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                <title>Law and Justice - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>लखनऊ राज्य कर भवन में अत्याधुनिक लाइब्रेरी का उद्घाटन, अधिवक्ताओं को मिला ज्ञान का नया केंद्र</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ। </strong>राजधानी के मीराबाई मार्ग स्थित राज्य कर भवन के चौथे तल पर सेल्स टैक्स बार एसोसिएशन द्वारा नवनिर्मित अत्याधुनिक लाइब्रेरी का भव्य उद्घाटन समारोह आयोजित किया गया। वरिष्ठ एवं सम्मानित अधिवक्ता बनवारी लाल दीक्षित ने फीता काटकर पुस्तकालय का शुभारंभ किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में कर अधिवक्ता, बार पदाधिकारी एवं वरिष्ठ सदस्य मौजूद रहे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि एक अधिवक्ता की सबसे बड़ी पूंजी उसका ज्ञान और अध्ययन होता है। कानून में होने वाले निरंतर बदलावों, नवीनतम न्यायिक निर्णयों तथा कर संबंधी प्रावधानों की जानकारी के लिए समृद्ध पुस्तकालय की महत्वपूर्ण</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183445/inauguration-of-state-of-the-art-library-in-lucknow-rajya-kar-bhavan-advocates"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/img-20260715-wa0005.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ। </strong>राजधानी के मीराबाई मार्ग स्थित राज्य कर भवन के चौथे तल पर सेल्स टैक्स बार एसोसिएशन द्वारा नवनिर्मित अत्याधुनिक लाइब्रेरी का भव्य उद्घाटन समारोह आयोजित किया गया। वरिष्ठ एवं सम्मानित अधिवक्ता बनवारी लाल दीक्षित ने फीता काटकर पुस्तकालय का शुभारंभ किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में कर अधिवक्ता, बार पदाधिकारी एवं वरिष्ठ सदस्य मौजूद रहे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि एक अधिवक्ता की सबसे बड़ी पूंजी उसका ज्ञान और अध्ययन होता है। कानून में होने वाले निरंतर बदलावों, नवीनतम न्यायिक निर्णयों तथा कर संबंधी प्रावधानों की जानकारी के लिए समृद्ध पुस्तकालय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि यह लाइब्रेरी अधिवक्ताओं के ज्ञानवर्धन के साथ-साथ शोध एवं प्रभावी पैरवी में भी महत्वपूर्ण योगदान देगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सेल्स टैक्स बार एसोसिएशन के महामंत्री रमेश श्रीवास्तव ने कहा कि अत्यल्प समय में इस आधुनिक लाइब्रेरी को तैयार कर संचालन योग्य बनाने का पूरा श्रेय लाइब्रेरी समिति के चेयरमैन एडवोकेट अरविंदर सिंह आनंद को जाता है। उन्होंने बताया कि उनके अथक परिश्रम और समर्पण के कारण अधिवक्ताओं को यह महत्वपूर्ण सुविधा उपलब्ध हो सकी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेंद्र त्रिपाठी ने कहा कि पुस्तकें किसी भी अधिवक्ता की सच्ची मार्गदर्शक होती हैं। बदलते कानूनी प्रावधानों और कर व्यवस्था की अद्यतन जानकारी के लिए यह लाइब्रेरी युवा एवं वरिष्ठ अधिवक्ताओं के लिए समान रूप से लाभदायक सिद्ध होगी। उन्होंने इस अवसर पर सभी अतिथियों, वरिष्ठ अधिवक्ताओं एवं सदस्यों का आभार व्यक्त किया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के समापन पर मीडिया कमेटी के सदस्य एडवोकेट मोहम्मद सलीम ने बताया कि लाइब्रेरी में टैक्स, जीएसटी एवं विधि से संबंधित नवीनतम पुस्तकें, बेयर एक्ट्स तथा महत्वपूर्ण विधिक जर्नल्स का समृद्ध संग्रह उपलब्ध कराया गया है। उन्होंने कहा कि अधिवक्ताओं को बेहतर पेशेवर सुविधाएं उपलब्ध कराना बार एसोसिएशन की प्राथमिकता है और यह लाइब्रेरी उसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक कदम है। इससे कर अधिवक्ताओं की शोध क्षमता, विधिक ज्ञान और कार्यकुशलता को नई मजबूती मिलेगी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 22:11:07 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट की गरिमा और न्याय की संवेदना</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश की सर्वोच्च अदालत केवल एक न्यायिक संस्था नहीं है, बल्कि संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की अंतिम आशा का केंद्र है। जब देश का कोई नागरिक हर स्तर पर न्याय की तलाश में असफल होकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है, तो उसके मन में यही विश्वास होता है कि यहां उसकी बात निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ सुनी जाएगी। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट की गरिमा, मर्यादा और प्रतिष्ठा पूरे न्यायिक तंत्र की आधारशिला मानी जाती है। अदालत की गरिमा बनाए रखना जितना न्यायाधीशों और न्यायिक कर्मचारियों का दायित्व है, उतना ही वहां उपस्थित प्रत्येक अधिवक्ता, याचिकाकर्ता और नागरिक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183200/supreme-courts-sense-of-dignity-and-justice"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(3)2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश की सर्वोच्च अदालत केवल एक न्यायिक संस्था नहीं है, बल्कि संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की अंतिम आशा का केंद्र है। जब देश का कोई नागरिक हर स्तर पर न्याय की तलाश में असफल होकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है, तो उसके मन में यही विश्वास होता है कि यहां उसकी बात निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ सुनी जाएगी। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट की गरिमा, मर्यादा और प्रतिष्ठा पूरे न्यायिक तंत्र की आधारशिला मानी जाती है। अदालत की गरिमा बनाए रखना जितना न्यायाधीशों और न्यायिक कर्मचारियों का दायित्व है, उतना ही वहां उपस्थित प्रत्येक अधिवक्ता, याचिकाकर्ता और नागरिक का भी कर्तव्य है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता वकील द्वारा न्यायाधीशों के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करना, कागजात उछालना और मुख्य न्यायाधीश के लिए अपशब्द कहना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। किसी भी परिस्थिति में न्यायालय के भीतर इस प्रकार का व्यवहार स्वीकार्य नहीं कहा जा सकता। अदालत तर्क और कानून की भाषा समझती है, आक्रोश और अपमान की नहीं। यदि न्याय की लड़ाई लड़ने वाला स्वयं कानून और शिष्टाचार की सीमाएं लांघने लगे, तो न्याय व्यवस्था पर लोगों का विश्वास कमजोर होने का खतरा पैदा हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वकील केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि वह न्यायालय का भी अधिकारी माना जाता है। उसकी वाणी, उसका आचरण और उसका व्यवहार न्यायपालिका की गरिमा से जुड़ा होता है। इसलिए अधिवक्ताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे कठिन से कठिन परिस्थिति में भी संयम बनाए रखें। असहमति व्यक्त करने का अधिकार सभी को है, लेकिन असहमति और अभद्रता के बीच एक स्पष्ट रेखा होती है। उस रेखा का सम्मान करना ही लोकतांत्रिक संस्कृति और न्यायिक परंपरा की पहचान है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अदालत ने वकील की याचिका खारिज कर दी, लेकिन उसके खिलाफ अवमानना की कठोर कार्रवाई नहीं की। न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि वह व्यक्ति संभवतः अत्यधिक तनाव और मानसिक दबाव में है तथा उसकी हताशा स्पष्ट दिखाई दे रही है। यह दृष्टिकोण न्यायपालिका की मानवीय संवेदना को भी सामने लाता है। कानून केवल दंड देने का माध्यम नहीं है, बल्कि परिस्थितियों को समझने और न्याय के व्यापक उद्देश्य को ध्यान में रखने की व्यवस्था भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वास्तविकता यह है कि न्याय की तलाश में अदालत तक पहुंचने वाला प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी पीड़ा, संघर्ष या अन्याय का बोझ लेकर आता है। वर्षों तक मुकदमे लड़ने, आर्थिक बोझ उठाने और बार-बार अदालतों के चक्कर लगाने के बाद जब अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता, तब कई लोग मानसिक रूप से टूट जाते हैं। यह टूटन कभी-कभी हताशा और असंतुलित व्यवहार के रूप में सामने आती है। इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसे व्यवहार को उचित ठहराया जाए, बल्कि यह समझना आवश्यक है कि उसके पीछे पीड़ा और निराशा का एक लंबा इतिहास भी हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न्यायपालिका की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्षता के साथ-साथ उसकी संवेदनशीलता भी है। यदि कोई व्यक्ति अदालत में अत्यधिक तनावग्रस्त दिखाई देता है, तो उसके साथ कानून के अनुसार व्यवहार करते हुए उसकी मानसिक स्थिति को भी समझना चाहिए। न्याय केवल आदेश सुनाने से पूरा नहीं होता, बल्कि यह विश्वास भी पैदा करता है कि अदालत ने व्यक्ति की बात पूरी गंभीरता से सुनी और समझी। यही विश्वास लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी सच है कि न्याय में विलंब, लंबी कानूनी प्रक्रिया और बढ़ते मुकदमों का बोझ कई लोगों में निराशा पैदा करता है। ऐसे में न्याय व्यवस्था