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                <title>Family Values - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>संजीव-नी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>संजीव-नी।</strong><br /><br />माँ की सीख, पिता का अनुशासन<br /><br />माँ ने ऊँची आवाज़ में<br />बड़े बोल नहीं बोले<br />उन्होंने रोटी पर सीख मिला दी<br />मैं उसके स्वाद के संग<br />बड़ा होता रहा।<br /><br />पिता ने कम शब्द रखे ,<br />उनके मौन का अनुशासन<br />घड़ी की तरह चलता रहा<br />जब भी मैं भटकने लगा,<br />माँ की उँगली ने भीतर से<br />मेरा हाथ पकड़ लिया।<br /><br />जब भी मैं ठिठका<br />ठहरने लगा,<br />पिता की दूर-दृष्टि ने<br />मुझे फिर चलना सिखाया।<br /><br />माँ ने बताया कि मनुष्य होना<br />कोई अग्नि परीक्षा नहीं,<br />हर दिन का अभ्यास है।<br /><br />पिता ने सिखाया<br />ईमानदारी अलंकार नहीं<br />जीवन की आवश्यकता।<br />आज भी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183953/sanjeevani"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>संजीव-नी।</strong><br /><br />माँ की सीख, पिता का अनुशासन<br /><br />माँ ने ऊँची आवाज़ में<br />बड़े बोल नहीं बोले<br />उन्होंने रोटी पर सीख मिला दी<br />मैं उसके स्वाद के संग<br />बड़ा होता रहा।<br /><br />पिता ने कम शब्द रखे ,<br />उनके मौन का अनुशासन<br />घड़ी की तरह चलता रहा<br />जब भी मैं भटकने लगा,<br />माँ की उँगली ने भीतर से<br />मेरा हाथ पकड़ लिया।<br /><br />जब भी मैं ठिठका<br />ठहरने लगा,<br />पिता की दूर-दृष्टि ने<br />मुझे फिर चलना सिखाया।<br /><br />माँ ने बताया कि मनुष्य होना<br />कोई अग्नि परीक्षा नहीं,<br />हर दिन का अभ्यास है।<br /><br />पिता ने सिखाया<br />ईमानदारी अलंकार नहीं<br />जीवन की आवश्यकता।<br />आज भी मेरे भीतर<br />एक रसोई धुआँ नहीं<br />संस्कार पकाती,<br />एक आँगन में<br />अनुशासन की धूप<br />में उजाला फैला ।<br /><br />मैं जहाँ भी पैर रखता ,<br />माँ की सीख<br />मेरे शब्दों को तौलती ,<br />पिता का अनुशासन<br />मेरे कदमों को रास्तों की<br />पहचान से पहले<br />ठोकरों से अवगत करा देता।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य/ज्योतिष</category>
                                            <category>कविता/कहानी</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 22:25:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>सींखचों में सिसक रहीं हैं अपने सुहाग की खूनी विवाहिताएं</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">देश की बहुत सारी जेलों में अंधी वासना अवैध संबंध के चलते अपना सुहाग को उजाड़ने वाली कुलटाएं अपने कृत्यों के लिए दिनरात त्रासदी भुगत रहीं हैं। पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ जिला जेल में ही पिछले कुछ महीनों में सामने आए  अवैध रिश्तों के ताने बाने में फंसकर अपने ही हाथों से अपने सुहाग को कत्ल कर जीवन को नरक में धकेलने की की कहानी दबी पड़ी हैं । हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ चौधरी चरण सिंह जिला कारागार की बैरक नंबर 12ए में छह महिलाएं भी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183904/the-bloody-married-women-of-their-husbands-are-sobbing-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas12.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश की बहुत सारी जेलों में अंधी वासना अवैध संबंध के चलते अपना सुहाग को उजाड़ने वाली कुलटाएं अपने कृत्यों के लिए दिनरात त्रासदी भुगत रहीं हैं। पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ जिला जेल में ही पिछले कुछ महीनों में सामने आए  अवैध रिश्तों के ताने बाने में फंसकर अपने ही हाथों से अपने सुहाग को कत्ल कर जीवन को नरक में धकेलने की की कहानी दबी पड़ी हैं । हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ चौधरी चरण सिंह जिला कारागार की बैरक नंबर 12ए में छह महिलाएं भी बंद हैं, जिन्होंने पराए संबंधों के मोह में अपने ही परिवार के खिलाफ घातक षड्यंत्र रच डाला। पांच जहां पति की हत्या की गुनहगार हैं, छठी ने अपनी कोख से जन्मे बेटे को ही मरवा दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यूपी की सबसे पुरानी जेलों में शुमार मेरठ की जिला जेल में फिलहाल 67 महिला बंदी हैं, जिन्हें बैरक 12ए और 12बी में रखा गया है। पति को सांप से डसवाकर मरवाने वाली दामिनी को भी इसी बैरक में मुस्कान, अंजलि, रविता, कोमल और गुरप्रीत के साथ रखा गया है। जेल प्रशासन के अनुसार दामिनी फिलहाल किसी से बातचीत नहीं कर रही है। उसकी काउंसलिंग की तैयारी है।  जेल अधीक्षक वीरेश राज शर्मा बताते हैं कि इन महिलाओं को एक ही बैरक में रखने का उद्देश्य यह है कि वे एक-दूसरे का सहारा बन सकें। अधिकांश को अपने किए पर पछतावा है।