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                <title>प्रवासी भारतीय - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>प्रवासी भारतीय RSS Feed</description>
                
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                <title>विविधता से एकात्मता की ओर</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश</strong></div>
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<div style="text-align:justify;">आज विश्व के तमाम देश धार्मिक पहचान, नस्ली अस्मिता, अतिराष्ट्रवाद, युद्ध, सांस्कृतिक टकराव, धार्मिक असहिष्णुता, सामाजिक ध्रुवीकरण और बढ़ती वैचारिक दूरियों जैसी अनेक चुनौतियों से गुजर रहे है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।विज्ञान, परिवहन और संचार प्रौद्योगिकी ने भौगोलिक दूरियां कम जरूर की हैं, लेकिन अनेक मामलों में मनुष्यों के बीच वैचारिक और भावनात्मक दूरियां बढ़ी हैं। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में दिया गया संबोधन विशेष आकर्षण बना हुआ है। </div>
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<div style="text-align:justify;">डॉ. भागवत के संबोधन का</div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186883/the-message-of-one-world-one-humanity-from-diversity-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/img-20241207-wa00031.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज विश्व के तमाम देश धार्मिक पहचान, नस्ली अस्मिता, अतिराष्ट्रवाद, युद्ध, सांस्कृतिक टकराव, धार्मिक असहिष्णुता, सामाजिक ध्रुवीकरण और बढ़ती वैचारिक दूरियों जैसी अनेक चुनौतियों से गुजर रहे है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।विज्ञान, परिवहन और संचार प्रौद्योगिकी ने भौगोलिक दूरियां कम जरूर की हैं, लेकिन अनेक मामलों में मनुष्यों के बीच वैचारिक और भावनात्मक दूरियां बढ़ी हैं। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में दिया गया संबोधन विशेष आकर्षण बना हुआ है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. भागवत के संबोधन का केंद्रीय विचार भारत की उस सभ्यतागत दृष्टि से जुड़ा था, जिसमें विविधता को एकता के विरोधी के रूप में नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। उन्होंने कहा कि भारत के लिए ‘विविधता में एकता’ केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि भारतीय समाज के डीएनए में रची-बसी है। उन्होंने अमेरिका में प्रचलित ‘बहुलतावाद’ की अवधारणा की तुलना भारत की ‘विविधता में एकता’ की दृष्टि से करते हुए कहा कि विविधता को समाप्त करने के बजाय उसे स्वीकार, सम्मान और संरक्षित किया जाना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह विचार भारतीय चिंतन की उस परंपरा से भी जुड़ता है, जिसमें सत्य की अनेक अभिव्यक्तियों को स्वीकार करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध वचन ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ और महोपनिषद् का ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इसी व्यापक दृष्टि के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। इन प्राचीन सूत्रों को आधुनिक लोकतंत्र, बहुलतावाद या मानवाधिकारों का सीधा पर्याय मानना उचित नहीं होगा, लेकिन वे भारतीय दार्शनिक परंपरा में सह-अस्तित्व, व्यापकता और मानवीय एकात्मता की गहरी भावना को अवश्य व्यक्त करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय दृष्टि में एकता का अर्थ एकरूपता नहीं है। वास्तविक एकता तभी संभव है, जब अलग-अलग धर्म, भाषा, संस्कृति और जीवन-पद्धति से जुड़े लोग समान मानवीय गरिमा तथा पारस्परिक सम्मान के साथ रह सकें। यही कारण है कि भारतीयता को किसी एक धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान तक सीमित कर देना भारत की बहुस्तरीय ऐतिहासिक और सामाजिक संरचना को अत्यधिक सरल बना देगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">धार्मिक विविधता के प्रश्न पर भी यही कसौटी लागू होती है। भारत की सामाजिक संरचना सदियों से अनेक धर्मों, संप्रदायों, भाषाओं, जातीय समूहों, क्षेत्रों और परंपराओं के सह-अस्तित्व से निर्मित हुई है। इसलिए विविधता का सम्मान केवल सहिष्णुता तक सीमित नहीं होना चाहिए; उसका आधार समान नागरिक गरिमा, कानून के समक्ष समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और पारस्परिक उत्तरदायित्व होना चाहिए।