को अधिक सुलभ, सरल और समयबद्ध बनाने की दिशा में लगातार प्रयास आवश्यक हैं। जब लोगों को समय पर न्याय मिलेगा, तो निराशा और असंतोष की स्थितियां भी कम होंगी। न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल विवादों का निपटारा नहीं, बल्कि समाज में विश्वास और संतुलन बनाए रखना भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस घटना ने एक और संदेश दिया है कि न्यायालय की गरिमा बनाए रखने में सभी की समान जिम्मेदारी है। यदि अदालत में अनुशासन समाप्त हो जाए, तो न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होगी और इसका नुकसान अंततः आम नागरिक को ही होगा। इसलिए चाहे वह वरिष्ठ अधिवक्ता हों, नए वकील हों या स्वयं पक्षकार, सभी को यह समझना होगा कि अदालत में शब्दों का चयन, व्यवहार की मर्यादा और कानून के प्रति सम्मान सर्वोपरि है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर न्यायपालिका की उदारता भी सराहनीय है। यदि अदालत चाहती तो अवमानना की कार्रवाई कर सकती थी, लेकिन उसने संयम दिखाया और कठोर दंड देने के बजाय मामले को वहीं समाप्त करना उचित समझा। यह निर्णय बताता है कि न्याय केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि विवेक, धैर्य और करुणा का संतुलित स्वरूप है। हालांकि इस उदारता का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि भविष्य में कोई भी व्यक्ति अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाने का साहस करे। कानून का सम्मान हर परिस्थिति में अनिवार्य है।</div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र में न्यायपालिका अंतिम आशा होती है। जब प्रशासन, व्यवस्था और अन्य संस्थाओं से निराश व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है, तो उसके मन में उम्मीद की आखिरी किरण बची होती है। इसलिए अदालतों को भी यह ध्यान रखना होगा कि उनके सामने खड़ा हर व्यक्ति केवल एक केस नंबर नहीं, बल्कि अपने जीवन की किसी गहरी समस्या से जूझता हुआ इंसान है। उसकी बात सुनते समय कानून के साथ मानवीय संवेदना भी बनी रहनी चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस घटना से देश को दो महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं। पहली, अदालत की गरिमा किसी भी कीमत पर भंग नहीं होनी चाहिए। न्यायालय में अपशब्द, आक्रोश और अभद्र व्यवहार लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध हैं। दूसरी, न्याय व्यवस्था को लोगों की पीड़ा, मानसिक तनाव और संघर्ष को भी समझना चाहिए, क्योंकि न्याय केवल निर्णय देने का नाम नहीं, बल्कि समाज में विश्वास बनाए रखने की प्रक्रिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है और उसकी प्रतिष्ठा पूरे राष्ट्र की प्रतिष्ठा से जुड़ी हुई है। वहीं, अदालत की चौखट पर आने वाला हर व्यक्ति न्याय की उम्मीद लेकर आता है। इसलिए आवश्यक है कि एक ओर अधिवक्ता और पक्षकार अपनी मर्यादा और जिम्मेदारी को समझें, तो दूसरी ओर न्याय व्यवस्था भी हर पीड़ित की व्यथा को महसूस करते हुए कानून और संवेदना के बीच संतुलन बनाए रखे। यही संतुलन भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति है और यही लोकतंत्र की स्थायी पहचान भी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 22:12:25 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>रिश्तों की नींव में दरार</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">हाल ही में आगरा में सामने आए उस हृदयविदारक मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया, जिसमें एक महिला पर अपने पति की हत्या कर शव को बाथरूम के फर्श के नीचे दफनाने का आरोप है। यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि हमारे समाज के बदलते मनोविज्ञान, पारिवारिक मूल्यों के क्षरण और रिश्तों में बढ़ती कटुता का गंभीर संकेत भी है। जिस घर को सुरक्षा, स्नेह और विश्वास का प्रतीक माना जाता है, वही यदि भय और हिंसा का केंद्र बन जाए तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">आज का समय अभूतपूर्व तकनीकी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182836/cracks-in-the-foundation-of-relationships"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(1)2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">हाल ही में आगरा में सामने आए उस हृदयविदारक मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया, जिसमें एक महिला पर अपने पति की हत्या कर शव को बाथरूम के फर्श के नीचे दफनाने का आरोप है। यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि हमारे समाज के बदलते मनोविज्ञान, पारिवारिक मूल्यों के क्षरण और रिश्तों में बढ़ती कटुता का गंभीर संकेत भी है। जिस घर को सुरक्षा, स्नेह और विश्वास का प्रतीक माना जाता है, वही यदि भय और हिंसा का केंद्र बन जाए तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज का समय अभूतपूर्व तकनीकी प्रगति, आर्थिक अवसरों और आधुनिक जीवनशैली का दौर है, लेकिन दूसरी ओर मानवीय संवेदनाएं और रिश्तों की गर्माहट लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही हैं। पति-पत्नी का संबंध भारतीय संस्कृति में सबसे पवित्र और विश्वासपूर्ण माना गया है। यह रिश्ता केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और अनेक भावनाओं का संगम होता है। जब इसी रिश्ते में अविश्वास, क्रोध, स्वार्थ और हिंसा प्रवेश कर जाते हैं, तब उसका परिणाम केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की आत्मा को भी घायल करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पिछले कुछ महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों से पति या पत्नी द्वारा अपने जीवनसाथी की हत्या के कई मामले सामने आए हैं। कहीं अवैध संबंधों के कारण हत्या हुई, कहीं संपत्ति के विवाद ने रिश्ते खत्म कर दिए, तो कहीं लंबे समय से चले आ रहे घरेलू विवाद हिंसक रूप ले बैठे। इन घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया है कि जिन लोगों ने साथ जीने-मरने की कसमें खाईं, वे एक-दूसरे के प्राण लेने तक पहुंच रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी सच है कि ऐसे अपराध समाज के अधिकांश परिवारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। देश में करोड़ों परिवार आज भी प्रेम, विश्वास और परस्पर सम्मान के साथ जीवन जी रहे हैं। लेकिन जब इस प्रकार की घटनाएं बार-बार सामने आती हैं, तो वे समाज के सामने गंभीर प्रश्न अवश्य खड़े करती हैं। क्या हमारी सहनशीलता कम हो रही है? क्या संवाद की जगह आक्रोश ने ले ली है? क्या छोटी-छोटी बातों का समाधान बातचीत से निकालने की बजाय हिंसा को आसान रास्ता समझा जाने लगा है?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आधुनिक जीवन की भागदौड़, आर्थिक दबाव, बढ़ती अपेक्षाएं, मानसिक तनाव और सामाजिक प्रतिस्पर्धा ने पारिवारिक जीवन को प्रभावित किया है। पति-पत्नी दोनों कामकाजी हों या एक ही व्यक्ति परिवार की जिम्मेदारी निभा रहा हो, हर स्थिति में मानसिक दबाव पहले की तुलना में कहीं अधिक है। यदि इन परिस्थितियों में संवाद समाप्त हो जाए, एक-दूसरे को समझने का प्रयास खत्म हो जाए और अहंकार रिश्तों पर हावी हो जाए, तो विवाद गहराते चले जाते हैं। ऐसे विवादों का समाधान कानून, परिवार, परामर्श या आपसी बातचीत से निकल सकता है, लेकिन हिंसा कभी समाधान नहीं हो सकती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आगरा की घटना में जिस तरह शव को छिपाने का प्रयास किया गया, उसने लोगों को स्तब्ध कर दिया। यह घटना केवल हत्या तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसके बाद किए गए कथित प्रयासों ने भी समाज को विचलित किया। ऐसे मामलों में कानून अपना कार्य करता है और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से दोषी या निर्दोष का निर्णय होता है। इसलिए किसी भी आरोपी को अंतिम रूप से दोषी मानना न्यायालय के निर्णय के बाद ही उचित होता है। फिर भी ऐसी घटनाएं यह अवश्य बताती हैं कि अपराध की मानसिकता कितनी भयावह हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज परिवारों में रिश्ते कभी-कभी सूत के धागे जैसे नाजुक प्रतीत होते हैं। छोटी-सी गलतफहमी, आर्थिक विवाद, संदेह या अहंकार वर्षों पुराने संबंधों को तोड़ देता है। पहले परिवार के बड़े-बुजुर्ग विवादों को बैठकर सुलझाते थे। संयुक्त परिवारों में संवाद के अधिक अवसर होते थे। अब एकल परिवारों के बढ़ने, सामाजिक दूरी और व्यस्त जीवनशैली के कारण कई लोग अपनी मानसिक परेशानियां भीतर ही भीतर दबाए रहते हैं। जब भावनाएं लंबे समय तक दबती रहती हैं, तो कभी-कभी उनका विस्फोट अत्यंत दुखद रूप में सामने आता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी आवश्यक है कि समाज किसी एक वर्ग या लिंग को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति से बचे। अपराध करने वाला व्यक्ति पुरुष भी हो सकता है और महिला भी। कानून की दृष्टि में अपराधी केवल अपराधी होता है। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर पूरे समाज, किसी पीढ़ी या किसी लिंग के बारे में व्यापक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपराध के कारणों को समझें और उन्हें रोकने के उपाय खोजें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। तनाव, अवसाद, गुस्सा और संबंधों में बढ़ती दूरी को समय रहते पहचानना और उनका समाधान करना अत्यंत आवश्यक है। यदि पति-पत्नी के बीच मतभेद हैं, तो परिवार, मित्र, विवाह परामर्शदाता या कानूनी प्रक्रिया की सहायता ली जा सकती है। अलग होना पड़े तो वह भी कानून के दायरे में और गरिमा के साथ होना चाहिए। तलाक एक वैधानिक प्रक्रिया है, जबकि हत्या मानवता और कानून—दोनों के विरुद्ध जघन्य अपराध है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मीडिया और सोशल मीडिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। अपराधों की जानकारी समाज तक पहुंचाना आवश्यक है, लेकिन उनके सनसनीखेज चित्रण की बजाय यह भी बताया जाना चाहिए कि ऐसे अपराधों के पीछे कौन-से सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण काम करते हैं तथा उनसे बचाव कैसे किया जा सकता है। समाज को भय और सनसनी नहीं, बल्कि जागरूकता और संवेदनशीलता की आवश्यकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बच्चों और युवाओं को बचपन से ही संवाद, सहनशीलता, नैतिकता और सम्मानजनक व्यवहार की शिक्षा देना समय की मांग है। परिवार केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का आधार होता है। यदि घरों में प्रेम, विश्वास और धैर्य का वातावरण बनेगा, तो समाज भी अधिक सुरक्षित और संवेदनशील बनेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हर दिन दर्ज होने वाले हत्या, मारपीट, अपहरण और अन्य गंभीर अपराध निश्चित रूप से चिंता पैदा करते हैं। लेकिन इन घटनाओं के बीच यह याद रखना भी जरूरी है कि समाज में आज भी असंख्य लोग ईमानदारी, प्रेम और पारिवारिक मूल्यों के साथ जीवन जी रहे हैं। हमें उन्हीं सकारात्मक मूल्यों को मजबूत करना होगा, ताकि हिंसा की प्रवृत्ति को रोका जा सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रिश्ते विश्वास से बनते हैं और विश्वास टूटने पर सबसे बड़ी क्षति केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज की होती है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित, संवेदनशील और संस्कारित वातावरण में जीवन जीएं, तो हमें संवाद, धैर्य, परस्पर सम्मान और नैतिक मूल्यों को फिर से अपने पारिवारिक जीवन का आधार बनाना होगा। यही वह मार्ग है जो समाज को हिंसा से दूर और मानवीयता के निकट ले जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 22:02:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हिरासत में मौत और पुलिसिया हिंसा के मामलों में अभियोजन मंजूरी जरूरी नहीं: ।मध्य प्रदेश हाईकोर्ट।</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181536/prosecution-sanction-is-not-necessary-in-cases-of-custodial-death"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas6.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">याचिकाकर्ता पुलिसकर्मियों ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ अभियोजन चलाने से पहले सरकार की मंजूरी आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि कथित घटनाएं उनके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़ी हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मामले के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूचित जाति समुदाय से संबंध रखने वाले 24 वर्षीय पंकज वैष्णव को 19 दिसंबर 2015 को स्कूटर चोरी के मामले में पूछताछ के लिए इंदौर के एमआईजी थाने लाया गया। उसी रात उसकी पुलिस हिरासत में मौत हो गई। पुलिस ने इसे आत्महत्या बताया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घटना के बाद </span>CrPC <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 176 के तहत स्वतंत्र जांच कराई गई। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की गई जांच में निष्कर्ष निकाला गया कि यह मामला आपराधिक मानव वध का प्रतीत होता है।