इन सबके भीतर जेल से बाहर आने की छटपटाहट है लेकिन भविष्य खत्म हो जाने का अहसास भी है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन पति हंता महिलाओं से जब परिवार वाले बच्चों के साथ मिलने आते हैं तो उनका भावनात्मक संतुलन टूट जाता है। ऐसे समय में वे एक-दूसरे से कहती भी हैं कि उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी , जो खुद ही अपनी गृहस्थी उजाड़ ली। सुबह सुंदरकांड के पाठ के बाद मुस्कान अपनी बेटी के साथ समय बिताती है, जबकि अंजलि, गुरुप्रीत, रविता और कोमल सिलाई-कढ़ाई में खुद को व्यस्त रखती हैं। आपको बता दें मुस्कान रस्तोगी का नीला ड्रम कांड हो अथवा रविता और दामिनी..। सभी ने पति के रहते भी दूसरे युवकों से आशिकी का चक्कर चलाया प्यार के चक्कर में अपने पति का काम तमाम कर अपराध की अंधी राह पर जाकर खून से अपने हाथ रंग लिए। संगीता, अंजलि, कोमल और कविता की भी यही कहानी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पति से भावनात्मक और जिस्मानी पूर्ति के बावजूद ये दूसरे आशिकों के साथ रंगरलियां मनाने की वासना भरी चाहत में ऐसी भटकी कि कुछ महिलाओं ने अपने ही सुहाग को मौत के घाट उतार दिया तो एक ने बेटे को ही मार दिया। जिन सपनों के लिए उन्होंने यह खतरनाक रास्ता अख्तियार किया, वे टूट चुके हैं। जेल में कोई सिलाई-कढ़ाई सीख रही तो कोई बच्चों को पढ़ा रही है।हर सुबह जेल में बजने वाले सुंदरकांड को सुन कर मन की शांति पाने की कोशिश करती है। जाने-अनजाने उन्होंने यह कदम उठा तो लिया लेकिन सलाखों के पीछे अब सिर्फ दर्द है, पछतावा है और बेबस सिसकियां भी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको पता होगा तीन मार्च 2025 की रात को ब्रह्मपुरी की रहने वाली मुस्कान रस्तागी ने प्रेमी साहिल शुक्ला के साथ मिलकर पति सौरभ राजपूत की हत्या कर दी थी। ड्रम के अंदर सीमेंट से शव को जमा दिया था। मुस्कान और साहिल अभी भी जेल की सलाखों के पीछे है। दोनों के मुकदमे में जल्द ही निर्णय भी आने वाला है। परीक्षितगढ़ थाना क्षेत्र के गांव अगवानपुर निवासी 28 वर्षीय राहुल से अंजलि के तीन बेटे हैं। इसके बावजूद अंजलि का दिल पड़ोसी अजय पर आ गया। राहुल खेती बाड़ी व पशुपालन करता था, जबकि अजय आवारा किस्म का था और मौजमस्ती करता था। अजय ही अंजलि को रास्ते में से पिकअप कर लेकर होटल पहुंच जाता था। राहुल इसका विरोध करता था। एक नंवबर 2025 रात आठ बजे अंजलि ने काल कर राहुल को गांव के बाहर मंदिर पर बुलाया। वहां पर अजय भी आ गया। तब अजय ने राहुल की तीन गोली मारकर हत्या कर दी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मेरठ के बहसूमा के अकबरपुर सादात ने रविता ने 17 अप्रैल 2025 को प्रेमी प्रेमी अमरदीप के साथ मिलकर पति अमित की गला दबाकर हत्या कराई। उसके बाद सांप खरीद कर अमित के बिस्तर पर छोड़ दिया। उसके बाद सांप से काटने का नाटक रच दिया। पोस्टमार्टम में गला दबाकर हत्या आने के बाद पुलिस ने रविता और अमरदीप को जेल भेज दिया। दोनों फिलहाल जेल में बंद है। वहीं चार अप्रैल को मेरठ जिला के परीक्षितगढ़ के अगवानपुर निवासी बीएसएफ जवान नैन सिंह की हत्या का पर्दाफाश करते हुए पुलिस ने पत्नी को और मौसी के बेटे गुलशन समेत पांच आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेजा। कोमल ने बहन के मंगेतर गुलशन के साथ मिलकर हत्या की पूरी पटकथा रची थी। छह लाख की सुपारी के लिए अपने आभूषण गिरवी रखकर रकम जुटाई थी। मोबाइल कॉल डिटेल से ही पुलिस गुलशन तक पहुंची थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मेरठ की ही युवती गुरप्रीत ने तो प्रेमी के चक्कर में फंसकर अपनी कोख को ही उजाड़ दिया है। 17 जून को मेरठ जिला के बहसूमा के सैफपुर फिरोजपुर निवासी गुरुप्रीत कौर ने प्रेमी मुजफ्फरनगर के मीरापुर निवासी अर्पित पराशर के साथ मिलकर सात साले के बेटे अंगदवीर की हस्तिनापुर ले जाकर हत्या करा दी। महिला पौने दो साल से पति से अलग रह रही थी, बेटे की हत्या से चार दिन पहले ही ससुराल लौटी थी। गुरुप्रीत और अर्पित पराशर भी जेल में है। 23 जून 2025 को मेरठ के जानी खुर्द के किसान सुभाष की हत्या उसकी पत्नी कविता और छोटी बेटी सोनम ने अपने प्रेमियों के साथ मिलकर कराई थी। बेटी के प्रेमी विपिन ने दोस्त अजगर उर्फ शिवम के साथ गोली मारकर हत्या की थी। मां बेटी समेत पांच आरोपितों को पुलिस ने जेल भेज दिया। कविता और सोनम जमानत पर जेल से छूट चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">28 फरवरी 2025 को जानी के गांव कुसैड़ी निवासी लोडर ऑपरेटर अजय कुमार की हत्या उसकी पत्नी संगीता ने ही प्रेमी अवनीश निवासी गाजियाबाद के संग मिलकर की है। अजय कुमार उर्फ बिटटू ताऊ के बेटे की शादी समारोह में शामिल होने के बाद लौट रहा था। तब रास्ते में अवनीश ने ईंट से कुचलकर मार डाला। संगीता जमानत पर जेल से छूट चुकी है। यह समय की गति है या कलियुग का प्रभाव कि यूपी ही नहीं देश भर  में प्रेम त्रिकोण विवाहेत्तर संबंध अंधी वासना और अवैध सम्बन्धों के चलते कई सौ विवाहिता युवतियां जेल की चारदीवारी में शून्य हो चुके भविष्य को तलाश रहीं हैं। कुछ तो जेल से बाहर निकल कर कहां ठिकाना होगा यह भी नहीं जानती क्योंकि उनके अपराध के कारण सामाजिक जिल्लत झेल रहे उनके मा बाप परिवार ने भी उनसे किनारा कर लिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सवाल फिर वही है ऐसा क्या है जो मुस्कान रविता गुलशन संगीता अंजली को उनके साथ सात फेरे लेने वाले पति नहीं दे पाए। संस्कार की कमी अवैध सम्बन्ध और विवाहेत्तर वासना की अंधी सुरंग हजारों विवाहित कपल्स के जीवन को कलंकित कर रही है। हमारे गौरवशाली समाज और संस्कृति में यौन शुचिता का विचार रहा है यही विचार है कि हिन्दुस्तान की नारी शक्ति का विश्व भर में विश्वास और सम्मान रहा है लेकिन पिछले एक दशक में भारतीय नारी समाज को कथित प्रगतिशीलता पुरुष समानता और स्वतंत्र जीवन शैली के नाम पर यौन स्वछंदता और अमर्यादित जीवन की ओर धकेलने की कोशिश की जा रही है नेटफलिक्स होट स्टार तमाम मीडिया पर भारतीय महिलाओं को कथित आधुनिकता के नाम पर अवैध सम्बन्धों वाले स्वछंद जीवन शैली की और प्रेरित किया जा रहा है। इसी का परिणाम है कि हजारों जीवन अपने राह से उतर कर अंधेरी सुरंग में जीवन का स्वर्णिम समय देने के लिए मजबूर