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                <title>India Growth Story - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>युद्ध और टैरिफ के तूफान में भी भारत की अर्थव्यवस्था का बजा डंका</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">दुनिया इस समय आर्थिक और सामरिक अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पैदा हुई वैश्विक परिस्थितियों ने पहले ही ऊर्जा और आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रखा था। इसके बाद अमेरिका-ईरान तनाव और युद्ध ने वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ा दी। होर्मुज क्षेत्र में पैदा हुए संकट का असर तेल और समुद्री व्यापार पर पड़ा। भारत के आयात-निर्यात पर भी इसका दबाव महसूस किया गया। दूसरी ओर अमेरिका की ओर से भारत पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी और व्यापारिक दबाव ने परिस्थितियों को और चुनौतीपूर्ण बना दिया। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने जिस मजबूती</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186989/indias-economy-continues-to-thrive-even-in-the-storm-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-09/1002217491.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">दुनिया इस समय आर्थिक और सामरिक अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पैदा हुई वैश्विक परिस्थितियों ने पहले ही ऊर्जा और आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रखा था। इसके बाद अमेरिका-ईरान तनाव और युद्ध ने वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ा दी। होर्मुज क्षेत्र में पैदा हुए संकट का असर तेल और समुद्री व्यापार पर पड़ा। भारत के आयात-निर्यात पर भी इसका दबाव महसूस किया गया। दूसरी ओर अमेरिका की ओर से भारत पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी और व्यापारिक दबाव ने परिस्थितियों को और चुनौतीपूर्ण बना दिया। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने जिस मजबूती का प्रदर्शन किया है, वह केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं बल्कि देश की आर्थिक क्षमता और नीतिगत स्थिरता का बड़ा संकेत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में भारत की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में यह वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक के लगभग 7 प्रतिशत के अनुमान से भी बेहतर रहा। वैश्विक स्तर पर जब अनेक अर्थव्यवस्थाएं युद्ध, महंगाई, ऊर्जा संकट और व्यापारिक तनाव से जूझ रही हैं, तब भारत की अर्थव्यवस्था का इस गति से आगे बढ़ना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की इस आर्थिक तस्वीर को केवल बाजार की स्वाभाविक ताकत के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे सरकार की लगातार बनाई गई आर्थिक रणनीति और उस रणनीति को जमीन पर लागू करने की कार्यप्रणाली भी महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने विकास का आधार केवल तत्काल राहत या उपभोग को नहीं बनाया, बल्कि बुनियादी ढांचे, सड़क, रेल, बंदरगाह, ऊर्जा, रक्षा, विनिर्माण और डिजिटल अर्थव्यवस्था में लगातार निवेश बढ़ाने पर जोर दिया है। यही पूंजीगत खर्च आज आर्थिक गतिविधियों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पहली तिमाही में सरकार के पूंजीगत खर्च में 18.6 प्रतिशत की वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि सरकार आर्थिक दबाव के समय भी विकास खर्च को रोकने के बजाय उसे आगे बढ़ाने की नीति पर कायम है। सरकार का यह दृष्टिकोण अर्थव्यवस्था के लिए दोहरा लाभ पैदा करता है। एक ओर बड़े स्तर पर निर्माण और आधारभूत ढांचे की परियोजनाओं से रोजगार और कारोबार को बढ़ावा मिलता है, वहीं दूसरी ओर सड़क, रेलवे, बिजली, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक ढांचे में सुधार से आने वाले वर्षों की आर्थिक क्षमता मजबूत होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की अर्थव्यवस्था में सरकारी निवेश का असर निजी क्षेत्र की गतिविधियों पर भी दिखाई देता है। जब सरकार बुनियादी ढांचे में निवेश