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                <title>Indian Society - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Indian Society RSS Feed</description>
                
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                <title>रिश्तों की नींव में दरार</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">हाल ही में आगरा में सामने आए उस हृदयविदारक मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया, जिसमें एक महिला पर अपने पति की हत्या कर शव को बाथरूम के फर्श के नीचे दफनाने का आरोप है। यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि हमारे समाज के बदलते मनोविज्ञान, पारिवारिक मूल्यों के क्षरण और रिश्तों में बढ़ती कटुता का गंभीर संकेत भी है। जिस घर को सुरक्षा, स्नेह और विश्वास का प्रतीक माना जाता है, वही यदि भय और हिंसा का केंद्र बन जाए तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">आज का समय अभूतपूर्व तकनीकी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182836/cracks-in-the-foundation-of-relationships"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/images-(1)2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">हाल ही में आगरा में सामने आए उस हृदयविदारक मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया, जिसमें एक महिला पर अपने पति की हत्या कर शव को बाथरूम के फर्श के नीचे दफनाने का आरोप है। यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि हमारे समाज के बदलते मनोविज्ञान, पारिवारिक मूल्यों के क्षरण और रिश्तों में बढ़ती कटुता का गंभीर संकेत भी है। जिस घर को सुरक्षा, स्नेह और विश्वास का प्रतीक माना जाता है, वही यदि भय और हिंसा का केंद्र बन जाए तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज का समय अभूतपूर्व तकनीकी प्रगति, आर्थिक अवसरों और आधुनिक जीवनशैली का दौर है, लेकिन दूसरी ओर मानवीय संवेदनाएं और रिश्तों की गर्माहट लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही हैं। पति-पत्नी का संबंध भारतीय संस्कृति में सबसे पवित्र और विश्वासपूर्ण माना गया है। यह रिश्ता केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और अनेक भावनाओं का संगम होता है। जब इसी रिश्ते में अविश्वास, क्रोध, स्वार्थ और हिंसा प्रवेश कर जाते हैं, तब उसका परिणाम केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की आत्मा को भी घायल करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पिछले कुछ महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों से पति या पत्नी द्वारा अपने जीवनसाथी की हत्या के कई मामले सामने आए हैं। कहीं अवैध संबंधों के कारण हत्या हुई, कहीं संपत्ति के विवाद ने रिश्ते खत्म कर दिए, तो कहीं लंबे समय से चले आ रहे घरेलू विवाद हिंसक रूप ले बैठे। इन घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया है कि जिन लोगों ने साथ जीने-मरने की कसमें खाईं, वे एक-दूसरे के प्राण लेने तक पहुंच रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी सच है कि ऐसे अपराध समाज के अधिकांश परिवारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। देश में करोड़ों परिवार आज भी प्रेम, विश्वास और परस्पर सम्मान के साथ जीवन जी रहे हैं। लेकिन जब इस प्रकार की घटनाएं बार-बार सामने आती हैं, तो वे समाज के सामने गंभीर प्रश्न अवश्य खड़े करती हैं। क्या हमारी सहनशीलता कम हो रही है? क्या संवाद की जगह आक्रोश ने ले ली है? क्या छोटी-छोटी बातों का समाधान बातचीत से निकालने की बजाय हिंसा को आसान रास्ता समझा जाने लगा है?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आधुनिक जीवन की भागदौड़, आर्थिक दबाव, बढ़ती अपेक्षाएं, मानसिक तनाव और सामाजिक प्रतिस्पर्धा ने पारिवारिक जीवन को प्रभावित किया है। पति-पत्नी दोनों कामकाजी हों या एक ही व्यक्ति परिवार की जिम्मेदारी निभा रहा हो, हर स्थिति में मानसिक दबाव पहले की तुलना में कहीं अधिक है। यदि इन परिस्थितियों में संवाद समाप्त हो जाए, एक-दूसरे को समझने का प्रयास खत्म हो जाए और अहंकार रिश्तों पर हावी हो जाए, तो विवाद गहराते चले जाते हैं। ऐसे विवादों का समाधान कानून, परिवार, परामर्श या आपसी बातचीत से निकल सकता है, लेकिन हिंसा कभी समाधान नहीं हो सकती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आगरा की घटना में जिस तरह शव को छिपाने का प्रयास किया गया, उसने लोगों को स्तब्ध कर दिया। यह घटना केवल हत्या तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसके बाद किए गए कथित प्रयासों ने भी समाज को विचलित किया। ऐसे मामलों में कानून अपना कार्य करता है और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से दोषी या निर्दोष का निर्णय होता है। इसलिए किसी भी आरोपी को अंतिम रूप से दोषी मानना न्यायालय के निर्णय के बाद ही उचित होता है। फिर भी ऐसी घटनाएं यह अवश्य बताती हैं कि अपराध की मानसिकता कितनी भयावह हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज परिवारों में रिश्ते कभी-कभी सूत के धागे जैसे नाजुक प्रतीत होते हैं। छोटी-सी गलतफहमी, आर्थिक विवाद, संदेह या अहंकार वर्षों पुराने संबंधों को तोड़ देता है। पहले परिवार के बड़े-बुजुर्ग विवादों को बैठकर सुलझाते थे। संयुक्त परिवारों में संवाद के अधिक अवसर होते थे। अब एकल परिवारों के बढ़ने, सामाजिक दूरी और व्यस्त जीवनशैली के कारण कई लोग अपनी मानसिक परेशानियां भीतर ही भीतर दबाए रहते हैं। जब भावनाएं लंबे समय तक दबती रहती हैं, तो कभी-कभी उनका विस्फोट अत्यंत दुखद रूप में सामने आता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी आवश्यक है कि समाज किसी एक वर्ग या लिंग को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति से बचे। अपराध करने वाला व्यक्ति पुरुष भी हो सकता है और महिला भी। कानून की दृष्टि में अपराधी केवल अपराधी होता है। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर पूरे समाज, किसी पीढ़ी या किसी लिंग के बारे में व्यापक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपराध के कारणों को समझें और उन्हें रोकने के उपाय खोजें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। तनाव, अवसाद, गुस्सा और संबंधों में बढ़ती दूरी को समय रहते पहचानना और उनका समाधान करना अत्यंत आवश्यक है। यदि पति-पत्नी के बीच मतभेद हैं, तो परिवार, मित्र, विवाह परामर्शदाता या कानूनी प्रक्रिया की सहायता ली जा सकती है। अलग होना पड़े तो वह भी कानून के दायरे में और गरिमा के साथ होना चाहिए। तलाक एक वैधानिक प्रक्रिया है, जबकि हत्या मानवता और कानून—दोनों के विरुद्ध जघन्य अपराध है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मीडिया और सोशल मीडिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। अपराधों की जानकारी समाज तक पहुंचाना आवश्यक है, लेकिन उनके सनसनीखेज चित्रण की बजाय यह भी बताया जाना चाहिए कि ऐसे अपराधों के पीछे कौन-से सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण काम करते हैं तथा उनसे बचाव कैसे किया जा सकता है। समाज को भय और सनसनी नहीं, बल्कि जागरूकता और संवेदनशीलता की आवश्यकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बच्चों