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                <title>Sanjeev Thakur - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Sanjeev Thakur RSS Feed</description>
                
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                <title>शहरों की बसाहट के पीछे विलुप्त होती मूल ग्रामीण संस्कृती</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ ने कहा है कि अनियोजित शहरीकरण आर्थिक अवसर तो देता है,लेकिन यदि ग्रामीण क्षेत्रों का संतुलित विकास नहीं किया जाए तो सामाजिक असंतुलन और सांस्कृतिक क्षरण अपरिहार्य हो जाता है। भारत में बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधुनिक सुविधाओं की तलाश में लाखों लोग प्रतिवर्ष गाँवों से शहरों की ओर पलायन करते हैं। यह पलायन केवल जनसंख्या का स्थानांतरण नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों का भी परिवर्तन है। </p><p style="text-align:justify;">शहरों की भागदौड़, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावादी जीवनशैली में संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, पारंपरिक रीति-रिवाज कमजोर पड़ रहे हैं और लोककलाएँ धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183432/the-original-rural-culture-is-disappearing-behind-the-settlement-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(1)7.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ ने कहा है कि अनियोजित शहरीकरण आर्थिक अवसर तो देता है,लेकिन यदि ग्रामीण क्षेत्रों का संतुलित विकास नहीं किया जाए तो सामाजिक असंतुलन और सांस्कृतिक क्षरण अपरिहार्य हो जाता है। भारत में बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधुनिक सुविधाओं की तलाश में लाखों लोग प्रतिवर्ष गाँवों से शहरों की ओर पलायन करते हैं। यह पलायन केवल जनसंख्या का स्थानांतरण नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों का भी परिवर्तन है। </p><p style="text-align:justify;">शहरों की भागदौड़, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावादी जीवनशैली में संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, पारंपरिक रीति-रिवाज कमजोर पड़ रहे हैं और लोककलाएँ धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनेक अवसरों पर कहा है, "भारत का विकास तभी संभव है जब गाँवों का विकास होगा।" उनकी 'आत्मनिर्भर भारत', 'डिजिटल इंडिया', 'स्मार्ट विलेज' और 'वाइब्रेंट विलेज' जैसी अवधारणाएँ इसी सोच को आगे बढ़ाती हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों को आधुनिक सुविधाएँ मिलें, लेकिन उनकी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहे।<br /></p><p style="text-align:justify;">पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने अपने "पूरा मॉडल" जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधा उपलब्ध करने की बात कही में स्पष्ट कहा था कि ग्रामीण क्षेत्रों में शहर जैसी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ ताकि लोगों को पलायन के लिए विवश न होना पड़े। उनका विश्वास था कि यदि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीक गाँवों तक पहुँचेगी, तो भारत का संतुलित विकास संभव होगा।<br /></p><p style="text-align:justify;">भारत को सदियों से गाँवों का देश कहा जाता रहा है। गाँव केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, परंपरा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समरसता की जीवंत प्रयोगशाला रहे हैं। कभी गाँवों की चौपालें संवाद का केंद्र थीं, खेत-खलिहान जीवन का आधार थे, लोकगीत और लोकनृत्य संस्कृति की पहचान थे, और आपसी सहयोग जीवन की सबसे बड़ी पूँजी था। किंतु पिछले कुछ दशकों में तीव्र शहरीकरण, औद्योगीकरण और आर्थिक अवसरों की तलाश ने ग्रामीण संस्कृति की जड़ों को कमजोर कर दिया है। </p><p style="text-align:justify;">शहरों का लगातार विस्तार गाँवों की जमीन ही नहीं, उनकी आत्मा को भी अपने भीतर