इसके बाद दो आरक्षकों और एक थाना प्रभारी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवैध निरुद्ध करने और झूठे साक्ष्य देने सहित विभिन्न आरोपों में आरोपपत्र दायर किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 197 के संरक्षण का लाभ तभी मिल सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आरोपित कृत्य और सरकारी कर्तव्य के निर्वहन के बीच स्पष्ट और उचित संबंध हो। लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा कोई संबंध नहीं पाया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने कहा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">यह ऐसा मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें पुलिसकर्मी किसी हिंसक भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे और बल प्रयोग करते हुए अपनी सीमा से आगे बढ़ गए हों। यहां आरोपित बल प्रयोग उस समय किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब मृतक पुलिस हिरासत में था और थाने के नियंत्रण में था। ऐसी स्थिति में बल प्रयोग या शारीरिक हमला करने का कोई औचित्य नहीं था।”</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि कानून पुलिस को कुछ विशेष परिस्थितियों में बल प्रयोग की अनुमति देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे हिंसक भीड़ को तितर-बितर करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिरफ्तारी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें कहा गया कि हिरासत में हिंसा और मौत सभ्य समाज में सबसे गंभीर अपराधों में से हैं तथा यह व्यक्ति के मूल मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आरक्षकों की पुनरीक्षण याचिका खारिज की और स्पष्ट किया कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा जैसे मामलों में धारा 197 के तहत अभियोजन मंजूरी का संरक्षण उपलब्ध नहीं होगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 13:57:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चार दीवारों के भीतर, सार्वजनिक शांति में कोई खलल नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को गोहत्या के आरोपी दो लोगों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1980 (एनएसए</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी हिरासत आदेश रद्द किया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कथित घटना घर की चारदीवारी के भीतर हुई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि किसी सार्वजनिक स्थान पर।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस राजीव मिश्रा और जस्टिस डॉ. अजय कुमार-</span>II <span lang="hi" xml:lang="hi">की खंडपीठ ने इस प्रकार इशम उर्फ इसम और समीर द्वारा दायर दो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को स्वीकार किया और निर्देश दिया कि उन्हें तत्काल हिरासत से रिहा किया जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  कोर्ट ने टिप्पणी की कि कथित घटना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें केवल</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180333/no-disturbance-of-public-peace-within-the-four-walls"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/allahabad-high-court1.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को गोहत्या के आरोपी दो लोगों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1980 (एनएसए</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी हिरासत आदेश रद्द किया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कथित घटना घर की चारदीवारी के भीतर हुई थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि किसी सार्वजनिक स्थान पर।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस राजीव मिश्रा और जस्टिस डॉ. अजय कुमार-</span>II <span lang="hi" xml:lang="hi">की खंडपीठ ने इस प्रकार इशम उर्फ इसम और समीर द्वारा दायर दो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को स्वीकार किया और निर्देश दिया कि उन्हें तत्काल हिरासत से रिहा किया जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> कोर्ट ने टिप्पणी की कि कथित घटना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें केवल एक गाय की हत्या शामिल थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके कारण न तो कोई हिंसा हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न ही सार्वजनिक शांति और व्यवस्था में कोई खलल पड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और न ही सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">उपर्युक्त चर्चा के आलोक में यह अकाट्य निष्कर्ष निकलता है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ एनएसए</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी हिरासत आदेश न तो कानून की दृष्टि से और न ही तथ्यों के आधार पर कायम रखा जा सकता है। अतः</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह आदेश इस न्यायालय द्वारा रद्द किए जाने योग्य है।"