करती है तो उससे सीमेंट, स्टील, मशीनरी, परिवहन, निर्माण और अनेक दूसरे क्षेत्रों में मांग पैदा होती है। इससे अर्थव्यवस्था में पैसा घूमता है और निजी क्षेत्र को भी विस्तार का अवसर मिलता है। यही कारण है कि वर्तमान आर्थिक वृद्धि को केवल सरकारी खर्च से जोड़ना उचित नहीं होगा। सरकार द्वारा तैयार किया गया वातावरण निजी निवेश और उपभोग दोनों के लिए आधार तैयार कर रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आम लोगों की खपत भी आर्थिक वृद्धि का एक महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है। पिछले वर्ष जीएसटी और आयकर से संबंधित राहतों के कारण लोगों के हाथ में खर्च करने योग्य आय बढ़ी। महंगाई की चुनौतियों के बावजूद उपभोक्ता मांग में अपेक्षित कमजोरी नहीं आई। इसका असर यात्री वाहनों की बिक्री में दिखाई दिया, जहां पहली तिमाही में 25.6 प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर्ज की गई। यह आंकड़ा बताता है कि घरेलू बाजार में उपभोक्ता विश्वास अभी भी मजबूत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बिजली की मांग में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। बिजली की मांग की वृद्धि दर 1.9 प्रतिशत से बढ़कर 8.4 प्रतिशत तक पहुंचना औद्योगिक और आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने का संकेत माना जा सकता है। जब उद्योग, सेवा क्षेत्र, निर्माण और घरेलू खपत में गतिविधियां बढ़ती हैं तो ऊर्जा की मांग भी बढ़ती है। इसलिए बिजली की मांग का यह आंकड़ा अर्थव्यवस्था की व्यापक गतिविधियों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।</div>
<div style="text-align:justify;">सकल मूल्य वर्धित यानी जीवीए के आंकड़े भी भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती को रेखांकित करते हैं। पहली तिमाही में वास्तविक जीवीए वृद्धि 8.2 प्रतिशत रही, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 7.1 प्रतिशत थी। वहीं नॉमिनल जीवीए वृद्धि 11.5 प्रतिशत दर्ज की गई। नॉमिनल जीडीपी वृद्धि भी 8.1 प्रतिशत से बढ़कर 10.3 प्रतिशत हुई। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि आर्थिक गतिविधियों का विस्तार केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सेवा क्षेत्र की मजबूती भी भारत की आर्थिक कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी पीएमआई 58.6 तक पहुंचना बताता है कि सेवा क्षेत्र में कारोबारी गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। भारत लंबे समय से सेवा क्षेत्र की अपनी क्षमता के लिए दुनिया में पहचान रखता है। सूचना प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाओं, डिजिटल सेवाओं, संचार, व्यापार और अन्य सेवा क्षेत्रों का विस्तार भारतीय अर्थव्यवस्था को लगातार नया आधार दे रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार की कार्यप्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसने वैश्विक संकटों के बीच आर्थिक गतिविधियों को सामान्य बनाए रखने पर लगातार जोर दिया। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ऊर्जा और खाद्य बाजार में भारी उतार-चढ़ाव आया। बाद में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा और समुद्री व्यापार तथा तेल आपूर्ति को लेकर चिंताएं पैदा हुईं। ऐसे समय में किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए आयात लागत और महंगाई को नियंत्रित रखना बड़ी चुनौती होती है। भारत ने ऐसी परिस्थितियों में आर्थिक गतिविधियों को बनाए रखने के लिए नीतिगत स्तर पर संतुलन साधने की कोशिश की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव भी भारत के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में आया। भारत पर भारी टैरिफ लगाने की धमकियों ने यह आशंका पैदा की कि इसका भारतीय निर्यात और औद्योगिक उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। लेकिन भारत ने अपनी आर्थिक रणनीति को केवल किसी एक बाजार पर निर्भर नहीं रखा। निर्यात बाजारों के विविधीकरण, घरेलू मांग को मजबूत करने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और विनिर्माण को प्रोत्साहन देने की दिशा में सरकार की नीतियां इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की आर्थिक नीति में आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होना नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति मजबूत करना है। सरकार ने घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ विदेशी निवेश आकर्षित करने, विनिर्माण क्षमता बढ़ाने और रणनीतिक क्षेत्रों में देश की निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठाए हैं। रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, मोबाइल निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में लगातार क्षमता निर्माण इसी सोच का हिस्सा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर यह है कि वैश्विक कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता चाहती हैं। यदि भारत इस अवसर को पूरी तरह भुना पाता है तो आने वाले वर्षों में विनिर्माण और निर्यात के क्षेत्र में उसकी भूमिका और मजबूत हो सकती है। इसके लिए सरकार की नीतिगत स्थिरता, तेज निर्णय लेने की क्षमता और परियोजनाओं को समय पर पूरा कराने की कार्यप्रणाली महत्वपूर्ण होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी समझना जरूरी है कि 7.8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि उत्सव का विषय जरूर है, लेकिन इसे अंतिम उपलब्धि नहीं माना जा सकता। भारत के सामने रोजगार सृजन, ग्रामीण मांग, महंगाई, निर्यात प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार में बढ़ते संरक्षणवाद जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इसलिए सरकार के सामने आगे भी यही चुनौती रहेगी कि आर्थिक वृद्धि को अधिक व्यापक बनाया जाए और उसका लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फिर भी वर्तमान आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था ने बाहरी दबावों के सामने उल्लेखनीय लचीलापन दिखाया है। युद्ध हो, तेल संकट हो, वैश्विक व्यापार में तनाव हो या टैरिफ का दबाव—भारत की आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह पटरी से नहीं उतरीं। इसके पीछे मजबूत घरेलू बाजार, बढ़ता सरकारी पूंजीगत खर्च, सेवा क्षेत्र की क्षमता, सुधारों की निरंतरता और आर्थिक प्रबंधन का महत्वपूर्ण योगदान है।</div>
<div style="text-align:justify;">भारत आज विश्व शक्ति बनने की दिशा में केवल सामरिक या राजनीतिक आधार पर नहीं बढ़ रहा है। आर्थिक शक्ति किसी भी राष्ट्र की वैश्विक स्थिति का सबसे महत्वपूर्ण आधार होती है। 7.8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि इसी आर्थिक क्षमता का संकेत देती है। सरकार ने जिस तरह बुनियादी ढांचे, सउत्पादन, डिजिटल अर्थव्यवस्था, निवेश और घरेलू मांग को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश की है, उसका परिणाम आर्थिक आंकड़ों में दिखाई देने लगा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सबसे बड़ी बात यह है कि भारत ने संकटों के बीच अपनी गति बनाए रखने की क्षमता दिखाई है। दुनिया में आर्थिक अनिश्चितता बनी हुई है और आगे भी अनेक चुनौतियां सामने आ सकती हैं। लेकिन यदि सरकार इसी तरह वित्तीय अनुशासन, पूंजीगत निवेश, नीतिगत स्थिरता और आर्थिक सुधारों के बीच संतुलन बनाए रखती है तो भारत की विकास यात्रा और तेज हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज 7.8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि भारत के लिए केवल एक आंकड़ा नहीं है। यह उस आर्थिक आत्मविश्वास का संकेत है जिसके आधार पर भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका और मजबूत कर रहा है। युद्ध और टैरिफ के दबाव के बावजूद अर्थव्यवस्था की यह रफ्तार बताती है कि भारत ने कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का संकल्प नहीं छोड़ा है। सरकार की कार्यप्रणाली और आर्थिक नीतियों की असली परीक्षा भी यही है कि संकट चाहे कितना बड़ा हो, विकास की गति को थमने न दिया जाए। फिलहाल जीडीपी के आंकड़े यही संदेश दे रहे हैं कि भारत की आर्थिक गाड़ी न केवल चल रही है, बल्कि वैश्विक उथल-पुथल के बीच भी अपनी रफ्तार बनाए हुए है।</div>
