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                <title>Indian Education System - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>श्रीकृष्ण की गुरुकुल यात्रा में निहित शिक्षा-दर्शन</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारतीय सनातन परंपरा में श्रीकृष्ण का महर्षि सांदीपनि के आश्रम अर्थात् गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करना केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा-दर्शन का अत्यंत गहन और कालजयी संदेश है। इसमें ज्ञान के साथ विनय, विद्या के साथ विवेक, शिक्षा के साथ अनुशासन, गुरु के प्रति श्रद्धा, श्रम के प्रति सम्मान, सहपाठियों के प्रति संवेदनशीलता तथा अर्जित सामर्थ्य के लोककल्याण में उपयोग की भावना निहित है। आज जब शिक्षा का उद्देश्य मुख्यतः अच्छा रोजगार प्राप्त करना रह गया है और उसका मूल्यांकन प्रायः परीक्षा, अंक, डिग्री तथा प्रतिस्पर्धा में सफलता तक सीमित होता जा रहा है,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/187151/education-philosophy-contained-in-shri-krishnas-gurukul-yatra"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-09/img-20241207-wa0003.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारतीय सनातन परंपरा में श्रीकृष्ण का महर्षि सांदीपनि के आश्रम अर्थात् गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करना केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा-दर्शन का अत्यंत गहन और कालजयी संदेश है। इसमें ज्ञान के साथ विनय, विद्या के साथ विवेक, शिक्षा के साथ अनुशासन, गुरु के प्रति श्रद्धा, श्रम के प्रति सम्मान, सहपाठियों के प्रति संवेदनशीलता तथा अर्जित सामर्थ्य के लोककल्याण में उपयोग की भावना निहित है। आज जब शिक्षा का उद्देश्य मुख्यतः अच्छा रोजगार प्राप्त करना रह गया है और उसका मूल्यांकन प्रायः परीक्षा, अंक, डिग्री तथा प्रतिस्पर्धा में सफलता तक सीमित होता जा रहा है, तब श्रीकृष्ण का गुरुकुल जीवन हमें शिक्षा के व्यापक, मानवीय और जीवनोपयोगी उद्देश्य का स्मरण कराता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल में ही अनेक असाधारण लीलाओं के माध्यम से स्वयं को दिव्य शक्तियों से संपन्न सिद्ध कर दिया था। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जिन्हें भारतीय परंपरा अवतारी पुरुष मानती है, उन्हें शिक्षा ग्रहण करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसका उत्तर श्रीकृष्ण के आचरण में ही निहित है। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से यह स्थापित किया कि ज्ञान की आवश्यकता किसी एक वर्ग, लिंग, आयु, पद या परिस्थिति तक सीमित नहीं है। वस्तुतः महान से महान व्यक्ति भी सीखने की प्रक्रिया से ऊपर नहीं होता। स्वयं को सर्वज्ञ मान लेने के बजाय ज्ञान के प्रति जिज्ञासा और गुरु के प्रति विनम्रता ही वास्तविक विद्वत्ता का लक्षण है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राजपरिवार से संबंधित होने के बावजूद श्रीकृष्ण ने गुरुकुल में सामान्य शिष्य की तरह जीवन व्यतीत किया और शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने किसी विशेषाधिकार की अपेक्षा नहीं की तथा आश्रम की व्यवस्था, अनुशासन और मर्यादाओं का पालन किया। इससे शिक्षा का पहला महत्वपूर्ण संदेश मिलता है कि महानता जन्म, पद, धन या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि ज्ञान, विनय और आचरण से निर्धारित होती है। शिक्षा के मंदिर में व्यक्ति की सामाजिक स्थिति नहीं, बल्कि उसकी जिज्ञासा, लगन और सीखने की तत्परता उसे श्रेष्ठ शिक्षार्थी बनाती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह संदेश आज के संदर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक है। शिक्षा में समान अवसर, समान सम्मान और समान गरिमा लोकतांत्रिक समाज की मूल आवश्यकताएँ हैं। आर्थिक संसाधनों की असमानता के कारण यदि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए अलग-अलग स्तर के शिक्षण संस्थानों पर निर्भर रहना पड़े, तो शिक्षा सामाजिक विषमता को कम करने के बजाय उसे और गहरा कर सकती है। श्रीकृष्ण का गुरुकुल प्रसंग इस बात की प्रेरणा देता है कि शिक्षा व्यक्ति में विशेषाधिकार का अहंकार नहीं, बल्कि समानता, सह-अस्तित्व और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण की शिक्षा-यात्रा का दूसरा प्रमुख संदेश है—विद्या के साथ विनय। ज्ञान का उद्देश्य अहंकार बढ़ाना नहीं, बल्कि दृष्टि को व्यापक बनाना है। वास्तविक विद्वान वही है जो जितना अधिक जानता है, उतना ही अधिक सीखने की आवश्यकता अनुभव करता है। गुरु के प्रति श्रद्धा और सीखने की प्रक्रिया के प्रति समर्पण इसी विनम्रता के प्रतीक हैं। भारतीय परंपरा में गुरु केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि जीवन की जटिलताओं को समझने की दृष्टि प्रदान करने वाला मार्गदर्शक माना गया है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">महर्षि सांदीपनि के प्रति श्रीकृष्ण की श्रद्धा और गुरु-दक्षिणा का प्रसंग भी शिक्षा के इसी भाव को पुष्ट करता है। परंपरागत कथा के अनुसार, उन्होंने अपने गुरु के पुत्र को वापस लाकर गुरु-दक्षिणा अर्पित की। इस प्रसंग का मूल संदेश धन अथवा भौतिक भुगतान से कहीं व्यापक है। शिक्षा के प्रति कृतज्ञता केवल शुल्क चुकाने से पूरी नहीं होती; उसका वास्तविक प्रतिदान अर्जित ज्ञान का सदुपयोग, गुरु के प्रति सम्मान, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और अपने कर्तव्य का ईमानदारीपूर्वक निर्वहन है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">गुरुकुल जीवन का तीसरा महत्वपूर्ण संदेश है—अनुशासन और आत्मनिर्भरता। गुरुकुल में शिक्षा केवल पुस्तकीय अध्ययन तक सीमित नहीं थी। आश्रम का जीवन विद्यार्थियों को श्रम, संयम, सेवा और सामूहिक जीवन का अभ्यास कराता था। अपने दैनिक कार्य स्वयं करना, आश्रम की आवश्यकताओं में सहयोग देना और सीमित संसाधनों में जीवन जीना व्यक्ति में आत्मनिर्भरता तथा दायित्व-बोध विकसित करता था। इससे यह धारणा पुष्ट होती है कि शिक्षा केवल मस्तिष्क को प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व को गढ़ने का माध्यम है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज जब बच्चों और युवाओं के जीवन में सुविधाएँ बढ़ी हैं, वहीं अनेक मामलों में श्रम से दूरी और तत्काल उपलब्धि की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। ऐसे समय में शिक्षा को यह सिखाने की आवश्यकता है कि कोई भी कार्य छोटा नहीं होता, श्रम सम्मानजनक है और आत्मनिर्भरता व्यक्तित्व की शक्ति है। अंक और प्रमाणपत्र महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन वे चरित्र, धैर्य, अनुशासन और जिम्मेदारी का विकल्प नहीं हो सकते।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता गुरुकुल जीवन के एक अन्य अत्यंत सुंदर पक्ष को सामने लाती है। दोनों की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ भिन्न थीं, लेकिन गुरुकुल में उनका संबंध समानता, स्नेह और आत्मीयता पर आधारित था। यह प्रसंग बताता है कि सच्ची मित्रता धन, पद और प्रतिष्ठा की सीमाओं से परे होती है। शिक्षा यदि मनुष्य को दूसरे मनुष्य की गरिमा का सम्मान करना नहीं सिखाती, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण की शिक्षा को व्यापक अर्थ में देखें तो उसमें एकांगी विशेषज्ञता के बजाय बहुआयामी व्यक्तित्व-निर्माण की भावना दिखाई देती है। परंपरागत आख्यानों में उनके द्वारा अनेक विद्याओं और कलाओं में प्रवीणता प्राप्त करने का उल्लेख मिलता है। इन विवरणों का मूल संदेश यह है कि शिक्षा केवल किसी एक विषय में दक्षता प्राप्त करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। ज्ञान के साथ व्यवहार-कौशल, शारीरिक दक्षता, कला, संवेदना, नैतिकता, सामाजिक चेतना और परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने की क्षमता का विकास भी आवश्यक है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यहीं से शिक्षा का चौथा और सबसे महत्वपूर्ण आयाम सामने आता है—विवेक। ज्ञान हमें तथ्यों से परिचित