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                <title>Global Diplomacy - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Global Diplomacy RSS Feed</description>
                
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                <title>सेशेल्स यात्रा से मजबूत हुआ भारत का समुद्री सामरिक सहयोग और वैश्विक विश्वास का नया अध्याय</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सेशेल्स यात्रा केवल एक औपचारिक राजकीय यात्रा नहीं बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका मजबूत कूटनीति और वैश्विक विश्वास का प्रभावशाली उदाहरण है । इस यात्रा ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अपने पड़ोसी और मित्र देशों के साथ विश्वास सम्मान और साझेदारी के आधार पर संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है ।सेशेल्स जैसे छोटे लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण द्वीपीय देश के साथ भारत के संबंध केवल रणनीतिक हितों तक सीमित नहीं हैं बल्कि दोनों  के बीच ऐतिहासिक सांस्कृतिक और मानवीय जुड़ाव भी उतना</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182370/seychelles-visit-strengthens-indias-maritime-strategic-cooperation-and-new-chapter"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas27.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सेशेल्स यात्रा केवल एक औपचारिक राजकीय यात्रा नहीं बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका मजबूत कूटनीति और वैश्विक विश्वास का प्रभावशाली उदाहरण है । इस यात्रा ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अपने पड़ोसी और मित्र देशों के साथ विश्वास सम्मान और साझेदारी के आधार पर संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है ।सेशेल्स जैसे छोटे लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण द्वीपीय देश के साथ भारत के संबंध केवल रणनीतिक हितों तक सीमित नहीं हैं बल्कि दोनों  के बीच ऐतिहासिक सांस्कृतिक और मानवीय जुड़ाव भी उतना ही गहरा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सेशेल्स पहुंचने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया जो किसी भी राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख के प्रति सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक शुरू हुई जिसमें समुद्री सुरक्षा रक्षा सहयोग तटीय निगरानी क्षमता बढ़ाने और हिंद महासागर क्षेत्र में शांति तथा स्थिरता बनाए रखने जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई दोनों देशों के बीच सहयोग के नए आयाम स्थापित करने की दिशा में कई समझौतों पर भी विचार किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत लंबे समय से हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और विकास के साझा दृष्टिकोण को आगे बढ़ाता रहा है सेशेल्स इस दृष्टि से भारत का एक महत्वपूर्ण समुद्री साझेदार है क्योंकि यह देश उन समुद्री मार्गों के निकट स्थित है जिनसे दुनिया का बड़ा व्यापार संचालित होता है ऐसे में समुद्री डकैती अवैध मछली पकड़ने मानव तस्करी और अन्य समुद्री अपराधों पर नियंत्रण के लिए भारत और सेशेल्स का सहयोग पूरे क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर भारत में निर्मित फास्ट पेट्रोल वेसल लेस्पवार सेशेल्स को सौंपा जिससे वहां की कोस्ट गार्ड की क्षमता और अधिक मजबूत होगी यह केवल एक रक्षा सहयोग नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत की तकनीकी क्षमता और मित्र देशों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का भी प्रतीक है ।भारत पहले भी सेशेल्स को समुद्री निगरानी विमान और अन्य सुरक्षा उपकरण उपलब्ध करा चुका है। जिससे दोनों देशों के बीच विश्वास लगातार मजबूत हुआ है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस यात्रा की एक और ऐतिहासिक उपलब्धि यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सेशेल्स की नेशनल असेंबली को संबोधित करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय परंपराओं के प्रति विश्व समुदाय के सम्मान को भी दर्शाती है। किसी दूसरे देश की संसद को संबोधित करना दोनों देशों के बीच गहरे राजनीतिक विश्वास और परस्पर सम्मान का प्रमाण माना जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत और सेशेल्स के बीच संबंधों का इतिहास लगभग ढाई सौ वर्षों से भी अधिक पुराना है। जब वर्ष सत्रह सौ सत्तर में यहां पहली स्थायी बस्ती बसाई गई, तब वहां पहुंचने वाले पहले लोगों में पांच भारतीय भी शामिल थे। बाद के वर्षों में बिहार तमिलनाडु और गुजरात से बड़ी संख्या में भारतीय यहां जाकर बसे और उन्होंने व्यापार कृषि निर्माण तथा सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज भी सेशेल्स की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भारतीय मूल का है। जिसने दोनों देशों के संबंधों को पीढ़ी दर पीढ़ी मजबूत बनाए रखा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सेशेल्स के पूर्व राष्ट्रपति वेवेल रामकलावन के पूर्वज भी भारत के बिहार राज्य से जुड़े रहे हैं। यह तथ्य दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की गहराई को दर्शाता है। भारतीय मूल के लोग वहां केवल आर्थिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहे बल्कि उन्होंने शिक्षा स्वास्थ्य व्यापार और प्रशासन जैसे अनेक क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने सेशेल्स के नेशनल बोटैनिकल गार्डन का भी दौरा किया जहां उन्होंने राष्ट्रपति के साथ पौधारोपण किया और प्रसिद्ध एल्डाब्रा विशालकाय कछुओं को पत्तियां खिलाईं। यह प्रतीकात्मक कार्यक्रम पर्यावरण संरक्षण जैव विविधता और प्रकृति के प्रति साझा जिम्मेदारी का संदेश देता है ।