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                <title>Screen Time - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Screen Time RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>एक ऐसी दुनिया जहाँ सब उपलब्ध हैं, पर कोई उपस्थित नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता का सबसे गहरा घाव किसी युद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामारी या आर्थिक संकट ने नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस चमकती स्क्रीन ने दिया है जिसे हमने सुविधा समझकर जीवन का केंद्र बना लिया। इतिहास में पहली बार संवाद के साधन सबसे अधिक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर संवाद सबसे कम है। आवाज़ें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर महत्व नहीं। हर चेहरा ऑनलाइन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर हर मन ऑफलाइन हो रहा है। रिश्ते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दफ्तर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र और अंतर्मन तक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">म्यूट</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">होने लगे हैं। उँगलियाँ सक्रिय हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर संवेदनाएँ निष्क्रिय। उत्तर तुरंत मिल रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन किसी को समझने में</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184772/a-world-where-everyone-is-available-but-no-one-is"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1.-prof.-rkjain1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता का सबसे गहरा घाव किसी युद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महामारी या आर्थिक संकट ने नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस चमकती स्क्रीन ने दिया है जिसे हमने सुविधा समझकर जीवन का केंद्र बना लिया। इतिहास में पहली बार संवाद के साधन सबसे अधिक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर संवाद सबसे कम है। आवाज़ें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर महत्व नहीं। हर चेहरा ऑनलाइन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर हर मन ऑफलाइन हो रहा है। रिश्ते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दफ्तर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र और अंतर्मन तक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">म्यूट</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">होने लगे हैं। उँगलियाँ सक्रिय हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर संवेदनाएँ निष्क्रिय। उत्तर तुरंत मिल रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन किसी को समझने में पहले से अधिक समय लग रहा है। यह तकनीक की विजय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानवीय उपस्थिति के मौन विस्थापन की कथा है। जिसने दुनिया को जोड़ने का दावा किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी ने मनुष्य को उसके सबसे निकट बैठे व्यक्ति से सबसे अधिक दूर कर दिया। यही हमारे समय का सबसे मौन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापक और सबसे कम समझा गया सामाजिक पतन है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परिवारों का विघटन अब खामोशी में हो रहा है। घर दीवारों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्क्रीन से संचालित हैं। एक ही छत के नीचे लोग अलग-अलग डिजिटल दुनियाओं में जी रहे हैं। भारत में औसत व्यक्ति प्रतिदिन सात घंटे से अधिक स्क्रीन पर बिताता है। माता-पिता पाँच घंटे से अधिक और बच्चे चार घंटे से अधिक समय स्मार्टफोन पर बिताते हैं। अध्ययनों में दो-तिहाई माता-पिता और आधे से अधिक बच्चों ने माना कि मोबाइल ने रिश्तों की ऊष्मा घटा दी है। भोजन की मेज़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कभी संवाद का केंद्र थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब रील्स का मंच है। बच्चे बोलना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर माता-पिता स्क्रीन पर हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता संवाद चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब बच्चे स्क्रॉल करते हैं। सामने बैठे व्यक्ति की उपेक्षा कर मोबाइल में डूबे रहने की आदत—</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">फुबिंग</span>'—<span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्य हो रही है। रिश्ते अचानक नहीं टूटते</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वे पहले सुनना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर महसूस करना छोड़ते हैं। अंततः केवल औपचारिक संपर्क बचता है। घर अब भी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर आत्मीयता साइलेंट मोड में है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यस्थलों की सबसे बड़ी दूरी अब किलोमीटरों में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्यों के बीच मापी जाती है। कार्यालयों की नई वास्तुकला ईंट-पत्थर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बैंडविड्थ से बनती है। वर्क फ्रॉम होम ने काम घर तक पहुँचाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अदृश्य दूरियाँ खड़ी कर दीं। कमरे पास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन दूर। शोध बताते हैं कि दूरस्थ कर्मचारी अधिक अकेलापन और मानसिक तनाव महसूस करते हैं। डिजिटल बैठकों में कैमरे बंद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माइक्रोफोन म्यूट</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">उपस्थिति दर्ज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहभागिता नहीं। कर्मचारी का मूल्य विचारों से अधिक ऑनलाइन सक्रियता से आँका जाता है। प्रमोशन चेहरों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्क्रीन पर दर्ज गतिविधियों से जुड़ने लगा है। कभी दफ्तर बातचीत से चलते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज वह काम के बीच बची है। तकनीक ने गति बढ़ाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सहयोग का ताप घटा दिया। कार्यस्थल संवाद नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल प्रक्रियाओं के केंद्र हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी लोकतंत्र का पतन तब नहीं शुरू होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब लोग बोलना छोड़ देते हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तब शुरू होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वे सुनना छोड़ देते हैं। जनचर्चा की चौपाल अब एल्गोरिदम के दरबार में बदल चुकी है। कभी राजनीति जनसभाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहसों और प्रत्यक्ष संवाद से चलती थी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">आज स्क्रीन पर सिमट गई है। सोशल मीडिया पर राजनीतिक सामग्री का उपभोग बढ़ रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर विचार की गहराई घट रही है। युवा समाचार रील्स में देखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नारे शॉर्ट्स में सुनते हैं और आक्रोश इमोजी से जताते हैं। संवाद की जगह प्रतिक्रिया ने ले ली है—लाइक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शेयर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एंग्री फेस। सत्ता जनता की आँखों में कम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्रेंडिंग सूची में अधिक झाँकती है। जनता सड़क पर कम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फीड में अधिक दिखती है। कुछ सेकंड के विमर्श में जटिल प्रश्न मनोरंजन बन जाते हैं। लोकतंत्र की आवाज़ म्यूट होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो केवल चुनाव नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागरिकता भी कमजोर पड़ती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य की सबसे लंबी दूरी अब स्वयं से है। भावनाएँ अनुभव नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नोटिफिकेशन बनती जा रही हैं। प्रेम स्टोरी में सिमट गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोस्ती वर्चुअल समूहों में कैद है और अपनापन ऑनलाइन उपस्थिति से मापा जाता है। अध्ययन बताते हैं कि केवल आभासी संपर्क रखने वाले लोग मित्रताओं से कम संतुष्ट रहते हैं। विडंबना यह है कि संपर्क सूची बढ़ती जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अकेलापन भी गहराता जाता है। स्क्रीन ने दुनिया से