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                <title>Humanism - Swatantra Prabhat</title>
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                            <item>
                <title>रवींद्रनाथ टैगोर: विचारों का वह वृक्ष, जिसकी छाया आज भी शीतल है</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यताएँ अपनी सबसे बड़ी पूँजी स्मारकों में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन विचारों में बचाकर रखती हैं जो पीढ़ियों का हाथ थामे रहते हैं। </span>7 <span lang="hi" xml:lang="hi">अगस्त </span>1941 <span lang="hi" xml:lang="hi">को रवींद्रनाथ टैगोर का शरीर कोलकाता के जोड़ासाँको में</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">शांत हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनका सृजन और चिंतन पहले से अधिक जीवित हो उठा। उनका प्रस्थान किसी अध्याय का अंत नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई दिशाओं में खुलते एक विराट संवाद की शुरुआत था। आज भी किसी वृक्ष तले बैठा बालक जब कल्पना का पहला शब्द गढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या शहरी कोलाहल में कोई मन पक्षियों का स्वर सुन लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब टैगोर हमारे बीच उपस्थित हो</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184836/rabindranath-tagore-the-tree-of-thoughts-whose-shadow-is-cool"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/2.-krati-jain.jpeg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यताएँ अपनी सबसे बड़ी पूँजी स्मारकों में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन विचारों में बचाकर रखती हैं जो पीढ़ियों का हाथ थामे रहते हैं। </span>7 <span lang="hi" xml:lang="hi">अगस्त </span>1941 <span lang="hi" xml:lang="hi">को रवींद्रनाथ टैगोर का शरीर कोलकाता के जोड़ासाँको में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">शांत हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनका सृजन और चिंतन पहले से अधिक जीवित हो उठा। उनका प्रस्थान किसी अध्याय का अंत नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई दिशाओं में खुलते एक विराट संवाद की शुरुआत था। आज भी किसी वृक्ष तले बैठा बालक जब कल्पना का पहला शब्द गढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या शहरी कोलाहल में कोई मन पक्षियों का स्वर सुन लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब टैगोर हमारे बीच उपस्थित हो उठते हैं। उनकी पुण्यतिथि स्मरण का अनुष्ठान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्ममंथन का क्षण है—क्या हमने अब भी अपने भीतर संवेदना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौंदर्य और प्रकाश की वह ज्योति बचा रखी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे उन्होंने अपने जीवन और साहित्य से प्रज्ज्वलित किया था।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विचार तभी साँस लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वे परंपरा का सम्मान करते हुए उसकी सीमाओं से आगे बढ़ने का साहस रखें। जोड़ासाँको ने रवींद्रनाथ टैगोर को संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगीत और उदार विचारों का वातावरण दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर किसी मान्यता को अंतिम सत्य मानना नहीं सिखाया। विद्यालय की बंधी व्यवस्था उन्हें रास नहीं आई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए उन्होंने ज्ञान को पुस्तकों से निकालकर प्रकृति में खोजा। वृक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋतुएँ और आकाश उनके शिक्षक थे। यही सोच शांतिनिकेतन बनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ शिक्षा का उद्देश्य सूचना जुटाना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भीतर के मनुष्य को जगाना था। वहाँ परीक्षा से ज्यादा जीवन का अनुभव महत्त्व रखता था। इसलिए शांतिनिकेतन केवल शिक्षण संस्थान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी दृष्टि बना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें ज्ञान और संवेदना एक-दूसरे के पूरक बने।