सेशेल्स अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता दुर्लभ समुद्री जीवों और विश्व प्रसिद्ध एल्डाब्रा विशालकाय कछुओं के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सेशेल्स का भौगोलिक क्षेत्रफल भले ही बहुत छोटा हो लेकिन इसका समुद्री आर्थिक क्षेत्र अत्यंत विशाल है ।यही कारण है कि दुनिया की बड़ी शक्तियां इस क्षेत्र को रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानती हैं। भारत हमेशा इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग और साझेदारी की नीति पर विश्वास करता आया है यही सोच भारत को अन्य देशों से अलग पहचान दिलाती है।</div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि इस वर्ष भारत और सेशेल्स के राजनयिक संबंधों के पचास वर्ष पूरे हो रहे हैं। यह केवल एक वर्षगांठ नहीं बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास मित्रता और साझा विकास की सफल यात्रा का उत्सव है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह यात्रा आने वाले समय में दोनों देशों के संबंधों को और अधिक मजबूत बनाएगी तथा हिंद महासागर क्षेत्र में शांति सुरक्षा और समृद्धि के साझा लक्ष्य को नई गति प्रदान करेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज जब पूरी दुनिया बदलते वैश्विक समीकरणों और नई चुनौतियों का सामना कर रही है तब भारत की विदेश नीति विश्व बंधुत्व आपसी सम्मान और समान विकास के सिद्धांतों पर आगे बढ़ रही है। भारत छोटे और विकासशील देशों को बराबरी का सम्मान देता है और उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप सहयोग प्रदान करता है। यही कारण है कि भारत की विश्वसनीयता लगातार बढ़ रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सेशेल्स यात्रा ने यह भी सिद्ध कर दिया कि भारत केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा तक सीमित नहीं है बल्कि वह पूरे हिंद महासागर क्षेत्र को सुरक्षित शांतिपूर्ण और समृद्ध बनाने के लिए अपने मित्र देशों के साथ मिलकर कार्य कर रहा है आने वाले समय में यह साझेदारी समुद्री सुरक्षा व्यापार पर्यटन पर्यावरण संरक्षण और तकनीकी सहयोग जैसे अनेक क्षेत्रों में नई उपलब्धियां हासिल करेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत और सेशेल्स की यह मित्रता केवल सरकारों के बीच संबंध नहीं बल्कि दोनों देशों के लोगों के बीच विश्वास अपनत्व और साझा भविष्य की मजबूत नींव है। यही कारण है कि यह यात्रा आने वाले वर्षों में भारत की सफल कूटनीति और वैश्विक नेतृत्व के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद की जाएगी।</div>
<div style="text-align:justify;"><strong>        *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="WhmR8e"></div>
</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 17:59:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जर्मनी की राजनीति में बड़ा झटका</title>
                                    <description><![CDATA[<p>यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और विश्व राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले जर्मनी को इस सप्ताह एक बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) की अस्थायी सदस्यता के चुनाव में जर्मनी को हार का सामना करना पड़ा, जिससे देश की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए मतदान में जर्मनी आवश्यक समर्थन जुटाने में असफल रहा। पश्चिमी यूरोपीय समूह की सीटों के लिए हुए चुनाव में ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल को सफलता मिली, जबकि जर्मनी पहली बार इस तरह की महत्वपूर्ण हार का सामना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180771/big-shock-in-german-politics"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/76959563_1006.webp" alt=""></a><br /><p>यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और विश्व राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले जर्मनी को इस सप्ताह एक बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) की अस्थायी सदस्यता के चुनाव में जर्मनी को हार का सामना करना पड़ा, जिससे देश की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए मतदान में जर्मनी आवश्यक समर्थन जुटाने में असफल रहा। पश्चिमी यूरोपीय समूह की सीटों के लिए हुए चुनाव में ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल को सफलता मिली, जबकि जर्मनी पहली बार इस तरह की महत्वपूर्ण हार का सामना कर रहा है।</p>
