोले डूबेगी। अशोक कुमार चौबे।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारत ही दुनि या मेंएक ऐसा देश हैजहां हम पत्थर की मूर्ति मेंप्राण डाल कर भगवान केरूप मानते  रहे है गली मोहल्ले मेंमन्दि र है तो कई मन्दि रों का शहर भी मिलता हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारत केमन्दिरों मेंइतना धन हैजो भारत</div>
<div style="text-align:justify;">की जीडीपी सेबहुत ज़्यादा हैं।ै फिर भी देश गरीब ही है।१९०केदशक सेभाजपा और वि श्व हिन्दूपरिषद</div>
<div style="text-align:justify;">बजरंगदल और सं घ भागवान राम केलि ए संघर्ष करता था वह राम केलि ए वास्तव में क्तिुक्ति का सघर्ष</div>
<div style="text-align:justify;">नहीं था वह भाजपा को सत्ता केलि ए नकली हि न्दूवाद और राम केनाम का एक चहेरा था चहेरेके पीछे</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181997/if-they-come-to-power-in-the-name-of-ram"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/1001841289.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत ही दुनि या मेंएक ऐसा देश हैजहां हम पत्थर की मूर्ति मेंप्राण डाल कर भगवान केरूप मानते  रहे है गली मोहल्ले मेंमन्दि र है तो कई मन्दि रों का शहर भी मिलता हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत केमन्दिरों मेंइतना धन हैजो भारत</div>
<div style="text-align:justify;">की जीडीपी सेबहुत ज़्यादा हैं।ै फिर भी देश गरीब ही है।१९०केदशक सेभाजपा और वि श्व हिन्दूपरिषद</div>
<div style="text-align:justify;">बजरंगदल और सं घ भागवान राम केलि ए संघर्ष करता था वह राम केलि ए वास्तव में क्तिुक्ति का सघर्ष</div>
<div style="text-align:justify;">नहीं था वह भाजपा को सत्ता केलि ए नकली हि न्दूवाद और राम केनाम का एक चहेरा था चहेरेके पीछे सत्ता और सत्ता सेधन तक पहुं चने मेंमदद कोई देसकता था तो वह श्रीराम ही थेवह बाबरी मस्ज़िद थी</div>
<div style="text-align:justify;">जिसकेसहारेसत्ता का रास्ता दि खा रहा था।</div>
<div style="text-align:justify;">राम केनाम की लू ट तो राम जन्म भूमि मक्तिुक्ति आन्दोलन केसाथ शरूु होगया था राम केनाम सेदेश विदेश तक गए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अशोक सिंघल प्रवीण तोगड़िया और न जाने कितनों नेचन्दा लि या उस चन्देसेअपनेलि ए सुख लिया ऐसा</div>
<div style="text-align:justify;">मैनहीं कह रहा हूं ।यह देश का नागरि क कह रहा। गली चौराहों पर बात कर रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">राम मन्दि र सेसत्ता तक का सफर बहुत आसान नहीं था। परन्तुसत्ता भाजपा को राम केनाम पर ही मि ला</div>
<div style="text-align:justify;">ह।ै</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परन्तुजो शरूु सेसं घर्ष कि या राजनीति मेंथा आज वह भाजपा</div>
<div style="text-align:justify;">में हाशिये पर ह।ैआडवानी मुरली मनोहर जोशी उमाभारती विनय कटियार नेपथ्य मेंचलेगये।सामनेतो बस वह रंजन गोगोई जो फैसला दिया कि मन्दि र का कहीं कोई चि न्ह नहीं हैनहीं यह साबि त हुआ कि मन्दि र</div>
<div style="text-align:justify;">तोड़कर मस्जि द बनी परन्तुकरोड़ों हि न्दूसमाज की आस्था को ध्यान मेंरखकर मन्दि र बनानेका निर्माण का</div>
<div style="text-align:justify;">फैसला दि या।।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> मन्दि र बन गया।परन्तुमन्दि र की भूमि पूजन मेंउन लोगो को दूर रखा गया। वह</div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा केथे सं घ और बजरंगदल तथा वि श्वहिंदू परि षद भी बाहर कर दि या गया । अब तो बस एक ऐसे</div>
<div style="text-align:justify;">विचार केलोग ट्रस्टी बन गये जि नका आन्दोलन मेंकहीं किसी तरह का योगदान नहीं था।।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब अयोध्या मन्दि र मेंचोरी का आरोप टी वी पर लगा रहेहैं। वह कह रहेसोन-ेचांदी</div>
<div style="text-align:justify;">हीरेजवाहरात केईंट की चोरी हो गई वि श्व हि न्दूपरिषद केअशोक सिंघल नेजो लगभग बारहह सौ करोड़</div>