यहां भारतीय संविधान का संदर्भ स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। संविधान की प्रस्तावना न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता को भारतीय गणराज्य के मूल आदर्शों के रूप में स्थापित करती है। अतः विविधता के प्रति सम्मान केवल किसी संगठन या विचारधारा की अपेक्षा नहीं, बल्कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था की भी मूल प्रतिबद्धता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> भारतीय परंपरा में ‘धर्म’ का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि कर्तव्य, आचरण, मर्यादा और उत्तरदायित्व से भी जुड़ा रहा है। इस व्यापक अर्थ को समझना आज सभी धर्मावलंबियों के लिए जरूरी है। न्यूयॉर्क प्रवास के दौरान डॉ. भागवत ने न्यूयॉर्क स्थित इस्कॉन के ऐतिहासिक केंद्र का भी दौरा किया और सेवा-कार्य में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि आज दुनिया अनेक संघर्षों और द्वंद्वों से गुजर रही है और लोगों को जोड़ने वाली चेतना ही शांति का आधार बन सकती है; उन्होंने इसे ‘कृष्ण चेतना’ से जोड़ा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए डॉ. भागवत ने एक महत्वपूर्ण बात कही,जिस देश में भारतीय मूल के लोग रहते हैं, वह उनकी ‘कर्मभूमि’ है और वहां के प्रति उनकी जिम्मेदारी सर्वोपरि है। उन्होंने अमेरिका में रहने वाले भारतीयों से अमेरिकी समाज और देश के प्रति निष्ठापूर्वक अपने दायित्व निभाने का आग्रह किया, साथ ही अपनी ‘जन्मभूमि’ भारत से प्राप्त मूल्यों को बनाए रखने की बात कही। यह संदेश प्रवासी भारतीयों को दो पहचानों के बीच संघर्ष में खड़ा करने के बजाय, अपनी सांस्कृतिक जड़ों को संजोते हुए जिस देश में वे रहते हैं, उसके संविधान ,नियम-कानून के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा देता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. भागवत ने सामाजिक परिवर्तन में राजनीति की सीमाओं और समाज की भूमिका पर भी बल दिया। शिक्षा, संवाद, सेवा और सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन को स्थायी परिवर्तन का आधार माना जा सकता है। सामाजिक समरसता केवल कानून या सत्ता के माध्यम से निर्मित नहीं होती; इसके लिए समाज की मानसिकता, पारस्परिक व्यवहार और सार्वजनिक जीवन में दूसरे के प्रति सम्मान की आवश्यकता होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज जब दुनिया युद्ध, विस्थापन, धार्मिक संघर्ष, आर्थिक असमानता और जलवायु संकट जैसी साझा चुनौतियों का सामना कर रही है, तब ‘एक विश्व, एक मानवता’ का विचार निश्चित रूप से प्रासंगिक है। लेकिन किसी भी वैश्विक आदर्श की सार्थकता उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार में उतरने से सिद्ध होती है। परिवार, शिक्षा मंदिर, कार्यस्थल और सार्वजनिक जीवन में दूसरे व्यक्ति की पहचान, आस्था, विचार और गरिमा का सम्मान ही इस विचार की वास्तविक परीक्षा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत यदि अपनी सभ्यतागत परंपरा के आधार पर विश्व को कोई संदेश देना चाहता है, तो वह यह हो सकता है कि विविधता को मिटाकर स्थायी एकता स्थापित नहीं की जा सकती। स्थायी एकता का आधार सम्मान, संवाद, सह-अस्तित्व और साझा मानवीय गरिमा है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ भी तभी सार्थक होगा, जब वह केवल संस्कृत का एक सुंदर वाक्य या समारोहों में उद्धृत किया जाने वाला श्लोक न रहकर सामाजिक आचरण का सिद्धांत बने।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अतः विविधताओं को समाप्त किए बिना एकता, मतभेदों को मिटाए बिना संवाद और पहचान को नकारे बिना मानवता  उस व्यापक विचार की कसौटी है जिसे आज ‘एक विश्व, एक मानवता’ के रूप में अभिव्यक्त किया जा सकता है। डॉ. मोहन भागवत का न्यूयॉर्क संबोधन इसी दृष्टि से विचार और विमर्श का विषय बनता है। इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि एकता और मानव-एकात्मता का यह संदेश भाषणों से निकलकर समाज के दैनिक व्यवहार में कब और कितना उतरता है।