<p>राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के वर्षों में जर्मनी की विदेश नीति, विशेषकर यूक्रेन युद्ध, इज़राइल समर्थन और विदेशी सहायता बजट में कटौती जैसे मुद्दों ने कई देशों को उससे दूर कर दिया। यही कारण रहा कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक देशों का अपेक्षित समर्थन जर्मनी को नहीं मिल सका।</p>
<p>जर्मनी के विदेश मंत्री और सरकारी अधिकारियों ने इस परिणाम पर निराशा व्यक्त की है। सरकार का कहना है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी सक्रिय भूमिका जारी रखेगी और वैश्विक चुनौतियों के समाधान में योगदान देती रहेगी। हालांकि विपक्षी दलों ने इसे सरकार की कूटनीतिक विफलता करार दिया है और विदेश नीति की समीक्षा की मांग की है।</p>
<p>इस हार के बाद जर्मनी में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोप और वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों के बीच संतुलन बनाने में जर्मनी अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाया। इसके चलते उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को झटका लगा है।</p>
<p>विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना केवल एक चुनावी हार नहीं बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत भी है। आने वाले समय में जर्मनी को अपनी विदेश नीति, विकास सहयोग कार्यक्रमों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को और मजबूत करना होगा ताकि वह विश्व मंच पर अपनी प्रभावशाली भूमिका बनाए रख सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>यूरोप</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/180771/big-shock-in-german-politics</link>
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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 19:32:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गरीब मरीज पूछ रहा है— क्या मेरा जीवन इतना सस्ता है?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा अस्पतालों की इमारतों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज को समय पर मिलने वाले उपचार से होती है। दुर्भाग्य से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश की चिकित्सा व्यवस्था के सर्वोच्च प्रतीकों में गिने जाने वाले</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  एम्स भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी प्रतीक्षा की समस्या से जूझ रहे हैं। एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल में गैर-इमरजेंसी (रूटीन) केस में कई मरीजों को सीटी स्कैन या एमआरआई जैसी जरूरी जांच के लिए तीन-चार माह इंतजार करना पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह केवल संसाधनों की कमी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का संकेत है। बीमारी न प्रशासनिक प्रक्रियाओं का इंतजार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180672/the-poor-patient-is-asking-%E2%80%93-is-my-life-so"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/360_f_334557287_wuhbarg68kugnheiwrgwanrxqtrl8wwv.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा अस्पतालों की इमारतों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज को समय पर मिलने वाले उपचार से होती है। दुर्भाग्य से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश की चिकित्सा व्यवस्था के सर्वोच्च प्रतीकों में गिने जाने वाले</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> एम्स भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी प्रतीक्षा की समस्या से जूझ रहे हैं। एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल में गैर-इमरजेंसी (रूटीन) केस में कई मरीजों को सीटी स्कैन या एमआरआई जैसी जरूरी जांच के लिए तीन-चार माह इंतजार करना पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह केवल संसाधनों की कमी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का संकेत है। बीमारी न प्रशासनिक प्रक्रियाओं का इंतजार करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न सरकारी गति का</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह हर दिन गंभीर होती जाती है। ऐसे में </span>120 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन बाद जांच की तारीख मिलना एक चिंताजनक प्रश्न खड़ा करता है—इसका बोझ आखिर कौन उठाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका परिवार या उसका जीवन</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स भोपाल की लंबी वेटिंग लिस्ट अब केवल एक अस्पताल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की समस्या</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पुरानी चुनौती का प्रतीक बन गई है। कम खर्च में बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले लाखों गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों के लिए सस्ता इलाज भी तब बेमानी हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब जरूरी जांच ही महीनों बाद उपलब्ध हो। पेट के असहनीय दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर की आशंका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मस्तिष्क रोग या अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज यदि केवल व्यवस्थागत कमी के कारण चार माह प्रतीक्षा करने को