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भाषा की सबसे बड़ी सफलता सीमाएँ लाँघकर मनुष्य से मनुष्य को जोड़ना है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">गीतांजलि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का नोबेल सम्मान रवींद्रनाथ टैगोर का निजी गौरव नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एशिया की सांस्कृतिक चेतना की वैश्विक स्वीकृति था। उनकी कविता का ईश्वर मंदिरों में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य के निर्मल अंतर्मन में बसता है। इसलिए उनकी रचनाएँ भय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविश्वास और भीतरी स्वतंत्रता जगाती हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">गोरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घरे-बाइरे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">काबुलीवाला</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उपदेश नहीं देते</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वे समाज के अंतर्विरोध खोलकर पाठक को स्वयं से प्रश्न करने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके लिए साहित्य मनोरंजन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मपहचान का माध्यम था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ मनुष्य स्वयं से साक्षात्कार करता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र का सबसे ऊँचा स्वर वह है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें विवेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा और आत्मसम्मान साथ बोलते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर का देशप्रेम इसी आधार पर खड़ा था। जलियाँवाला बाग़ के बाद नाइटहुड लौटाना उनके लिए राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मसम्मान का निर्णय था। उन्होंने राष्ट्रवाद को कभी आक्रोश की भाषा नहीं बनने दिया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एकला चलो रे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भीड़ से अलग होने का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य के लिए अकेले डटे रहने का संदेश है। उनका विश्वास था कि बाहरी स्वतंत्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतःकरण की स्वतंत्रता के बिना अधूरी है। इसलिए हिंसा उन्हें किसी आदर्श का स्थायी मार्ग नहीं लगी। आज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब राष्ट्रप्रेम कई बार शोर और कटुता में सिमट जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टैगोर याद दिलाते हैं कि प्रेम से रिक्त देशभक्ति अंततः अपना अर्थ खो देती है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ भाव शब्दों में नहीं समाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे स्वर बनकर ही अपना पूरा अर्थ पाते हैं। रवींद्रनाथ का संगीत उसी अनुभूति का विस्तार है। रवींद्र संगीत में प्रकृति पृष्ठभूमि नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य के भावों की सहभागी है। हवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संध्या और बदलती ऋतुएँ प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विरह और आशा के साथ एकाकार हो उठती हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जन गण मन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आमार सोनार बांग्ला</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्ध करते हैं कि सच्ची कला सीमाओं और राजनीति से कहीं बड़ी होती है। टैगोर के लिए संगीत साधना था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ गायक और श्रोता एक ही लय में अपना अहं विसर्जित कर देते हैं। इसलिए उनके गीत समय के साथ पुराने नहीं होते</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वे मनुष्य के शाश्वत अनुभवों से जन्मे हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सृजन का स्वभाव एक ही भाषा में ठहरना नहीं जानता। जीवन के उत्तरार्ध में रवींद्रनाथ टैगोर ने शब्दों से आगे बढ़कर रंग और रेखाओं में अपनी अनुभूतियाँ उकेरीं। चित्रकला उनके लिए परंपरा की पुनरावृत्ति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म-अन्वेषण का नया माध्यम बनी। लोक और आदिवासी कला की प्रेरणा को उन्होंने अपनी मौलिक दृष्टि से ऐसा रूप दिया कि अमूर्त आकृतियाँ भी गहरे भाव व्यक्त करने लगीं। उनकी तूलिका मानो कविता की ही दूसरी अभिव्यक्ति थी। इससे स्पष्ट हुआ कि प्रतिभा किसी एक विधा की सीमाओं में नहीं बँधती। कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कथाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगीतकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्रकार और शिक्षाविद्—हर रूप में वही जिज्ञासु चेतना सक्रिय रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जीवन के अनदेखे अर्थों की निरंतर तलाश करती रही।