<div style="text-align:justify;"><strong>         *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2026 17:00:19 +0530</pubDate>
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                <title>बालोतरा की पचपदरा रिफाइनरी से आत्मनिर्भर भारत को नई ऊर्जा मिली</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">राजस्थान के बालोतरा जिले के पचपदरा में देश की सबसे आधुनिक रिफाइनरी का उद्घाटन केवल एक औद्योगिक परियोजना का लोकार्पण नहीं है, बल्कि यह भारत के ऊर्जा क्षेत्र, औद्योगिक विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर जिस दूरदर्शिता, आत्मविश्वास और विकास के संकल्प का परिचय दिया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि नया भारत केवल योजनाओं की घोषणा नहीं करता, बल्कि उन्हें समय पर पूरा करके राष्ट्र को नई शक्ति प्रदान करता है। पचपदरा रिफाइनरी का उद्घाटन राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182706/self-reliant-india-gets-new-energy-from-balotras-pachpadra-refinery"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/6a48e6408d54f_file.png" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">राजस्थान के बालोतरा जिले के पचपदरा में देश की सबसे आधुनिक रिफाइनरी का उद्घाटन केवल एक औद्योगिक परियोजना का लोकार्पण नहीं है, बल्कि यह भारत के ऊर्जा क्षेत्र, औद्योगिक विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर जिस दूरदर्शिता, आत्मविश्वास और विकास के संकल्प का परिचय दिया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि नया भारत केवल योजनाओं की घोषणा नहीं करता, बल्कि उन्हें समय पर पूरा करके राष्ट्र को नई शक्ति प्रदान करता है। पचपदरा रिफाइनरी का उद्घाटन राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि पश्चिमी एशिया में युद्ध के कारण विश्व के सामने 21वीं सदी का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट खड़ा हो गया था। ऐसी परिस्थितियों में अनेक देशों में ईंधन और गैस की कीमतें आसमान छूने लगीं। उन्होंने बताया कि यदि भारत ने समय रहते सही रणनीति नहीं अपनाई होती तो घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत दो हजार रुपये तक पहुंच सकती थी। लेकिन उनकी सरकार की दूरदर्शी नीति, प्रभावी कूटनीति और बेहतर प्रबंधन के कारण देशवासियों को इस संकट से राहत मिली। भारत ने ऊर्जा आयात के स्रोतों का विस्तार किया और पहले जहां लगभग 25 देशों से ईंधन खरीदा जाता था, वहीं अब 40 देशों से आयात कर ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उन्होंने भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई है। दुनिया के अनेक देशों के साथ मजबूत संबंध स्थापित कर भारत ने कठिन परिस्थितियों में भी अपने नागरिकों के हितों की रक्षा की। ऊर्जा संकट के समय भारत की विदेश नीति और कूटनीतिक क्षमता का प्रभाव पूरी दुनिया ने देखा। यही कारण है कि भारत न केवल संकट से सुरक्षित निकला बल्कि विकास की गति भी बनाए रखने में सफल रहा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पचपदरा रिफाइनरी राजस्थान के औद्योगिक इतिहास का नया अध्याय है। यह देश की अत्याधुनिक रिफाइनरियों में शामिल है, जहां आधुनिक तकनीक के माध्यम से पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, एविएशन फ्यूल तथा पेट्रोकेमिकल उत्पादों का निर्माण होगा। इससे भारत की आयात पर निर्भरता कम होगी और देश की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगी। यह परियोजना आत्मनिर्भर भारत अभियान को नई मजबूती प्रदान करेगी और भारत को ऊर्जा क्षेत्र में अधिक सक्षम बनाएगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस रिफाइनरी का सबसे बड़ा लाभ राजस्थान के लोगों को मिलने वाला है। पश्चिमी राजस्थान लंबे समय तक औद्योगिक विकास से अपेक्षाकृत वंचित रहा, लेकिन अब यह क्षेत्र देश के प्रमुख औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित होगा। उद्योगों के आने से सड़क, रेल, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आधारभूत सुविधाओं का भी तेजी से विस्तार होगा। इससे पूरे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी और स्थानीय व्यापार को नई गति मिलेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रोजगार की दृष्टि से भी यह परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण है। रिफाइनरी के निर्माण के दौरान हजारों इंजीनियरों, तकनीशियनों, श्रमिकों और स्थानीय लोगों को काम मिला। अब इसके संचालन के दौरान भी बड़ी संख्या में स्थायी और अस्थायी रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। प्रत्यक्ष रूप से हजारों युवाओं को रोजगार मिलेगा, जबकि परिवहन, होटल, खानपान, सुरक्षा, रखरखाव, निर्माण, गोदाम, पैकेजिंग और अन्य सहायक उद्योगों के माध्यम से लाखों लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त होगा। स्थानीय युवाओं के लिए कौशल विकास और तकनीकी प्रशिक्षण के नए अवसर भी खुलेंगे, जिससे वे आधुनिक उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को तैयार कर सकेंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रिफाइनरी के आसपास पेट्रोकेमिकल उद्योगों का बड़ा नेटवर्क विकसित होने की संभावना है। प्लास्टिक, रसायन, सिंथेटिक फाइबर, पैकेजिंग सामग्री, उर्वरक और अनेक अन्य उद्योग यहां स्थापित होंगे। इससे निवेश बढ़ेगा, नए उद्योग लगेंगे और राजस्थान देश के प्रमुख औद्योगिक राज्यों की श्रेणी में और अधिक मजबूत स्थान प्राप्त करेगा। छोटे और मध्यम उद्योगों को भी नए बाजार मिलेंगे, जिससे स्थानीय उद्यमियों को व्यापक लाभ होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजस्व के क्षेत्र में भी यह परियोजना अत्यंत लाभदायक सिद्ध होगी। शुरुआती चरण में राजस्थान को हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होने की संभावना है, जबकि केंद्र सरकार को भी बड़ी आय होगी। यह धन सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई और अन्य विकास योजनाओं में निवेश किया जा सकेगा। इस प्रकार रिफाइनरी केवल ईंधन उत्पादन का केंद्र नहीं बल्कि आर्थिक समृद्धि का आधार बनेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि भाजपा सरकार केवल शिलान्यास करके परियोजनाओं को अधूरा नहीं छोड़ती बल्कि उन्हें पूरा करके जनता को समर्पित करती है। पचपदरा रिफाइनरी इसका सशक्त उदाहरण है। निर्माण के दौरान अनेक चुनौतियां आईं। कुछ समय पहले लगी आग के कारण उद्घाटन कार्यक्रम भी स्थगित करना पड़ा था, लेकिन इंजीनियरों, कर्मचारियों और विशेषज्ञों ने अथक परिश्रम कर बहुत कम समय में सभी कार्य पूरे किए। प्रधानमंत्री ने इस उपलब्धि की सराहना करते हुए कहा कि नया भारत किसी भी चुनौती के सामने झुकता नहीं है और अपने संकल्पों को पूरा करके ही दम लेता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान के जल विकास का भी उल्लेख किया और बताया कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने तत्कालीन राजस्थान सरकार के साथ मिलकर बिना किसी विवाद के नर्मदा का पानी राजस्थान तक पहुंचाने का कार्य किया। यह उनकी सहयोग की भावना, विकास की राजनीति और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की सोच का उदाहरण है। आज राजस्थान के अनेक गांवों तक नर्मदा का पानी पहुंच रहा है और लाखों लोगों का जीवन बदल रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जोधपुर एयरपोर्ट के नए टर्मिनल भवन का उद्घाटन और जयपुर मेट्रो फेज दो की आधारशिला भी इस बात का प्रमाण है कि केंद्र सरकार राजस्थान के सर्वांगीण विकास के लिए निरंतर कार्य कर रही है। सड़क, रेल, हवाई संपर्क, ऊर्जा, उद्योग और शहरी विकास जैसे सभी क्षेत्रों में बड़े निवेश किए जा रहे हैं। इससे पर्यटन, व्यापार और निवेश को नई गति मिलेगी तथा प्रदेश की अर्थव्यवस्था और मजबूत होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रिफाइनरी परिसर में पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया। आधुनिक तकनीक और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप विकसित यह परियोजना औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के संतुलन का भी उदाहरण बनेगी। इससे स्वच्छ ऊर्जा प्रबंधन और संसाधनों के बेहतर उपयोग को बढ़ावा मिलेगा। आज भारत जिस गति से विकास की ओर बढ़ रहा है, उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व निर्णायक भूमिका निभा