और युवाओं को बचपन से ही संवाद, सहनशीलता, नैतिकता और सम्मानजनक व्यवहार की शिक्षा देना समय की मांग है। परिवार केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का आधार होता है। यदि घरों में प्रेम, विश्वास और धैर्य का वातावरण बनेगा, तो समाज भी अधिक सुरक्षित और संवेदनशील बनेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हर दिन दर्ज होने वाले हत्या, मारपीट, अपहरण और अन्य गंभीर अपराध निश्चित रूप से चिंता पैदा करते हैं। लेकिन इन घटनाओं के बीच यह याद रखना भी जरूरी है कि समाज में आज भी असंख्य लोग ईमानदारी, प्रेम और पारिवारिक मूल्यों के साथ जीवन जी रहे हैं। हमें उन्हीं सकारात्मक मूल्यों को मजबूत करना होगा, ताकि हिंसा की प्रवृत्ति को रोका जा सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रिश्ते विश्वास से बनते हैं और विश्वास टूटने पर सबसे बड़ी क्षति केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज की होती है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित, संवेदनशील और संस्कारित वातावरण में जीवन जीएं, तो हमें संवाद, धैर्य, परस्पर सम्मान और नैतिक मूल्यों को फिर से अपने पारिवारिक जीवन का आधार बनाना होगा। यही वह मार्ग है जो समाज को हिंसा से दूर और मानवीयता के निकट ले जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 22:02:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>हे समाज, कुछ चेहरों की भूल पर हर बेटी को दोषी मत ठहराओ</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि किसी मोहल्ले में एक घर की दीवार गिर जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या पूरा शहर जर्जर घोषित कर दिया जाता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि एक डॉक्टर लापरवाह निकल जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या पूरा चिकित्सा जगत अपराधी हो जाता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर आखिर सिया और सोनम जैसी आठ-दस लड़कियों के कुछ चर्चित मामलों को आधार बनाकर करोड़ों भारतीय बेटियों के चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाने का साहस समाज कहाँ से ले आता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आज सोशल मीडिया ने इसी अन्यायपूर्ण प्रवृत्ति को सामान्य बना दिया है। कुछ नामों को बार-बार दोहराइए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें वायरल कीजिए और फिर पूरी पीढ़ी को</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182696/hey-society-dont-blame-every-daughter-on-the-mistake-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि किसी मोहल्ले में एक घर की दीवार गिर जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या पूरा शहर जर्जर घोषित कर दिया जाता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि एक डॉक्टर लापरवाह निकल जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या पूरा चिकित्सा जगत अपराधी हो जाता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर आखिर सिया और सोनम जैसी आठ-दस लड़कियों के कुछ चर्चित मामलों को आधार बनाकर करोड़ों भारतीय बेटियों के चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाने का साहस समाज कहाँ से ले आता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आज सोशल मीडिया ने इसी अन्यायपूर्ण प्रवृत्ति को सामान्य बना दिया है। कुछ नामों को बार-बार दोहराइए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें वायरल कीजिए और फिर पूरी पीढ़ी को उसी रंग में रंग दीजिए। यही है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सिया–सोनम सिंड्रोम</span>'—<span lang="hi" xml:lang="hi"> एक ऐसा दृष्टिदोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ मुट्ठीभर परछाइयों को इतना फैलाया जाता है कि करोड़ों बेटियों की उजली धूप भी दिखाई देना बंद हो जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह केवल सोशल मीडिया का खेल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चयनात्मक दृष्टि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का परिणाम है। इतिहास बताता है कि जब भी समाज बदलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवर्तन से असहज लोग पूरे परिदृश्य को नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपने पूर्वाग्रहों के अनुकूल कुछ उदाहरण चुनकर उन्हें ही सच साबित करने लगते हैं। आज बेटियाँ शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायपालिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्यमिता और सामाजिक नेतृत्व तक हर क्षेत्र में नए कीर्तिमान गढ़ रही हैं। यही बदलाव कुछ लोगों को अखरता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए वे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चेरी-पिकिंग</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के सहारे कुछ वायरल घटनाओं को पूरी पीढ़ी का चेहरा बना देते हैं। प्रश्न यह है कि यदि कुछ लड़कियों की गलती से सभी लड़कियों का आकलन होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या यही कसौटी पुरुषों पर भी लागू होगी</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि उत्तर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह तर्क नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सुविधानुसार गढ़ा गया पूर्वाग्रह है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना यह है कि जो बेटियाँ समाज को नई दिशा दे रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे शायद ही कभी बहस का विषय बनती हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अरुणिमा सिन्हा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने कृत्रिम पैर के सहारे माउंट एवरेस्ट फतह कर अदम्य इच्छाशक्ति की मिसाल कायम की।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सुनीता कृष्णन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी सामाजिक कार्यकर्ता ने हैदराबाद में हजारों लड़कियों को ट्रैफिकिंग</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं से बचाया तथा उन्हें नई जिंदगी दी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐश्वर्या सागर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी युवा उद्यमी ग्रामीण लड़कियों को डिजिटल शिक्षा और आत्मनिर्भरता से जोड़ रही हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इनके जैसी हजारों बेटियाँ प्रतिदिन समाज का भविष्य गढ़ रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी वे सुर्खियाँ नहीं बनतीं। वजह साफ है—योगदान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवाद बिकता है। मीडिया और सोशल प्लेटफ़ॉर्म भी जानते हैं कि नकारात्मक खबरें अधिक क्लिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक प्रतिक्रियाएँ और अधिक प्रसार बटोरती हैं। अच्छाई प्रायः शांत रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि बुराई शोर मचाती है। नतीजा यह कि समाज धीरे-धीरे शोर को सच और मौन को महत्वहीन मानने लगता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि वायरल वीडियो के शोर से बाहर निकलकर वास्तविक भारत को देखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। भारतीय बेटियाँ आज उपलब्धियों के नए प्रतिमान गढ़ रही हैं। अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में उन्होंने कई बार पुरुष खिलाड़ियों से अधिक प्रभावशाली प्रदर्शन किया है। डॉक्टर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंजीनियर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पायलट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैनिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसान और प्रशासक के रूप में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ रही है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एनएसएस</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एनसीसी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के आँकड़े भी सामुदायिक सेवा में युवतियों की उल्लेखनीय सक्रियता का प्रमाण हैं। उच्च शिक्षा में उनका प्रवेश बढ़ रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साक्षरता दर सुधर रही है और आर्थिक आत्मनिर्भरता का उनका संकल्प निरंतर मजबूत हो रहा है। फिर भी यदि समाज कुछ वायरल मामलों को ही पूरी सच्चाई मान ले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह वास्तविकता की नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी दृष्टि की विफलता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दरअसल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिया–सोनम सिंड्रोम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">केवल बेटियों के साथ अन्याय नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समाज की निर्णय-क्षमता भी कुंद करता है। यह तथ्यों पर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भावनाओं पर आधारित धारणा गढ़ता है। पूर्वाग्रह फैलाने वाले बार-बार वही उदाहरण सामने रखते हैं जो भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अविश्वास और आक्रोश को हवा दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि वे उन हजारों बेटियों को अनदेखा कर देते हैं जो परिवारों की आर्थिक शक्ति हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाँवों में शिक्षा पहुँचा रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्पतालों में जीवन बचा रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयोगशालाओं में शोध कर रही हैं और सीमाओं पर देश की रक्षा में जुटी हैं। सकारात्मक कहानियाँ कम दिखाई देती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वे उत्तेजना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेरणा जगाती हैं। जबकि राष्ट्र उत्तेजना से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेरणा से आगे बढ़ते हैं। इसलिए कुछ अपवादों को संपूर्ण सत्य बना देना समाज और उसके भविष्य—दोनों के साथ अन्याय है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि गलतियों को अनदेखा किया जाए। जो दोषी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे कानून के अनुसार दंड मिलना ही चाहिए—चाहे वह लड़की हो या लड़का। किंतु न्याय का तकाज़ा है कि सजा व्यक्ति को मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरे वर्ग को नहीं। हर बेटी को सिया या सोनम मान लेना उतना ही अविवेकपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितना किसी एक पुरुष के अपराध के आधार पर समूचे पुरुष समाज को दोषी ठहराना। परिपक्व समाज वही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो व्यक्ति और समुदाय के बीच का अंतर समझे। बेटियों को संदेह की दीवारों में कैद करने के बजाय विश्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसर और सही मार्गदर्शन दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यही एक संतुलित और प्रगतिशील समाज की सबसे मजबूत नींव है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब समय आ गया है कि हम अपनी दृष्टि बदलें। किसी छोटे से अंधेरे को इतना विशाल बना देना कि पूरा सूरज ही ओझल हो जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह यथार्थ नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टिदोष है। इतिहास अपवादों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुसंख्यक के योगदान से लिखा जाता है। सिया और सोनम जैसी घटनाएँ अपराध हो सकती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वे भारतीय बेटियों का चरित्र-पत्र नहीं हैं। इस देश की पहचान उन लाखों बेटियों से बनती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो प्रयोगशालाओं में शोध कर रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेतों में श्रम कर रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीमाओं पर डटी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टार्टअप खड़े कर रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालतों में न्याय की आवाज़ बन रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवारों का संबल हैं और विश्व मंच पर भारत का मान बढ़ा रही हैं। इसलिए आवश्यकता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सिया–सोनम सिंड्रोम</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">को नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की बेटियों के वास्तविक स्वरूप को सामने लाने की है। आखिर कुछ परछाइयाँ कभी सूरज की पहचान नहीं बन सकतीं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 19:17:06 +0530</pubDate>
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                <title>गृहिणियों को राष्ट्र निर्माता मानकर सुप्रीम कोर्ट ने रचा सामाजिक न्याय का नया अध्याय</title>
                                    <description><![CDATA[<div>भारतीय समाज में गृहिणी का स्थान हमेशा से परिवार की धुरी के रूप में रहा है। वह घर की व्यवस्था संभालती है बच्चों का पालन-पोषण करती है बुजुर्गों की देखभाल करती है और परिवार को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करती है। इसके बावजूद उसके श्रम को लंबे समय तक आर्थिक मूल्यांकन से बाहर रखा गया। घर के भीतर किए जाने वाले अनगिनत कार्यों को कर्तव्य और जिम्मेदारी का नाम देकर उनकी वास्तविक कीमत को नजरअंदाज किया जाता रहा। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक चेतना को नई दिशा देने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181065/supreme-court-created-a-new-chapter-of-social-justice-by"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/4.jpg" alt=""></a><br /><div>भारतीय समाज में गृहिणी का स्थान हमेशा से परिवार की धुरी के रूप में रहा है। वह घर की व्यवस्था संभालती है बच्चों का पालन-पोषण करती है बुजुर्गों की देखभाल करती है और परिवार को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करती है। इसके बावजूद उसके श्रम को लंबे समय तक आर्थिक मूल्यांकन से बाहर रखा गया। घर के भीतर किए जाने वाले अनगिनत कार्यों को कर्तव्य और जिम्मेदारी का नाम देकर उनकी वास्तविक कीमत को नजरअंदाज किया जाता रहा। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक चेतना को नई दिशा देने वाला भी है। सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाली गृहिणियों के मुआवजे को लेकर सर्वोच्च अदालत ने जो मानक निर्धारित किया है वह महिलाओं के सम्मान और न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता दोनों का प्रतीक है।</div>