समेटता जा रहा है। महात्मा गांधी ने कहा था, "भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है।" यह कथन आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। यदि गाँव अपनी सांस्कृतिक पहचान खो देंगे, तो भारत की मौलिक पहचान भी धीरे-धीरे धुंधली पड़ जाएगी। प्रख्यात अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का मानना है कि किसी भी राष्ट्र का विकास तभी सार्थक है जब वह आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक विकास को भी समान महत्व दे। केवल शहरों में विकास केंद्रित होने से असमानता बढ़ती है और ग्रामीण समाज अपनी मौलिकता खोने लगता है।<br /></p><p style="text-align:justify;">पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कहा करते थे कि "मजबूत गाँव ही मजबूत भारत की नींव हैं।" यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है क्योंकि केवल महानगरों का विकास किसी राष्ट्र को समृद्ध नहीं बना सकता।ग्रामीण संस्कृति केवल खेती तक सीमित नहीं है। यह लोकभाषाओं, लोकसंगीत, हस्तशिल्प, पारंपरिक कृषि ज्ञान, सामुदायिक जीवन, प्रकृति के प्रति सम्मान और मानवीय संबंधों की संस्कृति है। जब गाँव शहरों में बदलते हैं, तब खेतों की जगह कंक्रीट के जंगल उग आते हैं। तालाब मिट जाते हैं, चौपालें समाप्त हो जाती हैं और बच्चों के खेल मोबाइल स्क्रीन तक सीमित हो जाते हैं। अर्थशास्त्री ई. एफ. शूमाकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "स्माल इस ब्यूटीफुल" में लिखा था कि विकास का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज को अधिक मानवीय बनाना होना चाहिए। यदि विकास मनुष्य को उसकी संस्कृति और प्रकृति से दूर कर दे, तो वह अधूरा विकास है।<br /></p><p style="text-align:justify;">विकास और संस्कृति के बीच संतुलन स्थापित किया जाने की नितांत आवश्यकता है । गाँवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, इंटरनेट, उद्योग, कृषि प्रसंस्करण, कुटीर उद्योग, पर्यटन और रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएँ। साथ ही लोककलाओं, लोकभाषाओं, लोकपर्वों और पारंपरिक ज्ञान को विद्यालयों और सामाजिक जीवन में सम्मानपूर्वक स्थान दिया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020-21 भी भारतीय भाषाओं, स्थानीय ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर विशेष बल देती है। यदि शिक्षा अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करेगी, तो नई पीढ़ी आधुनिक भी बनेगी और अपनी सांस्कृतिक पहचान भी नहीं भूलेगी।<br /></p><p style="text-align:justify;">आज अनेक गाँव शहरों के विस्तार में समाहित होकर अपनी पहचान खो चुके हैं। वहाँ अब खेतों की जगह कॉलोनियाँ हैं, बैलगाड़ियों की जगह वाहनों की भीड़ है, और लोकगीतों की जगह शोरगुल ने ले ली है। आधुनिकता का विरोध नहीं किया जा सकता, लेकिन आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना भी नहीं होना चाहिए। अंततः यह समझना होगा कि शहर किसी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति हो सकते हैं, लेकिन गाँव उसकी सांस्कृतिक चेतना हैं। यदि आर्थिक विकास की दौड़ में ग्रामीण संस्कृति समाप्त हो गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ आधुनिक तो होंगी, किंतु अपनी पहचान से अनभिज्ञ रह जाएँगी।<br /></p><p style="text-align:justify;">इसलिए आवश्यक है कि विकास की प्रत्येक योजना में ग्रामीण संस्कृति के संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। शहरों का विस्तार हो, पर गाँवों की आत्मा सुरक्षित रहे। यही संतुलित विकास भारत को आर्थिक रूप से समृद्ध, सांस्कृतिक रूप से सशक्त और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण राष्ट्र बनाएगा। आखिरकार, जिस देश के गाँव जीवित रहते हैं, वही देश अपनी सभ्यता को लंबे समय तक सुरक्षित रख पाता है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 21:56:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>परमाणु शक्ति संपन्न भारत में कब होगी बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181062/when-will-girls-education-be-100-in-nuclear-power-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/4.