रहा है। उनके नेतृत्व में देश ने ऊर्जा सुरक्षा, आधारभूत ढांचे, वैश्विक प्रतिष्ठा, औद्योगिक विकास और आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त की हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पचपदरा रिफाइनरी इस परिवर्तनकारी सोच का सशक्त प्रतीक है। यह परियोजना आने वाले दशकों तक राजस्थान और भारत की आर्थिक प्रगति की आधारशिला बनेगी। इससे लाखों लोगों का जीवन बेहतर होगा, युवाओं को रोजगार मिलेगा, उद्योगों को नई दिशा मिलेगी और भारत ऊर्जा के क्षेत्र में और अधिक सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा। यही विकसित भारत के निर्माण की वह यात्रा है जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दृढ़ संकल्प, दूरदृष्टि और अथक परिश्रम के साथ कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 19:40:59 +0530</pubDate>
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                <title>आ अब लौट चलें</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">कभी भारत से विदेश जाना सफलता का पर्याय माना जाता था। इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ अपने सपनों को साकार करने के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप की ओर निकल पड़ते थे। बेहतर वेतन, आधुनिक जीवनशैली, अनुसंधान के अवसर और सामाजिक सुरक्षा ने लाखों भारतीय युवाओं को आकर्षित किया। लेकिन आज विश्व की बदलती परिस्थितियां एक नया प्रश्न खड़ा कर रही हैं,क्या अब वह समय आ गया है जब विदेशों में बसे भारतीय पेशेवर "आ अब लौट चलें की व्यथा तथा कथा की पीड़ा से पीड़ित है? वैश्विक युद्ध के चलते अब भारतीय प्रवासी पैसे वालों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180373/come-lets-go-back-now"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20250331-wa016315.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कभी भारत से विदेश जाना सफलता का पर्याय माना जाता था। इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ अपने सपनों को साकार करने के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप की ओर निकल पड़ते थे। बेहतर वेतन, आधुनिक जीवनशैली, अनुसंधान के अवसर और सामाजिक सुरक्षा ने लाखों भारतीय युवाओं को आकर्षित किया। लेकिन आज विश्व की बदलती परिस्थितियां एक नया प्रश्न खड़ा कर रही हैं,क्या अब वह समय आ गया है जब विदेशों में बसे भारतीय पेशेवर "आ अब लौट चलें की व्यथा तथा कथा की पीड़ा से पीड़ित है? वैश्विक युद्ध के चलते अब भारतीय प्रवासी पैसे वालों की जान को खतरा मंडराने लगा और विदेशी शासको के पराई पान के व्यवहार से परेशान होकर वापस घर लौटने की मानसिकता बन चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व पिछले कुछ वर्षों से युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, बढ़ती महंगाई, सांस्कृतिक तनाव और कठोर होती आव्रजन नीतियों के दौर से गुजर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व में बढ़ते संघर्ष, अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा तथा पश्चिमी देशों में बढ़ती राष्ट्रवादी राजनीति ने विदेशी नागरिकों के भविष्य को अनिश्चित बना दिया है। विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों के सामने वीजा, स्थायी निवास और रोजगार सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। अनेक देशों में स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता देने की मांग तेज हुई है, जिसके कारण प्रवासी समुदाय स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगा है। हाल के वर्षों में अमेरिका की एच-1बी वीजा नीतियों में बदलाव और बढ़ती अनिश्चितताओं ने हजारों भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों को भविष्य के प्रति चिंतित किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय मूल के लाखों पेशेवर विदेशों में रहते हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार विश्वभर में लगभग 3.5 करोड़ भारतीय मूल के लोग निवास करते हैं, जो दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय माना जाता है।  