<div>अदृश्य श्रम को मिली प्रतिष्ठा</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा है कि गृहिणियों के काम का मूल्य कम से कम 30 हजार रुपए प्रतिमाह माना जाना चाहिए और इसी आधार पर मुआवजे की गणना की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी माना कि गृहिणियां केवल परिवार का हिस्सा नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति हैं। यह टिप्पणी अपने आप में ऐतिहासिक है क्योंकि पहली बार इतने स्पष्ट और प्रभावशाली शब्दों में गृहिणियों की भूमिका को राष्ट्रीय विकास से जोड़ा गया है।</div>
<div> </div>
<div>दरअसल किसी भी समाज की प्रगति का आधार मजबूत परिवार होता है और मजबूत परिवार का आधार अक्सर एक समर्पित महिला होती है। वह बिना किसी वेतन और अवकाश के चौबीसों घंटे कार्य करती है। उसकी मेहनत का कोई हिसाब नहीं रखा जाता और उसके योगदान को आर्थिक आंकड़ों में नहीं मापा जाता। सुप्रीम कोर्ट ने इस वास्तविकता को स्वीकार कर महिलाओं के अदृश्य श्रम को वह सम्मान दिया है जिसकी मांग लंबे समय से की जा रही थी।</div>
<div> </div>
<div>पुरानी सोच को बदलने वाला निर्णय है।अब तक सड़क दुर्घटना मामलों में गृहिणियों की आय का अनुमान अक्सर कुशल मजदूर की मजदूरी के आधार पर लगाया जाता था। यह व्यवस्था न केवल अव्यावहारिक थी बल्कि महिलाओं के योगदान को कम करके आंकने वाली भी थी। अदालत ने इस सोच को खारिज करते हुए कहा कि घरेलू कार्यों को सामान्य मजदूरी के पैमाने पर नहीं तौला जा सकता</div>
<div> </div>
<div>यह निर्णय इस बात की स्वीकारोक्ति है कि घर संभालना एक पूर्णकालिक और बहुआयामी जिम्मेदारी है। गृहिणी एक साथ प्रबंधक शिक्षक मार्गदर्शक परिचारिका और परिवार की भावनात्मक शक्ति के रूप में कार्य करती है। इसलिए उसके योगदान की तुलना किसी एक पेशे या मजदूरी से नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने इसी व्यापक दृष्टिकोण को अपनाकर न्याय की नई परिभाषा प्रस्तुत की है।</div>
<div> </div>
<div>महिला सम्मान की दिशा में बड़ा कदम कहा जा सकता है।</div>
<div>यह फैसला केवल मुआवजे की राशि बढ़ाने का मामला नहीं है बल्कि महिलाओं के सम्मान को कानूनी मान्यता देने का प्रयास भी है। भारतीय समाज में आज भी अनेक महिलाएं अपने कार्यों के लिए सामाजिक सराहना तो पाती हैं लेकिन आर्थिक पहचान नहीं मिलती। अदालत ने इस स्थिति को बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।</div>
<div> </div>
<div>जब देश की सर्वोच्च अदालत किसी गृहिणी को राष्ट्र निर्माता कहती है तब यह संदेश केवल न्यायालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे समाज तक पहुंचता है। इससे महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना मजबूत होती है और यह स्वीकार किया जाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल कार्यालयों और उद्योगों में नहीं बल्कि घरों के भीतर भी होता है।</div>
<div> </div>
<div>न्याय प्रणाली का  संवेदनशील उदाहरण है और इस फैसले की सबसे बड़ी विशेषता न्यायपालिका की संवेदनशीलता है। अदालत ने कहा कि मुआवजा तय करते समय केवल महिला की आय को आधार नहीं बनाया जा सकता। उसकी उम्र शिक्षा कौशल पारिवारिक जिम्मेदारियां और आर्थिक परिस्थितियां भी ध्यान में रखी जानी चाहिए। यह दृष्टिकोण बताता है कि न्यायालय जीवन की वास्तविकताओं को समझते हुए निर्णय दे रहा है</div>
<div> </div>
<div>कई बार दुर्घटना में गृहिणी की मृत्यु के बाद परिवार केवल एक सदस्य को नहीं खोता बल्कि पूरे परिवार की व्यवस्था प्रभावित हो जाती है। बच्चों का भविष्य बुजुर्गों की देखभाल और घर की स्थिरता पर गहरा असर पड़ता है। अदालत ने इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए भावनात्मक और पारिवारिक क्षति को भी मुआवजे का हिस्सा माना है। यह न्याय की मानवीय और व्यावहारिक व्याख्या है।</div>
<div> </div>
<div>त्वरित न्याय के प्रति प्रतिबद्धता</div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने केवल मुआवजे की गणना का नया आधार निर्धारित नहीं किया बल्कि न्याय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि ऐसे मामलों की निगरानी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश स्वयं करें और दावों का निपटारा एक वर्ष के भीतर किया जाए।</div>
<div> </div>
<div>भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबित मामलों की समस्या लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। दुर्घटना पीड़ित परिवार अक्सर वर्षों तक मुआवजे की प्रतीक्षा करते रहते हैं। ऐसे में अदालत का यह निर्देश न्याय को समयबद्ध और पीड़ित केंद्रित बनाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि सर्वोच्च न्यायालय केवल सिद्धांतों की बात नहीं कर रहा बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन को भी सुनिश्चित करना चाहता है</div>
<div>न्यायपालिका की प्रगतिशील सोच</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्यायपालिका की प्रगतिशील और दूरदर्शी सोच का परिचायक है। अदालत ने यह समझा कि बदलते समय में महिलाओं की भूमिका को पुराने मानकों से नहीं आंका जा सकता। आज महिलाओं का योगदान केवल आर्थिक कमाई तक सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक और पारिवारिक संरचना को मजबूत बनाने में भी उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।</div>
<div> </div>
<div>इस निर्णय ने यह संदेश दिया है कि किसी व्यक्ति का मूल्य केवल उसकी वेतन पर्ची से नहीं तय किया जा सकता। समाज के लिए किए गए उसके योगदान को भी समान महत्व मिलना चाहिए। गृहिणियों के मामले में यह संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि उनका अधिकांश श्रम घर की चारदीवारी के भीतर ही रह जाता है।</div>
<div>सामाजिक बदलाव की नई शुरुआत शुरू हो चुका है।</div>
<div> </div>
<div>यह फैसला भविष्य में व्यापक सामाजिक बदलाव का आधार बन सकता है। इससे महिलाओं के घरेलू कार्यों के आर्थिक महत्व पर नई चर्चा शुरू होगी। नीति निर्माण के स्तर पर भी घरेलू श्रम को लेकर गंभीर विचार हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे करोड़ों गृहिणियों को यह एहसास होगा कि उनके कार्यों को देश की सर्वोच्च अदालत ने सम्मान और मान्यता दी है</div>
<div> </div>
<div>समाज में लंबे समय से यह धारणा रही है कि घर का काम स्वाभाविक जिम्मेदारी है और उसका कोई आर्थिक मूल्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस धारणा को चुनौती देते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि घरेलू श्रम भी उतना ही मूल्यवान है जितना किसी अन्य पेशे में किया जाने वाला कार्य। यह विचार महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में सहायक होगा</div>
<div> </div>
<div>न्याय और सम्मान का ऐतिहासिक संगम देखने को मिला है।सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसने गृहिणियों के अदृश्य श्रम को पहचान दी है महिलाओं के सम्मान को नई ऊंचाई प्रदान की है और दुर्घटना पीड़ित परिवारों को अधिक न्यायपूर्ण राहत सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त किया है</div>