कराता है, लेकिन विवेक हमें यह निर्धारित करने की क्षमता देता है कि उन तथ्यों का उपयोग कब, कहाँ, कैसे और किस उद्देश्य से किया जाए। आज विज्ञान और तकनीक ने मनुष्य को अभूतपूर्व शक्ति प्रदान की है। किंतु शक्ति के साथ विवेक न हो तो वही ज्ञान विनाश का कारण भी बन सकता है। इसलिए शिक्षा का लक्ष्य केवल अधिक से अधिक जानना नहीं, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेना और अपने ज्ञान का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग करना होना चाहिए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण के जीवन का उत्तरवर्ती चरण इसी शिक्षा की परिणति को दर्शाता है। उन्होंने अपने ज्ञान, कौशल और सामर्थ्य को केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधा तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अन्याय और अधर्म का प्रतिरोध किया तथा समाज में धर्म और न्याय की स्थापना के लिए सक्रिय भूमिका निभाई। महाभारत के युद्धक्षेत्र में अर्जुन को दिया गया उनका उपदेश शिक्षा के सर्वोच्च उद्देश्य को रेखांकित करता है—अर्थात् ज्ञान व्यक्ति को अपने कर्तव्य का बोध कराए और कठिन परिस्थितियों में भी विवेकपूर्ण निर्णय लेने की शक्ति दे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भगवद्गीता का कर्मयोग इसी व्यापक शिक्षा-दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है। व्यक्ति को अपने कर्तव्य से विमुख होने के बजाय उसे निष्काम भाव से पूरा करने की प्रेरणा दी जाती है। इस दृष्टि से शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ और उत्तरदायी नागरिक का निर्माण है। जो व्यक्ति अपनी योग्यता का उपयोग केवल अपने लाभ के लिए करता है, वह सफल तो हो सकता है, लेकिन उसकी सफलता समाज के लिए कितनी उपयोगी है, यह एक अलग प्रश्न है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज की शिक्षा-व्यवस्था के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। विद्यार्थियों को प्रतिस्पर्धी बनाने के साथ-साथ संवेदनशील भी बनाना होगा; उन्हें सफल बनाने के साथ-साथ जिम्मेदार भी बनाना होगा। ज्ञान के साथ विनय, अधिकार के साथ कर्तव्य, स्वतंत्रता के साथ अनुशासन, आधुनिकता के साथ सांस्कृतिक आत्मबोध और व्यक्तिगत उपलब्धि के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलन ही शिक्षा को सार्थक बना सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण की गुरुकुल यात्रा इसलिए अतीत की केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए शिक्षा का एक जीवंत दर्शन है। यह हमें बताती है कि विद्या मनुष्य को सक्षम बनाए, विनय उसे अहंकार से बचाए और विवेक उसकी क्षमता को सही दिशा दे। शिक्षा बुद्धि को प्रखर करने के साथ हृदय को संवेदनशील, चरित्र को दृढ़ और व्यवहार को जिम्मेदार बनाए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अंततः श्रीकृष्ण का शिक्षा-संदेश तीन शब्दों में समाहित किया जा सकता है—विद्या, विनय और विवेक। विद्या से ज्ञान प्राप्त हो, विनय से व्यक्तित्व में गरिमा आए और विवेक से ज्ञान का सदुपयोग हो। जब शिक्षा इन तीनों का समन्वय कर सकेगी, तभी वह केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन न रहकर श्रेष्ठ मनुष्य, उत्तरदायी नागरिक और सशक्त समाज के निर्माण का माध्यम बनेगी। यही श्रीकृष्ण के गुरुकुल जीवन की कालजयी तथा आज के शिक्षार्थियों के लिए सर्वाधिक प्रासंगिक सीख है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 20:02:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अजय यादव]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>शिक्षा को लौटानी होगी मानवीय संवेदना</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारत की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से ऐसी दोहरी चुनौती का सामना कर रही है जिसमें एक ओर वैश्विक स्तर पर प्रतिभाशाली युवाओं का निर्माण करने की आकांक्षा है, तो दूसरी ओर प्रवेश परीक्षाओं, कोचिंग उद्योग और अंकों की अंधी प्रतिस्पर्धा ने शिक्षा के मूल उद्देश्य को सीमित कर दिया है। हाल के वर्षों में प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा अनियमितताओं, मानसिक तनाव, छात्र आत्महत्याओं और महंगी कोचिंग व्यवस्था ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि संपूर्ण शैक्षिक दर्शन पर पुनर्विचार आवश्यक है। यह तथ्य है कि भारत ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, प्रशासन</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184838/human-sensitivity-must-be-returned-to-education"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1001020091.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से ऐसी दोहरी चुनौती का सामना कर रही है जिसमें एक ओर वैश्विक स्तर पर प्रतिभाशाली युवाओं का निर्माण करने की आकांक्षा है, तो दूसरी ओर प्रवेश परीक्षाओं, कोचिंग उद्योग और अंकों की अंधी प्रतिस्पर्धा ने शिक्षा के मूल उद्देश्य को सीमित कर दिया है। हाल के वर्षों में प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा अनियमितताओं, मानसिक तनाव, छात्र आत्महत्याओं और महंगी कोचिंग व्यवस्था ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि संपूर्ण शैक्षिक दर्शन पर पुनर्विचार आवश्यक है। यह तथ्य है कि भारत ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, प्रशासन और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में विश्वस्तरीय प्रतिभाएँ दी हैं। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि इन सफलताओं के पीछे लाखों ऐसे विद्यार्थी भी हैं जो संसाधनों की कमी, असमान अवसरों और अत्यधिक प्रतिस्पर्धा के कारण अपनी वास्तविक क्षमता तक पहुँच ही नहीं पाते। इसलिए अब शिक्षा को केवल चयन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी की क्षमता के विकास की प्रक्रिया के रूप में देखने की आवश्यकता है।<br /><br />यह मान लेना कि तीन या चार घंटे की एक परीक्षा किसी विद्यार्थी की बुद्धिमत्ता, रचनात्मकता, नैतिकता, नेतृत्व क्षमता और जीवन कौशल का अंतिम प्रमाण बन सकती है, आधुनिक शिक्षा विज्ञान की दृष्टि से भी सीमित सोच है। परीक्षा आवश्यक है, किंतु उसे शिक्षा का पर्याय बना देना सबसे बड़ी भूल रही है। आज अनेक विद्यार्थी विश्लेषणात्मक सोच, नवाचार, कला, खेल, सामाजिक नेतृत्व, संवाद कौशल और व्यावहारिक दक्षताओं में उत्कृष्ट होते हुए भी केवल इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि वे एक विशेष प्रकार की प्रतियोगी परीक्षा के अनुरूप स्वयं को ढाल नहीं पाते। दूसरी ओर रटने की संस्कृति और अनुमान आधारित तैयारी को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था कई बार वास्तविक प्रतिभा की अपेक्षा परीक्षा तकनीक में दक्ष विद्यार्थियों को आगे ले आती है। तथ्य और मत के बीच अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है। तथ्य यह है कि अधिकांश प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश अभी भी प्रतियोगी परीक्षाओं पर आधारित है। मत यह है कि भविष्य में इन परीक्षाओं के साथ बहुआयामी मूल्यांकन को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए ताकि चयन अधिक न्यायपूर्ण बन सके।<br /><br />कोचिंग उद्योग का विस्तार भी इसी असंतुलित व्यवस्था का परिणाम है। जब विद्यालयों की शिक्षा प्रवेश परीक्षाओं की आवश्यकताओं से अलग दिखाई देने लगती है, तब अभिभावक अतिरिक्त संसाधनों की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित होते हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा एक सामाजिक अधिकार से अधिक आर्थिक क्षमता का विषय बन जाती है। छोटे नगरों और ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक परिवार अपने बच्चों की तैयारी के लिए ऋण लेते हैं, बचत समाप्त कर देते हैं अथवा अन्य आवश्यकताओं में कटौती करते हैं। महानगरों के अतिरिक्त कोटा, प्रयागराज, पटना, सीकर, हैदराबाद, दिल्ली और अन्य शिक्षा केंद्रों में विकसित कोचिंग संस्कृति ने अवसर तो दिए हैं, किंतु साथ ही मानसिक दबाव और सामाजिक असमानता को भी बढ़ाया है। यह कहना उचित नहीं होगा कि प्रत्येक कोचिंग संस्थान नकारात्मक भूमिका निभाता है, क्योंकि अनेक संस्थान गुणवत्तापूर्ण मार्गदर्शन भी उपलब्ध कराते हैं। किंतु जब किसी व्यवस्था की सफलता विद्यालयों से अधिक कोचिंग संस्थानों पर निर्भर होने लगे, तब यह शिक्षा तंत्र के लिए गंभीर संकेत माना जाना चाहिए।