</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 20:46:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पश्चिम एशिया में युद्ध के प्रभाव से निबटना भारतीयों की चुनौती </title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181931/challenge-of-indians-to-deal-with-the-impact-of-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hq720-(1).jpg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव इस क्षेत्र को एक बड़े युद्ध की कगार पर ले आया है। भारत के लिए यह सिर्फ एक भौगोलिक दूरी की खबर नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, 90 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीयों की रोज़ी-रोटी और खाड़ी देशों से व्यापार का सीधा जुड़ाव रखता है। ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ रहा है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% आयात करता है। इसमें से 50% से ज्यादा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है - सऊदी अरब, UAE, इराक, ईरान और कुवैत मुख्य आपूर्तिकर्ता हैं। जब भी होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें उछलती हैं। 2024-2025 में इज़राइल-ईरान मिसाइल हमलों के दौरान ब्रेंट क्रूड $90 पार कर गया था। भारत के लिए इसका मतलब है महंगा पेट्रोल-डीजल, बढ़ती महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव। एयर इंडिया, इंडिगो जैसी एयरलाइनों का खर्च बढ़ता है, जिसका असर हवाई किराए पर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />             इस अशांति से 90 लाख भारतीयों का भविष्य दांव पर लग गया है। सरकार बहुत कुछ सोच रही है लेकिन स्थिति उसके नियंत्रण से बाहर है।यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान में 90 लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं। ये हर साल 35-40 बिलियन डॉलर की रेमिटेंस भारत भेजते हैं। युद्ध बढ़ने पर दो तरह का खतरा है। पहला, अगर खाड़ी देश युद्ध में खिंचे तो वहां नौकरियां घटेंगी और भारतीयों की वापसी शुरू होगी। 1990 में खाड़ी युद्ध के समय 1.5 लाख भारतीयों को एयरलिफ्ट करना पड़ा था।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरा, अगर ईरान-इज़राइल संघर्ष बढ़ा तो ईरान में 4000 और इज़राइल में 18,000 भारतीयों की सुरक्षा बड़ी चुनौती बनेगी। भारत ने ऑपरेशन अजय और ऑपरेशन अजेय के जरिए पहले भी नागरिकों को निकाला है, लेकिन बड़े पैमाने पर निकासी लॉजिस्टिक रूप से जटिल है। युद्ध के कारण व्यापार और निवेश की रफ्तार धीमी पड़ रही है। यूएई और सऊदी अरब भारत के टॉप 5 व्यापारिक साझेदार हैं। I2U2 और IMEC कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं पश्चिम एशिया को भारत से जोड़ने के लिए बनी थीं। लेकिन युद्ध के माहौल में निवेश रुक जाता है। लाल सागर में हूती हमलों के बाद शिपिंग बीमा महंगा हुआ और भारत-यूरोप व्यापार पर असर पड़ा। अगर सूएज नहर या होर्मुज बंद हुआ तो भारत का 80% विदेशी व्यापार प्रभावित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />भारत की पश्चिम एशिया नीति हमेशा "संतुलन" पर टिकी रही है। भारत इज़राइल से रक्षा और तकनीक लेता है, अरब देशों से तेल और निवेश, और ईरान से चाबहार पोर्ट के जरिए मध्य एशिया तक पहुंच चाहता है। वर्तमान युद्ध ने इस संतुलन को कठिन बना दिया है। एक तरफ चुनना पड़ा तो भारत के आर्थिक हित प्रभावित होंगे। इसलिए भारत ने यूएन में शांति की अपील की है, लेकिन सीधे किसी पक्ष का खुलकर समर्थन नहीं किया। ये तटस्थता कूटनीतिक तौर पर जरूरी है, लेकिन घरेलू राजनीति में इसकी आलोचना भी होती है। इस युद्ध का असर घरेलू राजनीति और सामाजिक स्तर पर भी पड़ रहा है। पश्चिम एशिया का युद्ध भारत में धार्मिक और राजनीतिक बहस को भी प्रभावित करता है। फिलिस्तीन और इज़राइल पर भारत के रुख को लेकर सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक ध्रुवीकरण दिखता है। इसके अलावा, अगर तेल 120 डॉलर पार गया तो भारत सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ेगी या महंगाई झेलनी पड़ेगी। दोनों ही स्थिति में आम आदमी की जेब पर असर पड़ता है। भारत सरकार इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है कि भारत के पास क्या विकल्प हैं? रणनीतिक तेल भंडार : भारत ने पहले ही 5.33 मिलियन टन का भंडार बना रखा है, जो 9-10 दिन चल सकता है। इसे बढ़ाने की जरूरत है। वैकल्पिक स्रोत : रूस, अमेरिका और अफ्रीका से तेल आयात बढ़ाकर पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करना। निकासी योजना: खाड़ी देशों में भारतीय दूतावासों को हाई अलर्ट पर रखना और नौसेना की तत्परता बढ़ाना।