</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हिरासत जारी करने वाले प्राधिकारी (जिला मजिस्ट्रेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शामली) ने मूल रूप से एनएसए की धारा 3(2) के तहत विवादित हिरासत आदेश जारी किया। यह आदेश याचिकाकर्ताओं के खिलाफ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यूपी गोहत्या निवारण अधिनियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">1955</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 3</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">5</span>A <span lang="hi" xml:lang="hi">और 8 के तहत दर्ज </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एफआईआर </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के आधार पर जारी किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हिरासत के कारणों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस को 23 अप्रैल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2025 को शिकायतकर्ता से सूचना मिली थी कि कुछ लोग गोहत्या कर रहे हैं। घर के भीतर तलाशी लेने पर पुलिस को एक कटा हुआ सिर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पैर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाल और मांस बरामद हुआ। पशु चिकित्सक द्वारा किए गए वैज्ञानिक परीक्षण के बाद बरामद मांस की पहचान </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बीफ</span>' (<span lang="hi" xml:lang="hi">गोमांस) के रूप में हुई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शेष सामग्री की पहचान गाय की संतान (बछड़े/बछिया) के अवशेषों के रूप में की गई। जहां आरोपी हासिम को अगले ही दिन (24 अप्रैल) गिरफ्तार कर लिया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं आरोपी समीर को 27 जून को ही गिरफ्तार किया जा सका।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आगे भेजी गई रिपोर्ट मिलने पर ज़िला मजिस्ट्रेट ने 7 जुलाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">2025 को हिरासत के आदेश जारी किए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ताओं को 12 महीने की अवधि के लिए हिरासत में रखा जाए। राज्य सरकार ने आखिरकार 19 अगस्त को इस आदेश की पुष्टि की। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">   </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हिरासत को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं के वकील गौतम बघेल ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं का कथित कृत्य उनके घर की सीमाओं के बाहर नहीं हुआ। इसलिए यह निजी तौर पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोगों की नज़र से दूर किया गया। यह भी कहा गया कि प्रतिवादियों द्वारा दायर जवाबी हलफनामे में ऐसा कोई दावा नहीं था कि याचिकाकर्ता के कृत्य के कारण कोई सांप्रदायिक हिंसा हुई हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक शांति भंग हुई हो या किसी व्यक्ति को चोट लगी हो।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उपरोक्त के परिणामस्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न तो कोई हिंसा हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न ही सार्वजनिक शांति और व्यवस्था में कोई बाधा आई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और न ही सांप्रदायिक सौहार्द में कोई खलल पड़ा।" इसलिए इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए कि हिरासत का आदेश न तो कानून की नज़र में और न ही तथ्यों के आधार पर सही ठहराया जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेंच ने हिरासत के आदेश को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उसके बाद राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए पुष्टि आदेश को भी रद्द कर दिया।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/180333/no-disturbance-of-public-peace-within-the-four-walls</link>
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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:21:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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