<div> </div>
<div>यह फैसला बताता है कि न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक शक्ति भी है। महिलाओं को राष्ट्र निर्माता का दर्जा देकर सर्वोच्च अदालत ने न्याय और संवेदनशीलता का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। यह निर्णय आने वाले वर्षों में महिला सम्मान सामाजिक न्याय और मानवीय न्यायशास्त्र के एक आदर्श उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा। भारत की न्याय प्रणाली ने इस फैसले के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया है कि सच्चा न्याय वही है जो समाज के सबसे अनदेखे और उपेक्षित योगदान को भी सम्मानपूर्वक पहचान दे सके।</div>
<div>     <strong>   *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:01:28 +0530</pubDate>
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                <title>भारत की विकास यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की महती भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत आज दुनिया की तीसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहा है। जब देशवासी अपने देश की तरक्की की बातें सुनते हैं तो बेशक उन्हें बड़ी खुशी और गर्व होता है। भारत की इस विकास यात्रा में केंद्र व राज्यों की सरकारों के साथ-साथ देश के नागरिकों का भी अपना अथाह योगदान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी तो आज हम दुनिया की तीसरी बड़ी महाशक्ति बनकर उभर रहे हैं। भारत की विकास यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका भी महती रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे नकारा नहीं जा सकता है। बेशक कुछ संघ-विरोधी विचारधारा वाले लोगों को देश की विकास यात्रा में</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180815/important-role-of-rashtriya-swayamsevak-sangh-in-indias-development-journey"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/rss-shatabdi-varsh-jan-sampark-abhiyaan-history.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत आज दुनिया की तीसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहा है। जब देशवासी अपने देश की तरक्की की बातें सुनते हैं तो बेशक उन्हें बड़ी खुशी और गर्व होता है। भारत की इस विकास यात्रा में केंद्र व राज्यों की सरकारों के साथ-साथ देश के नागरिकों का भी अपना अथाह योगदान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी तो आज हम दुनिया की तीसरी बड़ी महाशक्ति बनकर उभर रहे हैं। भारत की विकास यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका भी महती रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे नकारा नहीं जा सकता है। बेशक कुछ संघ-विरोधी विचारधारा वाले लोगों को देश की विकास यात्रा में संघ का योगदान अचरज भरा भी लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के योगदान को यह देश कभी भुला नहीं पाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आजादी के उस वक्त को याद कर कल्पना करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ तथाकथित सत्ता-स्वार्थी राजनेताओं की हुक्मरान बनने की चाहत के चलते जिस देश की आजादी धर्म के नाम पर की गई हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ कितना खून-खराबा अपनों का अपनों के ही हाथों हुआ होगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान के उदय के साथ ही लाहौर से लेकर कराची तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्वी-पश्चिमी सीमाओं तक बसने वाले हिंदुओं के कत्लेआम की जो दास्तां देश ने देखी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी कल्पना मात्र से आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं और शरीर में सिहरन पैदा हो जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आजादी से पहले भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अखंड भारत की कल्पना को साकार करने की अलख जगाने के लिए लोगों को जागरूक कर रहा था। कई मौकों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जन्मदाता और तत्कालीन प्रथम सरसंघचालक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार और द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ‘गुरुजी’ ने भी देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले सभी बड़े तत्कालीन नेताओं से अखंड भारत बनाए रखने की लड़ाई लड़ने की बात कही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन संघ विरोधी मानसिकता वाले कुछ लोगों ने हर बार संघ की बातों को नजरअंदाज करते हुए मुस्लिम लीग के जिन्ना की जिद के आगे नतमस्तक होकर आखिरकार अखंड भारत को धर्म के नाम पर टुकड़ों में बांट दिया था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्ना की मुस्लिम लीग के समर्थक गुंडों और पाकिस्तानी फौजी सिपाहियों ने पाकिस्तान के हर हिस्से में रह रहे हिंदुओं को वहाँ से भागने के लिए उन पर रक्तरंजित अत्याचार ही नहीं किए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि हिंदू बेटियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुओं और माताओं की अस्मिता को भी सरेआम लूटकर तार-तार किया था। पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में हिंदुओं की लाशों के ढेर इस बात के सबूत थे कि हिंदुओं के प्रति जिन्ना और उसके गुंडों ने सत्ता की लालच में लोगों के बीच कितना जहर भरा था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आजादी के उस रक्तरंजित दौर में पाकिस्तान में सबसे पहले हिंदू माँ-बहनों और बेटियों की अस्मिता को बचाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता ही आगे आए और जिन्ना के गुंडों तथा उसके सिपाहियों से अपनी जान की बाजी लगाकर जितना हो सकता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतने हिंदुओं को बचाने का भरसक प्रयास भी किया था। इतना ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने विभाजन की त्रासदी से अपनी ही जमीन से बेदखल किए गए हिंदुओं की मदद हेतु जगह-जगह राहत शिविर खोलकर पाकिस्तान से बेदखल और प्रताड़ित किए गए हिंदुओं तथा उनके परिजनों को न केवल सुरक्षा दी</span>,</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि स्वयंसेवकों ने बिना सरकारी मदद के अपने दम पर महीनों तक उन हिंदुओं के भोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी और स्वास्थ्य की भी व्यवस्था की थी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह तो देश जानता है कि विभाजन के उस कठिन दौर में कैसे आरएसएस के स्वयंसेवकों ने पाकिस्तान में रह रहे हिंदुओं को बचाया था। आजादी के दौर के बहुत से लोगों का मानना है कि यदि आजादी के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक हिंदुओं को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी नहीं लगाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जिन्ना के गुंडे और गुंडागर्दी पर उतारू उसकी सेना नफरत की आग में पाकिस्तान से समूची हिंदू कौम का ही सर्वनाश कर देते।