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज में ऐसे कर्मचारियों का वर्ग तैयार करना था जो अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक कार्यों को संचालित कर सके। आधुनिक विज्ञान और अंग्रेजी भाषा के प्रसार में इस शिक्षा प्रणाली का योगदान रहा, किंतु इसने भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक शिक्षा और कौशल आधारित शिक्षण को काफी हद तक हाशिए पर पहुंचा दिया। उस समय महिलाओं की शिक्षा लगभग नगण्य थी। समाज में बाल विवाह, पर्दा प्रथा और लैंगिक असमानता जैसी कुरीतियां लड़कियों की शिक्षा में बड़ी बाधा थीं।<br />समाज सुधारकों का योगदान</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">+<br />ऐसे कठिन समय में सावित्रीबाई फुले और महात्मा ज्योतिराव फुले ने बालिका शिक्षा की अलख जगाई। 1848 में उन्होंने लड़कियों के लिए पहला आधुनिक विद्यालय प्रारंभ किया।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने महिला शिक्षा और सामाजिक सुधारों को नई दिशा दी। बाद में महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर तथा स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना।<br />डॉ. अंबेडकर का प्रसिद्ध संदेश</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।"<br />स्वतंत्र भारत में शिक्षा का विकास</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की साक्षरता दर लगभग 18 प्रतिशत थी। महिलाओं की साक्षरता तो 10 प्रतिशत से भी कम थी। संविधान निर्माताओं ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार माना।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />समय-समय पर कोठारी आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968, 1986, सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 तथा नई शिक्षा नीति 2020 जैसे प्रयास किए गए। इन प्रयासों से शिक्षा का दायरा बढ़ा और लड़कियों की विद्यालयों तक पहुंच बेहतर हुई।.आज भारत की साक्षरता दर 77 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुकी है, जबकि महिला साक्षरता दर 70 प्रतिशत से अधिक है। यह प्रगति उत्साहजनक है, किंतु अभी भी पुरुषों और महिलाओं की साक्षरता में अंतर बना हुआ है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व के सर्वाधिक शिक्षित देशों से सीख<br />विश्व में फिनलैंड, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जापान और नॉर्वे जैसे देशों की शिक्षा व्यवस्था विश्व में आदर्श मानी जाती है। फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />फिनलैंड में शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन कौशल विकसित करना है। वहां बच्चों पर अनावश्यक परीक्षा का दबाव नहीं होता। शिक्षकों को अत्यंत सम्मान और स्वायत्तता प्राप्त है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> बालिका और बालक के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता। सिंगापुर ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा साधन बनाया। वहां विज्ञान, गणित, तकनीक और कौशल आधारित शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता है। शिक्षा को उद्योगों और रोजगार से जोड़ा गया है।<br />जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में अनुशासन, नैतिकता, समयबद्धता और तकनीकी दक्षता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। परिणामस्वरूप ये देश सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद आर्थिक महाशक्ति बन गए।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत में प्रतिभा की कोई कमी कभी भी नहीं रही है, किंतु शिक्षा व्यवस्था अभी भी परीक्षा-केंद्रित बनी हुई है। रटंत प्रणाली, विद्यालयों की असमान गुणवत्ता, शिक्षकों की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों का अभाव आज भी चुनौतियां हैं।