हैं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 22:06:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रिश्तों की नींव में दरार</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">हाल ही में आगरा में सामने आए उस हृदयविदारक मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया, जिसमें एक महिला पर अपने पति की हत्या कर शव को बाथरूम के फर्श के नीचे दफनाने का आरोप है। यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि हमारे समाज के बदलते मनोविज्ञान, पारिवारिक मूल्यों के क्षरण और रिश्तों में बढ़ती कटुता का गंभीर संकेत भी है। जिस घर को सुरक्षा, स्नेह और विश्वास का प्रतीक माना जाता है, वही यदि भय और हिंसा का केंद्र बन जाए तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">आज का समय अभूतपूर्व तकनीकी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182836/cracks-in-the-foundation-of-relationships"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(1)2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">हाल ही में आगरा में सामने आए उस हृदयविदारक मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया, जिसमें एक महिला पर अपने पति की हत्या कर शव को बाथरूम के फर्श के नीचे दफनाने का आरोप है। यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि हमारे समाज के बदलते मनोविज्ञान, पारिवारिक मूल्यों के क्षरण और रिश्तों में बढ़ती कटुता का गंभीर संकेत भी है। जिस घर को सुरक्षा, स्नेह और विश्वास का प्रतीक माना जाता है, वही यदि भय और हिंसा का केंद्र बन जाए तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज का समय अभूतपूर्व तकनीकी प्रगति, आर्थिक अवसरों और आधुनिक जीवनशैली का दौर है, लेकिन दूसरी ओर मानवीय संवेदनाएं और रिश्तों की गर्माहट लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही हैं। पति-पत्नी का संबंध भारतीय संस्कृति में सबसे पवित्र और विश्वासपूर्ण माना गया है। यह रिश्ता केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और अनेक भावनाओं का संगम होता है। जब इसी रिश्ते में अविश्वास, क्रोध, स्वार्थ और हिंसा प्रवेश कर जाते हैं, तब उसका परिणाम केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की आत्मा को भी घायल करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पिछले कुछ महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों से पति या पत्नी द्वारा अपने जीवनसाथी की हत्या के कई मामले सामने आए हैं। कहीं अवैध संबंधों के कारण हत्या हुई, कहीं संपत्ति के विवाद ने रिश्ते खत्म कर दिए, तो कहीं लंबे समय से चले आ रहे घरेलू विवाद हिंसक रूप ले बैठे। इन घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया है कि जिन लोगों ने साथ जीने-मरने की कसमें खाईं, वे एक-दूसरे के प्राण लेने तक पहुंच रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी सच है कि ऐसे अपराध समाज के अधिकांश परिवारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। देश में करोड़ों परिवार आज भी प्रेम, विश्वास और परस्पर सम्मान के साथ जीवन जी रहे हैं। लेकिन जब इस प्रकार की घटनाएं बार-बार सामने आती हैं, तो वे समाज के सामने गंभीर प्रश्न अवश्य खड़े करती हैं। क्या हमारी सहनशीलता कम हो रही है? क्या संवाद की जगह आक्रोश ने ले ली है? क्या छोटी-छोटी बातों का समाधान बातचीत से निकालने की बजाय हिंसा को आसान रास्ता समझा जाने लगा है?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आधुनिक जीवन की भागदौड़, आर्थिक दबाव, बढ़ती अपेक्षाएं, मानसिक तनाव और सामाजिक प्रतिस्पर्धा ने पारिवारिक जीवन को प्रभावित किया है। पति-पत्नी दोनों कामकाजी हों या एक ही व्यक्ति परिवार की जिम्मेदारी निभा रहा हो, हर स्थिति में मानसिक दबाव पहले की तुलना में कहीं अधिक है। यदि इन परिस्थितियों में संवाद समाप्त हो जाए, एक-दूसरे को समझने का प्रयास खत्म हो जाए और अहंकार रिश्तों पर हावी हो जाए, तो विवाद गहराते चले जाते हैं। ऐसे विवादों का समाधान कानून, परिवार, परामर्श या आपसी बातचीत से निकल सकता है, लेकिन हिंसा कभी समाधान नहीं हो सकती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आगरा की घटना में जिस तरह शव को छिपाने का प्रयास किया गया, उसने लोगों को स्तब्ध कर दिया। यह घटना केवल हत्या तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसके बाद किए गए कथित प्रयासों ने भी समाज को विचलित किया। ऐसे मामलों में कानून अपना कार्य करता है और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से दोषी या निर्दोष का निर्णय होता है। इसलिए किसी भी आरोपी को अंतिम रूप से दोषी मानना न्यायालय के निर्णय के बाद ही उचित होता है। फिर भी ऐसी घटनाएं यह अवश्य बताती हैं कि अपराध की मानसिकता कितनी भयावह हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज परिवारों में रिश्ते कभी-कभी सूत के धागे जैसे नाजुक प्रतीत होते हैं। छोटी-सी गलतफहमी, आर्थिक विवाद, संदेह या अहंकार वर्षों पुराने संबंधों को तोड़ देता है। पहले परिवार के बड़े-बुजुर्ग विवादों को बैठकर सुलझाते थे। संयुक्त परिवारों में संवाद के अधिक अवसर होते थे। अब एकल परिवारों के बढ़ने, सामाजिक दूरी और व्यस्त जीवनशैली के कारण कई लोग अपनी मानसिक परेशानियां भीतर ही भीतर दबाए रहते हैं। जब भावनाएं लंबे समय तक दबती रहती हैं, तो कभी-कभी उनका विस्फोट अत्यंत दुखद रूप में सामने आता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी आवश्यक है कि समाज किसी एक वर्ग या लिंग को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति से बचे। अपराध करने वाला व्यक्ति पुरुष भी हो सकता है और महिला भी। कानून की दृष्टि में अपराधी केवल अपराधी होता है। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर पूरे समाज, किसी पीढ़ी या किसी लिंग के बारे में व्यापक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपराध के कारणों को समझें और उन्हें रोकने के उपाय खोजें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। तनाव, अवसाद, गुस्सा और संबंधों में बढ़ती दूरी को समय रहते पहचानना और उनका समाधान करना अत्यंत आवश्यक है। यदि पति-पत्नी के बीच मतभेद हैं, तो परिवार, मित्र, विवाह परामर्शदाता या कानूनी प्रक्रिया की सहायता ली जा सकती है। अलग होना पड़े तो वह भी कानून के दायरे में और गरिमा के साथ होना चाहिए। तलाक एक वैधानिक प्रक्रिया है, जबकि हत्या मानवता और कानून—दोनों के विरुद्ध जघन्य अपराध है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मीडिया और सोशल मीडिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। अपराधों की जानकारी समाज तक पहुंचाना आवश्यक है, लेकिन उनके सनसनीखेज चित्रण की बजाय यह भी बताया जाना चाहिए कि ऐसे अपराधों के पीछे कौन-से सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण काम करते हैं तथा उनसे बचाव कैसे किया जा सकता है। समाज को भय और सनसनी नहीं, बल्कि जागरूकता और संवेदनशीलता की आवश्यकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बच्चों और युवाओं को बचपन से ही संवाद, सहनशीलता, नैतिकता और सम्मानजनक व्यवहार की शिक्षा देना समय की मांग है। परिवार केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का आधार होता है। यदि घरों में प्रेम, विश्वास और धैर्य का वातावरण बनेगा, तो समाज भी अधिक सुरक्षित और संवेदनशील बनेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हर दिन दर्ज होने वाले हत्या, मारपीट, अपहरण और अन्य गंभीर अपराध निश्चित रूप से चिंता पैदा करते हैं। लेकिन इन घटनाओं के बीच यह याद रखना भी जरूरी है कि समाज में आज भी असंख्य लोग ईमानदारी, प्रेम और पारिवारिक मूल्यों के साथ जीवन जी रहे हैं। हमें उन्हीं सकारात्मक मूल्यों को मजबूत करना होगा, ताकि हिंसा की प्रवृत्ति को रोका जा सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रिश्ते विश्वास से बनते हैं और विश्वास टूटने पर सबसे बड़ी क्षति केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज की होती है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित, संवेदनशील और संस्कारित वातावरण में जीवन जीएं, तो हमें संवाद, धैर्य, परस्पर सम्मान और नैतिक मूल्यों को फिर से अपने पारिवारिक जीवन का आधार बनाना होगा। यही वह मार्ग है जो समाज को हिंसा से दूर और मानवीयता के निकट ले जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/182836/cracks-in-the-foundation-of-relationships</link>
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                <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 22:02:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुल्तानपुर निवासी 90 वर्ष से अधिक आयु की बुजुर्ग मां पुरबिन आज भी हर काम से नहीं हटती पीछे</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">
<blockquote class="format1"><strong>महराजगंज/रायबरेली:</strong></blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जहां बढ़ती उम्र के साथ अधिकांश लोग दूसरों के सहारे जीवन व्यतीत करने लगते हैं, वहीं विकासखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत सुल्तानपुर निवासी 90 वर्ष से अधिक आयु की बुजुर्ग मां पुरबिन आज भी अपनी मेहनत, आत्मनिर्भरता और अदम्य जीवटता से नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी दिनचर्या किसी युवा महिला से कम नहीं है। घर के लगभग सभी काम वह स्वयं करती हैं और अपनी सक्रिय जीवनशैली से यह साबित कर रही हैं कि, इच्छाशक्ति मजबूत हो तो उम्र केवल एक संख्या बनकर रह जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
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<div style="text-align:justify;">        </div>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181678/purbin-an-elderly-mother-of-more-than-90-years-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260619-wa0383.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">
<blockquote class="format1"><strong>महराजगंज/रायबरेली:</strong></blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जहां बढ़ती उम्र के साथ अधिकांश लोग दूसरों के सहारे जीवन व्यतीत करने लगते हैं, वहीं विकासखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत सुल्तानपुर निवासी 90 वर्ष से अधिक आयु की बुजुर्ग मां पुरबिन आज भी अपनी मेहनत, आत्मनिर्भरता और अदम्य जीवटता से नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी दिनचर्या किसी युवा महिला से कम नहीं है। घर के लगभग सभी काम वह स्वयं करती हैं और अपनी सक्रिय जीवनशैली से यह साबित कर रही हैं कि, इच्छाशक्ति मजबूत हो तो उम्र केवल एक संख्या बनकर रह जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">      आपको बता दें कि, मां पुरबिन का परिवार भरा-पूरा है। उनके एक पुत्र संतलाल लोधी हैं, जो वर्तमान में ग्राम प्रधान हैं, जबकि उनकी दो बेटियां विवाह के बाद अपने-अपने परिवारों में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रही हैं। परिवार में बहू, दो नाती, दो नातिन और दो