जोड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर स्वयं से दूर कर दिया। अब हम उपलब्धियों का मूल्य अनुभवों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों की रील्स से तय करते हैं। निरंतर तुलना आत्मसम्मान को क्षीण करती है। चेहरे मुस्कुराते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोफाइल चमकती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर मन का एकांत और गहरा हो जाता है। भीड़ में जन्मा यही अकेलापन हमारे समय की नई सामाजिक बीमारी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यताएँ एक दिन में नहीं बदलतीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वे आदतों में बदलती हैं। पहले पत्रों की जगह संदेश आए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर संदेशों की जगह इमोजी ने भावनाएँ ले लीं। बातचीत स्टेटस में सिमट गई और साथ होने की जगह ऑनलाइन दिखना पर्याप्त हो गया। हर सुविधा के साथ संवाद घटा। हर नई तकनीक ने समय बचाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर थोड़ा-सा मनुष्य भी छीन लिया। अब असहमति को समझाने से आसान उसे म्यूट करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुःख बाँटने से आसान उसे छिपाना और प्रेम निभाने से आसान उसे पोस्ट करना है। सुविधा धीरे-धीरे संवेदना पर भारी पड़ गई। आधुनिक जीवन ने नियंत्रण दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर मानवीय स्पर्श छीन लिया। यही इस युग का सबसे अदृश्य सौदा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सौभाग्य से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्णय हमारे हाथ में है। परिवार फोन-फ्री डिनर का नियम बना सकते हैं। दफ्तर कैमरा-ऑन संवाद को औपचारिकता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहभागिता बना सकते हैं। नागरिक सोशल मीडिया से निकलकर प्रत्यक्ष संवाद की संस्कृति जीवित कर सकते हैं। तकनीक शत्रु नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेकहीन उपयोग संकट है। सुविधा के बदले संवेदना गिरवी रखी गई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आने वाली पीढ़ियाँ ऐसे समय को याद करेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब हर हाथ में स्मार्टफोन था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर किसी का हाथ थामने का समय नहीं। तब इंसानियत का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लास्ट सीन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">होगा—चलती उँगलियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थकी आँखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौन होंठ। रील्स चलती रहेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन ठहर जाएगा। इसलिए सबसे पहले रिश्तों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यस्थलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र और भीतर का </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">म्यूट</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">हटाना होगा। भविष्य हमारे समय का मूल्य तकनीक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बचाए गए संवाद से तय करेगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 21:38:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कोविड के बाद 3 वर्षों में 6 करोड़ मधुमेह रोगी बढ़े: भारत कैसे बन रहा 'डायबिटीज कैपिटल'</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>राजीव शुक्ल </strong></p>
<p style="text-align:justify;">कोविड-19 खत्म हुए 3 साल हो गए, लेकिन उसकी एक चुप छाप अब भारत की सेहत पर भारी पड़ रही है। ICMR और इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की रिपोर्ट बताती हैं कि 2021 से 2024 के बीच भारत में मधुमेह के मरीजों की संख्या में 6 करोड़ से ज्यादा का इजाफा हुआ है। 2021मे भारत में डायबिटीज के मरीज करीब 7.7 करोड़ थे। 2024 में ये संख्या बढ़कर 8.98 करोड़ पहुंच गई। यानी 1.28 करोड़ का इजाफा सिर्फ 3 साल में। 2026 तक ICMR के मुताबिक देश में अब 10 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं। 13 करोड़ लोग</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181550/6-crore-diabetic-patients-increased-in-3-years-after-covid"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas13.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>राजीव शुक्ल </strong></p>