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आजादी के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीयों में एकजुटता बनी रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस महान उद्देश्य को लेकर बिना प्रचार-प्रसार के अपने कार्यकर्ताओं के बूते अलख जगाए रखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी परिणति यह है कि भारत आज दुनिया की महाशक्तियों को अपने आगे झुकाने वाला देश बन गया है। देश में जब-जब भी विपदाएँ आईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब-तब सरकार से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता निस्वार्थ भाव से अपनी जान की परवाह किए बिना विपदाओं में उम्मीदों का सहारा बनकर खड़े हुए हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा किए गए कार्यों की विपक्ष के नेता तक खुले मन से प्रशंसा करते रहे हैं। देश में जब भी कहीं भीषण बाढ़ आई हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूखा पड़ा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूकंप की त्रासदी हुई हो या फिर कोई गंभीर बीमारी ही क्यों न फैली हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यकर्ता देश में आई हर विपदा में सबसे पहले सहारा बनकर खड़ा हो जाता है और बिना जाति-धर्म पूछे अपनी जान की बाजी लगाकर सेवा कार्यों में जुट जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आरएसएस देश को जोड़ने और मजबूती प्रदान करने वाला संगठन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बिना जाति-धर्म का भेद किए देश के हर वर्ग और समाज के विकास में सहयोग प्रदान करता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आरएसएस का दायरा समूचा देश और देश में रहने वाले सभी जाति-धर्मों के लोगों के बीच मानवीय प्रेम और राष्ट्रीय एकता बनी रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी महान उद्देश्य को लेकर दिन-रात उसके स्वयंसेवक कार्य करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एकमात्र ऐसा संगठन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने किए गए कार्यों का कभी दिखावा नहीं करता और न कभी अपना बखान करता है। देश की सेहत देखकर ही संघ की सक्रियता समझी जा सकती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देश यदि आज दुनिया में सिरमौर बन रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसमें आरएसएस की भूमिका को भी खुले मन से स्वीकारना होगा। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया के सबसे बड़े राष्ट्रहित को समर्पित संगठन आरएसएस के करोड़ों कार्यकर्ता बेहद अनुशासित तरीके से अपने सरसंघचालक के हर शब्द को अपना सर्वस्व त्याग कर निस्वार्थ भाव से पूर्ण करते हैं। यह संघ के सरसंघचालक के तपोबल का ही परिणाम है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के श्री मोहन भागवत छठे सरसंघचालक हैं। इससे पूर्व डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुकर दत्तात्रेय देवरस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ और के. एस. सुदर्शन जी के त्याग और अनुशासन से संघ दुनिया भर के देशों में अपनी जड़ें मजबूती से जमाए हुए मानवीय सेवा के कार्यों हेतु समर्पित है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय राजनीति के कुछ अवसरवादी सत्ता-स्वार्थी नेताओं ने अपने वोट बैंक की राजनीति के चक्कर में आरएसएस को देश-विरोधी संगठन बताने से भी गुरेज नहीं किया है। इतना ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ राजनीतिक दलों ने सत्ता में आने के बाद जाति-धर्म के वोट बैंक के सहारे सत्ता में बने रहने की चाहत में अपने-अपने राज्यों में आरएसएस पर प्रतिबंध भी लगा दिया था और आरएसएस से संबंध रखने वाले भारतीयों को प्रताड़ित भी किया जाता था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के कुछ राज्यों में आज भी आरएसएस के कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर बंदिशें लगाई गई हैं। वर्तमान में राजनीति से जुड़े कुछ लोगों ने एक विशेष वर्ग के वोट बैंक पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए आरएसएस को केवल हिंदुओं का संगठन बता कर उसके खिलाफ आए दिन जहर उगला है। बेशक आरएसएस एक हिंदुत्ववादी विचारधारा वाला संगठन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका महान उद्देश्य सभी धर्मों और जातियों के लोगों में राष्ट्रप्रेम की भावना जागृत कर राष्ट्र को एकजुट और मजबूत बनाना है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आरएसएस की विचारधारा के विरोधी जो भी लोग आज राजनीति में मौजूद होकर जात-पात की राजनीति करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री जी से सीखना चाहिए कि उन्होंने देशहित के कार्यों में आरएसएस की दलगत राजनीति से ऊपर उठकर समय-समय पर प्रशंसा भी की है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत देश के सभी वर्गों और धर्मों के प्रमुखों के साथ मिलकर संघ के प्रति राजनीतिक दलों द्वारा जो दूषित धारणाएँ फैलाई गई थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें बहुत हद तक दूर कर संघ के सच्चे राष्ट्र हित के उद्देश्य से परिचित करवाकर अन्य धर्मों को भी संघ की विचारधारा से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देश इस वर्ष विजयादशमी के अवसर पर आरएसएस की स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के मार्गदर्शन में देशभर में संघ के कार्यों से देश की नई पीढ़ी को अवगत कराने के कार्यक्रम जारी हैं। आरएसएस एक ऐसा सामाजिक संगठन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जाति-धर्म के नाम पर टुकड़ों में बंटे और बिखरे लोगों को एकजुट करता है तथा उनमें अपने राष्ट्र की निस्वार्थ सेवा के लिए व्यक्ति निर्माण से लेकर राष्ट्र निर्माण तक का पाठ सिखाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आरएसएस की स्थापना भी सन </span>1925 <span lang="hi" xml:lang="hi">में विजयादशमी के दिन डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जी द्वारा इसी महान उद्देश्य को लेकर की गई थी। अपने सौ वर्षों के सफर में आरएसएस अपने कार्यकर्ताओं के समर्पण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग और अनुशासन के बल पर आज एक वटवृक्ष बनकर दुनिया के अस्सी से ज्यादा देशों में फैल चुका है।</span>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरसंघचालक श्री मोहन भागवत की अगुवाई में संघ अपना सौवां जन्मोत्सव पिछली विजयादशमी को मनाया गया उस ऐतिहासिक पल का समूचा दे साक्षी बना!  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष को पूरे वर्ष देशभर में हर्षोल्लास से मनाएगा और कार्यक्रमों के माध्यम से देश के विकास में संघ की भूमिका से उसके त्याग बलिदान और कर्तव्य निष्ठा से नवपीढ़ी को परिचित भी करवाएगा।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 18:29:02 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>अब यह तस्वीर बदलनी चाहिए</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">नसमय बदला, तकनीक बदली, जीवन-शैली बदली, बाजार बदला और फैशन भी बदल गया। महिलाओं को उपभोक्तावादी संस्कृति ने विज्ञापनों और प्रदर्शन की वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने के नए-नए तरीके खोज लिए। किंतु दुखद प्रश्न यह है कि क्या समाज की मूलभूत सोच बदली? क्या बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत हो गई? क्या दहेज प्रथा समाप्त हो गई? क्या स्त्री उत्पीड़न इतिहास बन गया?