नई शिक्षा नीति 2020 ने इन समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसमें मातृभाषा आधारित शिक्षा, कौशल विकास, डिजिटल शिक्षण और बहुविषयक अध्ययन पर बल दिया गया है। किंतु इसके वास्तविक लाभ तभी मिलेंगे जब इसका प्रभावी क्रियान्वयन हो। बालिका शिक्षा का सत प्रतिशत होना इसलिए भी आवश्यक है कि शिक्षित बेटी, समृद्ध परिवार</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />एक शिक्षित महिला अपने परिवार को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कार प्रदान करती है। वह अगली पीढ़ी की प्रथम शिक्षिका होती है।सामाजिक कुरीतियों का अंत भी।बाल विवाह, दहेज प्रथा, लैंगिक भेदभाव और घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं को समाप्त करने में शिक्षा सबसे प्रभावी साधन है</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व बैंक सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का मानना है कि महिलाओं की शिक्षा में निवेश किसी भी देश के आर्थिक विकास को तीव्र गति देता है। यदि भारत की प्रत्येक बेटी शिक्षित होगी तो देश की उत्पादकता और आर्थिक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />शिक्षित महिलाएं स्वास्थ्य, पोषण और परिवार नियोजन के प्रति अधिक जागरूक होती हैं। इससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी आती है।<br />आज महिलाएं विज्ञान, अंतरिक्ष, प्रशासन, राजनीति, सेना और उद्यमिता के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। शिक्षा उन्हें नेतृत्व और नवाचार की शक्ति प्रदान करती है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />महापुरुषों की दृष्टि में नारी शिक्षा<br />स्वामी विवेकानंद ने कहा</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"राष्ट्र की प्रगति का सबसे अच्छा मापदंड वहां की महिलाओं की स्थिति है।"डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का मत था कि<br />"महिलाओं का सशक्तिकरण और शिक्षा किसी राष्ट्र के विकास का सबसे प्रभावी माध्यम है।"पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था<br />"एक महिला को शिक्षित करना एक पीढ़ी को शिक्षित करना है।"</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />इक्कीसवीं सदी ज्ञान, विज्ञान और नवाचार की सदी है। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब देश की प्रत्येक बेटी शिक्षित, आत्मनिर्भर और सशक्त बनेगी। शिक्षा केवल विद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं है; यह सामाजिक चेतना, आर्थिक समृद्धि और राष्ट्रीय विकास का आधार है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली से लेकर नई शिक्षा नीति तक भारत ने लंबी यात्रा तय की है, किंतु अभी मंजिल दूर है। यदि सरकार, समाज, परिवार और शैक्षणिक संस्थान मिलकर बालिका शिक्षा को शत-प्रतिशत अनिवार्य बनाने का संकल्प लें, तो भारत न केवल विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति बनेगा, बल्कि सबसे विकसित और ज्ञानवान राष्ट्रों की अग्रिम पंक्ति में भी खड़ा होगा।<br />क्योंकि किसी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों में नहीं, बल्कि उसकी शिक्षित बेटियों की आंखों में स्वप्न बनकर पलता है।<br /><br />संजीव ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिंतक, स्तंभकार, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,<div>कविता,</div><div>संजीव-नी।<br />शिक्षा का कवच।<br /><br />शिक्षा का कवच।<br />कुछ देना ही तो आइये,<br />नन्हीं बालिकाओं को<br />स्वर्ण के गहने नहीं,<br />शिक्षा का कवच दें।<br />उनकी हथेलियों में<br />रोटी के साथ-साथ<br />कुछ अक्षर भी रख दें,<br />जो भूख से जुझतीं<br />उन्हें ज्ञान की कुंजी दें<br />अँधेरे बंद कमरों में<br />रोशन-दान बनती,<br />ज्ञान की रोशनी के लिए<br />बंद रास्तों पर<br />एक नया आकाश फैला देती,<br />उनकी आँखों में<br />सिर्फ़ स्वप्न ना रखें ,<br />उन तक पहुँचने के पंख भी दें।<br />उन्हें ज्ञान दें कि<br />अपने हिस्से की धूप<br />खुद चुन सकें।