<p style="text-align:justify;">कोविड-19 खत्म हुए 3 साल हो गए, लेकिन उसकी एक चुप छाप अब भारत की सेहत पर भारी पड़ रही है। ICMR और इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की रिपोर्ट बताती हैं कि 2021 से 2024 के बीच भारत में मधुमेह के मरीजों की संख्या में 6 करोड़ से ज्यादा का इजाफा हुआ है। 2021मे भारत में डायबिटीज के मरीज करीब 7.7 करोड़ थे। 2024 में ये संख्या बढ़कर 8.98 करोड़ पहुंच गई। यानी 1.28 करोड़ का इजाफा सिर्फ 3 साल में। 2026 तक ICMR के मुताबिक देश में अब 10 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं। 13 करोड़ लोग ऐसी स्थिति में हैं जहां अगर लाइफस्टाइल न बदली तो अगले 5-10 साल में वो डायबिटीज के मरीज बन जाएंगे। IDF की 'डायबिटीज एटलस 2025' कहती है कि भारत में 2050 तक ये संख्या 15.67 करोड़ तक पहुंच सकती है। कोविड का क्या रोल रहा? डॉक्टरों का मानना है कि महामारी ने डायबिटीज की रफ्तार को 5 साल आगे बढ़ा दिया। लाइफस्टाइल ठप- लॉकडाउन में शारीरिक गतिविधि कम हुई, स्क्रीन टाइम और बैठे रहने का समय बढ़ा। मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन की डॉ. अंजना कहती हैं कि कोविड के बाद फिजिकल इनएक्टिविटी डायबिटीज का बड़ा रिस्क फैक्टर बन गई। स्ट्रेस और अनियमित नींद काम का दबाव, अनिश्चितता और नींद का पैटर्न बिगड़ने से इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ा।<br />डाइट में बदलाव- घर पर बैठे-बैठे प्रोसेस्ड फूड, मीठे पेय और फास्ट फूड की खपत बढ़ी। पोस्ट-कोविड इफेक्ट-  कई स्टडी में दिखा कि कोविड से उबरने वाले लोगों में पहले साल में डायबिटीज का खतरा 40% तक बढ़ गया। वायरस अग्न्याशय पर असर डाल सकता है। कौन सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है? शहर या गांव -  रांची, जमशेदपुर, धनबाद जैसे शहरों में 13-14% लोग डायबिटीज से ग्रसित हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में ये 3-5% है। युवा और बच्चे-  अब ये बीमारी सिर्फ 45+ की नहीं रही। दिल्ली में 14 साल से कम उम्र के बच्चों में भी मौतें दर्ज हुई हैं।<br />           आदिवासी इलाके-  झारखंड जैसे राज्यों में आदिवासी समुदाय में भी डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है। इसकी वजह प्रोसेस्ड फूड, मोबाइल-स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल और बदलती जीवनशैली है। <br />मौतें भी बढ़ीं- दिल्ली सरकार के MCCD डेटा के मुताबिक 2024 में डायबिटीज से 2,459 लोगों की मौत हुई, जबकि 2023 में ये 1,823 थी। अस्पतालों में डायबिटीज से मौतें 544 बढ़ीं। राष्ट्रीय स्तर पर 2024 में हर 9 सेकंड में एक मौत डायबिटीज की वजह से हुई। क्यों नहीं रुक रहा ये सिलसिला?<br />डॉक्टर 4 वजहें बताते हैं-  पश्चिमी डाइट तले-भुने, बेकरी प्रोडक्ट, मीठे ड्रिंक्स और परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट का बढ़ता चलन। मोटापा देश में 60 करोड़ लोग ओवरवेट या ओबेस हैं। मोटापा टाइप-2 डायबिटीज का सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर है।<br />जागरूकता की कमी- ज्यादातर लोग तब जांच कराते हैं जब बीमारी बढ़ चुकी होती है। अनियंत्रित दवाएं-  दवाएं बिना डॉक्टर की सलाह के ली जा रही हैं, जिससे किडनी और पैंक्रियाज को नुकसान पहुंच रहा है। आगे का रास्ता-  स्क्रीनिंग बढ़ाओ-  30 साल से ऊपर हर व्यक्ति को साल में एक बार शुगर टेस्ट कराना चाहिए। लाइफस्टाइल रिवर्स करो- रोज 30 मिनट चलना, शुगर-प्रोसेस्ड फूड कम करना, नींद 7-8 घंटे। स्कूल लेवल पर बदलाव-  बच्चों में फास्ट फूड और कोल्ड ड्रिंक पर रोक जरूरी है। सरकारी स्तर पर- NCD स्क्रीनिंग प्रोग्राम को ग्रामीण इलाकों तक ले जाना होगा। कोविड ने सिर्फ फेफड़े ही नहीं, मेटाबॉलिज्म भी खराब किया। 6 करोड़ नए मरीजों का मतलब है कि हर 2 सेकंड में एक भारतीय डायबिटीज की चपेट में आ रहा है। अगर अभी कदम नहीं उठाए गए तो 2050 तक भारत में हर 7वां व्यक्ति डायबिटिक होगा। ये सिर्फ स्वास्थ्य का नहीं, देश की अर्थव्यवस्था का भी संकट है, क्योंकि डायबिटीज दिल, किडनी और आंखों की बीमारियों का सीधा रास्ता है।  