पनाती भी हैं। परिवार के सभी सदस्य उनका सम्मान करते हैं और उनकी देखभाल के लिए तत्पर रहते हैं, फिर भी मां पुरबिन आत्मनिर्भर जीवन जीना ही पसंद करती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">         बुजुर्ग मां पुरबिन की एक विशेष इच्छा भी है। वह चाहती हैं कि, अपने जीवनकाल में अपने एक अविवाहित नाती का विवाह अपनी आंखों से देखें। यही इच्छा उनके जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">         उम्र बढ़ने के बावजूद उनकी दिनचर्या आज भी बेहद सक्रिय है। वह घर में झाड़ू लगाने से लेकर भोजन बनाने तक के सभी कार्य स्वयं करती हैं। पशुओं की देखभाल, गाय-भैंस का दूध निकालना, खैलर चलाकर मट्ठा तैयार करना, गोबर उठाना, चावल साफ करना तथा अपने हाथों से आटा गूंधकर मिट्टी के चूल्हे पर रोटियां बनाना उनके रोजमर्रा के कार्यों में शामिल है। उम्र के प्रभाव से उनकी कमर भले ही झुक गई हो, लेकिन उनके हौसले और कार्य करने की क्षमता में आज भी कोई कमी दिखाई नहीं देती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">        ग्रामीण परिवेश में सादगीपूर्ण जीवन, नियमित शारीरिक श्रम और अनुशासित दिनचर्या को ही वह अपनी अच्छी सेहत का राज मानती हैं। उनका कहना है कि, शरीर को स्वस्थ और सक्रिय बनाए रखने के लिए लगातार काम करना जरूरी है। यही कारण है कि, परिवार के मना करने के बावजूद वह स्वयं अपने काम करना पसंद करती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">        मां पुरबिन बताती हैं कि, उनका बेटा ग्राम प्रधान होने के नाते उन्हें आराम करने की सलाह देता है, लेकिन वह मानती हैं कि, निष्क्रियता शरीर को कमजोर बना देती है। इसलिए वह अपने दैनिक कार्यों को ही व्यायाम और स्वास्थ्य का आधार मानती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">        आज के समय में, जब कम उम्र में ही लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं, मां पुरबिन की जीवनशैली समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश लेकर आती है। उनकी मेहनत, अनुशासन और आत्मनिर्भरता यह सिखाती है कि, नियमित श्रम, सकारात्मक सोच और सक्रिय जीवनशैली इंसान को लंबे समय तक स्वस्थ, सक्षम और आत्मविश्वासी बनाए रख सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">        मां पुरबिन की यह प्रेरणादायी कहानी न केवल ग्रामीण महिलाओं के लिए बल्कि हर आयु वर्ग के लोगों के लिए एक मिसाल है। उनकी जीवटता और कर्मशीलता को देखकर सहज ही कहा जा सकता है कि, उम्र भले ही 90 पार कर जाए, लेकिन हौसले जवान हों तो जीवन की रफ्तार कभी नहीं थमती।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टेक्नोलॉजी</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>लाइफस्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 22:17:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दुनिया की नजरों में मुस्कुराती, भीतर पिता से ताकत लेती बेटी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष बाहर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीतर शुरू होता है—जहाँ निर्णयों की भीड़ में आत्मविश्वास मौन हो जाता है और रिश्तों की अपेक्षाएँ मन पर दबाव बनकर धीरे-धीरे कसने लगती हैं। विवाह के बाद स्त्री-जीवन में यह भार और गहरा हो जाता है—कभी शब्दों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी मौन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी जिम्मेदारियों के नाम पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कभी “समझदारी” की कठोर परिभाषाओं में। बाहर से सब सामान्य लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर भीतर हर दिन एक नई परीक्षा जैसा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका प्रश्नपत्र बदलता रहता है और उत्तर पहले से तय मान लिए जाते</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181465/smiling-daughter-in-the-eyes-of-the-world-taking-strength"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2)1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष बाहर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीतर शुरू होता है—जहाँ निर्णयों की भीड़ में आत्मविश्वास मौन हो जाता है और रिश्तों की अपेक्षाएँ मन पर दबाव बनकर धीरे-धीरे कसने लगती हैं। विवाह के बाद स्त्री-जीवन में यह भार और गहरा हो जाता है—कभी शब्दों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी मौन में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी जिम्मेदारियों के नाम पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कभी “समझदारी” की कठोर परिभाषाओं में। बाहर से सब सामान्य लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर भीतर हर दिन एक नई परीक्षा जैसा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका प्रश्नपत्र बदलता रहता है और उत्तर पहले से तय मान लिए जाते हैं। ऐसे में अपनी इच्छाओं और दूसरों की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना भी एक निरंतर संघर्ष बन जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पिता का अदृश्य सहारा</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे समय में सबसे बड़ा सहारा कोई सामने खड़ा व्यक्ति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर बसा वह अदृश्य संस्कार होता है जो पिता ने बिना औपचारिक उपदेश के अपने आचरण से दिया होता है। उनके शब्द जीवन गढ़ने वाले सूत्र थे—“धैर्य रखो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब अच्छा