विवश हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह स्वास्थ्य सेवा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनहीनता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बीमारी किसी वेटिंग लिस्ट का इंतजार नहीं करती</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वह लगातार बढ़ती जाती है और कई बार उपचार की संभावनाओं को भी सीमित कर देती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना यह है कि इस व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ उसी वर्ग पर पड़ रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके नाम पर राजनीति सबसे अधिक होती है। आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति निजी अस्पताल में कुछ घंटों या दिनों में जांच करा लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मजदूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटा व्यापारी और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह विकल्प अक्सर पहुंच से बाहर होता है। ऐसे में उसके सामने दो ही रास्ते बचते हैं—कर्ज लेकर निजी जांच कराए या दर्द और आशंका के बीच सरकारी अस्पताल की लंबी प्रतीक्षा सहे। यह केवल चिकित्सा व्यवस्था की विफलता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सामाजिक असमानता का भी दर्पण है। स्वास्थ्य सुविधाएं आय से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवश्यकता से तय होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु मौजूदा व्यवस्था में पैसे वालों को समय मिलता है और अभावग्रस्तों को इंतजार।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी वेटिंग लिस्ट वर्षों से बढ़ती मांग और अपर्याप्त संसाधन विस्तार की कीमत है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मरीजों का बोझ बढ़ता रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन डॉक्टरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञों और तकनीकी कर्मचारियों की संख्या लगभग वहीं ठहरी रही। कई सुपर-स्पेशियलिटी विभाग सीमित मानव संसाधनों पर निर्भर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि रेडियो डायग्नोसिस जैसे अहम विभाग पर्याप्त स्टाफ के अभाव में अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे। परिणाम सामने है—संसाधन मौजूद हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर सेवाएं नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मशीनें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर समय पर जांच नहीं। प्रश्न यह है कि जब बढ़ती जरूरतें वर्षों से दिखाई दे रही थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उनकी तैयारी क्यों नहीं की गई</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आखिर किस स्तर की चूक ने देश के अग्रणी चिकित्सा संस्थानों को भी प्रतीक्षा के संकट में धकेल दिया</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब राजनीति का केंद्र तात्कालिक लोकप्रियता बन जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब अस्पतालों की जरूरतें अक्सर हाशिये पर चली जाती हैं। यही कारण है कि मुफ्त योजनाओं और लोकलुभावन घोषणाओं पर अरबों रुपये खर्च हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन डॉक्टरों की भर्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई मशीनों और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए संसाधनों का अभाव बताया जाता है। विडंबना यह है कि वोट के लिए खजाना खुल जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर जीवन बचाने के लिए बजट सीमित पड़ जाता है। वास्तविक जनकल्याण मुफ्त सुविधाएं बांटने में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था खड़ी करने में है जहां किसी मरीज को जांच के लिए महीनों प्रतीक्षा न करनी पड़े। स्वास्थ्य और शिक्षा के बुनियादी ढांचे पर गंभीर निवेश ही देश की तस्वीर बदल सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब जरूरत आश्वासनों नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्रवाई की है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल में अतिरिक्त सीटी स्कैन और एमआरआई मशीनें लगाई जाएं तथा रेडियो डायग्नोसिस विभाग में विशेषज्ञ डॉक्टरों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीशियनों और कर्मचारियों की भर्ती हो। उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए </span>24 <span lang="hi" xml:lang="hi">घंटे शिफ्ट आधारित संचालन लागू किया जाए। आयुष्मान भारत के दायरे में सभी आवश्यक जांचें लाई जाएं और सार्वजनिक-निजी भागीदारी से सुविधाओं का विस्तार हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना मरीजों पर अतिरिक्त बोझ डाले। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल अपॉइंटमेंट प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाया जाए। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल की स्थिति को चेतावनी मानते हुए देशभर के सरकारी अस्पतालों में संसाधन और मानवबल बढ़ाना अनिवार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि मरीजों को इलाज मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंतजार नहीं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य व्यवस्था का बोझ केवल </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे संस्थानों के भरोसे नहीं उठाया जा सकता। जब जिला अस्पतालों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेडिकल कॉलेजों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं होंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बड़े संस्थानों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए स्वास्थ्य शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोग-निवारण और प्रारंभिक जांच व्यवस्था को मजबूत करना उतना ही जरूरी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना उपचार सुविधाओं का विस्तार। मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने और ग्रामीण क्षेत्रों तक आधुनिक जांच सुविधाएं पहुंचाने पर भी समान ध्यान देना होगा। आखिर स्वास्थ्य व्यवस्था केवल भवनों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सक्षम मानव संसाधन और जवाबदेह प्रशासन से मजबूत बनती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य कोई दया या उपकार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नागरिक का मौलिक अधिकार है। यदि किसी मरीज को अपनी बीमारी की सच्चाई जानने के लिए महीनों प्रतीक्षा करनी पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह व्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था की नाकामी है। एम्स</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोपाल की चार माह लंबी जांच प्रतीक्षा सूची इसी विफलता का प्रतीक है। यह मौन संकट हजारों परिवारों की चिंता बढ़ा रहा है। सरकारों को याद रखना होगा कि अस्पतालों की कतारों में खड़े लोग आंकड़े नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंसान हैं। यदि स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं मिली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जनकल्याण के दावे अर्थहीन रह जाएंगे। आखिर सवाल यही है—</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या एक गरीब मरीज के लिए महीनों का इंतजार सामान्य हो गया है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जांच में हर देरी कई बार जीवन की संभावनाएं भी कम कर देती है। ऐसी व्यवस्था पर गर्व नहीं किया जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां बीमारी की रफ्तार उपचार से तेज हो।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/180672/the-poor-patient-is-asking-%E2%80%93-is-my-life-so</link>
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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 18:44:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>बदलते परिवेश में भी भारत और रूस की मित्रता रहेगी कायम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक कूटनीति के निरंतर बदलते स्वरूप के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत के संदर्भ में दिया गया हालिया बयान दोनों देशों के बीच की प्रगाढ़ और ऐतिहासिक मित्रता को एक नई ऊर्जा प्रदान करता है। पुतिन ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में भारत को रूस का एक बेहद भरोसेमंद साझेदार करार दिया है। इसके साथ ही उन्होंने वैश्विक मंच पर एक बहुत बड़ा संदेश देते हुए यह भी साफ कर दिया है कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक और कूटनीतिक नजदीकियों का असर मॉस्को और नई दिल्ली के गहरे संबंधों पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा। यह</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180668/friendship-between-india-and-russia-will-continue-even-in-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/1200-675-25531568-thumbnail-16x9-modi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक कूटनीति के निरंतर बदलते स्वरूप के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत के संदर्भ में दिया गया हालिया बयान दोनों देशों के बीच की प्रगाढ़ और ऐतिहासिक मित्रता को एक नई ऊर्जा प्रदान करता है। पुतिन ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में भारत को रूस का एक बेहद भरोसेमंद साझेदार करार दिया है। इसके साथ ही उन्होंने वैश्विक मंच पर एक बहुत बड़ा संदेश देते हुए यह भी साफ कर दिया है कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती रणनीतिक और कूटनीतिक नजदीकियों का असर मॉस्को और नई दिल्ली के गहरे संबंधों पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा। यह बयान इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि भारत ने अपनी विदेश नीति को किसी एक ध्रुव या गुट तक सीमित नहीं रखा है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज के समय में जब पश्चिमी देश लगातार विकासशील देशों पर अपने एजेंडे थोपने का प्रयास कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब पुतिन का यह कहना कि भारत पर रूस के साथ सहयोग कम करने के लिए डाला जा रहा पश्चिमी दबाव पूरी तरह से व्यर्थ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की सबसे बड़ी वैश्विक स्वीकार्यता है। यह बयान केवल दो नेताओं या दो देशों की सरकारों के बीच का कूटनीतिक संवाद नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह एक बदलते हुए विश्व के शक्ति संतुलन का बहुत ही सजीव चित्रण है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रूस और भारत के कूटनीतिक रिश्तों की बुनियाद कई दशकों के विश्वास और आपसी सहयोग पर टिकी है। वर्ष </span>1971<span lang="hi" xml:lang="hi"> की शांति और मैत्री संधि से लेकर आज </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक के सफर में दोनों देशों ने कई वैश्विक उतार चढ़ाव देखे हैं। जब भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को समर्थन की आवश्यकता पड़ी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूस ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी वीटो शक्ति का इस्तेमाल कर भारत का साथ दिया है। कश्मीर का मुद्दा हो या फिर आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूस हमेशा एक सच्चे मित्र की भांति भारत के साथ खड़ा रहा है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यही कारण है कि आज की सदी में भी यह रिश्ता मात्र कूटनीतिक समझौतों का मोहताज नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह दोनों देशों की जनता के बीच पनपे एक अटूट भावनात्मक जुड़ाव का भी प्रतीक है। पुतिन की बातों में इसी ऐतिहासिक विश्वास की झलक मिलती है। उन्हें इस बात का भलीभांति भान है कि भारत किसी भी बाहरी देश के दबाव में आकर अपने पुराने और सच्चे मित्र के साथ संबंधों में कोई भी कटौती नहीं करेगा। भारत की जनता और भारत के नीति निर्माता दोनों ही इस बात को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं कि संकट के समय में किसने उनका साथ दिया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फरवरी </span>2022<span lang="hi" xml:lang="hi"> में शुरू हुए यूक्रेन संकट के बाद से ही पश्चिमी देशों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर कई तरह के कड़े आर्थिक और कूटनीतिक प्रतिबंध लगाए हैं। इन पश्चिमी देशों ने भारत पर भी यह भारी दबाव बनाया कि वह रूस के साथ अपने व्यापारिक संबंध सीमित करे और वहां से कच्चे तेल की खरीद को रोक दे। लेकिन भारत ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया कि उसकी नीतियां उसके अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार तय होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि पश्चिमी देशों के फरमानों से। भारत ने न केवल रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए उसे कई गुना बढ़ा भी दिया। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले कुछ वर्षों में भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार ने </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर लिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि दोनों देशों द्वारा तय किए गए </span>2025<span lang="hi" xml:lang="hi"> के लक्ष्य से बहुत पहले ही हासिल कर लिया गया। आज रूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन चुका है। भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग </span>40<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत हिस्सा रूस से आयात कर रहा है। यह आंकड़ा इस बात को साबित करता है कि पश्चिमी देशों की धमकियां भारत के इरादों को डिगा नहीं पाईं और भारत ने अपने नागरिकों के हितों को सर्वोपरि रखा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक मोर्चे पर पुतिन द्वारा भारत के तीव्र विकास की जो विशेष रूप से प्रशंसा की गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भी अत्यंत महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य है। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी विकास दर लगातार </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत के आस पास बनी हुई है। देश में हो रहे भारी बुनियादी ढांचे के निर्माण और तकनीकी विकास ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रूस यह भलीभांति समझता है कि भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका एक प्रमुख विकास इंजन की तरह होने वाली है। ऐसे में रूस के लिए भारत सिर्फ एक पारंपरिक हथियार खरीदार नहीं रह गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरिक्ष और विनिर्माण क्षेत्र में एक विशाल बाजार और सहयोगी बन गया है। दोनों देश अपनी मुद्राओं यानी रुपये और रूबल में व्यापार करने की दिशा में भी लगातार काम कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में पश्चिमी मुद्राओं के एकाधिकार को चुनौती दी जा सके और दोनों देशों के व्यापारियों को विदेशी मुद्रा के उतार चढ़ाव से बचाया जा सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा क्षेत्र की बात करें तो भारत और रूस का सहयोग केवल आयात और निर्यात के पुराने मॉडल तक सीमित नहीं है। आज यह दोनों देश ब्रह्मोस मिसाइल जैसे अत्याधुनिक हथियारों का संयुक्त रूप से निर्माण कर रहे हैं जो कि पूरी दुनिया में अपनी तरह की सबसे बेहतरीन मिसाइल मानी जाती है। इसके अलावा एस </span>400<span lang="hi" xml:lang="hi"> वायु रक्षा प्रणाली की आपूर्ति भी दोनों देशों के बीच हुए एक ऐतिहासिक सौदे का हिस्सा है</span>, </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे पूरा करने के लिए भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के संभावित खतरे की भी बिल्कुल परवाह नहीं की। भारत में मेक इन इंडिया पहल के तहत कलाश्निकोव राइफल से लेकर अन्य कई रूसी रक्षा उपकरणों के निर्माण को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे भारत की अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता लगातार मजबूत हो रही है। पुतिन का यह अटूट भरोसा इन्हीं ठोस धरातल पर टिके वास्तविक प्रोजेक्ट्स के कारण और भी मजबूत होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जहां तक अमेरिका और भारत के बढ़ते संबंधों का प्रश्न है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुतिन की बेबाक टिप्पणी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में रूस की परिपक्वता को दर्शाती है। आज भारत क्वाड जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठनों का सक्रिय सदस्य है जिसमें अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। पश्चिमी कूटनीतिक विश्लेषकों का अक्सर यह मानना रहा है कि भारत की अमेरिका से यह बढ़ती नजदीकी रूस को खटकती है और इससे दोनों के रिश्ते खराब हो सकते हैं। परंतु रूसी राष्ट्रपति ने अपने इस स्पष्ट बयान से इस सारे भ्रम को पूरी तरह से तोड़ दिया है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रूस यह गहराई से जानता है कि भारत हिंद प्रशांत क्षेत्र में अपने सामरिक हितों की रक्षा और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका के साथ खड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि भारत रूस के खिलाफ किसी भी पश्चिमी एजेंडे का हिस्सा बन जाएगा। इसके विपरीत भारत शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मंचों पर भी रूस के साथ मजबूती से कदमताल कर रहा है। वर्ष </span>2024<span lang="hi" xml:lang="hi"> में ब्रिक्स का जो ऐतिहासिक विस्तार हुआ उसके बाद आज </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> में यह संगठन एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का सबसे बड़ा और मजबूत पैरोकार बन चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें भारत और रूस की धुरी सबसे अहम भूमिका निभा रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि पुतिन का भारत को लेकर यह बयान महज एक सामान्य राजनीतिक वक्तव्य नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह एक तेजी से उभरती हुई विश्व शक्ति के रूप में भारत के प्रति गहरे सम्मान का सीधा प्रकटीकरण है। पश्चिमी देशों को यह बहुत ही स्पष्ट संदेश है कि दुनिया अब उनके इशारों या उनकी नीतियों पर नहीं चलती। भारत अपने सभी निर्णयों में पूर्णतः स्वतंत्र है और वह अपने रणनीतिक मित्रों का चुनाव केवल अपनी शर्तों और अपने लाभ के आधार पर करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> रूस और भारत की यह प्रगाढ़ साझेदारी आने वाले समय में न केवल एशिया बल्कि संपूर्ण वैश्विक शक्ति संतुलन को बनाए रखने में एक मील का पत्थर साबित होगी। यह दोनों देश मिलकर जिस न्यायपूर्ण और बहुध्रुवीय दुनिया का निर्माण करना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें आपसी सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संप्रभुता का आदर और एक दूसरे के विकास में बिना शर्त योगदान ही सबसे प्रमुख स्तंभ होंगे। व्लादिमीर पुतिन के शब्दों ने दोनों देशों के बीच की इसी अत्यंत मजबूत नींव को एक बार फिर से दुनिया के सामने पूरी दृढ़ता और विश्वास के साथ रख दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे भविष्य में दोनों देशों के संबंध और भी अधिक ऊंचाइयों को छुएंगे।</span></p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 18:30:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>पाकिस्तान के लिए गले की हड्डी बनता - अब्राहम समझौता</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> मध्य पूर्व में तेल के एकाधिकार के वर्चस्व की लड़ाई को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और युद्ध को रुकवाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आतंक की छवि के विपरीत पाकिस्तानी हुक्मरान अपने देश की छवि एक शांति-दूत राष्ट्र के रूप में गढने के लिए पिछले कई महीनों से ईरान और अमेरिका के मध्य युद्ध पूर्णतः खत्म करवाने हेतु लगातार एक के बाद एक बैठकें कर दुनिया में शांति के सबसे बड़े मसीहा बनने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डोनाल्ड ट्रम्प </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180143/new-approach-to-understanding-womens-hormonal-health"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/abraham-accords.