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर युग अपनी सबसे बड़ी कीमत किसी न किसी रूप में चुकाता है। हमारे समय ने सुविधा पाई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर संवेदना का कुछ हिस्सा खो दिया है। तकनीक ने गति दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु प्रकृति और अपने भीतर के मनुष्य से दूरी भी बढ़ाई। ऐसे दौर में रवींद्रनाथ टैगोर का चिंतन नई रोशनी देता है। उनकी शिक्षा-दृष्टि बताती है कि ज्ञान का उद्देश्य केवल दक्षता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तित्व का परिष्कार भी है। विश्वभारती इसी विचार का साकार रूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ शिक्षा जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति और प्रकृति से जुड़ती है। उनके लिए सौंदर्य और सत्य अलग नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक ही अनुभूति के दो आयाम थे। इसलिए उनका संदेश आज भी हमें ठहरने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं से मिलने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति से जुड़ने और मनुष्यता को जीवन का केंद्र बनाने की प्रेरणा देता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी महान जीवन का सबसे विश्वसनीय प्रमाण उसकी छोड़ी हुई विरासत नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी बची हुई प्रासंगिकता होती है। इसलिए </span>7 <span lang="hi" xml:lang="hi">अगस्त केवल स्मरण का दिन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मपरीक्षण का अवसर है। रवींद्रनाथ टैगोर को सचमुच याद करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उनके शब्दों का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके विचारों का आचरण करना होगा। प्रकृति के प्रति सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा में स्वतंत्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला में मानवीयता और राष्ट्रप्रेम में करुणा—यही उनकी सबसे बड़ी धरोहर है। उनका प्रकाश आज भी हमारे भीतर पहुँच सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम उसके लिए स्थान बचाए रखें। किसी कवि की सच्ची श्रद्धांजलि पुष्प नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह जीवन है जो उसके स्वप्नों को आगे बढ़ाए। तभी टैगोर इतिहास की स्मृति नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे समय की आवश्यकता बने रहेंगे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कृति आरके जैन</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 21:51:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बौद्धिक,आर्थिक प्रगति को छिन्न-भिन्न करती रूढ़िवादिता और अंधविश्वास</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">धार्मिक रूढ़िवादिता,कट्टरपंथी धर्मांधता हमारी प्रगति के बड़े बाधको में से एक है। यह हमारी राहों के कंटक और रोड़े साबित हुए हैं।  उनसे हमें हर हाल में छुटकारा पाना होगा। बुनियादी शिक्षा के प्रचार प्रसार से इसके अवरोधों को जनमानस के माध्यम से दूर किया जाना चाहिए ।जो विषय वस्तु आजाद विचारों मान्यताओं को बर्दाश्त नहीं करती उन्हें समाप्त हो जाना चाहिए, ऐसी अन्य और मानवीय कमजोरियां हैं, जिन पर हमें विजय प्राप्त करनी है। इस कार्य के लिए सभी समुदायों के क्रांतिकारी उत्साही नौजवानों की आवश्यकता है। यह बात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद भगत सिंह ने अपने संगठन नौजवान</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180139/conservatism-and-superstition-disrupting-intellectual-and-economic-progress"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/410.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">धार्मिक रूढ़िवादिता,कट्टरपंथी धर्मांधता हमारी प्रगति के बड़े बाधको में से एक है। यह हमारी राहों के कंटक और रोड़े साबित हुए हैं।  उनसे हमें हर हाल में छुटकारा पाना होगा। बुनियादी शिक्षा के प्रचार प्रसार से इसके अवरोधों को जनमानस के माध्यम से दूर किया जाना चाहिए ।जो विषय वस्तु आजाद विचारों मान्यताओं को बर्दाश्त नहीं करती उन्हें समाप्त हो जाना चाहिए, ऐसी अन्य और मानवीय कमजोरियां हैं, जिन पर हमें विजय प्राप्त करनी है। इस कार्य के लिए सभी समुदायों के क्रांतिकारी उत्साही नौजवानों की आवश्यकता है। यह बात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद भगत सिंह ने अपने संगठन नौजवान भारत सभा के लाहौर में प्रकाशित घोषणा पत्र में लिखी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">शहीद भगत सिंह ने अपने जीवन का बलिदान कर भारत को आजादी दिलाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, पर आजादी के बाद भी भारत का जनमानस उन्हीं अंधविश्वास धर्मांधता तथा रूढ़िवाद पर फंसा हुआ है।