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />कूटनीतिक सक्रियता: भारत G20 और BRICS के मंच पर युद्ध रोकने के लिए आवाज उठा सकता है। पश्चिम एशिया में युद्ध भारत के लिए दूर का युद्ध नहीं है। ये हमारे रसोई गैस के दाम, खाड़ी में काम करने वाले भाई-बहन की नौकरी और रुपये की कीमत से जुड़ा है। भारत की ताकत ये है कि वो अब भी अरब देशों, इज़राइल और ईरान तीनों से बात कर सकता है। लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इस संतुलन को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। आम भारतीय के लिए इसका मतलब है अगले 6-12 महीने महंगाई और अनिश्चितता के साथ जीना।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:36:47 +0530</pubDate>
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                <title>आ अब लौट चलें</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">कभी भारत से विदेश जाना सफलता का पर्याय माना जाता था। इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ अपने सपनों को साकार करने के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप की ओर निकल पड़ते थे। बेहतर वेतन, आधुनिक जीवनशैली, अनुसंधान के अवसर और सामाजिक सुरक्षा ने लाखों भारतीय युवाओं को आकर्षित किया। लेकिन आज विश्व की बदलती परिस्थितियां एक नया प्रश्न खड़ा कर रही हैं,क्या अब वह समय आ गया है जब विदेशों में बसे भारतीय पेशेवर "आ अब लौट चलें की व्यथा तथा कथा की पीड़ा से पीड़ित है? वैश्विक युद्ध के चलते अब भारतीय प्रवासी पैसे वालों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180373/come-lets-go-back-now"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20250331-wa016315.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कभी भारत से विदेश जाना सफलता का पर्याय माना जाता था। इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ अपने सपनों को साकार करने के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप की ओर निकल पड़ते थे। बेहतर वेतन, आधुनिक जीवनशैली, अनुसंधान के अवसर और सामाजिक सुरक्षा ने लाखों भारतीय युवाओं को आकर्षित किया। लेकिन आज विश्व की बदलती परिस्थितियां एक नया प्रश्न खड़ा कर रही हैं,क्या अब वह समय आ गया है जब विदेशों में बसे भारतीय पेशेवर "आ अब लौट चलें की व्यथा तथा कथा की पीड़ा से पीड़ित है? वैश्विक युद्ध के चलते अब भारतीय प्रवासी पैसे वालों की जान को खतरा मंडराने लगा और विदेशी शासको के पराई पान के व्यवहार से परेशान होकर वापस घर लौटने की मानसिकता बन चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व पिछले कुछ वर्षों से युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, बढ़ती महंगाई, सांस्कृतिक तनाव और कठोर होती आव्रजन नीतियों के दौर से गुजर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व में बढ़ते संघर्ष, अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा तथा पश्चिमी देशों में बढ़ती राष्ट्रवादी राजनीति ने विदेशी नागरिकों के भविष्य को अनिश्चित बना दिया है। विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों के सामने वीजा, स्थायी निवास और रोजगार सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। अनेक देशों में स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता देने की मांग तेज हुई है, जिसके कारण प्रवासी समुदाय स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगा है। हाल के वर्षों में अमेरिका की एच-1बी वीजा नीतियों में बदलाव और बढ़ती अनिश्चितताओं ने हजारों भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों को भविष्य के प्रति चिंतित किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय मूल के लाखों पेशेवर विदेशों में रहते हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार विश्वभर में लगभग 3.5 करोड़ भारतीय मूल के लोग निवास करते हैं, जो दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय माना जाता है।  