वैज्ञानिक तौर पर भले ही पुष्टि नहीं हुई हो, मगर कोविड काल के बाद लोगों में बीमारियां बढ़ने का रुझान देखा गया है। मधुमेह को लेकर कोविड काल के बाद आए राष्ट्रीय परिवार<br />कल्याण सर्वेक्षण -6 के आंकड़े भी इसकी पुष्टि कर रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 14:16:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुबह उठते ही प्रभु दर्शन से पहले मोबाइल दर्शन — स्वास्थ्य के लिए घातक</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज के दौर में यदि पूछा जाए कि मनुष्य के लिए सबसे कीमती वस्तु कौन सी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अधिकांश लोगों का उत्तर होगा मोबाइल। आधुनिक युग में मोबाइल मानव की सबसे प्रिय वस्तु बन चुका है। इसकी लत ऐसी है कि एक बार लग जाए तो उससे मुक्त होना अत्यंत कठिन हो जाता है। आज स्थिति यह है कि मनुष्य कुछ समय तक बिना भोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना आराम और कई बार अपने परिजनों से बातचीत किए बिना भी रह सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मोबाइल के बिना रहना उसके लिए लगभग असंभव होता जा रहा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मोबाइल आज मनुष्य के</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180757/mobile-darshan-before-seeing-god-as-soon-as-you-wake"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज के दौर में यदि पूछा जाए कि मनुष्य के लिए सबसे कीमती वस्तु कौन सी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अधिकांश लोगों का उत्तर होगा मोबाइल। आधुनिक युग में मोबाइल मानव की सबसे प्रिय वस्तु बन चुका है। इसकी लत ऐसी है कि एक बार लग जाए तो उससे मुक्त होना अत्यंत कठिन हो जाता है। आज स्थिति यह है कि मनुष्य कुछ समय तक बिना भोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना आराम और कई बार अपने परिजनों से बातचीत किए बिना भी रह सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मोबाइल के बिना रहना उसके लिए लगभग असंभव होता जा रहा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मोबाइल आज मनुष्य के हाथों से एक पल के लिए भी नहीं छूटता। यदि किसी मजबूरी में उसे अलग रखना भी पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह उसकी निगाहों की सीमा में ही रहता है। सुबह नींद खुलते ही घर में भगवान के दर्शन से पहले मोबाइल के दर्शन करना नई पीढ़ी की एक आदत ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक नई परंपरा बनती जा रही है। मोबाइल देखने में मनुष्य इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे अपने आसपास की दुनिया का भी ध्यान नहीं रहता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान समय का मानव अपने माता-पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाई-बहन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पति-पत्नी या यहां तक कि अपने बच्चों से भी उतना लगाव नहीं दिखाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना अपने मोबाइल से दिखाने लगा है। मोबाइल के प्रति यह अंधा मोह इस हद तक बढ़ गया है कि अनेक लोगों ने ईश्वर की अदृश्य शक्ति की अपेक्षा मोबाइल की रंगीन स्क्रीन को ही अपना आधुनिक देवता बना लिया है। तभी तो मोबाइल में डूबे व्यक्ति को न भूख का एहसास होता है</span>, </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">न प्यास का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न शारीरिक थकान का और न ही किसी सामाजिक उत्तरदायित्व का।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मोबाइल आज मनुष्य का महबूब बन चुका है। उसे बड़े नाज़ों से हाथों में रखा जाता है। स्थिति यह है कि जब कोई व्यक्ति मोबाइल में व्यस्त होता है और कोई उसके इस एकांत में व्यवधान डाल दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अपने ही परिवार के सदस्य उसे खलनायक प्रतीत होने लगते हैं। इसके बाद घरों में तकरार और विवाद का एक नया अध्याय शुरू हो जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह कटु सत्य है कि मनुष्य ने मोबाइल को अपनी आवश्यकता से बढ़ाकर अपनी मजबूरी बना लिया है। उसका अधिकांश समय मोबाइल की स्क्रीन पर बीत रहा है। परिणामस्वरूप वास्तविक जीवन के रिश्ते कमजोर होते जा रहे हैं और काल्पनिक दुनिया का आकर्षण बढ़ता जा रहा है। मोबाइल के माध्यम से मिलने वाले लाइक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमेंट और फॉलोअर्स आज कई लोगों के लिए सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक व्यक्ति इस भ्रम से बाहर निकलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक वह मानसिक तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकेलापन और अवसाद का शिकार हो चुका होता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मोबाइल की अति ने घर-परिवार और सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित किया है। सोशल मीडिया पर बढ़ती निर्भरता ने लोगों के मन में संदेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रम और अविश्वास को जन्म दिया है। जब यही संदेह विकराल रूप धारण कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब प्रेम और विश्वास पर आधारित रिश्ते पल भर में बिखर जाते हैं। उस समय वही मोबाइल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कभी सबसे प्रिय था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की सबसे बड़ी परेशानी का कारण बन जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मोबाइल की अत्यधिक लत का प्रभाव केवल मानसिक स्वास्थ्य पर ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। रातों की नींद छीन रखी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आंखों की रोशनी प्रभावित हो रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव बढ़ रहा है और पारिवारिक संवाद समाप्त होते जा रहे हैं। मनुष्य आभासी दुनिया में जितना अधिक डूब रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतना ही वास्तविक जीवन से दूर होता जा रहा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निस्संदेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोबाइल आधुनिक जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आवश्यकता और लत के बीच की सीमा को समझना भी उतना ही आवश्यक है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक का उपयोग जीवन को सरल बनाने के लिए होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन पर शासन करने के लिए नहीं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="font-family:'Times New Roman', serif;"> </span></span><span lang="hi" xml:lang="hi">अतः आधुनिक और शिक्षित पीढ़ी से केवल इतना ही निवेदन है कि यदि स्वस्थ मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ तन और सुखी पारिवारिक जीवन चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दिन की शुरुआत मोबाइल दर्शन से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभु दर्शन से करें। कुछ समय अपने परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति और स्वयं के लिए भी निकालें। तभी तकनीक और जीवन के बीच संतुलन स्थापित हो सकेगा तथा मनुष्य वास्तविक सुख और शांति का अनुभव कर सकेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 18:57:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>रील की लत से बीमार होता युवा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सोशल मीडिया पर रील का बुखार दिन रात बढ़ता जा रहा है ऐसे में वो युवा वर्ग जिसने रील को ही अपना कैरियर मान लिया है बीमार होता जा रहा, 15  सेकंड की रील के कारण अनगिनत बीमारी का शिकार होता जा रहा है। इस पर शीघ्र ही प्रभावी कदम उठाने होंगे नहीं तो स्थिति आगे चलकर बहुत बिगड़ सकती है। पहले हम खाना खाते वक्त बात करते थे। अब खाना ठंडा हो जाता है, लेकिन रील नहीं रुकती।</p>
<p style="text-align:justify;">15 सेकंड की वीडियो ने युवा दिमाग को ऐसे पकड़ा है कि घंटों निकल जाते हैं और पता भी नहीं चलता।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180711/youth-falling-ill-due-to-reel-addiction"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/768-512-17724759-thumbnail-4x3-palamu.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सोशल मीडिया पर रील का बुखार दिन रात बढ़ता जा रहा है ऐसे में वो युवा वर्ग जिसने रील को ही अपना कैरियर मान लिया है बीमार होता जा रहा, 15  सेकंड की रील के कारण अनगिनत बीमारी का शिकार होता जा रहा है। इस पर शीघ्र ही प्रभावी कदम उठाने होंगे नहीं तो स्थिति आगे चलकर बहुत बिगड़ सकती है। पहले हम खाना खाते वक्त बात करते थे। अब खाना ठंडा हो जाता है, लेकिन रील नहीं रुकती।</p>