</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्य से इन प्रश्नों का उत्तर आज भी नकारात्मक है। अनेक समस्याएँ आज भी यथावत बनी हुई हैं, बल्कि कई मामलों में उन्होंने और अधिक विकराल रूप धारण कर लिया है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180674/now-this-picture-should-be-changed"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नसमय बदला, तकनीक बदली, जीवन-शैली बदली, बाजार बदला और फैशन भी बदल गया। महिलाओं को उपभोक्तावादी संस्कृति ने विज्ञापनों और प्रदर्शन की वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने के नए-नए तरीके खोज लिए। किंतु दुखद प्रश्न यह है कि क्या समाज की मूलभूत सोच बदली? क्या बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत हो गई? क्या दहेज प्रथा समाप्त हो गई? क्या स्त्री उत्पीड़न इतिहास बन गया?</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्य से इन प्रश्नों का उत्तर आज भी नकारात्मक है। अनेक समस्याएँ आज भी यथावत बनी हुई हैं, बल्कि कई मामलों में उन्होंने और अधिक विकराल रूप धारण कर लिया है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत में महिलाओं की स्थिति अभी भी अपेक्षित सम्मान और अवसरों से काफी दूर दिखाई देती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसे क्षेत्रों में सुधार तो हुआ है, किंतु वह इतना व्यापक नहीं है कि समाज को संतोष हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे बुजुर्ग कहा करते थे कि शिक्षा का प्रसार होगा तो समाज की कुरीतियाँ स्वतः समाप्त हो जाएँगी। स्त्रियाँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ेंगी और बेटी को बोझ नहीं, अवसर माना जाएगा। कुछ क्षेत्रों में प्रगति अवश्य हुई है, किंतु धरातल पर तस्वीर अभी भी अधूरी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण  के अनुसार देश में 10 वर्ष या उससे अधिक शिक्षा प्राप्त महिलाओं का प्रतिशत बढ़कर लगभग 46.4 प्रतिशत तक पहुँचा है, जो पहले 41 प्रतिशत था।</p>
<p style="text-align:justify;">यह सुधार उत्साहजनक है, किंतु इसका अर्थ यह भी है कि आधी से अधिक महिलाएँ अभी भी दस वर्ष की बुनियादी शिक्षा से वंचित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालय छोड़ने वाली बालिकाओं की संख्या आज भी चिंता का विषय बनी हुई है।  शिक्षा के क्षेत्र में असमानता का एक कारण बाल विवाह, गरीबी, सामाजिक रूढ़ियाँ तथा सुरक्षा संबंधी चिंताएँ भी हैं। अनेक परिवार आज भी पुत्र की शिक्षा को निवेश और पुत्री की शिक्षा को व्यय मानते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यही सोच आगे चलकर दहेज जैसी कुप्रथा को जन्म देती और इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि शिक्षा और आधुनिकता के दावों के बीच दहेज का दानव आज भी जीवित है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में दहेज निषेध अधिनियम के अंतर्गत 15,489 मामले दर्ज किए गए तथा दहेज से संबंधित घटनाओं में 6,156 महिलाओं की मृत्यु हुई। अर्थात प्रतिदिन लगभग 17 महिलाओं ने दहेज की कीमत अपने जीवन से चुकाई। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की व्यापक तस्वीर भी चिंता उत्पन्न करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2023 में देशभर में महिलाओं के विरुद्ध लगभग 4.48 लाख अपराध दर्ज किए गए। इनमें सबसे बड़ी संख्या पति अथवा रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के मामलों की रही, जो कुल अपराधों का लगभग 30 प्रतिशत है। यह स्थिति केवल आँकड़ों की कहानी नहीं है; यह उन लाखों बेटियों, बहनों और माताओं की पीड़ा का दस्तावेज है जो आज भी भेदभाव, हिंसा और असमानता का सामना कर रही हैं। समाज सुधारिका सावित्रीबाई फुले ने कहा था यदि तुम शिक्षित हो जाओगे तो तुम्हें अपने अधिकारों का ज्ञान होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं डॉ. भीमराव आंबेडकर का प्रसिद्ध कथन है कि किसी समाज की प्रगति का आकलन उसकी महिलाओं की प्रगति से किया जाना चाहिए। महात्मा गांधी ने भी कहा था यदि आप एक पुरुष को शिक्षित करते हैं तो केवल एक व्यक्ति शिक्षित होता है, किंतु यदि आप एक स्त्री को शिक्षित करते हैं तो पूरा परिवार शिक्षित होता है। इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद का मानना था कि जिस राष्ट्र ने अपनी स्त्रियों का सम्मान करना नहीं सीखा, वह कभी महान नहीं बन सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ा देना पर्याप्त नहीं है; आवश्यक यह है कि बालिका शिक्षा को सामाजिक सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और समान अवसरों से जोड़ा जाए। जब तक बेटी को परिवार की उत्तराधिकारी नहीं माना जाएगा, जब तक विवाह को आर्थिक लेन-देन का माध्यम समझा जाएगा, तब तक दहेज की मानसिकता समाप्त नहीं होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">विडंबना यह है कि एक ओर हम महिला सशक्तिकरण के नारे लगाते हैं, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान चलाते हैं, महिलाओं की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, दूसरी ओर कन्या के जन्म पर चिंता और विवाह के समय दहेज की चर्चा अभी भी अनेक घरों में सामान्य बात मानी जाती है। यह दोहरा सामाजिक चरित्र हमारी सबसे बड़ी चुनौती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज आवश्यकता केवल कानूनों की नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की है। विद्यालयों में लैंगिक समानता के संस्कार, परिवारों में बेटियों के प्रति समान व्यवहार, महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता, दहेज लेने-देने वालों का सामाजिक बहिष्कार तथा पंचायत स्तर तक जनजागरण अभियान ही वास्तविक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। यदि हम सचमुच विकसित भारत का स्वप्न देखते हैं तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि बालिका शिक्षा, स्त्री सम्मान और दहेज उन्मूलन केवल महिला मुद्दे नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के प्रश्न हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जिस दिन हर बेटी निर्भय होकर शिक्षा प्राप्त करेगी, अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले सकेगी और विवाह दहेज नहीं बल्कि समानता, सम्मान और प्रेम पर आधारित होगा, उसी दिन हम सच्चे अर्थों में आधुनिक, प्रगतिशील और सभ्य समाज कहलाने के अधिकारी होंगे। अब समय की आवश्यकता यह है  कि हम केवल परिवर्तन की प्रतीक्षा न करें, बल्कि स्वयं परिवर्तन बनें। क्योंकि बेटी का सम्मान ही समाज का सम्मान है, और स्त्री की प्रगति ही राष्ट्र की वास्तविक प्रगति है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 18:49:27 +0530</pubDate>