<br /><br />विद्यालयों की भूमिका को पुनर्स्थापित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि विद्यालयों में प्रयोगशाला आधारित शिक्षण, परियोजना कार्य, भाषा दक्षता, तार्किक चिंतन, अनुसंधान प्रवृत्ति, कला, खेल, सामुदायिक सेवा और डिजिटल साक्षरता को समान महत्व दिया जाए तो विद्यार्थियों का समग्र विकास संभव होगा। प्रवेश प्रक्रिया में विद्यालयी उपलब्धियों, सत्यापित परियोजनाओं, सामाजिक सहभागिता, इंटर्नशिप, शोध अभिरुचि तथा साक्षात्कार जैसे तत्वों का संतुलित समावेश किया जा सकता है। इससे केवल स्मरण शक्ति नहीं, बल्कि समस्या समाधान क्षमता, नेतृत्व, सहयोग, नैतिक उत्तरदायित्व और व्यावहारिक समझ का भी मूल्यांकन संभव होगा। हालांकि इसके साथ पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट मानदंड, प्रशिक्षित मूल्यांकनकर्ता और डिजिटल सत्यापन प्रणाली अनिवार्य होगी।<br /><br />परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं ने विद्यार्थियों के विश्वास को गहरा आघात पहुँचाया है। ऐसी घटनाएँ केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर भी प्रश्नचिह्न लगाती हैं। सुरक्षित डिजिटल प्रश्नपत्र प्रबंधन, बहुस्तरीय एन्क्रिप्शन, सीमित अभिगम, परीक्षा केंद्रों का नियमित ऑडिट, स्वतंत्र निगरानी तंत्र, तकनीकी सुरक्षा, उत्तर पुस्तिकाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण तथा दोषियों के विरुद्ध त्वरित दंडात्मक कार्रवाई जैसी व्यवस्थाएँ अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुकी हैं। साथ ही परीक्षा कैलेंडर को पूरे वर्ष में संतुलित ढंग से वितरित किया जाए ताकि किसी एक परीक्षा पर अत्यधिक दबाव न बने और विद्यार्थियों को तैयारी के लिए पर्याप्त अवसर मिल सकें।<br /><br />राष्ट्रीय स्तर की एक समान परीक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर विमर्श आवश्यक है। विशाल भौगोलिक, भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता वाले देश में एक ही मॉडल सभी विद्यार्थियों के लिए समान रूप से उपयुक्त हो, यह मान लेना व्यावहारिक नहीं है। विभिन्न विषयों की प्रकृति भी अलग होती है। चिकित्सा, अभियांत्रिकी, विधि, कला, सामाजिक विज्ञान और डिजाइन जैसे क्षेत्रों के लिए समान मूल्यांकन पद्धति अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकती। इसलिए राष्ट्रीय मानकों के साथ संस्थानों को सीमित शैक्षणिक स्वायत्तता देना अधिक संतुलित विकल्प हो सकता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और संबंधित व्यावसायिक निकायों के दिशा-निर्देशों के भीतर संस्थानों को अपने विषयानुकूल अतिरिक्त मूल्यांकन विकसित करने की अनुमति मिलने से चयन प्रक्रिया अधिक सार्थक बन सकती है।<br /><br />अभिभावकों की भूमिका भी इस परिवर्तन में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनेक बार सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण कुछ चुनिंदा व्यवसायों को ही सफलता का पर्याय मान लिया जाता है। इससे विद्यार्थी अपनी वास्तविक रुचि और क्षमता की उपेक्षा करने लगते हैं। व्यवस्थित करियर परामर्श, मनोवैज्ञानिक सहयोग, योग्यता परीक्षण और उद्योग जगत से संवाद की व्यवस्था विद्यालय स्तर से ही विकसित की जानी चाहिए। यदि कोई विद्यार्थी कृषि प्रौद्योगिकी, पर्यावरण विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, शिक्षण, डिजाइन, लोक प्रशासन, उद्यमिता, साहित्य, खेल या संगीत में उत्कृष्ट भविष्य देखता है, तो उसे उसी दिशा में आगे बढ़ने का सम्मानजनक अवसर मिलना चाहिए। विविध करियर विकल्पों की सामाजिक स्वीकृति बढ़े बिना परीक्षा का दबाव कम नहीं होगा।<br /><br />नई शिक्षा नीति ने बहुविषयक शिक्षा, कौशल विकास और लचीले शिक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए हैं। किंतु किसी भी नीति की वास्तविक सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। पर्याप्त वित्तीय निवेश, प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक प्रयोगशालाएँ, स्थानीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री, डिजिटल अवसंरचना और ग्रामीण क्षेत्रों तक समान संसाधनों की उपलब्धता के बिना अपेक्षित परिवर्तन संभव नहीं होगा। शिक्षा सुधार को केवल नीति दस्तावेजों तक सीमित रखने के बजाय उसे विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के दैनिक शैक्षणिक जीवन का हिस्सा बनाना होगा।<br /><br />अंततः शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उत्तरदायी, संवेदनशील, वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले और लोकतांत्रिक मूल्यों से युक्त नागरिक तैयार करना है। जब व्यवस्था विद्यार्थियों को भय, ऋण, तनाव और निरंतर तुलना से मुक्त कर उनकी जिज्ञासा, रचनात्मकता और मानवीय गरिमा को केंद्र में रखेगी, तभी वास्तविक परिवर्तन दिखाई देगा। तथ्य यह है कि प्रतियोगिता आधुनिक समाज का हिस्सा रहेगी। किंतु यह मत अधिक दूरदर्शी प्रतीत होता है कि प्रतियोगिता का आधार केवल अंक नहीं, बल्कि क्षमता, चरित्र, कौशल, नवाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व होना चाहिए। भारत यदि ज्ञान आधारित वैश्विक नेतृत्व का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है, तो उसे ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करना होगा जिसमें प्रत्येक विद्यार्थी स्वयं को केवल परीक्षार्थी नहीं, बल्कि संभावनाओं से परिपूर्ण नागरिक के रूप में देख सके। तभी शिक्षा सचमुच मानवीय बनेगी और राष्ट्र की प्रगति का सबसे विश्वसनीय आधार भी।<br /><br /><strong>अवनीश कुमार गुप्ता</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 21:52:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>&quot;नीट में बदलता सामाजिक परिदृश्य&quot;</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">परीक्षा यानी नीट अब केवल मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश की परीक्षा भर नहीं रह गई है। यह देश के सामाजिक शैक्षणिक और आर्थिक बदलावों का भी आईना बन चुकी है। वर्ष 2026 के परिणामों ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत में उच्च शिक्षा विशेषकर मेडिकल शिक्षा तक पहुंच का दायरा लगातार व्यापक हो रहा है। इस वर्ष के आंकड़े बताते हैं कि ओबीसी वर्ग के छात्रों की सफलता सबसे अधिक रही है। वहीं अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर छोटे राज्यों और केंद्र</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183679/changing-social-scenario-in-neet"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/2042cbf4e6b79b201992fc2a0118d34f_original.