<div style="text-align:justify;">चन्दा एकत्र कि या वह कहां गया यह सवाल राम मन्दि र नि र्मा ण केसमय प्रवीण तोगड़ि या नेभी उठाया।था।परन्तुसब आवाज दब गई । उन आवाजो की जगह एक नई आवाज जो राम को लायेहैहम उनको यह मन्दि े तना और सअयोध्या हि न्दूसमाज सनातन का एक पवि ं घर्ष का प्रतीकत्र स्थान हर सनातन चै।ऐसै।श्रीराम मन्दि ेस्थल पर श्रद्धालु ओं केचढ़ावेकी लू ट चोरी हेराफेरी की खबर बहुत दुखद है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> जहां स्वतं त्र जांच न्यायि का मामला सु प्रीमकोर्ट मेंभी गया हक नि गरानी मेंकरनेकी मांग की गई । परन्तुै।सु प्रीम कोर्ट केहाल केक ई नि र्णयो सेदेश की जनता मेंनि राशा हैसिसियत और राम पर वि ैं।उनकाेश वि ेश सेबहुत सेश्रद्धालुअपनी श्रद्धा हेसाथ दान देतेहददश्वास कैवह सही जगह जन हि वि श्वास होता जो धन हमनेदान मेंदि ेंखर्च होगा।यदि मन्दि रों मेंचढ़ावेकेधनया हत मैयह आर्थि ैऔर हि ी चोरी हेरा फेरी होती हक नहीं धार्मि न्दूसनातन धर्म की आस्था की चोरीकक अपराध हैश्रद्धालुकै।।सबसेराफेरी सेधर्म पर आघात ही आत्मा पर चोट वि श्वास को लू टा गया हेअजीब बातहमन्दि ेट्रस्ट से जुडेलोग पहलेचोरी सेइन्कार कि ेंमन्दि ेंकाम करनेवालों केपास करोड़ों कीया।बाद मर कर मैकि नकदी महं गी गाड़ी सम्पति यां मि ेलगी </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तब जांच की बात हुई ।गजब तो यह हआज तक पुलिेंलनलिस मैजांच शु रूहो गई हैयह समाचार भारत कएफ आई आर नही हुआ हां एस आई टी का गणन हो गया हेगांवैलनेंपहुं च गया और श्रीराम मन्दि ैक्यागांव तक फेकेसाथ वि ेशों मेंआस्था रखनेवालेआज दुःखी हदर मेंसरकारी धन की चोरी वोट चोरी पे पर की चोरी सांसद की सीट की चोरी सेलोग अब आगेनि भारत मकलकर मन्दि रों केदान की चोरी भी कर लि या। क्या भारत का हि न्दूधर्म इतना नीचेस्तर पर गि र गया कि मन्दि रभी नहीं बचा चोरी से।ैवहां केश मेंअन्य धार्मि क मन्दि ी व्यवस्था सेक्या श्रीराम मन्दि र अयोध्या नेकुछ सीख नहीं लि या था किदर हैसैजहां हेरी और चोरीउन मन्दि रों की सुरक्षा नि गरानी ले खांकन नि यमि त आडि ेसु दृढ़ बनाया गया हेराफट कै।नहीं हो सकती है ष्णव दी तरह चाक चौबन्द पारदर्शी व्यवस्था क्योंश्रीराम मन्दि ेंभी मां वेवी तथा ति रुपति बालाजी मं दि र मर केंहुआ औरनहीं बनाया गया। हर साल राम मन्दि ेंचढ़ावा का धन कि तना आया कि तना खर्च कि र मस मद मैंक मैआडि ी धन कि ेंहेजनता केसामनेक्यों नहीं रखा गया । यानि यहां भी के लसत्ताबाकस बट करकुछ खैखैफि ेसं रक्षण मेंकि े लतो सभी जानतेकी दो करोड की जमीन कि ेकोई खरीदता हर उसीकयागया हसान सजमीन को चौबीस करोड मैयह लु टहुआ परन्तुआज तकेंश्रीराम मन्दि र अयोध्या मेंकेनाम खरीदा जाता है।सवाल का जबाब नहीं मि ै।जांच नहीं हुआ क्यों यह सवाल जनता मेआज भी हला परन्तुसवालल जि न्दा हैकि दो सौ करोड़ कैउसमेंकौन कौन शामि ैं।पता चलेखना ही जो चोरी हुई हे गा या सब दबअब यह दल हे गा।एस आई टी तो यू पी मेंइन आठ सालों मेंकई बनी कि सी की जांच रि पोर्ट आज तक बाहर नहीं आईजायै ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लकिेकिन जनता की आवाज आन्दोलन नहीं बनगे ा यह एक कटूसच हैसत्तर केदशक मेंकाशी वि श्वनाथ</div>
<div style="text-align:justify;">मं दि र केगर्भगहृ सेसोना चोरी हुआ था एक सप्ताह तक बनारस उबाल पर था जनता सड़क पर थी ।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 19:25:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>करोड़ों की ठगी, करोड़ों का खर्च और फिर भी नाकाफी रिकवरी; डिजिटल युग की सबसे बड़ी चुनौती बनता साइबर अपराध*</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
<div>