<br />किताबें जब उनके हांथों में होंगी,<br />तो सदियों के कई बोझ<br />आप उतर जाएँगे।<br />कलम उँगलियों से चलेंगीं<br />तक़दीर की कविता भी<br />लिखी जाएगी।<br />शिक्षित बालिका<br />अपना जीवन ही नहीं संवारती,<br />आने वाली पीढ़ियों के लिए<br />उजला दीप बन जाती।<br />आइये,<br />बेटी को शिक्षा का रक्षा-कवच दें,<br />ताकि वह<br />अपने सपनों, अपने अधिकारों<br />अपने अस्तित्व की रक्षा<br />स्वयं कर सके।<br /><br />संजीव ठाकुर, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,</div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 12:57:59 +0530</pubDate>
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                <title>आ अब लौट चलें</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">कभी भारत से विदेश जाना सफलता का पर्याय माना जाता था। इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ अपने सपनों को साकार करने के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप की ओर निकल पड़ते थे। बेहतर वेतन, आधुनिक जीवनशैली, अनुसंधान के अवसर और सामाजिक सुरक्षा ने लाखों भारतीय युवाओं को आकर्षित किया। लेकिन आज विश्व की बदलती परिस्थितियां एक नया प्रश्न खड़ा कर रही हैं,क्या अब वह समय आ गया है जब विदेशों में बसे भारतीय पेशेवर "आ अब लौट चलें की व्यथा तथा कथा की पीड़ा से पीड़ित है? वैश्विक युद्ध के चलते अब भारतीय प्रवासी पैसे वालों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180373/come-lets-go-back-now"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20250331-wa016315.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कभी भारत से विदेश जाना सफलता का पर्याय माना जाता था। इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ अपने सपनों को साकार करने के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप की ओर निकल पड़ते थे। बेहतर वेतन, आधुनिक जीवनशैली, अनुसंधान के अवसर और सामाजिक सुरक्षा ने लाखों भारतीय युवाओं को आकर्षित किया। लेकिन आज विश्व की बदलती परिस्थितियां एक नया प्रश्न खड़ा कर रही हैं,क्या अब वह समय आ गया है जब विदेशों में बसे भारतीय पेशेवर "आ अब लौट चलें की व्यथा तथा कथा की पीड़ा से पीड़ित है? वैश्विक युद्ध के चलते अब भारतीय प्रवासी पैसे वालों की जान को खतरा मंडराने लगा और विदेशी शासको के पराई पान के व्यवहार से परेशान होकर वापस घर लौटने की मानसिकता बन चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व पिछले कुछ वर्षों से युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, बढ़ती महंगाई, सांस्कृतिक तनाव और कठोर होती आव्रजन नीतियों के दौर से गुजर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व में बढ़ते संघर्ष, अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा तथा पश्चिमी देशों में बढ़ती राष्ट्रवादी राजनीति ने विदेशी नागरिकों के भविष्य को अनिश्चित बना दिया है। विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों के सामने वीजा, स्थायी निवास और रोजगार सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। अनेक देशों में स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता देने की मांग तेज हुई है, जिसके कारण प्रवासी समुदाय स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगा है। हाल के वर्षों में अमेरिका की एच-1बी वीजा नीतियों में बदलाव और बढ़ती अनिश्चितताओं ने हजारों भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों को भविष्य के प्रति चिंतित किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय मूल के लाखों पेशेवर विदेशों में रहते हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार विश्वभर में लगभग 3.5 करोड़ भारतीय मूल के लोग निवास करते हैं, जो दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय माना जाता है।  