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                <title>बौद्धिक,आर्थिक प्रगति को छिन्न-भिन्न करती रूढ़िवादिता और अंधविश्वास</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">धार्मिक रूढ़िवादिता,कट्टरपंथी धर्मांधता हमारी प्रगति के बड़े बाधको में से एक है। यह हमारी राहों के कंटक और रोड़े साबित हुए हैं।  उनसे हमें हर हाल में छुटकारा पाना होगा। बुनियादी शिक्षा के प्रचार प्रसार से इसके अवरोधों को जनमानस के माध्यम से दूर किया जाना चाहिए ।जो विषय वस्तु आजाद विचारों मान्यताओं को बर्दाश्त नहीं करती उन्हें समाप्त हो जाना चाहिए, ऐसी अन्य और मानवीय कमजोरियां हैं, जिन पर हमें विजय प्राप्त करनी है। इस कार्य के लिए सभी समुदायों के क्रांतिकारी उत्साही नौजवानों की आवश्यकता है। यह बात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद भगत सिंह ने अपने संगठन नौजवान</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180139/conservatism-and-superstition-disrupting-intellectual-and-economic-progress"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/410.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">धार्मिक रूढ़िवादिता,कट्टरपंथी धर्मांधता हमारी प्रगति के बड़े बाधको में से एक है। यह हमारी राहों के कंटक और रोड़े साबित हुए हैं।  उनसे हमें हर हाल में छुटकारा पाना होगा। बुनियादी शिक्षा के प्रचार प्रसार से इसके अवरोधों को जनमानस के माध्यम से दूर किया जाना चाहिए ।जो विषय वस्तु आजाद विचारों मान्यताओं को बर्दाश्त नहीं करती उन्हें समाप्त हो जाना चाहिए, ऐसी अन्य और मानवीय कमजोरियां हैं, जिन पर हमें विजय प्राप्त करनी है। इस कार्य के लिए सभी समुदायों के क्रांतिकारी उत्साही नौजवानों की आवश्यकता है। यह बात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद भगत सिंह ने अपने संगठन नौजवान भारत सभा के लाहौर में प्रकाशित घोषणा पत्र में लिखी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">शहीद भगत सिंह ने अपने जीवन का बलिदान कर भारत को आजादी दिलाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, पर आजादी के बाद भी भारत का जनमानस उन्हीं अंधविश्वास धर्मांधता तथा रूढ़िवाद पर फंसा हुआ है।और अभी भी इस युग में अंधविश्वास का बोलबाला दिखाई देता है। बिल्ली रास्ता काट दे तो यह समझना कि राह में दुर्घटना होने की संभावना हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">घर से निकलते समय कोई छींक दे तो यह समझना कि होने वाला काम बिगड़ जाएगा,और घर में कौवे के बोलने से यह अर्थ निकाला जाए कि घर में मेहमान आने वाले हैं। छोटी चिड़िया यदि मिट्टी की धूल से खेल रही हो तो यह समझा जाए की घनघोर बारिश होने वाली है, आदि इत्यादि ऐसी कई धारणाएं हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक तथा सामाजिक प्रमाण, तर्क या आधार मौजूद नहीं है। फिर भी बड़ी संख्या में लोग इन बातों पर विश्वास करके अपनी नियति तय करने में जुट जाते हैं, अपने विवेक का प्रयोग किए बिना ही इन बातों पर विश्वास कर लेना ही अंधविश्वास माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ लोग तेरा के अंक को अशुभ मानते हैं, तो कई देश किस अंग को शुभ भी मानते हैं। मृत्यु के बाद भी अनेक तरह के अंधविश्वास जी एवं आडंबर संयुक्त कर्मकांड किए जाते हैं। एवं इन कर्मकांड को नहीं किए जाने पर मनुष्य की आत्मा भूत बनकर इर्द गिर्द मंडराती है। और इस तरह के भूत मनुष्य जाति को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं, ऐसी मान्यताएं अंधविश्वास के साक्षात प्रमाण हैं। अधिकतर भारतीय ग्रामीण अभी भी यह मानते हैं कि पृथ्वी शेषनाग पर टिकी हुई है और भूकंप आने पर वह इस बात का दावा करते हैं कि शेषनाग नाराजगी कारण पृथ्वी हिलने लगी है,और भी पूजा पाठ करने में लग जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चंद्र ग्रहण तथा सूर्य ग्रहण के समय भी ग्रामीण क्षेत्र में लोगों द्वारा ऐसे ही कयास लगाए जाते हैं, और फिर ग्रहों की पूजा की जाती है। पूजा करना बहुत अच्छी बात है,ईश्वर में आस्था होनी चाहिए यह एक तरह की एकाग्रता तथा अदृश्य शक्ति के प्रति आप का समर्पण भाव दिखाती है। ईश्वर से लगाओ तथा ईश्वरीय शक्ति के आगे समर्पण एक स्तुत्य के कार्य है। पर इसके पीछे अंधविश्वास को पुष्पित पल्लवित करना खतरनाक भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त ग्रह के चक्कर को दूर करने के लिए किसी विशेष जाति अथवा पत्थर की अंगूठी पहनना विशेष मंत्र वाला ताबीज पहनना जादू टोना तथा टोटका करवाना आदि अंधविश्वास के बड़े उदाहरण हैं ।</p>
<p style="text-align:justify;">और इन सब अंधविश्वास के चक्कर में अनेक लोग धोखाधड़ी तथा शोषण के शिकार होते देखे गए हैं। अंधविश्वास धर्मांधता एक सामाजिक बुराई की तरह दिखाई देती है, जो निश्चित तौर पर देश के विकास के लिए बड़ी बाधा बन जाती है। संत कबीर दास ने बड़ी बेबाकी से इस अंधविश्वास पर अपनी कविता के माध्यम से गहरा कटाक्ष किया है, अरिहरन की चोरी करै, करे सुई का दान, ऊंचा चढ़ी के देखता,केतिक दूर विमान।</p>
<p style="text-align:justify;">दोहे का अर्थ है, मानव कुमार्ग के पथ पर चलकर कमाए गए अनैतिक धन का बहुत छोटा सा भाग दान कर आकाश की ओर देखता है कि उसको स्वर्ग ले जाने वाला विमान कितनी दूर है। अज्ञानी मानव का यह सोचना एक बड़े अंधविश्वास को दर्शाता है। किसी भी गरीब स्त्री की जमीन जायजाद को हड़पने के लिए जमीदारों या मुखिया द्वारा गांव में उसे डायन घोषित कर देना या ईश्वर को खुश करने के लिए मनुष्य की नरबलि दे देना या पशुओं की बलि देना एक बड़ा अंधविश्वास माना जाता है। इन सब अंधविश्वास से समाज में विसंगति फैलती है एवं जो साक्षरता तथा मानवता के लिए बड़े खतरे और विकास के लिए अवरोध पैदा करने के तथ्य हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इनके विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्रवाई कर इनको सजा देकर समाज में अंधविश्वास के खिलाफ सरकार को एक स्वस्थ संदेश देने की आवश्यकता है। समाचार पत्र, टीवी चैनल, इंटरनेट इन सब में राशिफल, वास्तु शास्त्र हाथ में पहनने वाले पत्थरो के बारे में जोर शोर से प्रचार प्रसार किया जाता है, जबकि इन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, क्योंकि इनके चलते बड़े-बड़े जालसाज तथा ठग लोगों से पैसा तथा सोने चांदी की ठगी करने से नहीं चूकते। यह अंधविश्वास यद्यपि सिर्फ भारत में ही नहीं है बल्कि ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया कनाडा अमेरिका तथा साउथ अफ्रीका में भी इसी बड़े पैमाने पर व्याप्त है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि अशिक्षित मनुष्य अंधविश्वासों को मानता है तो यह बात समझ में आती है कि वह वास्तविकता से अशिक्षा के कारण अनभिज्ञ है, एवं इनके परिणामों के बारे में नहीं जानता है। किंतु यह विडंबना तथा अफसोस की बात है कि इस वैज्ञानिक युग में उच्च शिक्षित लोग अनेक प्रकार के अंधविश्वासों से घिरे हुए हैं। शिक्षा अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर विवेकपूर्ण सोचने की शक्ति प्रदान करती है, इसके बाद ही मनुष्य विज्ञान तथा तर्क के आधार पर इसको परख कर किसी बात को मान्यता देता है। अतः अंधविश्वास धर्मांधता के खिलाफ शिक्षा जगत तथा शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में इस विषय को शामिल कर अशिक्षित तथा शिक्षित दोनों को अंधविश्वास के प्रति सचेत कर इसके दुष्परिणामों के बारे में अच्छे से समझा देना चाहिए तभी अंधविश्वास समाज से दूर हो पाएगा।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 18:33:30 +0530</pubDate>
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