होगा</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">अपने मन की राह पर अडिग रहो</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म ही पहचान है</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">सहनशीलता को ताकत बनाओ</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वर पर विश्वास रखो</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ों का सम्मान और छोटों से स्नेह रखो</span>,” “<span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य और ईमानदारी थामे रहो</span>,” <span lang="hi" xml:lang="hi">और “कठिन समय में हिम्मत मत छोड़ो।” विवाह के बाद जब जीवन जिम्मेदारियों और संघर्षों से भरता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब यही सूत्र भीतर से उठकर व्यक्ति को स्थिर रखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सही निर्णय की शक्ति देते हैं और कठिन मोड़ों पर टूटने से बचाकर आगे बढ़ने का साहस देते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मसम्मान का कवच</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विवाह के बाद स्त्री के सामने सबसे बड़ा संघर्ष केवल बदलती परिस्थितियों का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपनी पहचान को बनाए रखने का होता है—अनेक भूमिकाओं और अपेक्षाओं के बीच स्वयं को पीछे छूटने से बचाने का। ऐसे समय में पिता की शिक्षा एक अदृश्य कवच बनकर साथ रहती है। जब निर्णय भावनाओं में उलझता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनकी सिखाई तर्कशीलता मार्ग दिखाती है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">जब रिश्ता दबाव बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनके संस्कारों से उपजा आत्मसम्मान दृढ़ करता है। यह कोई बाहरी सहारा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर का अनुशासन और चेतना है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन में संतुलन की सीख</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गृहस्थ जीवन की सबसे कठिन परीक्षा संघर्ष नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संतुलन है—सपनों और जिम्मेदारियों के बीच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौन और अभिव्यक्ति के बीच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धैर्य और प्रतिरोध के बीच। ऐसे में पिता की सीख केवल मार्गदर्शन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर का संतुलन बन जाती है। उन्होंने सिखाया कि झुकना कमजोरी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर टूटना स्वीकार्य नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">समझौता जीवन का हिस्सा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर आत्मसम्मान कभी समझौते की वस्तु नहीं बन सकता। यही दृष्टि विवाह में स्त्री को केवल रिश्ते निभाने वाली नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि स्वयं को अक्षुण्ण रखने वाली शक्ति देती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मौन में पिता की स्मृति</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कई बार जीवन ऐसे मोड़ पर आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ रिश्तों में शब्द बोझ बन जाते हैं और मौन और भारी हो जाता है। ऐसे क्षणों में पिता की स्मृति सहारे की तरह नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर गूँजती शांत चेतना की तरह होती है—जो याद दिलाती है कि हर प्रतिक्रिया आवश्यक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर हर निर्णय विवेकपूर्ण होना चाहिए। तब वह बेटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अब पत्नी बन चुकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने भीतर उस परिचित स्वर को फिर सुनती है—“सब कुछ बचाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सबसे पहले स्वयं को मत खोना।”</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिरता का जीवन-सूत्र</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब सामाजिक अपेक्षाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक दायित्व और व्यक्तिगत आकांक्षाएँ एक साथ सामने खड़ी हो जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब जीवन मानो तीन दिशाओं में खिंचते हुए संघर्ष का रूप ले लेता है। ऐसे समय में पिता की शिक्षा सबसे गहरी भूमिका निभाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वह केवल भावनाओं को नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विचारों को भी स्थिरता प्रदान करती है। पिता ने यह नहीं सिखाया होता कि कठिनाइयों में टूट पड़ना या हार मान लेना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह कि कठिनाइयों के बीच भी स्वयं को समझना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहचानना और अपने भीतर की आवाज़ को सुनना कभी नहीं छोड़ना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षाओं की पूर्व-तैयारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समय के साथ यह गहराई से समझ आने लगता है कि पिता केवल एक व्यक्ति नहीं थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे जीवन की हर अनदेखी परीक्षा के लिए की गई एक तैयारी थे। विवाह के बाद जब परिस्थितियाँ नए प्रश्न और नई चुनौतियाँ सामने रखती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनकी सीखें किसी पुस्तक के पन्नों की तरह नहीं खुलतीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर की चेतना बनकर सक्रिय हो उठती हैं। हर कठिन निर्णय के क्षण में उनका कोई वाक्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई दृष्टिकोण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई मूल्य या फिर उनका मौन ही अदृश्य शक्ति बनकर साथ खड़ा दिखाई देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुपस्थिति में उपस्थिति</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धीरे-धीरे यह बोध और गहरा होता जाता है कि पिता भले ही इस दुनिया में नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनकी सबसे सशक्त उपस्थिति उनकी अनुपस्थिति में ही जीवित है। वे अब केवल एक आवाज़ नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विवेक बन चुके हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वे अब सलाह नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि निर्णयों की स्पष्टता हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वे अब साथ चलने वाले व्यक्ति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भीतर का आत्मबल हैं। विवाह के संघर्षों में जब परिस्थितियाँ और लोग समझौतों की सीमाएँ बढ़ाने लगते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब पिता की सीख भीतर एक अंतिम मर्यादा-रेखा खींच देती है—जिसके आगे आत्मसम्मान कभी मौन नहीं रहता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समय के साथ यह स्पष्ट हो जाता है कि पिता केवल एक संबंध नहीं थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जीवन की अदृश्य रीढ़ थे। उनके बिना भी जीवन आगे बढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनके संस्कार हर कठिन मोड़ पर संभाल लेते हैं और गिरने नहीं देते। चाहे संघर्ष कितने भी जटिल हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पिता की सीख यही दृढ़ता देती है— टूट जाना कोई विकल्प नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और स्वयं को खो देना किसी भी समस्या का समाधान नहीं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यही उनकी सबसे गहरी विरासत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो आँसुओं में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि साहस और आत्मबल बनकर जीवनभर साथ रहती है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 17:59:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>ऑपरेशन मिलाप : बिछड़ों को अपनों से मिलाने का मानवीय अभियान, परिवारों के आंसुओं में लौटी खुशियों की रोशनी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">किसी घर का बेटा, बेटी, बहन, भाई या माता-पिता अचानक लापता हो जाएं तो उस परिवार पर क्या गुजरती है, इसका अंदाजा वही लगा सकता है जिसने इस पीड़ा को करीब से महसूस किया हो। गुमशुदगी केवल किसी व्यक्ति का घर से दूर हो जाना नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार की खुशियों, उम्मीदों और मानसिक शांति के खो जाने जैसा होता है। हर गुजरते दिन के साथ परिजनों की चिंता बढ़ती जाती है। हर दरवाजे की आहट उन्हें उम्मीद देती है कि शायद उनका अपना लौट आया हो। हर फोन कॉल उन्हें चौंका देती है। ऐसे में जब वर्षों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181002/operation-milap-a-humanitarian-campaign-to-reunite-separated-people-with"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/delhi-police.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">किसी घर का बेटा, बेटी, बहन, भाई या माता-पिता अचानक लापता हो जाएं तो उस परिवार पर क्या गुजरती है, इसका अंदाजा वही लगा सकता है जिसने इस पीड़ा को करीब से महसूस किया हो। गुमशुदगी केवल किसी व्यक्ति का घर से दूर हो जाना नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार की खुशियों, उम्मीदों और मानसिक शांति के खो जाने जैसा होता है। हर गुजरते दिन के साथ परिजनों की चिंता बढ़ती जाती है। हर दरवाजे की आहट उन्हें उम्मीद देती है कि शायद उनका अपना लौट आया हो। हर फोन कॉल उन्हें चौंका देती है। ऐसे में जब वर्षों या महीनों से बिछड़ा कोई व्यक्ति अचानक परिवार से मिल जाता है तो वह क्षण किसी चमत्कार से कम नहीं होता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">गुजरात पुलिस द्वारा चलाया गया “ऑपरेशन मिलाप” इसी मानवीय संवेदना का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर सामने आया है। इस विशेष अभियान के अंतर्गत मात्र एक महीने में 1470 गुमशुदा व्यक्तियों को खोजकर उनके परिवारों से मिलाया गया। यह केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि हजारों टूटते हुए परिवारों के जीवन में आशा, विश्वास और खुशियों की वापसी का अभियान है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस अभियान में 852 महिलाओं, 342 पुरुषों तथा 276 नाबालिग बच्चों और किशोरियों को खोजकर उनके परिजनों तक पहुंचाया गया। विशेष रूप से यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि बड़ी संख्या में किशोरियां और महिलाएं अपने परिवारों से बिछड़ गई थीं। ऐसे मामलों में समय के साथ परिवारों की चिंता कई गुना बढ़ जाती है। उन्हें हर पल किसी अनहोनी की आशंका सताती रहती है। ऐसे में पुलिस द्वारा इन लोगों को सुरक्षित ढूंढ़ निकालना निश्चित रूप से सराहनीय कार्य है।