इनमें बड़ी संख्या डॉक्टरों, इंजीनियरों, आईटी विशेषज्ञों, वित्तीय सलाहकारों और शोधकर्ताओं की है। केवल भारतीय छात्रों की बात करें तो वर्ष 2024 तक 13 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में अध्ययन कर रहे थे। विदेशों में रहने वाले भारतीयों की चमकदार तस्वीर अक्सर दिखाई जाती है, किंतु उसके पीछे छिपी मानसिक और सामाजिक पीड़ा कम चर्चा में आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्थिक सफलता के बावजूद सांस्कृतिक अकेलापन, परिवार से दूरी, बुजुर्ग माता-पिता की चिंता, बच्चों की पहचान का संकट तथा नस्लीय भेदभाव के अनुभव अनेक प्रवासी भारतीयों को भीतर से विचलित करते हैं। पश्चिमी देशों में जीवन की बढ़ती लागत ने भी स्थिति कठिन बना दी है। ऊंचे किराए, महंगी स्वास्थ्य सेवाएं, बच्चों की शिक्षा का खर्च और नौकरी की असुरक्षा ने उस आकर्षण को कमजोर किया है जो कभी विदेशों को अवसरों की स्वर्णभूमि बनाता था। अनेक भारतीय पेशेवर स्वीकार करते हैं कि आर्थिक समृद्धि के बावजूद भावनात्मक संतोष की कमी उन्हें लगातार परेशान करती रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने भी इस विषय पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने भारतीय प्रवासी समुदाय को "ब्रेन ड्रेन" नहीं बल्कि "ब्रेन बैंक" बताया है। उनका मानना है कि प्रतिभाएं जहां अवसर मिलते हैं वहां जाती हैं, किंतु वे अनुभव, पूंजी, तकनीक और वैश्विक दृष्टि के रूप में अपने देश को भी समृद्ध करती हैं।  यह विचार आज और अधिक प्रासंगिक है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर अब विदेशों से लौटकर भारत में स्टार्टअप, अनुसंधान और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में भी परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप संस्कृति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, अंतरिक्ष अनुसंधान और वैश्विक क्षमता केंद्रों के विस्तार ने रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत अब केवल प्रतिभा निर्यातक देश नहीं रह गया है, बल्कि प्रतिभाओं को आकर्षित करने वाला देश भी बनने लगा है। कई भर्ती एजेंसियों ने बताया है कि विदेशों में कार्यरत अनुभवी भारतीय पेशेवरों की वापसी की प्रवृत्ति पिछले वर्षों की तुलना में बढ़ी है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह भी सच है कि भारत को अभी बहुत कार्य करना बाकी है। अनुसंधान एवं विकास पर खर्च, शहरी अवसंरचना, प्रशासनिक पारदर्शिता, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक भारत वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार के लिए विश्वस्तरीय वातावरण नहीं बनाएगा, तब तक प्रतिभा पलायन पूरी तरह नहीं रुकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">परिस्थितियों का संकेत स्पष्ट है कि दुनिया का भू-राजनीतिक वातावरण तेजी से बदल रहा है। विदेशी धरती पर बसे भारतीय पेशेवर अब केवल अधिक वेतन नहीं, बल्कि जीवन की स्थिरता, सामाजिक अपनत्व और भावनात्मक सुरक्षा को भी महत्व देने लगे हैं। वे महसूस कर रहे हैं कि अपने देश में संघर्ष करना पराए देश में असुरक्षा के साथ जीने से कहीं अधिक संतोषजनक हो सकता है। माता-पिता की वृद्ध आंखें, अपनी भाषा की मिठास, अपने त्योहारों की खुशबू और अपनी मिट्टी का अपनापन किसी भी मुद्रा में नहीं खरीदा जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भारत उन लाखों प्रतिभाशाली प्रवासी भारतीयों को पुकार रहा है जिन्होंने अपनी मेहनत से विश्व के बड़े संस्थानों को ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। यदि वही ज्ञान, अनुभव और नवाचार भारत की धरती पर लगे तो विकास की नई इबारत लिखी जा सकती है। यह केवल भावनात्मक आह्वान नहीं बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता भी है। वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में अनेक भारतीय पेशेवरों के मन में एक ही स्वर गूंज रहा है,विदेशों की चमक बहुत देख ली, अब अपने देश की धड़कनों को महसूस करने का समय है। सचमुच, यह समय कह रहा है,"आ अब लौट चलें।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 18:37:59 +0530</pubDate>
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