इनमें बड़ी संख्या डॉक्टरों, इंजीनियरों, आईटी विशेषज्ञों, वित्तीय सलाहकारों और शोधकर्ताओं की है। केवल भारतीय छात्रों की बात करें तो वर्ष 2024 तक 13 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में अध्ययन कर रहे थे। विदेशों में रहने वाले भारतीयों की चमकदार तस्वीर अक्सर दिखाई जाती है, किंतु उसके पीछे छिपी मानसिक और सामाजिक पीड़ा कम चर्चा में आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्थिक सफलता के बावजूद सांस्कृतिक अकेलापन, परिवार से दूरी, बुजुर्ग माता-पिता की चिंता, बच्चों की पहचान का संकट तथा नस्लीय भेदभाव के अनुभव अनेक प्रवासी भारतीयों को भीतर से विचलित करते हैं। पश्चिमी देशों में जीवन की बढ़ती लागत ने भी स्थिति कठिन बना दी है। ऊंचे किराए, महंगी स्वास्थ्य सेवाएं, बच्चों की शिक्षा का खर्च और नौकरी की असुरक्षा ने उस आकर्षण को कमजोर किया है जो कभी विदेशों को अवसरों की स्वर्णभूमि बनाता था। अनेक भारतीय पेशेवर स्वीकार करते हैं कि आर्थिक समृद्धि के बावजूद भावनात्मक संतोष की कमी उन्हें लगातार परेशान करती रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने भी इस विषय पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने भारतीय प्रवासी समुदाय को "ब्रेन ड्रेन" नहीं बल्कि "ब्रेन बैंक" बताया है। उनका मानना है कि प्रतिभाएं जहां अवसर मिलते हैं वहां जाती हैं, किंतु वे अनुभव, पूंजी, तकनीक और वैश्विक दृष्टि के रूप में अपने देश को भी समृद्ध करती हैं।  यह विचार आज और अधिक प्रासंगिक है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर अब विदेशों से लौटकर भारत में स्टार्टअप, अनुसंधान और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में भी परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप संस्कृति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, अंतरिक्ष अनुसंधान और वैश्विक क्षमता केंद्रों के विस्तार ने रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत अब केवल प्रतिभा निर्यातक देश नहीं रह गया है, बल्कि प्रतिभाओं को आकर्षित करने वाला देश भी बनने लगा है। कई भर्ती एजेंसियों ने बताया है कि विदेशों में कार्यरत अनुभवी भारतीय पेशेवरों की वापसी की प्रवृत्ति पिछले वर्षों की तुलना में बढ़ी है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह भी सच है कि भारत को अभी बहुत कार्य करना बाकी है। अनुसंधान एवं विकास पर खर्च, शहरी अवसंरचना, प्रशासनिक पारदर्शिता, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक भारत वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार के लिए विश्वस्तरीय वातावरण नहीं बनाएगा, तब तक प्रतिभा पलायन पूरी तरह नहीं रुकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">परिस्थितियों का संकेत स्पष्ट है कि दुनिया का भू-राजनीतिक वातावरण तेजी से बदल रहा है। विदेशी धरती पर बसे भारतीय पेशेवर अब केवल अधिक वेतन नहीं, बल्कि जीवन की स्थिरता, सामाजिक अपनत्व और भावनात्मक सुरक्षा को भी महत्व देने लगे हैं। वे महसूस कर रहे हैं कि अपने देश में संघर्ष करना पराए देश में असुरक्षा के साथ जीने से कहीं अधिक संतोषजनक हो सकता है। माता-पिता की वृद्ध आंखें, अपनी भाषा की मिठास, अपने त्योहारों की खुशबू और अपनी मिट्टी का अपनापन किसी भी मुद्रा में नहीं खरीदा जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भारत उन लाखों प्रतिभाशाली प्रवासी भारतीयों को पुकार रहा है जिन्होंने अपनी मेहनत से विश्व के बड़े संस्थानों को ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। यदि वही ज्ञान, अनुभव और नवाचार भारत की धरती पर लगे तो विकास की नई इबारत लिखी जा सकती है। यह केवल भावनात्मक आह्वान नहीं बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता भी है। वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में अनेक भारतीय पेशेवरों के मन में एक ही स्वर गूंज रहा है,विदेशों की चमक बहुत देख ली, अब अपने देश की धड़कनों को महसूस करने का समय है। सचमुच, यह समय कह रहा है,"आ अब लौट चलें।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 18:37:59 +0530</pubDate>
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