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">परीक्षा यानी नीट अब केवल मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश की परीक्षा भर नहीं रह गई है। यह देश के सामाजिक शैक्षणिक और आर्थिक बदलावों का भी आईना बन चुकी है। वर्ष 2026 के परिणामों ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत में उच्च शिक्षा विशेषकर मेडिकल शिक्षा तक पहुंच का दायरा लगातार व्यापक हो रहा है। इस वर्ष के आंकड़े बताते हैं कि ओबीसी वर्ग के छात्रों की सफलता सबसे अधिक रही है। वहीं अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने सफलता प्रतिशत के मामले में बड़े राज्यों को पीछे छोड़कर यह साबित किया है कि गुणवत्तापूर्ण तैयारी और बेहतर शैक्षणिक वातावरण आकार से अधिक महत्वपूर्ण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस वर्ष नीट में सबसे बड़ा वर्ग अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी का रहा। कुल पंजीकरण में ओबीसी छात्रों की हिस्सेदारी 41.8 प्रतिशत रही जबकि सफल छात्रों में यह बढ़कर 45.7 प्रतिशत पहुंच गई। इसका अर्थ है कि लगभग हर दूसरा सफल छात्र ओबीसी वर्ग से है। यह केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव का मजबूत संकेत भी है। पिछले कई वर्षों में शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने वाली सरकारी योजनाओं छात्रवृत्तियों और आरक्षण व्यवस्था ने इस वर्ग के छात्रों को आगे बढ़ने का अवसर दिया है। अब उसका प्रभाव परिणामों में स्पष्ट दिखाई देने लगा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों की भागीदारी में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2019 की तुलना में अनुसूचित जाति के छात्रों की संख्या में 63.52 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि अनुसूचित जनजाति के छात्रों की संख्या लगभग 57 प्रतिशत बढ़ी है। यह दर्शाता है कि देश के दूरदराज और सामाजिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में भी शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। पहले जहां मेडिकल शिक्षा केवल कुछ वर्गों तक सीमित मानी जाती थी वहीं अब समाज के सभी वर्गों के छात्र इस क्षेत्र में अपनी जगह बना रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस के छात्रों की वृद्धि सबसे तेज रही है। वर्ष 2020 से 2026 के बीच इस वर्ग के परीक्षार्थियों की संख्या में 76.30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह इस बात का प्रमाण है कि आर्थिक आधार पर दिए गए आरक्षण और सहायता का लाभ बड़ी संख्या में छात्रों तक पहुंच रहा है। इससे ऐसे परिवारों के विद्यार्थियों को भी मेडिकल शिक्षा का सपना पूरा करने का अवसर मिल रहा है जिनके लिए पहले यह राह कठिन थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सामान्य वर्ग के छात्रों की संख्या में भी वृद्धि हुई है लेकिन यह अन्य वर्गों की तुलना में काफी कम रही। वर्ष 2019 से 2026 के बीच सामान्य वर्ग के परीक्षार्थियों में लगभग 24.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इससे स्पष्ट होता है कि अब मेडिकल शिक्षा की दौड़ में नए सामाजिक वर्ग तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और प्रतियोगिता पहले की तुलना में अधिक व्यापक हो गई है।इन आंकड़ों का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत में शिक्षा का लोकतंत्रीकरण तेजी से हो रहा है। मेडिकल जैसी प्रतिष्ठित शिक्षा अब केवल कुछ चुनिंदा वर्गों तक सीमित नहीं रही। सरकारी योजनाएं छात्रवृत्ति डिजिटल शिक्षा ऑनलाइन कोचिंग और ग्रामीण क्षेत्रों तक बढ़ती शैक्षणिक सुविधाओं ने इस परिवर्तन को गति दी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राज्यों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो एक और दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। सफलता प्रतिशत के मामले में छोटे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सबसे आगे रहे। चंडीगढ़ में 2622 छात्रों में से 70 प्रतिशत से अधिक छात्रों ने परीक्षा उत्तीर्ण की। मिजोरम मणिपुर नगालैंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने भी शानदार प्रदर्शन किया। इन राज्यों में परीक्षार्थियों की संख्या कम होने के बावजूद सफलता का प्रतिशत काफी अधिक रहा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">छोटे राज्यों की इस सफलता के पीछे कई कारण माने जा सकते हैं। वहां छात्रों की संख्या कम होने से शिक्षा व्यवस्था पर दबाव अपेक्षाकृत कम रहता है। शिक्षकों और छात्रों के बीच बेहतर संवाद होता है। कई राज्यों में सरकारी और निजी संस्थानों द्वारा प्रतियोगी परीक्षाओं की विशेष तैयारी भी कराई जाती है। इसके अलावा विद्यार्थियों में लक्ष्य के प्रति स्पष्टता और अनुशासन भी सफलता का महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बड़े राज्यों की स्थिति अलग रही। उत्तर प्रदेश से सबसे अधिक 3.28 लाख छात्रों ने परीक्षा दी लेकिन इनमें से लगभग 52 प्रतिशत ही सफल हो सके। महाराष्ट्र में लगभग 53 प्रतिशत और बिहार में लगभग 49 प्रतिशत छात्र सफल रहे। इन राज्यों में परीक्षार्थियों की संख्या बहुत अधिक होने के कारण प्रतियोगिता भी बेहद कठिन होती है। इसके साथ ही ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच संसाधनों का अंतर भी परिणामों को प्रभावित करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजस्थान इस मामले में सबसे बड़ा अपवाद बनकर सामने आया। लगभग 1.92 लाख परीक्षार्थियों में से 69.34 प्रतिशत छात्रों का सफल होना पूरे देश के लिए चर्चा का विषय है। पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान विशेषकर कोटा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। यहां विकसित कोचिंग व्यवस्था अनुभवी शिक्षकों और प्रतिस्पर्धी माहौल का सकारात्मक प्रभाव परिणामों में दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">टॉप रैंक हासिल करने वाले छात्रों का विश्लेषण भी कई महत्वपूर्ण संकेत देता है। शीर्ष 138 छात्रों में 109 लड़के और 29 लड़कियां शामिल हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि लड़कियों की भागीदारी लगातार बढ़ने के बावजूद शीर्ष स्थानों पर अभी भी लड़कों का दबदबा बना हुआ है। आने वाले वर्षों में लड़कियों को और बेहतर अवसर तथा संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता बनी रहेगी।राज्यवार देखें तो शीर्ष रैंक प्राप्त करने वालों में राजस्थान सबसे आगे रहा। इसके बाद महाराष्ट्र तमिलनाडु दिल्ली पंजाब उत्तर प्रदेश गुजरात हरियाणा तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का स्थान रहा। यह सूची बताती है कि जहां मजबूत शैक्षणिक ढांचा और प्रतियोगी माहौल उपलब्ध है वहां से बड़ी संख्या में उत्कृष्ट परिणाम सामने आते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नीट 2026 के परिणाम केवल परीक्षा का परिणाम नहीं बल्कि भारत के बदलते सामाजिक और शैक्षणिक स्वरूप की कहानी भी हैं। पिछड़े वर्गों की बढ़ती भागीदारी आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों की तेज प्रगति छोटे राज्यों का बेहतर प्रदर्शन और राजस्थान जैसे राज्यों की सफलता यह सभी संकेत देते हैं कि देश में प्रतिभा अब किसी एक क्षेत्र या वर्ग तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में यदि शिक्षा की गुणवत्ता समान रूप से पूरे देश में उपलब्ध कराई जाए ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर विद्यालय और विज्ञान शिक्षा को बढ़ावा मिले तथा आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को पर्याप्त सहायता मिलती रहे तो भारत को और अधिक योग्य डॉक्टर मिलेंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इससे केवल स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं होगी बल्कि सामाजिक समानता और अवसरों की बराबरी का सपना भी और मजबूत होगा।नीट 2026 ने यह साबित कर दिया है कि मेहनत अवसर और सही नीतियां मिल जाएं तो देश का हर वर्ग और हर क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का परिचय दे सकता है। यही बदलते भारत की सबसे बड़ी पहचान है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 22:42:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>देश की शिक्षा प्रणाली एक्सटोर्शन मशीन, बच्चों को दबाती-कुचलती है, इसे बदलना होगा: राहुल गांधी ।</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बुधवार को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कोचिंग हब</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">के रूप में विख्यात कोटा शहर में छात्रों के साथ संवाद कार्यक्रम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">छात्रों की गूंज</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">में देश की शिक्षा प्रणाली की प्रासंगकिता पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह हमारे बच्चों को दबाती और कुचलती है जो देश के लिए सही नहीं है। उन्होंने देश की शिक्षा प्रणाली को बदलने पर जोर दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा</span>, ‘‘<span lang="hi" xml:lang="hi">हिंदुस्तान की शिक्षा प्रणाली अपने बच्चों को ‘प्रेशराइज’ (दबाव में) करता है। यह उन्हें ‘स्ट्रेस’ (तनाव) देता है। यह बच्चों को दबाता और कुचलता है</span>,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181544/the-countrys-education-system-is-an-extortion-machine-that-oppresses"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas11.