इनमें बड़ी संख्या डॉक्टरों, इंजीनियरों, आईटी विशेषज्ञों, वित्तीय सलाहकारों और शोधकर्ताओं की है। केवल भारतीय छात्रों की बात करें तो वर्ष 2024 तक 13 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में अध्ययन कर रहे थे। विदेशों में रहने वाले भारतीयों की चमकदार तस्वीर अक्सर दिखाई जाती है, किंतु उसके पीछे छिपी मानसिक और सामाजिक पीड़ा कम चर्चा में आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्थिक सफलता के बावजूद सांस्कृतिक अकेलापन, परिवार से दूरी, बुजुर्ग माता-पिता की चिंता, बच्चों की पहचान का संकट तथा नस्लीय भेदभाव के अनुभव अनेक प्रवासी भारतीयों को भीतर से विचलित करते हैं। पश्चिमी देशों में जीवन की बढ़ती लागत ने भी स्थिति कठिन बना दी है। ऊंचे किराए, महंगी स्वास्थ्य सेवाएं, बच्चों की शिक्षा का खर्च और नौकरी की असुरक्षा ने उस आकर्षण को कमजोर किया है जो कभी विदेशों को अवसरों की स्वर्णभूमि बनाता था। अनेक भारतीय पेशेवर स्वीकार करते हैं कि आर्थिक समृद्धि के बावजूद भावनात्मक संतोष की कमी उन्हें लगातार परेशान करती रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने भी इस विषय पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने भारतीय प्रवासी समुदाय को "ब्रेन ड्रेन" नहीं बल्कि "ब्रेन बैंक" बताया है। उनका मानना है कि प्रतिभाएं जहां अवसर मिलते हैं वहां जाती हैं, किंतु वे अनुभव, पूंजी, तकनीक और वैश्विक दृष्टि के रूप में अपने देश को भी समृद्ध करती हैं।  यह विचार आज और अधिक प्रासंगिक है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर अब विदेशों से लौटकर भारत में स्टार्टअप, अनुसंधान और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में भी परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप संस्कृति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, अंतरिक्ष अनुसंधान और वैश्विक क्षमता केंद्रों के विस्तार ने रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत अब केवल प्रतिभा निर्यातक देश नहीं रह गया है, बल्कि प्रतिभाओं को आकर्षित करने वाला देश भी बनने लगा है। कई भर्ती एजेंसियों ने बताया है कि विदेशों में कार्यरत अनुभवी भारतीय पेशेवरों की वापसी की प्रवृत्ति पिछले वर्षों की तुलना में बढ़ी है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह भी सच है कि भारत को अभी बहुत कार्य करना बाकी है। अनुसंधान एवं विकास पर खर्च, शहरी अवसंरचना, प्रशासनिक पारदर्शिता, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक भारत वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार के लिए विश्वस्तरीय वातावरण नहीं बनाएगा, तब तक प्रतिभा पलायन पूरी तरह नहीं रुकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">परिस्थितियों का संकेत स्पष्ट है कि दुनिया का भू-राजनीतिक वातावरण तेजी से बदल रहा है। विदेशी धरती पर बसे भारतीय पेशेवर अब केवल अधिक वेतन नहीं, बल्कि जीवन की स्थिरता, सामाजिक अपनत्व और भावनात्मक सुरक्षा को भी महत्व देने लगे हैं। वे महसूस कर रहे हैं कि अपने देश में संघर्ष करना पराए देश में असुरक्षा के साथ जीने से कहीं अधिक संतोषजनक हो सकता है। माता-पिता की वृद्ध आंखें, अपनी भाषा की मिठास, अपने त्योहारों की खुशबू और अपनी मिट्टी का अपनापन किसी भी मुद्रा में नहीं खरीदा जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भारत उन लाखों प्रतिभाशाली प्रवासी भारतीयों को पुकार रहा है जिन्होंने अपनी मेहनत से विश्व के बड़े संस्थानों को ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। यदि वही ज्ञान, अनुभव और नवाचार भारत की धरती पर लगे तो विकास की नई इबारत लिखी जा सकती है। यह केवल भावनात्मक आह्वान नहीं बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता भी है। वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में अनेक भारतीय पेशेवरों के मन में एक ही स्वर गूंज रहा है,विदेशों की चमक बहुत देख ली, अब अपने देश की धड़कनों को महसूस करने का समय है। सचमुच, यह समय कह रहा है,"आ अब लौट चलें।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 18:37:59 +0530</pubDate>
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