<p style="text-align:justify;">15 सेकंड की वीडियो ने युवा दिमाग को ऐसे पकड़ा है कि घंटों निकल जाते हैं और पता भी नहीं चलता। रील्स डोपामिन का शॉर्टकट हैं। हर नई वीडियो पर दिमाग को छोटा सा "रिवॉर्ड" मिलता है। असल जिंदगी की मेहनत वाले काम - पढ़ाई, प्रोजेक्ट, रिश्ते - में रिजल्ट देर से मिलता है। दिमाग आसान वाला रास्ता चुन लेता है। ध्यान का बिखराव- 2 मिनट से ज्यादा एक काम पर टिकना मुश्किल लगने लगता है। नींद का बिगड़ना रात 2 बजे तक स्क्रॉल करना और सुबह उठ न पाना आम हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">तुलना का जहर- दूसरों की हाईलाइट रील देखकर अपनी जिंदगी फीकी लगने लगती है। लक्षण जो दिखने लगे हैं- यह सिर्फ "टाइम वेस्ट" नहीं रहा। अब ये मानसिक सेहत पर दिखने लगा है। बिना वजह चिड़चिड़ापन और बेचैनी जब फोन पास न हो- अकेले बैठे रहना, दोस्तों से मिलने का मन न करना - पढ़ाई या काम में रुचि कम होना, प्रोक्रास्टिनेशन बढ़ना, आत्मविश्वास में गिरावट क्योंकि हर कोई "परफेक्ट" लग रहा है। कई युवा खुद कहते हैं - "पता है नुकसान हो रहा है, पर छोड़ नहीं पाता"। यही लत की निशानी है। अगर तुमने एक बार सैड वीडियो देखी, तो अगले 20 वीडियो उसी मूड की होंगी। तुम्हारा कंट्रोल कम, प्लेटफॉर्म का कंट्रोल ज्यादा।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरा कारण है खालीपन। असली उपलब्धि, मेहनत, बातचीत में टाइम लगता है। रील्स तुरंत एंटरटेनमेंट देती हैं। खाली दिमाग सबसे पहले वहीं जाता है। इससे निकलने का रास्ता बहुत ही आसान है लेकिन लोग प्रयास ही नहीं करते। पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं, पर कंट्रोल वापस लेना जरूरी है। स्क्रीन टाइम को देखो- फोन में ही पता चल जाता है कितना वक्त जा रहा है। नंबर देखकर झटका लगता है। रील के लिए टाइम फिक्स करो- दिन में 20 मिनट, बस। बाकी टाइम ऐप लॉक कर दो। रिप्लेसमेंट ढूंढो-  जो खालीपन रील भरती है, उसे किताब, जिम, दोस्ती, कोई स्किल से भरो। खाली मत छोड़ो।</p>
<p style="text-align:justify;">नोटिफिकेशन बंद करो- हर नॉटिफिकेशन दिमाग को खींचता है। हिम्मत करके बंद कर दो। हाथ से फोन दूर रखो सोने से 1 घंटा पहले और उठने के 1 घंटे बाद फोन मत छुओ। इसके लिए अपने आप से ही सवाल करना होगा। रील देखकर तुम्हें क्या मिल रहा है? 1 घंटे बाद कैसा महसूस होता है - रिलैक्स या खालीपन। अगर जवाब "खालीपन" है, तो समझो ये एंटरटेनमेंट नहीं, एस्केप है। दिमाग एक मसल है। अगर तुम उसे सिर्फ 15 सेकंड के शॉट्स खिलाओगे, तो वो लंबी रेस नहीं दौड़ेगा। कॉलेज, करियर, रिश्ते - सब लंबी रेस हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">रील बुरा नहीं है। बुरा है जब रील तुम्हारी जिंदगी चला रही हो। कंट्रोल वापस लो, वरना 5 साल बाद पछतावा ज्यादा और समय कम बचेगा। तुम्हारे हिसाब से रील्स पर सबसे ज्यादा टाइम कहां चला जाता है - एंटरटेनमेंट, इंफो, या बस स्क्रॉल करने की आदत में। आज के दौर में सोशलमीडिया पर मानसिक स्वास्थ्यक्षको लेकर चर्चा शुरू हो चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">मनोवैज्ञानिक बातों को रील के जरिये 30 सेकंड के वायरल कंटेंट में बदल दिया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका नतीजा यह हो रहा है कि युवा पीढ़ी थेरेपी स्पीक में घिरती चली जा रही है, लेकिन असली खतरनाक है 30 सेकंड की रील थेरेपी विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया पर 30 सेकंड की रील देखने या इंस्टाग्राम पोस्ट को कोट करने से किसी व्यक्ति की मानसिक परेशानी या अंदर की भावनात्मक उलझन ठीक नहीं हो जाती।</p>
<p style="text-align:justify;">रील ने गंभीर मनोवैज्ञानिक बातों को एक बिकने वाली चीज बना दिया है। भावनात्मक समझ के मामले में वे कमजोर होते जा रहे हैं। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन ने 1,055 जेन-जी पर एक सर्वे किया गया। इसमें हर चार में से एक युवा ने माना कि एक महीने में उनके अच्छे दिनों के मुकाबले बुरे दिन ज्यादा होते। हैं। काम करने वाले लगभग 40 फीसदी युवा यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें हर हफ्ते कई बार गंभीर चिंता या डिप्रेशन के लक्षण महसूस होते हैं। पिछली पीढ़ियों के मुकाबले आज के युवाओं में तनाव या अवसाद की बात खुलकर स्वीकार करने और मदद मांगने की। संभावना सबसे ज्यादा देखी गई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 20:01:09 +0530</pubDate>
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