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<div>डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहां तकनीक ने लोगों का जीवन आसान बनाया है, वहीं साइबर अपराधियों ने भी इसी तकनीक को अपने अवैध कारोबार का सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, यूपीआई, सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग ने आम नागरिकों की सुविधाएं तो बढ़ाई हैं, लेकिन इसके साथ ही साइबर ठगी के मामलों में भी विस्फोटक वृद्धि देखने को मिल रही है। राजस्थान से सामने आए हालिया आंकड़े इस खतरे की गंभीरता को उजागर करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट और नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181068/fraud-worth-crores-expenditure-of-crores-and-still-inadequate-recovery"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/41.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
<div>
<div class="ii gt">
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<div>डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहां तकनीक ने लोगों का जीवन आसान बनाया है, वहीं साइबर अपराधियों ने भी इसी तकनीक को अपने अवैध कारोबार का सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, यूपीआई, सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग ने आम नागरिकों की सुविधाएं तो बढ़ाई हैं, लेकिन इसके साथ ही साइबर ठगी के मामलों में भी विस्फोटक वृद्धि देखने को मिल रही है। राजस्थान से सामने आए हालिया आंकड़े इस खतरे की गंभीरता को उजागर करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट और नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार पिछले एक वर्ष में राजस्थान में 77 हजार से अधिक लोग साइबर ठगी का शिकार हुए और ठगों ने लगभग 354 करोड़ रुपए की रकम हड़प ली। चिंताजनक बात यह है कि इस भारी-भरकम ठगी में से केवल 39 करोड़ रुपए ही रिकवर किए जा सके हैं, जबकि साइबर सुरक्षा और साइबर थानों के संचालन पर राज्य सरकार का सालाना खर्च 102 करोड़ रुपए से अधिक है।</div>
<div>यह स्थिति केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है। देश के लगभग सभी राज्यों में साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच जितनी तेजी से बढ़ी है, उससे कहीं अधिक तेजी से साइबर अपराधियों के तौर-तरीके विकसित हुए हैं। आज अपराधी किसी बैंक डकैती या चोरी के बजाय मोबाइल फोन और लैपटॉप के जरिए हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों को निशाना बना रहे हैं। वे नकली निवेश योजनाओं, फर्जी कस्टमर केयर, ऑनलाइन शॉपिंग, डिजिटल अरेस्ट, लॉटरी, नौकरी, टास्क फ्रॉड और क्यूआर कोड स्कैनिंग जैसे अनेक तरीकों से लोगों को जाल में फंसा रहे हैं।</div>
<div>राजस्थान के आंकड़े बताते हैं कि हर घंटे लगभग दस लोग साइबर ठगी का शिकार हो रहे हैं। यह केवल आंकड़ा नहीं बल्कि समाज के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती है। इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है जिन्होंने वर्षों की मेहनत से अपनी बचत जमा की थी। कई मामलों में लोगों की जीवनभर की कमाई कुछ ही मिनटों में उनके खातों से गायब हो गई। पीड़ितों में युवा, व्यापारी, नौकरीपेशा वर्ग, महिलाएं और बुजुर्ग सभी शामिल हैं। विशेष रूप से 25 से 40 वर्ष आयु वर्ग के लोग सबसे अधिक निशाना बन रहे हैं, क्योंकि यही वर्ग डिजिटल सेवाओं का सबसे ज्यादा उपयोग करता है।</div>
<div>साइबर अपराध का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अपराधी लगातार नए-नए तरीके अपनाते रहते हैं। जैसे ही पुलिस और बैंकिंग संस्थाएं किसी एक तरीके पर नियंत्रण करने का प्रयास करती हैं, ठग कोई नया तरीका खोज लेते हैं। हाल के वर्षों में डिजिटल अरेस्ट, इन्वेस्टमेंट फ्रॉड और फर्जी शेयर मार्केट निवेश योजनाओं के जरिए करोड़ों रुपए की ठगी सामने आई है। अपराधी स्वयं को पुलिस अधिकारी, सीबीआई अधिकारी, बैंक कर्मचारी या सरकारी एजेंसी का प्रतिनिधि बताकर लोगों को डराते हैं और फिर उनसे रकम ट्रांसफर करा लेते हैं।</div>