और अभी भी इस युग में अंधविश्वास का बोलबाला दिखाई देता है। बिल्ली रास्ता काट दे तो यह समझना कि राह में दुर्घटना होने की संभावना हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">घर से निकलते समय कोई छींक दे तो यह समझना कि होने वाला काम बिगड़ जाएगा,और घर में कौवे के बोलने से यह अर्थ निकाला जाए कि घर में मेहमान आने वाले हैं। छोटी चिड़िया यदि मिट्टी की धूल से खेल रही हो तो यह समझा जाए की घनघोर बारिश होने वाली है, आदि इत्यादि ऐसी कई धारणाएं हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक तथा सामाजिक प्रमाण, तर्क या आधार मौजूद नहीं है। फिर भी बड़ी संख्या में लोग इन बातों पर विश्वास करके अपनी नियति तय करने में जुट जाते हैं, अपने विवेक का प्रयोग किए बिना ही इन बातों पर विश्वास कर लेना ही अंधविश्वास माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ लोग तेरा के अंक को अशुभ मानते हैं, तो कई देश किस अंग को शुभ भी मानते हैं। मृत्यु के बाद भी अनेक तरह के अंधविश्वास जी एवं आडंबर संयुक्त कर्मकांड किए जाते हैं। एवं इन कर्मकांड को नहीं किए जाने पर मनुष्य की आत्मा भूत बनकर इर्द गिर्द मंडराती है। और इस तरह के भूत मनुष्य जाति को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं, ऐसी मान्यताएं अंधविश्वास के साक्षात प्रमाण हैं। अधिकतर भारतीय ग्रामीण अभी भी यह मानते हैं कि पृथ्वी शेषनाग पर टिकी हुई है और भूकंप आने पर वह इस बात का दावा करते हैं कि शेषनाग नाराजगी कारण पृथ्वी हिलने लगी है,और भी पूजा पाठ करने में लग जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चंद्र ग्रहण तथा सूर्य ग्रहण के समय भी ग्रामीण क्षेत्र में लोगों द्वारा ऐसे ही कयास लगाए जाते हैं, और फिर ग्रहों की पूजा की जाती है। पूजा करना बहुत अच्छी बात है,ईश्वर में आस्था होनी चाहिए यह एक तरह की एकाग्रता तथा अदृश्य शक्ति के प्रति आप का समर्पण भाव दिखाती है। ईश्वर से लगाओ तथा ईश्वरीय शक्ति के आगे समर्पण एक स्तुत्य के कार्य है। पर इसके पीछे अंधविश्वास को पुष्पित पल्लवित करना खतरनाक भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त ग्रह के चक्कर को दूर करने के लिए किसी विशेष जाति अथवा पत्थर की अंगूठी पहनना विशेष मंत्र वाला ताबीज पहनना जादू टोना तथा टोटका करवाना आदि अंधविश्वास के बड़े उदाहरण हैं ।</p>
<p style="text-align:justify;">और इन सब अंधविश्वास के चक्कर में अनेक लोग धोखाधड़ी तथा शोषण के शिकार होते देखे गए हैं। अंधविश्वास धर्मांधता एक सामाजिक बुराई की तरह दिखाई देती है, जो निश्चित तौर पर देश के विकास के लिए बड़ी बाधा बन जाती है। संत कबीर दास ने बड़ी बेबाकी से इस अंधविश्वास पर अपनी कविता के माध्यम से गहरा कटाक्ष किया है, अरिहरन की चोरी करै, करे सुई का दान, ऊंचा चढ़ी के देखता,केतिक दूर विमान।</p>
<p style="text-align:justify;">दोहे का अर्थ है, मानव कुमार्ग के पथ पर चलकर कमाए गए अनैतिक धन का बहुत छोटा सा भाग दान कर आकाश की ओर देखता है कि उसको स्वर्ग ले जाने वाला विमान कितनी दूर है। अज्ञानी मानव का यह सोचना एक बड़े अंधविश्वास को दर्शाता है। किसी भी गरीब स्त्री की जमीन जायजाद को हड़पने के लिए जमीदारों या मुखिया द्वारा गांव में उसे डायन घोषित कर देना या ईश्वर को खुश करने के लिए मनुष्य की नरबलि दे देना या पशुओं की बलि देना एक बड़ा अंधविश्वास माना जाता है। इन सब अंधविश्वास से समाज में विसंगति फैलती है एवं जो साक्षरता तथा मानवता के लिए बड़े खतरे और विकास के लिए अवरोध पैदा करने के तथ्य हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इनके विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्रवाई कर इनको सजा देकर समाज में अंधविश्वास के खिलाफ सरकार को एक स्वस्थ संदेश देने की आवश्यकता है। समाचार पत्र, टीवी चैनल, इंटरनेट इन सब में राशिफल, वास्तु शास्त्र हाथ में पहनने वाले पत्थरो के बारे में जोर शोर से प्रचार प्रसार किया जाता है, जबकि इन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, क्योंकि इनके चलते बड़े-बड़े जालसाज तथा ठग लोगों से पैसा तथा सोने चांदी की ठगी करने से नहीं चूकते। यह अंधविश्वास यद्यपि सिर्फ भारत में ही नहीं है बल्कि ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया कनाडा अमेरिका तथा साउथ अफ्रीका में भी इसी बड़े पैमाने पर व्याप्त है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि अशिक्षित मनुष्य अंधविश्वासों को मानता है तो यह बात समझ में आती है कि वह वास्तविकता से अशिक्षा के कारण अनभिज्ञ है, एवं इनके परिणामों के बारे में नहीं जानता है। किंतु यह विडंबना तथा अफसोस की बात है कि इस वैज्ञानिक युग में उच्च शिक्षित लोग अनेक प्रकार के अंधविश्वासों से घिरे हुए हैं। शिक्षा अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर विवेकपूर्ण सोचने की शक्ति प्रदान करती है, इसके बाद ही मनुष्य विज्ञान तथा तर्क के आधार पर इसको परख कर किसी बात को मान्यता देता है। अतः अंधविश्वास धर्मांधता के खिलाफ शिक्षा जगत तथा शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में इस विषय को शामिल कर अशिक्षित तथा शिक्षित दोनों को अंधविश्वास के प्रति सचेत कर इसके दुष्परिणामों के बारे में अच्छे से समझा देना चाहिए तभी अंधविश्वास समाज से दूर हो पाएगा।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 18:33:30 +0530</pubDate>
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