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                <title>Rule of Law - Swatantra Prabhat</title>
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                            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट की गरिमा और न्याय की संवेदना</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश की सर्वोच्च अदालत केवल एक न्यायिक संस्था नहीं है, बल्कि संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की अंतिम आशा का केंद्र है। जब देश का कोई नागरिक हर स्तर पर न्याय की तलाश में असफल होकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है, तो उसके मन में यही विश्वास होता है कि यहां उसकी बात निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ सुनी जाएगी। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट की गरिमा, मर्यादा और प्रतिष्ठा पूरे न्यायिक तंत्र की आधारशिला मानी जाती है। अदालत की गरिमा बनाए रखना जितना न्यायाधीशों और न्यायिक कर्मचारियों का दायित्व है, उतना ही वहां उपस्थित प्रत्येक अधिवक्ता, याचिकाकर्ता और नागरिक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183200/supreme-courts-sense-of-dignity-and-justice"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(3)2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश की सर्वोच्च अदालत केवल एक न्यायिक संस्था नहीं है, बल्कि संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की अंतिम आशा का केंद्र है। जब देश का कोई नागरिक हर स्तर पर न्याय की तलाश में असफल होकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है, तो उसके मन में यही विश्वास होता है कि यहां उसकी बात निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ सुनी जाएगी। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट की गरिमा, मर्यादा और प्रतिष्ठा पूरे न्यायिक तंत्र की आधारशिला मानी जाती है। अदालत की गरिमा बनाए रखना जितना न्यायाधीशों और न्यायिक कर्मचारियों का दायित्व है, उतना ही वहां उपस्थित प्रत्येक अधिवक्ता, याचिकाकर्ता और नागरिक का भी कर्तव्य है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता वकील द्वारा न्यायाधीशों के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करना, कागजात उछालना और मुख्य न्यायाधीश के लिए अपशब्द कहना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। किसी भी परिस्थिति में न्यायालय के भीतर इस प्रकार का व्यवहार स्वीकार्य नहीं कहा जा सकता। अदालत तर्क और कानून की भाषा समझती है, आक्रोश और अपमान की नहीं। यदि न्याय की लड़ाई लड़ने वाला स्वयं कानून और शिष्टाचार की सीमाएं लांघने लगे, तो न्याय व्यवस्था पर लोगों का विश्वास कमजोर होने का खतरा पैदा हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वकील केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि वह न्यायालय का भी अधिकारी माना जाता है। उसकी वाणी, उसका आचरण और उसका व्यवहार न्यायपालिका की गरिमा से जुड़ा होता है। इसलिए अधिवक्ताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे कठिन से कठिन परिस्थिति में भी संयम बनाए रखें। असहमति व्यक्त करने का अधिकार सभी को है, लेकिन असहमति और अभद्रता के बीच एक स्पष्ट रेखा होती है। उस रेखा का सम्मान करना ही लोकतांत्रिक संस्कृति और न्यायिक परंपरा की पहचान है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अदालत ने वकील की याचिका खारिज कर दी, लेकिन उसके खिलाफ अवमानना की कठोर कार्रवाई नहीं की। न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि वह व्यक्ति संभवतः अत्यधिक तनाव और मानसिक दबाव में है तथा उसकी हताशा स्पष्ट दिखाई दे रही है। यह दृष्टिकोण न्यायपालिका की मानवीय संवेदना को भी सामने लाता है। कानून केवल दंड देने का माध्यम नहीं है, बल्कि परिस्थितियों को समझने और न्याय के व्यापक उद्देश्य को ध्यान में रखने की व्यवस्था भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वास्तविकता यह है कि न्याय की तलाश में अदालत तक पहुंचने वाला प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी पीड़ा, संघर्ष या अन्याय का बोझ लेकर आता है। वर्षों तक मुकदमे लड़ने, आर्थिक बोझ उठाने और बार-बार अदालतों के चक्कर लगाने के बाद जब अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता, तब कई लोग मानसिक रूप से टूट जाते हैं। यह टूटन कभी-कभी हताशा और असंतुलित व्यवहार के रूप में सामने आती है। इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसे व्यवहार को उचित ठहराया जाए, बल्कि यह समझना आवश्यक है कि उसके पीछे पीड़ा और निराशा का एक लंबा इतिहास भी हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न्यायपालिका की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्षता के साथ-साथ उसकी संवेदनशीलता भी है। यदि कोई व्यक्ति अदालत में अत्यधिक तनावग्रस्त दिखाई देता है, तो उसके साथ कानून के अनुसार व्यवहार करते हुए उसकी मानसिक स्थिति को भी समझना चाहिए। न्याय केवल आदेश सुनाने से पूरा नहीं होता, बल्कि यह विश्वास भी पैदा करता है कि अदालत ने व्यक्ति की बात पूरी गंभीरता से सुनी और समझी। यही विश्वास लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी सच है कि न्याय में विलंब, लंबी कानूनी प्रक्रिया और बढ़ते मुकदमों का बोझ कई लोगों में निराशा पैदा करता है। ऐसे में न्याय व्यवस्था को अधिक सुलभ, सरल और समयबद्ध बनाने की दिशा में लगातार प्रयास आवश्यक हैं। जब लोगों को समय पर न्याय मिलेगा, तो निराशा और असंतोष की स्थितियां भी कम होंगी। न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल विवादों का निपटारा नहीं, बल्कि समाज में विश्वास और संतुलन बनाए रखना भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस घटना ने एक और संदेश दिया है कि न्यायालय की गरिमा बनाए रखने में सभी की समान जिम्मेदारी है। यदि अदालत में अनुशासन समाप्त हो जाए, तो न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होगी और इसका नुकसान अंततः आम नागरिक को ही होगा। इसलिए चाहे वह वरिष्ठ अधिवक्ता हों, नए वकील हों या स्वयं पक्षकार, सभी को यह समझना होगा कि अदालत में शब्दों का चयन, व्यवहार की मर्यादा और कानून के प्रति सम्मान सर्वोपरि है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर न्यायपालिका की उदारता भी सराहनीय है। यदि अदालत चाहती तो अवमानना की कार्रवाई कर सकती थी, लेकिन उसने संयम दिखाया और कठोर दंड देने के बजाय मामले को वहीं समाप्त करना उचित समझा। यह निर्णय बताता है कि न्याय केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि विवेक, धैर्य और करुणा का संतुलित स्वरूप है। हालांकि इस उदारता का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि भविष्य में कोई भी व्यक्ति अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाने का साहस करे। कानून का सम्मान हर परिस्थिति में अनिवार्य है।</div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र में न्यायपालिका अंतिम आशा होती है। जब प्रशासन, व्यवस्था और अन्य संस्थाओं से निराश व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है, तो उसके मन में उम्मीद की आखिरी किरण बची होती है। इसलिए अदालतों को भी यह ध्यान रखना होगा कि उनके सामने खड़ा हर व्यक्ति केवल एक केस नंबर नहीं, बल्कि अपने जीवन की किसी गहरी समस्या से जूझता हुआ इंसान है। उसकी बात सुनते समय कानून के साथ मानवीय संवेदना भी बनी रहनी चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस घटना से देश को दो महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं। पहली, अदालत की गरिमा किसी भी कीमत पर भंग नहीं होनी चाहिए। न्यायालय में अपशब्द, आक्रोश और अभद्र व्यवहार लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध हैं। दूसरी, न्याय व्यवस्था को लोगों की पीड़ा, मानसिक तनाव और संघर्ष को भी समझना चाहिए, क्योंकि न्याय केवल निर्णय देने का नाम नहीं, बल्कि समाज में विश्वास बनाए रखने की प्रक्रिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है और उसकी प्रतिष्ठा पूरे राष्ट्र की प्रतिष्ठा से जुड़ी हुई है। वहीं, अदालत की चौखट पर आने वाला हर व्यक्ति न्याय की उम्मीद लेकर आता है। इसलिए आवश्यक है कि एक ओर अधिवक्ता और पक्षकार अपनी मर्यादा और जिम्मेदारी को समझें, तो दूसरी ओर न्याय व्यवस्था भी हर पीड़ित की व्यथा को महसूस करते हुए कानून और संवेदना के बीच संतुलन बनाए रखे। यही संतुलन भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति है और यही लोकतंत्र की स्थायी पहचान भी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 22:12:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हिरासत में मौत और पुलिसिया हिंसा के मामलों में अभियोजन मंजूरी जरूरी नहीं: ।मध्य प्रदेश हाईकोर्ट।</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181536/prosecution-sanction-is-not-necessary-in-cases-of-custodial-death"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas6.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">याचिकाकर्ता पुलिसकर्मियों ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ अभियोजन चलाने से पहले सरकार की मंजूरी आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि कथित घटनाएं उनके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़ी हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मामले के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूचित जाति समुदाय से संबंध रखने वाले 24 वर्षीय पंकज वैष्णव को 19 दिसंबर 2015 को स्कूटर चोरी के मामले में पूछताछ के लिए इंदौर के एमआईजी थाने लाया गया। उसी रात उसकी पुलिस हिरासत में मौत हो गई। पुलिस ने इसे आत्महत्या बताया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घटना के बाद </span>CrPC <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 176 के तहत स्वतंत्र जांच कराई गई। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की गई जांच में निष्कर्ष निकाला गया कि यह मामला आपराधिक मानव वध का प्रतीत होता है।