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बुधवार को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कोचिंग हब</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">के रूप में विख्यात कोटा शहर में छात्रों के साथ संवाद कार्यक्रम </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">छात्रों की गूंज</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">में देश की शिक्षा प्रणाली की प्रासंगकिता पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह हमारे बच्चों को दबाती और कुचलती है जो देश के लिए सही नहीं है। उन्होंने देश की शिक्षा प्रणाली को बदलने पर जोर दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा</span>, ‘‘<span lang="hi" xml:lang="hi">हिंदुस्तान की शिक्षा प्रणाली अपने बच्चों को ‘प्रेशराइज’ (दबाव में) करता है। यह उन्हें ‘स्ट्रेस’ (तनाव) देता है। यह बच्चों को दबाता और कुचलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो देश के भविष्य के लिए बिल्कुल सही नहीं है।’’ उन्होंने कहा</span>, ‘‘<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं चाहता हूं कि हम सब मिलकर इसके खिलाफ लड़ाई लड़ें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि आगे से किसी भी बच्चे को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मघाती</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">कदम न उठाना पड़े।’’</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे पहले राहुल गांधी ने कहा कि उनकी छात्रों और युवाओं के साथ इस संवाद का मकसद राजनीतिक नहीं है। उन्होंने कहा</span>, ‘‘<span lang="hi" xml:lang="hi">यह कोई राजनीतिक बैठक नहीं है। इसमें भारत की शिक्षा प्रणाली पर चर्चा होगी कि इसमें क्या कमियां हैं और क्या सुधार करने की जरूरत है।’’ उन्होंने कहा</span>, ‘‘<span lang="hi" xml:lang="hi">यह बैठक आपके बारे में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन युवाओं के बारे में है जो अपना भविष्य बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह शाम आपके बारे में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन चुनौतियों के बारे में जिनका आप हर दिन सामना कर रहे हैं।"</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने विभिन्न प्रतियोगी परीक्षा की तैयार कर रहे पांच छात्रों को मंच पर बुलाया और उनसे बात की। उन्होंने एक छात्रा और उसके अभिभावकों से भी मंच पर बात की। उन्होंने कहा</span>, ‘‘<span lang="hi" xml:lang="hi">हम अभी आज राजनीतिक बात नहीं कर रहे हैं। मैं हिंदुस्तान के भविष्य की बात कर रहा हूं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपके भविष्य की बात कर रहा हूं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देश के भविष्य की बात कर रहा हूं। हमें इस (शिक्षा) प्रणाली को बदलना होगा और इस प्रणाली को ठीक करना होगा।’’</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा कि हम ऐसी शिक्षा प्रणाली चाहते हैं जो हर भारतीय को बड़ा सपना देखने का मौका दे और उसे पूरा करे। सबसे बड़ी बात आपका यह सपना न्यूनतम लागत पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना आपकी जेब से लाखों करोड़ रुपये छीने करना चाहिए। उन्होंने कहा</span>, ‘‘<span lang="hi" xml:lang="hi">देश की शिक्षा प्रणाली हिंदुस्तान के सबसे गरीब मध्यम वर्ग के लोगों से एक परीक्षा के लिए उतना पैसा छीनता है जितना शिक्षा का बजट है और पांच बड़ी परीक्षा के लिए उतना पैसा छीनता है जितने पांच बड़े मंत्रालयों को बजट मिलता है। ये शर्मनाक है। हमें इसे बदलना होगा।’’</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा</span>, ‘‘<span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की शिक्षा प्रणाली शोषण (एक्सटोर्शन) मशीन है। ये आपसे पैसे लेने का ‘सिस्टम’ है। ये सिर्फ शिक्षा देने का ‘सिस्टम’ नहीं है। ये परीक्षा के आधार पर आपसे लाखों करोड़ रुपये छीनने का ‘सिस्टम’ है।’’ कांग्रेस नेता ने कहा कि यह कार्यक्रम इस आंदोलन की शुरुआत है। उन्होंने युवाओं से इससे जुड़ने और अपने सुझाव देने की अपील की कि हम इस प्रणाली को कैसे बदलें।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 14:05:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>परमाणु शक्ति संपन्न भारत में कब होगी बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181062/when-will-girls-education-be-100-in-nuclear-power-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/4.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज में ऐसे कर्मचारियों का वर्ग तैयार करना था जो अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक कार्यों को संचालित कर सके। आधुनिक विज्ञान और अंग्रेजी भाषा के प्रसार में इस शिक्षा प्रणाली का योगदान रहा, किंतु इसने भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक शिक्षा और कौशल आधारित शिक्षण को काफी हद तक हाशिए पर पहुंचा दिया। उस समय महिलाओं की शिक्षा लगभग नगण्य थी। समाज में बाल विवाह, पर्दा प्रथा और लैंगिक असमानता जैसी कुरीतियां लड़कियों की शिक्षा में बड़ी बाधा थीं।<br />समाज सुधारकों का योगदान</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">+<br />ऐसे कठिन समय में सावित्रीबाई फुले और महात्मा ज्योतिराव फुले ने बालिका शिक्षा की अलख जगाई। 1848 में उन्होंने लड़कियों के लिए पहला आधुनिक विद्यालय प्रारंभ किया।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने महिला शिक्षा और सामाजिक सुधारों को नई दिशा दी। बाद में महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर तथा स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना।<br />डॉ. अंबेडकर का प्रसिद्ध संदेश</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।"<br />स्वतंत्र भारत में शिक्षा का विकास</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की साक्षरता दर लगभग 18 प्रतिशत थी। महिलाओं की साक्षरता तो 10 प्रतिशत से भी कम थी। संविधान निर्माताओं ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार माना।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />समय-समय पर कोठारी आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968, 1986, सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 तथा नई शिक्षा नीति 2020 जैसे प्रयास किए गए। इन प्रयासों से शिक्षा का दायरा बढ़ा और लड़कियों की विद्यालयों तक पहुंच बेहतर हुई।.आज भारत की साक्षरता दर 77 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुकी है, जबकि महिला साक्षरता दर 70 प्रतिशत से अधिक है। यह प्रगति उत्साहजनक है, किंतु अभी भी पुरुषों और महिलाओं की साक्षरता में अंतर बना हुआ है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व के सर्वाधिक शिक्षित देशों से सीख<br />विश्व में फिनलैंड, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जापान और नॉर्वे जैसे देशों की शिक्षा व्यवस्था विश्व में आदर्श मानी जाती है। फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />फिनलैंड में शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन कौशल विकसित करना है। वहां बच्चों पर अनावश्यक परीक्षा का दबाव नहीं होता। शिक्षकों को अत्यंत सम्मान और स्वायत्तता प्राप्त है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> बालिका और बालक के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता। सिंगापुर ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा साधन बनाया। वहां विज्ञान, गणित, तकनीक और कौशल आधारित शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता है। शिक्षा को उद्योगों और रोजगार से जोड़ा गया है।