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> मध्य पूर्व में तेल के एकाधिकार के वर्चस्व की लड़ाई को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और युद्ध को रुकवाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आतंक की छवि के विपरीत पाकिस्तानी हुक्मरान अपने देश की छवि एक शांति-दूत राष्ट्र के रूप में गढने के लिए पिछले कई महीनों से ईरान और अमेरिका के मध्य युद्ध पूर्णतः खत्म करवाने हेतु लगातार एक के बाद एक बैठकें कर दुनिया में शांति के सबसे बड़े मसीहा बनने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डोनाल्ड ट्रम्प </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने पश्चिम एशिया में स्थायी शांति हेतु एक बार फिर सभी मुस्लिम देशों से इजराइल के साथ मित्रता कर अब्राहम समझौता करने की बात छेड़कर पाकिस्तान की हुकूमत और सेना प्रमुख की नींद उड़ा दी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी कूटनीति के हिसाब से ईरान समझौते से ज्यादा मध्य पूर्व के देशों के बीच अब्राहम समझौता जरूरी है। इसलिए राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान समझौते पर जल्दबाज़ी न दिखाकर अब्राहम समझौते पर मुस्लिम देशों की राजनीति गरमा दी है। बकौल अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब्राहम समझौता पश्चिम एशिया के सभी देशों की आर्थिक उन्नति का समझौता है। इसलिए भविष्य में मुस्लिम देशों को अपने व्यापारिक हितों के लिए आंतरिक मतभेदों को भूलकर अब्राहम समझौते पर सहमत होना पड़ेगा और जो राष्ट्र इस समझौते से इतर जाएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें स्वाभाविक रूप से अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीन और रूस जैसे महाशक्तिशाली देशों की नाराज़गी भी सहनी पड़ सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका के अब्राहम समझौते पर कई मुस्लिम देशों ने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इजरायल </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के साथ संबंध बेहतर करने की दिशा में कदम बढ़ा भी दिए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके परिणाम भी सार्थक निकल रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा पाकिस्तानी हुक्मरानों को अब्राहम समझौते पर सहमति देकर इजराइल के साथ संबंध बेहतर करने की बात से ही पाकिस्तान की राजनीति में भूचाल मच गया है। पाकिस्तान ने इजराइल को कभी एक राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी है। इसकी वजह पाकिस्तान का फिलिस्तीनी प्रेम रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि दुनिया के करीब सौ से ज्यादा देश इजराइल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दे चुके हैं।</span> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो टूक कहा है कि ईरान-अमेरिका के बीच शांति मध्यस्थता करवाने वाले देश पहले अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर कर इजराइल से संबंध बेहतर करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे पाकिस्तान में सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेना और कट्टरपंथी आतंकी ताकतों के बीच घमासान मचा हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के अब्राहम समझौते वाली बात ने पाकिस्तान को एक बार फिर  गृहयुद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह पाकिस्तानी हुक्मरानों के लिए अब अब्राहम समझौता  गले की हड्डी बनता जा रहा है। यदि वे इसे स्वीकार करते हैं तो निश्चित ही पाकिस्तान में सत्ता और सेना के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को कट्टरपंथी ताकतों का तीखा विरोध झेलना पड़ेगा और यदि पाकिस्तान अब्राहम समझौते से इंकार कर देता है तो फिर अमेरिका सहित अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से उसका हुक्का-पानी बंद होना तय माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान के रक्षा मंत्री द्वारा अब्राहम समझौते को स्वीकार करने से इंकार करने के बाद पाकिस्तान के शांति का मसीहा बनने का दावे का झूठ भी उजागर हो चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी अंतरराष्ट्रीय मंच पर आलोचना हो रही है। बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य पूर्व के देशों को अमेरिकी दबदबे को कम करने और अपनी आर्थिक उन्नति के लिए आपसी दुश्मनी को भुलाकर साझा व्यापार कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने हेतु अब्राहम समझौते को अपनाना ही होगा। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो देश मनभेद रखकर इस समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे या तो गृहयुद्ध में स्वयं खत्म हो जाएंगे या फिर अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देशों के दबाव में कमजोर पड़ जाएंगे।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका के नए शांति प्रस्ताव पर कई मुस्लिम देश मंथन कर रहे हैं और इसे मानवीय शांति का सबसे बड़ा समझौता कह रहे हैं। उम्मीद है कि अमेरिकी संबंधों और कूटनीति के चलते</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आने वाले दिनों में </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सऊदी अरब , कतर, तुर्की और ईरान </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी अब्राहम समझौते को स्वीकारते नजर आएं तो हैरानी नहीं होगी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अतः वर्षों से युद्ध की त्रासदी भुगत रहे मध्य पूर्व के देशों के लोगों के लिए अब्राहम समझौता मानवीय शांति का सबसे बड़ा उपहार साबित हो सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अरविंद रावल</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 18:43:35 +0530</pubDate>
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