इसके बाद दो आरक्षकों और एक थाना प्रभारी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवैध निरुद्ध करने और झूठे साक्ष्य देने सहित विभिन्न आरोपों में आरोपपत्र दायर किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 197 के संरक्षण का लाभ तभी मिल सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आरोपित कृत्य और सरकारी कर्तव्य के निर्वहन के बीच स्पष्ट और उचित संबंध हो। लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा कोई संबंध नहीं पाया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने कहा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">यह ऐसा मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें पुलिसकर्मी किसी हिंसक भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे और बल प्रयोग करते हुए अपनी सीमा से आगे बढ़ गए हों। यहां आरोपित बल प्रयोग उस समय किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब मृतक पुलिस हिरासत में था और थाने के नियंत्रण में था। ऐसी स्थिति में बल प्रयोग या शारीरिक हमला करने का कोई औचित्य नहीं था।”</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि कानून पुलिस को कुछ विशेष परिस्थितियों में बल प्रयोग की अनुमति देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे हिंसक भीड़ को तितर-बितर करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिरफ्तारी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें कहा गया कि हिरासत में हिंसा और मौत सभ्य समाज में सबसे गंभीर अपराधों में से हैं तथा यह व्यक्ति के मूल मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आरक्षकों की पुनरीक्षण याचिका खारिज की और स्पष्ट किया कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा जैसे मामलों में धारा 197 के तहत अभियोजन मंजूरी का संरक्षण उपलब्ध नहीं होगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 13:57:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नया न्यायिक सवेरा – जब न्याय समय पर मिले, तो हर घाव भर जाता है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्याय व्यवस्था में कुछ फैसले केवल कानूनी आदेश नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलाव की नई दिशा तय करते हैं। </span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश ऐसा ही एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी हाईकोर्टों को स्पष्ट किया कि सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित (रिजर्व) रखा गया कोई भी फैसला सामान्यतः तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद </span>142 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी यह निर्देश महज प्रशासनिक व्यवस्था नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय की मूल भावना को सशक्त करने का प्रयास है। वर्षों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180348/new-judicial-dawn-%E2%80%93-when-justice-is-delivered-on-time"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्याय व्यवस्था में कुछ फैसले केवल कानूनी आदेश नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलाव की नई दिशा तय करते हैं। </span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश ऐसा ही एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी हाईकोर्टों को स्पष्ट किया कि सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित (रिजर्व) रखा गया कोई भी फैसला सामान्यतः तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद </span>142 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी यह निर्देश महज प्रशासनिक व्यवस्था नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय की मूल भावना को सशक्त करने का प्रयास है। वर्षों से न्यायालयों में गूंज रही “तारीख पर तारीख” की संस्कृति पर इसे एक निर्णायक और दूरगामी प्रहार माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय की सबसे बड़ी कसौटी केवल निर्णय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसका समय पर मिलना है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न्यायिक प्रक्रिया की उस गंभीर खामी पर प्रहार करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे लाखों मुकदमेबाज वर्षों से प्रभावित होते रहे हैं। अनेक मामलों में बहस पूरी होने के बाद फैसले सुरक्षित रख लिए जाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन्हें महीनों या वर्षों तक सुनाया नहीं जाता था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परिणामस्वरूप पक्षकार कानूनी अनिश्चितता में जीने को विवश हो जाते थे और उनका रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसाय तथा भविष्य अदालत के निर्णय की प्रतीक्षा में अटक जाता था। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक फैसलों का अनिश्चितकाल तक लंबित रहना स्वीकार्य नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि न्याय का अर्थ केवल सुनवाई नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर निर्णय भी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस आदेश की शक्ति उसके संवैधानिक आधार में निहित है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद </span>21 <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समय पर न्याय की अपेक्षा का भी संरक्षक है। जब किसी व्यक्ति का सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य या स्वतंत्रता किसी फैसले पर निर्भर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब निर्णय में अनावश्यक देरी उसके मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती है। इसलिए न्यायालय ने समयबद्ध न्याय को महज प्रशासनिक आवश्यकता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संवैधानिक दायित्व माना है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत का यह कथन कि उन्होंने अपने लगभग पंद्रह वर्षों के हाईकोर्ट कार्यकाल में कभी किसी रिजर्व फैसले को तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी न्यायपालिका के लिए एक प्रेरक मानक प्रस्तुत करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने सबसे स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि जमानत याचिकाओं पर आदेश आदर्श रूप से उसी दिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा अधिकतम अगले दिन जारी हो तथा इसकी सूचना तत्काल जेल प्रशासन तक पहुंचे। यह उन हजारों विचाराधीन कैदियों के लिए बड़ी राहत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दोषसिद्धि के बिना लंबे समय से कारावास में हैं। न्यायालय का स्पष्ट मत है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रक्रियागत देरी की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता। जमानत मंजूर होने के बाद उसका त्वरित लाभ मिलना ही वास्तविक न्याय है। इससे न केवल जेलों का बोझ घटेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्यायपालिका में जनविश्वास भी और मजबूत होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस ऐतिहासिक निर्देश की सबसे बड़ी ताकत उसका जवाबदेह निगरानी तंत्र है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल समय-सीमा तय नहीं की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसके पालन की ठोस व्यवस्था भी सुनिश्चित की है। तीन महीने के भीतर फैसला न आने पर मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर दूसरी पीठ को सौंपा जा सकेगा। साथ ही लंबित रिजर्व मामलों की निगरानी के लिए डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं। यह व्यवस्था पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करेगी। वहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जटिल मामलों के लिए सीमित छूट का प्रावधान रखकर न्यायालय ने व्यावहारिक संतुलन भी बनाए रखा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह पहल केवल लंबित फैसलों के निस्तारण का उपाय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय व्यवस्था की कार्यसंस्कृति में बदलाव का स्पष्ट संकेत है। देश में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं और लगातार स्थगन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी सुनवाई तथा निर्णयों में देरी ने आम नागरिक के मन में न्याय को एक थकाऊ और अंतहीन प्रक्रिया बना दिया था। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम बताता है कि शीर्ष अदालत अब केवल अंतिम फैसले सुनाने तक सीमित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र को अधिक उत्तरदायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। समयबद्ध निर्णयों की संस्कृति विकसित होने से न्यायालयों की कार्यक्षमता बढ़ेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और मुकदमों के निस्तारण की गति को नई ऊर्जा मिलेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस सुधार की राह पूरी तरह आसान नहीं है। कई हाईकोर्ट न्यायाधीशों की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बढ़ते मुकदमों के बोझ और जटिल मामलों की चुनौती से जूझ रहे हैं। कुछ मामलों में गहन अध्ययन के कारण निर्णय में अतिरिक्त समय भी स्वाभाविक है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक संतुलन बनाए रखा है। अतिरिक्त पीठों का गठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल तकनीक का विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक केस मैनेजमेंट और प्रशासनिक दक्षता में सुधार इस बदलाव को गति दे सकते हैं। इन उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन से न्यायिक प्रक्रिया की रफ्तार और गुणवत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों में उल्लेखनीय सुधार संभव है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी न्यायिक सुधार की असली कसौटी उसका प्रभाव आम नागरिक के जीवन पर होता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश मुकदमेबाजों को भरोसा देता है कि सुनवाई पूरी होने के बाद उनका मामला अनिश्चित प्रतीक्षा में नहीं रहेगा। किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यमवर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग जगत और समाज के कमजोर वर्गों के लिए समयबद्ध न्याय नई उम्मीद लेकर आएगा। समय पर मिला न्याय कानून की प्रतिष्ठा और लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनविश्वास को मजबूत करता है। यदि इस निर्देश का प्रभावी पालन हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो “तारीख पर तारीख” की संस्कृति अतीत बन सकती है और “समय पर न्याय” भारतीय न्याय व्यवस्था की नई पहचान।</span></p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:40:55 +0530</pubDate>
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