<br />जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में अनुशासन, नैतिकता, समयबद्धता और तकनीकी दक्षता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। परिणामस्वरूप ये देश सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद आर्थिक महाशक्ति बन गए।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत में प्रतिभा की कोई कमी कभी भी नहीं रही है, किंतु शिक्षा व्यवस्था अभी भी परीक्षा-केंद्रित बनी हुई है। रटंत प्रणाली, विद्यालयों की असमान गुणवत्ता, शिक्षकों की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों का अभाव आज भी चुनौतियां हैं।नई शिक्षा नीति 2020 ने इन समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसमें मातृभाषा आधारित शिक्षा, कौशल विकास, डिजिटल शिक्षण और बहुविषयक अध्ययन पर बल दिया गया है। किंतु इसके वास्तविक लाभ तभी मिलेंगे जब इसका प्रभावी क्रियान्वयन हो। बालिका शिक्षा का सत प्रतिशत होना इसलिए भी आवश्यक है कि शिक्षित बेटी, समृद्ध परिवार</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />एक शिक्षित महिला अपने परिवार को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कार प्रदान करती है। वह अगली पीढ़ी की प्रथम शिक्षिका होती है।सामाजिक कुरीतियों का अंत भी।बाल विवाह, दहेज प्रथा, लैंगिक भेदभाव और घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं को समाप्त करने में शिक्षा सबसे प्रभावी साधन है</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व बैंक सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का मानना है कि महिलाओं की शिक्षा में निवेश किसी भी देश के आर्थिक विकास को तीव्र गति देता है। यदि भारत की प्रत्येक बेटी शिक्षित होगी तो देश की उत्पादकता और आर्थिक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />शिक्षित महिलाएं स्वास्थ्य, पोषण और परिवार नियोजन के प्रति अधिक जागरूक होती हैं। इससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी आती है।<br />आज महिलाएं विज्ञान, अंतरिक्ष, प्रशासन, राजनीति, सेना और उद्यमिता के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। शिक्षा उन्हें नेतृत्व और नवाचार की शक्ति प्रदान करती है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />महापुरुषों की दृष्टि में नारी शिक्षा<br />स्वामी विवेकानंद ने कहा</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"राष्ट्र की प्रगति का सबसे अच्छा मापदंड वहां की महिलाओं की स्थिति है।"डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का मत था कि<br />"महिलाओं का सशक्तिकरण और शिक्षा किसी राष्ट्र के विकास का सबसे प्रभावी माध्यम है।"पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था<br />"एक महिला को शिक्षित करना एक पीढ़ी को शिक्षित करना है।"</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />इक्कीसवीं सदी ज्ञान, विज्ञान और नवाचार की सदी है। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब देश की प्रत्येक बेटी शिक्षित, आत्मनिर्भर और सशक्त बनेगी। शिक्षा केवल विद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं है; यह सामाजिक चेतना, आर्थिक समृद्धि और राष्ट्रीय विकास का आधार है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली से लेकर नई शिक्षा नीति तक भारत ने लंबी यात्रा तय की है, किंतु अभी मंजिल दूर है। यदि सरकार, समाज, परिवार और शैक्षणिक संस्थान मिलकर बालिका शिक्षा को शत-प्रतिशत अनिवार्य बनाने का संकल्प लें, तो भारत न केवल विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति बनेगा, बल्कि सबसे विकसित और ज्ञानवान राष्ट्रों की अग्रिम पंक्ति में भी खड़ा होगा।<br />क्योंकि किसी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों में नहीं, बल्कि उसकी शिक्षित बेटियों की आंखों में स्वप्न बनकर पलता है।<br /><br />संजीव ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिंतक, स्तंभकार, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,<div>कविता,</div><div>संजीव-नी।<br />शिक्षा का कवच।<br /><br />शिक्षा का कवच।<br />कुछ देना ही तो आइये,<br />नन्हीं बालिकाओं को<br />स्वर्ण के गहने नहीं,<br />शिक्षा का कवच दें।<br />उनकी हथेलियों में<br />रोटी के साथ-साथ<br />कुछ अक्षर भी रख दें,<br />जो भूख से जुझतीं<br />उन्हें ज्ञान की कुंजी दें<br />अँधेरे बंद कमरों में<br />रोशन-दान बनती,<br />ज्ञान की रोशनी के लिए<br />बंद रास्तों पर<br />एक नया आकाश फैला देती,<br />उनकी आँखों में<br />सिर्फ़ स्वप्न ना रखें ,<br />उन तक पहुँचने के पंख भी दें।<br />उन्हें ज्ञान दें कि<br />अपने हिस्से की धूप<br />खुद चुन सकें।<br />किताबें जब उनके हांथों में होंगी,<br />तो सदियों के कई बोझ<br />आप उतर जाएँगे।<br />कलम उँगलियों से चलेंगीं<br />तक़दीर की कविता भी<br />लिखी जाएगी।<br />शिक्षित बालिका<br />अपना जीवन ही नहीं संवारती,<br />आने वाली पीढ़ियों के लिए<br />उजला दीप बन जाती।<br />आइये,<br />बेटी को शिक्षा का रक्षा-कवच दें,<br />ताकि वह<br />अपने सपनों, अपने अधिकारों<br />अपने अस्तित्व की रक्षा<br />स्वयं कर सके।<br /><br />संजीव ठाकुर, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,</div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 12:57:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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                <title>भारतवर्ष की गुरु-शिष्य सनातनी परंपरा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">राष्ट्रीय चरित्र और राष्ट्रवाद शालाओं की बुनियादी शिक्षा कक्षाओं और गुरु और शिष्य परंपरा के साथ देश के प्रति समर्पण के भाव से प्रस्फुटित होता हैl राष्ट्रवाद राष्ट्र की रक्षा ,अखंडता एवं सशक्तिकरण नागरिकों के भाग्य को संरक्षित कर सुदृढ़ बनाता हैl स्वतंत्रता के बाद विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के स्वप्न दृष्टा प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश के भावी भविष्य को पहचानते हुए बुनियादी कक्षाओं की राष्ट्रवाद के निर्माण में भूमिका को सहजता से पहचान लिया और अमेरिका की तर्ज पर भारत को तकनीकी तौर पर एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के लिए अमेरिका के एमआईटी की तर्ज पर भारतीय</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180749/indias-guru-disciple-sanatani-tradition"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">राष्ट्रीय चरित्र और राष्ट्रवाद शालाओं की बुनियादी शिक्षा कक्षाओं और गुरु और शिष्य परंपरा के साथ देश के प्रति समर्पण के भाव से प्रस्फुटित होता हैl राष्ट्रवाद राष्ट्र की रक्षा ,अखंडता एवं सशक्तिकरण नागरिकों के भाग्य को संरक्षित कर सुदृढ़ बनाता हैl स्वतंत्रता के बाद विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के स्वप्न दृष्टा प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश के भावी भविष्य को पहचानते हुए बुनियादी कक्षाओं की राष्ट्रवाद के निर्माण में भूमिका को सहजता से पहचान लिया और अमेरिका की तर्ज पर भारत को तकनीकी तौर पर एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के लिए अमेरिका के एमआईटी की तर्ज पर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान स्थापित करवाया था ।जब खड़कपुर आईआईटी की स्थापना की गई थी तब उन्होंने अतिथि के रूप में अपने भाषण में कहा की भारत को वैज्ञानिक महाशक्ति बनाने का दायित्व इन्हीं आई,आई,टी की कक्षाओं शिक्षकों एवं छात्राओं का होगा, वे राष्ट्र को तकनीकी दिशा में मील का पत्थर बनाने में साबित होंगेl</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में भारत आज अंतरिक्ष की बड़ी शक्तियों की कतार में शामिल हैl इसके पीछे भारत के कई वैज्ञानिक सीवी रमन ,विक्रम साराभाई, सतीश धवन जैसे बड़े वैज्ञानिकों द्वारा विकसित इसरो संस्थान है जिसकी कक्षाओं में मंगल तक भारतीय तिरंगे को लहराया. भाभा एटॉमिक परमाणु शक्ति बन गया हैl वैश्विक स्तर पर हर बड़े स्पेस रिसर्च सेंटर पर भारत की इंजीनियर और वैज्ञानिक अपनी सेवाएं दे रहे हैंl</p>
