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                <title>Nand Kishore Potter - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Nand Kishore Potter RSS Feed</description>
                
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                <title>दम तोड़ती कुम्हारों की परंपरा: मिट्टी से जुड़ी संस्कृति और आजीविका पर गहराता संकट डॉ. मणि शंकर द्विवेदी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ।</strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>नैनी, प्रयागराज।</strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">  भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और पारंपरिक व्यवसायों के लिए विश्वभर में जाना जाता है। इन्हीं परंपराओं में कुम्हारों द्वारा मिट्टी के बर्तन बनाने की कला एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सदियों से यह कला भारतीय जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रही है। कभी गांवों की सुबह मिट्टी के घड़ों के शीतल जल से और शाम दीयों की मधुर रोशनी से आबाद होती थी। मटके, सुराही, कुल्हड़, दीये तथा अन्य मिट्टी के बर्तन प्रत्येक घर की आवश्यकता हुआ करते थे। लेकिन बदलते समय और आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव के कारण यह परंपरा आज अस्तित्व</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181019/the-potters-tradition-is-dying-the-clay-related-culture-and-livelihood"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260611-wa0139.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>स्वतंत्र प्रभात ।</strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>नैनी, प्रयागराज।</strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और पारंपरिक व्यवसायों के लिए विश्वभर में जाना जाता है। इन्हीं परंपराओं में कुम्हारों द्वारा मिट्टी के बर्तन बनाने की कला एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सदियों से यह कला भारतीय जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रही है। कभी गांवों की सुबह मिट्टी के घड़ों के शीतल जल से और शाम दीयों की मधुर रोशनी से आबाद होती थी। मटके, सुराही, कुल्हड़, दीये तथा अन्य मिट्टी के बर्तन प्रत्येक घर की आवश्यकता हुआ करते थे। लेकिन बदलते समय और आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव के कारण यह परंपरा आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही है।</div><div style="text-align:justify;">कुम्हार समुदाय की पीढ़ियों से चली आ रही आजीविका अब गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। आर्थिक दृष्टि से यह व्यवसाय पहले की अपेक्षा कम लाभकारी रह गया है। मिट्टी के बर्तन तैयार करने में अत्यधिक श्रम, समय और कौशल की आवश्यकता होती है, लेकिन उसके अनुरूप आय नहीं मिल पाती। अच्छी गुणवत्ता की मिट्टी जुटाने, उसे तैयार करने, बर्तन बनाने, सुखाने और भट्ठी में पकाने की पूरी प्रक्रिया कठिन और खर्चीली है।</div><div style="text-align:justify;">करछना क्षेत्र के चाका गांव निवासी 76 वर्षीय रामलाल प्रजापति, जो 1970 के दशक से इस व्यवसाय से जुड़े हैं, बताते हैं कि मिट्टी के बर्तनों का बाजार में उचित मूल्य नहीं मिल पाता। इसके कारण कुम्हार परिवार आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस स्थिति का सबसे अधिक प्रभाव नई पीढ़ी पर पड़ा है, जो अब इस पारंपरिक कला में कोई विशेष रुचि नहीं दिखा रही है।</div><div style="text-align:justify;">वहीं डांडी गांव के नंद किशोर के अनुसार मिट्टी की उपलब्धता और उसका प्रबंधन आज कुम्हारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। उनका कहना है कि उपयुक्त मिट्टी की व्यवस्था करने में काफी समय और पूंजी खर्च होती है, जबकि सरकार और समाज दोनों इस समस्या के प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखा रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कुम्हार समुदाय से जुड़े गेमराज का कहना है कि आज भी अधिकांश कुम्हार स्थानीय हाट-बाजारों तक ही सीमित हैं, जबकि देश में आधुनिक व्यापारिक नेटवर्क और बड़े बाजार विकसित हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि प्लास्टिक और अन्य कृत्रिम सामग्रियों से बने सस्ते उत्पादों के बढ़ते प्रचलन ने मिट्टी के बर्तनों की मांग को काफी हद तक प्रभावित किया है।</div><div style="text-align:justify;">कौंधियारा के राम भरोसे का मानना है कि यदि कुम्हारों को विद्युत चालित चाक, गुणवत्तापूर्ण मिट्टी, आधुनिक भट्ठियां और संगठित बाजार व्यवस्था में भागीदारी का अवसर मिले, तो उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता है। साथ ही वे पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।</div><div style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से मिट्टी के उत्पाद पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। जब पूरी दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है, तब मिट्टी के बर्तन प्राकृतिक, जैविक और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में उभरते हैं। इसलिए कुम्हारों की समस्या केवल एक समुदाय की आजीविका का प्रश्न नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण का भी विषय है।</div><div style="text-align:justify;">समय की मांग है कि सरकार, कॉर्पोरेट क्षेत्र, स्वयंसेवी संस्थाएं और समाज मिलकर इस दिशा में ठोस प्रयास करें। कुम्हारों को आधुनिक डिजाइन, तकनीकी प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, आसान ऋण, डिजिटल विपणन और स्थायी बाजार उपलब्ध कराए जाएं, ताकि यह परंपरा नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ सके।</div><div style="text-align:justify;">कुम्हारों के चाक की गति केवल मिट्टी को आकार नहीं देती, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और आत्मनिर्भरता को भी आकार देती है। आवश्यकता इस बात की है कि समय रहते इस अमूल्य विरासत को संरक्षित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी मिट्टी की सोंधी खुशबू और उससे जुड़ी भारतीयता को महसूस कर सकें।</div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL"><br /></div><div class="adL"><br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 19:32:33 +0530</pubDate>
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