</div><div style="text-align:justify;">गुजरात पुलिस ने केवल औपचारिक जांच तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि पुराने और लंबित मामलों को दोबारा खोलकर नए सिरे से जांच की। आधुनिक तकनीक, मोबाइल फोन विश्लेषण, सोशल मीडिया गतिविधियों की निगरानी, विभिन्न राज्यों की पुलिस के साथ समन्वय, सार्वजनिक परिवहन केंद्रों और आश्रय गृहों की जांच जैसे अनेक माध्यमों का उपयोग किया गया। शिकायतकर्ताओं और गवाहों से दोबारा संपर्क कर नए सुराग जुटाए गए। यह दर्शाता है कि यदि इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता हो तो वर्षों पुराने मामलों में भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।</div><div style="text-align:justify;">सूरत पुलिस द्वारा सर्वाधिक 341 गुमशुदा व्यक्तियों का पता लगाना भी इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय स्तर पर समर्पित प्रयास किस प्रकार बड़े परिणाम दे सकते हैं। पुलिस और प्रशासन की यह सक्रियता उन परिवारों के लिए राहत का कारण बनी है जो वर्षों से अपने प्रियजनों की प्रतीक्षा में दिन गिन रहे थे।</div><div style="text-align:justify;">इस अभियान का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे समाज के सामने गुमशुदगी के वास्तविक कारण भी उजागर हुए हैं। पुलिस के विश्लेषण में सामने आया कि 14 से 17 वर्ष की आयु वर्ग की अनेक किशोरियां प्रेम संबंधों, पारिवारिक विवादों, अभिभावकों की डांट-फटकार अथवा पढ़ाई में असफलता जैसी परिस्थितियों के कारण घर छोड़कर चली गई थीं। कुछ मामले रोजगार की तलाश में पलायन करने वाले परिवारों से भी जुड़े पाए गए।</div><div style="text-align:justify;">यहां एक गंभीर सामाजिक संदेश छिपा हुआ है। जीवन में कठिनाइयां, असफलताएं, पारिवारिक मतभेद या भावनात्मक उलझनें आना स्वाभाविक है। किशोरावस्था में भावनाएं अधिक संवेदनशील होती हैं और कई बार छोटी घटनाएं भी बहुत बड़ी लगने लगती हैं। लेकिन घर छोड़ देना किसी समस्या का समाधान नहीं है। यह निर्णय क्षणिक आवेश में लिया जा सकता है, पर उसके परिणाम बहुत गंभीर होते हैं।</div><div style="text-align:justify;">कई बार बच्चों और किशोरों को लगता है कि उनके जाने से परिवार को कोई फर्क नहीं पड़ेगा या कुछ दिनों बाद सब सामान्य हो जाएगा। वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत होती है। जिस दिन कोई बच्चा या किशोर घर से लापता होता है, उसी दिन से उसके माता-पिता का चैन और नींद समाप्त हो जाती है। मां की आंखें दरवाजे पर लगी रहती हैं। पिता बाहर से मजबूत दिखने का प्रयास करता है, लेकिन भीतर से टूट चुका होता है। भाई-बहन चिंता और असुरक्षा के बीच जीते हैं। पूरा परिवार हर संभावित स्थान पर तलाश करता है, पुलिस थानों के चक्कर लगाता है और अनिश्चितता के अंधेरे में जीवन बिताता है।</div><div style="text-align:justify;">गुमशुदगी का दर्द केवल भावनात्मक नहीं होता, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी परिवारों को प्रभावित करता है। अनेक परिवार अपनी बचत तक खर्च कर देते हैं। कई लोग कामकाज छोड़कर अपने प्रियजन की तलाश में जुट जाते हैं। मानसिक तनाव के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी उत्पन्न होने लगती हैं। इसलिए किसी भी परिस्थिति में घर छोड़कर चले जाना न तो समझदारी है और न ही समस्याओं का समाधान।</div><div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता इस बात की है कि परिवारों और बच्चों के बीच संवाद को मजबूत बनाया जाए। अभिभावक बच्चों की भावनाओं को समझें और बच्चे अपने माता-पिता पर विश्वास करें। यदि पढ़ाई में असफलता मिली है, किसी बात पर डांट पड़ी है या जीवन में कोई परेशानी आई है, तो उसका समाधान बातचीत से निकाला जा सकता है। परिवार ही वह स्थान है जहां व्यक्ति को सबसे अधिक सुरक्षा, प्रेम और सहयोग मिलता है।</div><div style="text-align:justify;">ऑपरेशन मिलाप की सफलता केवल आंकड़ों में नहीं मापी जा सकती। इसकी वास्तविक सफलता उन हजारों मुस्कानों में दिखाई देती है जो बिछड़ने के बाद फिर से लौट आईं। उन माताओं की आंखों में दिखाई देती है जिन्होंने वर्षों बाद अपने बच्चों को गले लगाया। उन परिवारों की खुशी में दिखाई देती है जिनकी उम्मीदें लगभग समाप्त हो चुकी थीं।</div><div style="text-align:justify;">यह अभियान यह भी सिद्ध करता है कि पुलिस केवल कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली संस्था नहीं है, बल्कि समाज के दुख-दर्द में सहभागी बनने वाली संवेदनशील व्यवस्था भी है। जब पुलिस किसी गुमशुदा व्यक्ति को उसके परिवार तक पहुंचाती है, तब वह केवल एक केस बंद नहीं करती बल्कि एक टूटे हुए परिवार को फिर से जोड़ती है।</div><div style="text-align:justify;">ऑपरेशन मिलाप ने हजारों परिवारों को नई जिंदगी दी है। यह अभियान मानवता, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का उत्कृष्ट उदाहरण है। साथ ही यह हम सभी को यह संदेश भी देता है कि जीवन की किसी भी कठिन परिस्थिति में घर और परिवार से दूर जाना समाधान नहीं है। संवाद, धैर्य और विश्वास ही हर समस्या का सबसे मजबूत उत्तर हैं। यदि यह संदेश समाज के प्रत्येक बच्चे और किशोर तक पहुंच जाए तो शायद भविष्य में अनेक परिवार गुमशुदगी की उस पीड़ा से बच सकेंगे, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं है।</div><div style="text-align:justify;">       </div><div style="text-align:justify;"><strong><br /></strong></div><div style="text-align:justify;"><strong>                                                                           *कांतिलाल मांडोत*</strong></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 18:35:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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