<p style="text-align:justify;">आज अमेरिका आर्थिक महाशक्ति बनने के पीछे उसके विश्वविद्यालय ,संस्थाएं हैं। हावर्ड बिजनेस स्कूल विश्व स्तरीय व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में से एक माना जाता हैl आर्थिक सामाजिक तथा वैज्ञानिक शोध संस्थाओं में अधिकाधिक धनराशि खर्च करके अमेरिका, रूस, ब्रिटेन ,चीन, ऑस्ट्रेलिया ,कनाडा ने विश्व में सर्वश्रेष्ठ बुद्धिजीवी दिए हैंl यह तो तय है कि कोई भी देश का भाग्य तभी उन्नत तथा विकसित होगा जब वहां के छात्र शिक्षक एवं आमजन न्याय, समता ,प्रबुद्धता के प्रति अपनी अडिग प्रतिबद्धता रखें। आने वाली पीढ़ी यानी कि वर्तमान के बच्चे और भविष्य के नागरिक ही किसी देश का भविष्य निर्माण करते हैं और यह भी तय रहता है कि बुद्धिमान शिक्षक अपने छात्रों के माध्यम से किसी महान राष्ट्र की नींव रखते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">किसी भी महान राष्ट्र का निर्माण रातों-रात नहीं होता है इसके लिए पीढीयो का योगदान और श्रेष्ठ शिक्षक एवं छात्रों की लग्न शीलता और मेहनत की प्रतिबद्धता होती है। 1960 और 70 के दशक में चीन में गठित सांस्कृतिक क्रांति कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, खेतों ,कारखानों को एकता में बांधकर सक्रिय नीति का प्रयोग कर सभी को एक सूत्र में बांधा गया था। जापान तो प्राथमिक कक्षाओं से उपजे राष्ट्रवाद, अनुशासन तथा कर्तव्य बोध के लिए सर्वश्रेष्ठ उदाहरण रहा है, जापान में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पराजय का कड़वा घूंट पीने के पश्चात कमजोर एवं मृतप्राय जापान को एक शक्तिशाली आर्थिक राष्ट्र बना दिया। इसके विपरीत वर्तमान कक्षाएं प्रेम, अनुशासन ,करुणा जैसे पाठ ना सिखा कर ईर्ष्या, कंपटीशन, हिंसा ,कटुता जैसे अध्याय सिखा कर राष्ट्र के भविष्य को गर्त में ले जा रही है ।</p>
<p style="text-align:justify;">देश के अनेक विश्वविद्यालय हड़ताल ,हिंसा, जाति भेदभाव, आपत्तिजनक नारों जैसे विसंगतियों का सामना कर रहे हैं। कक्षाओं का नैतिकता, सहिष्णुता ,अनुशासन से कटाव केवल भारत में नहीं पूरे विश्व में इसका फैलाव हो चुका है। अमेरिका तथा यूरोपीय देशों में स्कूलों का कक्षाओं में गोली कांड इसके बड़े विकृत उदाहरण हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने ट्रीस्ट विद डेस्टिनी के भाषण में भूख, भय ,बीमारी, अज्ञान से पूर्णता मुक्ति की बात को भारत की नियति या डेस्टिनी कहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में इस बात पर जोर दिया जाना चाहिए की कक्षाओं को चरित्र निर्माण ,अनुशासन ,उत्कृष्ट नवाचार ,लोकतांत्रिक विचार संरचना का केंद्र बनाकर इसकी शिक्षा दीक्षा दी जानी चाहिए। कक्षाओं से बच्चे आर्थिक रूप से प्रौद्योगिकी स्थापित कर स्वयं अपने पैरों पर खड़े होकर आने वाले वर्षों में कई युवाओं को रोजगार देकर संपूर्ण मानवता ,पर्यावरण की रक्षा तथा राष्ट्र के उत्कर्ष को सही दिशा देने का काम करेंगे। जिससे राष्ट्रीय चरित्र निर्माण तथा राष्ट्रीयता की भावना को एक मजबूत आधार प्राप्त हो सकेगा।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 18:47:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>कोचिंग संस्कृति के शिकंजे में शिक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारतीय समाज में शिक्षा को हमेशा सामाजिक परिवर्तन, बौद्धिक विकास और राष्ट्रीय निर्माण का सबसे प्रभावशाली साधन माना गया है। प्राचीन गुरुकुलों से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना रहा है जो विवेकशील, नैतिक, संवेदनशील और समाजोपयोगी हो। शिक्षा व्यक्ति को केवल जीविका कमाने की क्षमता नहीं देती, बल्कि जीवन को समझने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की दृष्टि भी प्रदान करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्य से पिछले तीन दशकों में भारतीय शिक्षा व्यवस्था के समानांतर विकसित हुई कोचिंग संस्कृति ने शिक्षा के इसी मूल उद्देश्य</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180134/education-in-the-clutches-of-coaching-culture"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/symbolic_image_1544311335.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय समाज में शिक्षा को हमेशा सामाजिक परिवर्तन, बौद्धिक विकास और राष्ट्रीय निर्माण का सबसे प्रभावशाली साधन माना गया है। प्राचीन गुरुकुलों से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना रहा है जो विवेकशील, नैतिक, संवेदनशील और समाजोपयोगी हो। शिक्षा व्यक्ति को केवल जीविका कमाने की क्षमता नहीं देती, बल्कि जीवन को समझने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की दृष्टि भी प्रदान करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्य से पिछले तीन दशकों में भारतीय शिक्षा व्यवस्था के समानांतर विकसित हुई कोचिंग संस्कृति ने शिक्षा के इसी मूल उद्देश्य को गंभीर चुनौती दी है। आज स्थिति यह है कि ज्ञान, जिज्ञासा और बौद्धिक विकास की अपेक्षा परीक्षा, अंक, रैंक और चयन को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। परिणामस्वरूप शिक्षा का व्यापक मानवीय स्वरूप सिकुड़कर प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी तक सीमित होता दिखाई दे रहा है।<br /><br />कोचिंग संस्थानों का उदय अचानक नहीं हुआ। यह हमारी औपचारिक शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों और समाज की बढ़ती आकांक्षाओं का परिणाम था। उच्च शिक्षा संस्थानों और सरकारी नौकरियों में सीटों की सीमित संख्या, बढ़ती जनसंख्या, तीव्र प्रतिस्पर्धा तथा बेहतर जीवन की इच्छा ने विद्यार्थियों को अतिरिक्त मार्गदर्शन की ओर आकर्षित किया। प्रारंभिक दौर में कोचिंग संस्थान उन छात्रों के लिए सहायक मंच थे जिन्हें किसी विशेष विषय में अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता होती थी। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था इतनी विस्तृत और प्रभावशाली हो गई कि उसने विद्यालयों और महाविद्यालयों की भूमिका को ही चुनौती देना शुरू कर दिया।<br /><br />आज देश के अनेक शहरों में कोचिंग उद्योग एक विशाल आर्थिक तंत्र का रूप ले चुका है। राजस्थान का कोटा, उत्तर प्रदेश का प्रयागराज, दिल्ली का मुखर्जी नगर, हैदराबाद, पुणे, पटना और कई अन्य शहर शिक्षा से अधिक कोचिंग के लिए पहचाने जाने लगे हैं। हजारों छात्र अपने घरों से दूर जाकर वर्षों तक केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे रहते हैं। उनके दैनिक जीवन का केंद्र विद्यालय या विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि कोचिंग संस्थान बन जाते हैं। यह परिवर्तन केवल संस्थागत बदलाव नहीं है; यह शिक्षा के चरित्र में आए गहरे परिवर्तन का संकेत है।<br /><br />सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में सफलता प्राप्त करना है? यदि नहीं, तो वर्तमान व्यवस्था किस दिशा में जा रही है? आज अधिकांश विद्यार्थी किसी विषय को उसकी बौद्धिक सुंदरता या व्यावहारिक उपयोगिता के कारण नहीं पढ़ते, बल्कि इसलिए पढ़ते हैं क्योंकि वह परीक्षा के पाठ्यक्रम का हिस्सा है। विज्ञान, गणित, इतिहास, साहित्य और समाजशास्त्र जैसे विषयों का अध्ययन जिज्ञासा से अधिक अंकों के लिए किया जाने लगा है। विद्यार्थियों को यह बताया जाता है कि कौन-सा अध्याय महत्वपूर्ण है, कौन-सा प्रश्न बार-बार पूछा जाता है और किस प्रकार न्यूनतम समय में अधिकतम अंक प्राप्त किए जा सकते हैं। इससे शिक्षा का उद्देश्य समझ विकसित करने से हटकर परीक्षा प्रबंधन तक सीमित हो जाता है।<br /><br />यह प्रवृत्ति रचनात्मकता और मौलिक चिंतन के लिए भी चुनौती बन रही है। महान वैज्ञानिक, साहित्यकार, दार्शनिक और नवप्रवर्तक केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करके नहीं बने। उनकी सफलता के पीछे स्वतंत्र चिंतन, प्रयोग करने का साहस और असफलता से सीखने की क्षमता थी। लेकिन वर्तमान कोचिंग-केंद्रित वातावरण में विद्यार्थियों को निर्धारित उत्तरों और निश्चित पद्धतियों के भीतर सोचने के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे उनके व्यक्तित्व का स्वाभाविक विकास बाधित हो सकता है। वे समस्या का समाधान खोजने के बजाय पहले से तैयार समाधान याद करने लगते हैं।