<div>सवाल यह भी उठता है कि जब साइबर थानों और साइबर सुरक्षा तंत्र पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, तब रिकवरी की दर इतनी कम क्यों है। राजस्थान में 354 करोड़ रुपए की ठगी के मुकाबले केवल 39 करोड़ रुपए की रिकवरी होना व्यवस्था की सीमाओं को दर्शाता है। इसका एक कारण यह है कि ठग रकम को तुरंत कई फर्जी खातों में ट्रांसफर कर देते हैं। इन खातों को म्यूल अकाउंट कहा जाता है। रकम कई राज्यों और कई बार विदेशों तक पहुंच जाती है, जिससे उसे ट्रेस करना और वापस लाना बेहद कठिन हो जाता है। इसके अलावा साइबर अपराधों की जांच में तकनीकी विशेषज्ञता, आधुनिक उपकरण और अंतरराज्यीय समन्वय की आवश्यकता होती है, जिसकी कमी कई बार जांच को प्रभावित करती है।</div>
<div>बैंकों की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक प्रभावित ग्राहकों में सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े बैंक शामिल हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि बैंक सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, लेकिन यह जरूर दर्शाता है कि ग्राहकों को जागरूक बनाने और संदिग्ध लेनदेन पर त्वरित कार्रवाई की दिशा में अभी और प्रयासों की आवश्यकता है। बैंकिंग प्रणाली में सुरक्षा के अनेक स्तर मौजूद हैं, फिर भी यदि ग्राहक स्वयं सतर्क नहीं रहेगा तो अपराधी किसी न किसी तरीके से उसे भ्रमित कर सकते हैं।</div>
<div>आज साइबर सुरक्षा केवल पुलिस या बैंक की जिम्मेदारी नहीं रह गई है। यह प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी बन चुकी है। अधिकांश मामलों में ठग लोगों की तकनीकी कमजोरी का नहीं बल्कि उनकी भावनाओं, लालच, डर या जल्दबाजी का फायदा उठाते हैं। कोई व्यक्ति यदि अनजान लिंक पर क्लिक करता है, ओटीपी साझा करता है, स्क्रीन शेयरिंग एप डाउनलोड करता है या फर्जी निवेश योजना में अधिक मुनाफे के लालच में पैसा लगाता है, तो वह स्वयं जोखिम बढ़ा देता है। इसलिए जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है।</div>
<div>सरकार और पुलिस प्रशासन भी लगातार लोगों को जागरूक करने के प्रयास कर रहे हैं। साइबर हेल्पलाइन 1930 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर ठगी होने के बाद पहला एक घंटा सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि पीड़ित तुरंत हेल्पलाइन या साइबर पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराए तो रकम को फ्रीज कराने और रिकवरी की संभावना काफी बढ़ जाती है। दुर्भाग्यवश कई लोग शर्म, घबराहट या जानकारी के अभाव में शिकायत करने में देर कर देते हैं, जिससे अपराधियों को रकम निकालने का पर्याप्त समय मिल जाता है।</div>
<div>देश में डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से विस्तार कर रही है। सरकार कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा दे रही है और करोड़ों लोग रोजाना ऑनलाइन भुगतान कर रहे हैं। ऐसे में साइबर सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता का विषय बनाना होगा। केवल नए साइबर थाने खोलना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित मानव संसाधन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणाली और बैंकिंग संस्थाओं के साथ बेहतर समन्वय भी जरूरी होगा। साथ ही स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने होंगे ताकि लोग साइबर अपराधियों के जाल में फंसने से बच सकें।</div>
<div>वर्तमान समय में साइबर अपराध किसी महामारी से कम नहीं है। यह अपराध बिना हथियार, बिना हिंसा और बिना किसी भौतिक उपस्थिति के लोगों को आर्थिक रूप से तबाह कर रहा है। राजस्थान के आंकड़े इस बात की चेतावनी हैं कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, पुलिस, बैंक, तकनीकी संस्थाएं और आम नागरिक मिलकर इस चुनौती का सामना करें। डिजिटल क्रांति तभी सफल मानी जाएगी जब लोगों का धन और उनका विश्वास दोनों सुरक्षित रहेंगे। अन्यथा साइबर ठगों का यह बढ़ता साम्राज्य आम जनता की मेहनत की कमाई को इसी तरह निगलता रहेगा और सुरक्षा तंत्र पर सवाल लगातार खड़े होते रहेंगे।</div>
<div>          *कांतिलाल मांडोत*</div>
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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:31:08 +0530</pubDate>
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