<br /><br />कोचिंग संस्कृति का एक अन्य गंभीर प्रभाव सामाजिक असमानता के रूप में सामने आया है। गुणवत्तापूर्ण कोचिंग प्राप्त करना आज अत्यंत महंगा हो गया है। प्रतिष्ठित संस्थानों की फीस कई परिवारों की वार्षिक आय के बराबर होती है। इसके अतिरिक्त आवास, भोजन, अध्ययन सामग्री और अन्य खर्च अलग से होते हैं। आर्थिक रूप से सक्षम परिवार अपने बच्चों को सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं उपलब्ध करा सकते हैं, जबकि कमजोर वर्ग के छात्र अनेक बाधाओं का सामना करते हैं। इस प्रकार शिक्षा, जो समान अवसर का माध्यम होनी चाहिए, धीरे-धीरे आर्थिक संसाधनों पर निर्भर होती जा रही है।<br /><br />इस स्थिति का एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है। जब किसी समाज में सफलता की परिभाषा कुछ चुनिंदा परीक्षाओं और संस्थानों तक सीमित हो जाती है, तब लाखों युवाओं पर असामान्य दबाव उत्पन्न होता है। विद्यार्थी कम उम्र में ही यह मानने लगते हैं कि यदि वे किसी विशेष परीक्षा में सफल नहीं हुए तो उनका भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। यह सोच उन्हें निरंतर तनाव, चिंता और भय की स्थिति में रखती है। प्रतिस्पर्धा की यह तीव्रता कई बार मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन जाती है।<br /><br />हाल के वर्षों में विद्यार्थियों में तनाव, अवसाद और आत्मविश्वास की कमी से जुड़ी समस्याओं में वृद्धि देखी गई है। अनेक छात्र अपने परिवार की अपेक्षाओं, सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन नहीं बना पाते। जब सफलता ही सम्मान का एकमात्र आधार बन जाए और असफलता को सामाजिक कलंक की तरह देखा जाए, तब मानसिक दबाव स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि एक व्यापक सामाजिक चिंता का विषय है।<br /><br />कोचिंग उद्योग के विस्तार ने शिक्षा के व्यावसायीकरण को भी बढ़ावा दिया है। आज शिक्षा एक बड़े बाजार का रूप लेती दिखाई देती है। आकर्षक विज्ञापन, सफलता की कहानियां, टॉपरों की तस्वीरें, चयन प्रतिशत और रैंकिंग के दावे छात्रों और अभिभावकों को प्रभावित करते हैं। कई बार शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पीछे छूट जाता है और विपणन रणनीतियां प्रमुख हो जाती हैं। शिक्षा सेवा से अधिक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत की जाने लगती है। इससे शिक्षा के नैतिक और सामाजिक मूल्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।<br /><br />प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा अनियमितताओं और चयन प्रक्रियाओं पर उठते सवालों ने भी इस संकट को और गहरा किया है। जब कोई छात्र वर्षों तक कठिन परिश्रम करता है और फिर परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है, तो उसका विश्वास टूटता है। शिक्षा व्यवस्था का आधार ही विश्वास और पारदर्शिता है। यदि यह आधार कमजोर पड़ जाए तो प्रतिभा, परिश्रम और ईमानदारी का महत्व कम होने लगता है। इससे पूरे समाज में निराशा और असंतोष का वातावरण बन सकता है।<br /><br />हालांकि कोचिंग संस्थानों की भूमिका को पूरी तरह नकारना भी उचित नहीं होगा। अनेक संस्थानों ने गुणवत्तापूर्ण मार्गदर्शन, उत्कृष्ट अध्ययन सामग्री और विशेषज्ञ शिक्षकों के माध्यम से छात्रों को लाभ पहुंचाया है। दूरदराज के क्षेत्रों के अनेक विद्यार्थियों को इन्हीं संस्थानों के माध्यम से बेहतर अवसर प्राप्त हुए हैं। कई छात्रों के लिए कोचिंग वास्तव में सफलता का माध्यम बनी है। इसलिए समस्या कोचिंग के अस्तित्व में नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की उस निर्भरता में है जहां कोचिंग अनिवार्य प्रतीत होने लगी है।<br /><br />यदि विद्यालयों और महाविद्यालयों की शिक्षा पर्याप्त प्रभावी हो, तो अतिरिक्त कोचिंग की आवश्यकता सीमित रह सकती है। दुर्भाग्य से अनेक विद्यालयों में शिक्षण की गुणवत्ता, संसाधनों की उपलब्धता और शिक्षकों की संख्या जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। कई स्थानों पर छात्रों को मूलभूत अवधारणाएं भी पर्याप्त रूप से नहीं सिखाई जातीं। ऐसी स्थिति में कोचिंग संस्थान उस रिक्त स्थान को भरने का प्रयास करते हैं जिसे औपचारिक शिक्षा व्यवस्था भरने में असफल रही है।<br /><br />समाधान केवल कोचिंग संस्थानों पर नियंत्रण लगाने से नहीं निकलेगा। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था में व्यापक और संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं। सबसे पहले विद्यालयी शिक्षा को इतना मजबूत बनाना होगा कि छात्र को बुनियादी ज्ञान और अवधारणाओं के लिए बाहरी सहायता पर निर्भर न रहना पड़े। शिक्षकों के प्रशिक्षण, आधुनिक शिक्षण तकनीकों, डिजिटल संसाधनों और गुणवत्तापूर्ण पाठ्यक्रम पर विशेष ध्यान देना होगा।<br /><br />साथ ही परीक्षा प्रणाली में भी परिवर्तन आवश्यक है। वर्तमान व्यवस्था अक्सर रटने की क्षमता और सीमित प्रकार के प्रश्नों पर आधारित होती है। यदि परीक्षाएं विश्लेषणात्मक सोच, समस्या समाधान, सृजनात्मकता और व्यावहारिक समझ का मूल्यांकन करें, तो कोचिंग आधारित तैयारी का प्रभाव स्वतः कम हो सकता है। शिक्षा का मूल्यांकन केवल अंक देने की प्रक्रिया नहीं होना चाहिए; उसे छात्र की वास्तविक क्षमता को पहचानने का माध्यम बनना चाहिए।<br /><br />राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भी बहुआयामी शिक्षा, कौशल विकास और समग्र मूल्यांकन पर जोर दिया है। यदि इन सिद्धांतों को प्रभावी रूप से लागू किया जाए तो शिक्षा का स्वरूप अधिक संतुलित और व्यापक बन सकता है। विद्यार्थियों को केवल डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी बनने की दिशा में नहीं, बल्कि विविध प्रतिभाओं और रुचियों के अनुसार आगे बढ़ने के अवसर मिलने चाहिए।<br /><br />अभिभावकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अक्सर माता-पिता सामाजिक प्रतिष्ठा या भविष्य की चिंता के कारण बच्चों पर अत्यधिक अपेक्षाएं थोप देते हैं। उन्हें यह समझना होगा कि प्रत्येक बच्चे की क्षमता, रुचि और व्यक्तित्व अलग होता है। सफलता का अर्थ केवल किसी प्रतिष्ठित परीक्षा में चयन नहीं है। एक अच्छा शिक्षक, वैज्ञानिक, कलाकार, लेखक, उद्यमी या सामाजिक कार्यकर्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है जितना किसी अन्य पेशे का व्यक्ति।<br /><br />समाज को भी सफलता की अपनी परिभाषा पर पुनर्विचार करना होगा। यदि हम केवल अंकों और रैंक के आधार पर व्यक्तियों का मूल्यांकन करेंगे, तो शिक्षा का मानवीय पक्ष कमजोर पड़ता जाएगा। हमें ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जहां सीखने, प्रश्न पूछने, प्रयोग करने और असफलताओं से सीखने को प्रोत्साहन मिले।<br /><br />अंततः कोचिंग संस्कृति का प्रश्न केवल शिक्षा व्यवस्था का प्रश्न नहीं है; यह उस समाज की दिशा का प्रश्न है जिसे हम भविष्य में निर्मित करना चाहते हैं। यदि शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सफलता रह जाएगा, तो हम कुशल परीक्षार्थी तो तैयार कर सकते हैं, लेकिन विचारशील नागरिक नहीं। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके विश्वविद्यालयों, विद्यालयों और युवाओं की जिज्ञासा में निहित होती है, न कि केवल उसकी परीक्षा प्रणालियों में।<br /><br />आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को फिर से ज्ञान, विवेक, सृजनशीलता और मानवीय मूल्यों से जोड़ा जाए। कोचिंग संस्कृति की उपयोगिता अपनी जगह हो सकती है, लेकिन उसे शिक्षा का विकल्प नहीं बनने दिया जा सकता। जब विद्यालय सीखने का केंद्र बनेंगे, परीक्षाएं समझ का मूल्यांकन करेंगी और समाज सफलता को व्यापक दृष्टि से देखेगा, तभी शिक्षा अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगी। यही वह मार्ग है जो भारत को केवल प्रतिभाशाली युवाओं का नहीं, बल्कि विचारशील, नवाचारी और संवेदनशील नागरिकों का राष्ट्र बना सकता है।<br /><br /><strong>अवनीश कुमार गुप्ता</strong></p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 18:26:23 +0530</pubDate>
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