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                <title>वैश्विक द्वंद्व के उपहार</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">विश्व अर्थव्यवस्था की धमनियों में यदि किसी तत्व को रक्त की उपमा दी जाए तो वह निस्संदेह तेल है। विश्व के सभी देशों में भारत सहित पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ा दिए गए हैं इनमें सबसे कम भारत में ही पेट्रोलियम पदार्थों के रेट बढ़ाए गए हैं। यह थोड़ी राहत की बात हो सकती है परंतु भारत की जैसी अर्थव्यवस्था पर निश्चित तौर पर यह बढ़े हुए पेट्रोलियम पदार्थों के दाम आम जनता पर भारी पड़ सकते हैं। भारत में आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने का प्रभाव आम जनता पर हमेशा उनकी जेब पर भारी कटौती किए जाने का अंदेशा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184619/gifts-of-global-conflict"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/s-th.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विश्व अर्थव्यवस्था की धमनियों में यदि किसी तत्व को रक्त की उपमा दी जाए तो वह निस्संदेह तेल है। विश्व के सभी देशों में भारत सहित पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ा दिए गए हैं इनमें सबसे कम भारत में ही पेट्रोलियम पदार्थों के रेट बढ़ाए गए हैं। यह थोड़ी राहत की बात हो सकती है परंतु भारत की जैसी अर्थव्यवस्था पर निश्चित तौर पर यह बढ़े हुए पेट्रोलियम पदार्थों के दाम आम जनता पर भारी पड़ सकते हैं। भारत में आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने का प्रभाव आम जनता पर हमेशा उनकी जेब पर भारी कटौती किए जाने का अंदेशा रहता है। भारत एक विकासशील देश है और यहां की अर्थव्यवस्था बहुत ही संवेदनशील एवं परिवर्तनशील है भारत की जनसंख्या वैश्विक देश में अग्रणी मानी जाती है देश में यदि थोड़े से भी आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं तो इस पर देश की अर्थव्यवस्था पर भारी परिवर्तन परिलक्षित होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पेट्रोलियम पदार्थ केवल वाहनों का ईंधन भर नहीं हैं, बल्कि आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की गति, उत्पादन, परिवहन, ऊर्जा और व्यापार की आधारशिला हैं। जब तेल की कीमतों में असंतुलित वृद्धि होती है तो उसका प्रभाव केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खेतों की मिट्टी से लेकर कारखानों की मशीनों और आम आदमी की रसोई तक महसूस किया जाता है। आज वैश्विक स्तर पर बढ़ती पेट्रोल-डीजल कीमतों ने भारत सहित अनेक देशों की आर्थिक संरचना को झकझोर कर रख दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, ओपेक देशों की उत्पादन नीतियां तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान ने कच्चे तेल की कीमतों को अस्थिर बना दिया। एक समय जो कच्चा तेल 60 से 70 डॉलर प्रति बैरल के बीच उपलब्ध था, वह कई अवसरों पर 100 डॉलर से ऊपर पहुंच गया। इसका सीधा प्रभाव उन देशों पर पड़ा जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर हैं। भारत अपनी कुल पेट्रोलियम आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का अर्थ है—देश के आयात बिल में भारी वृद्धि, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और व्यापार घाटे का विस्तार।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि ने परिवहन लागत को तेजी से बढ़ाया। ट्रकों के भाड़े बढ़े तो फल, सब्जी, अनाज, दूध और दैनिक उपयोग की वस्तुएं महंगी हो गईं। किसान के लिए डीजल केवल वाहन चलाने का साधन नहीं, बल्कि सिंचाई और कृषि उपकरणों की शक्ति है। डीजल महंगा होने का अर्थ है खेती की लागत बढ़ना। इसका परिणाम यह हुआ कि उत्पादन महंगा हुआ और महंगाई की दर लगातार ऊपर जाने लगी। आम नागरिक की आय स्थिर रही लेकिन खर्चों में वृद्धि होती गई। मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग के लिए घरेलू बजट संतुलित करना कठिन हो गया।<br />प्रसिद्ध अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने एक बार कहा था कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतें विकासशील देशों के लिए दोहरी चुनौती ह—एक ओर महंगाई बढ़ती है और दूसरी ओर विकास की गति धीमी पड़ती है।<br />         </p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में यही स्थिति आज अनेक देशों में दिखाई देती है। बढ़ती ईंधन कीमतों के कारण उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ गई। छोटे और मध्यम उद्योग, जो पहले ही वैश्विक प्रतिस्पर्धा और मंदी से जूझ रहे थे, अब ऊर्जा लागत के दबाव में कमजोर पड़ने लगे हैं।।विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं ने भी चेतावनी दी है कि ऊर्जा संकट वैश्विक आर्थिक मंदी को और गहरा कर सकता है। जब परिवहन और उत्पादन महंगा होता है तो वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं। उपभोक्ता कम खरीदारी करते हैं, बाजार की मांग घटती है और उद्योगों का विस्तार रुकने लगता है। यही कारण है कि कई देशों में आर्थिक विकास दर अनुमान से कम रही। यूरोप में गैस और तेल संकट ने ऊर्जा आधारित उद्योगों को प्रभावित किया, जबकि एशियाई देशों में आयात लागत ने आर्थिक संतुलन बिगाड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी उद्योगपति हेनरी फोर्ड ने कहा था कि यदि उत्पादन और परिवहन महंगे हो जाएं तो बाजार की आत्मा कमजोर पड़ जाती है। आज यह कथन बिल्कुल सटीक प्रतीत होता है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल व्यक्तिगत वाहन उपयोग को प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि रेल, विमानन, शिपिंग और सार्वजनिक परिवहन की लागत को भी बढ़ाती हैं। विमान कंपनियों ने किराए बढ़ाए, मालवाहक कंपनियों ने अतिरिक्त शुल्क लगाए और इसका भार अंततः उपभोक्ता पर पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत सरकार ने समय-समय पर उत्पाद शुल्क में कटौती और राज्यों द्वारा वैट कम करने जैसे कदम उठाए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की अस्थिरता ने राहत को सीमित रखा। दूसरी ओर सरकारों के सामने भी चुनौती थी क्योंकि ईंधन पर मिलने वाला कर राजस्व विकास योजनाओं और आधारभूत संरचना निर्माण का महत्वपूर्ण स्रोत है। यदि कर घटाए जाते हैं तो सरकारी आय प्रभावित होती है, और यदि कीमतें बढ़ती हैं तो जनता पर बोझ पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह एक जटिल आर्थिक संतुलन बन गया है। ऊर्जा संकट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि केवल पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता भविष्य के लिए सुरक्षित नहीं है। इसलिए विश्व अब वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ रहा है। भारत ने सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की दिशा में कई योजनाएं शुरू की हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कई मंचों पर ऊर्जा आत्मनिर्भरता को भारत के भविष्य की आवश्यकता बताया है। उनका मानना है कि यदि भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है तो ऊर्जा के क्षेत्र में आयात निर्भरता कम करनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि केवल नीतियां बना देने से समस्या समाप्त नहीं होगी। आवश्यक है कि सार्वजनिक परिवहन को मजबूत किया जाए, ऊर्जा संरक्षण को जनआंदोलन बनाया जाए और वैकल्पिक ऊर्जा तकनीकों को सस्ता व सुलभ बनाया जाए। साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तेल उत्पादक और उपभोक्ता देशों के बीच संतुलित संवाद आवश्यक है, ताकि बाजार में कृत्रिम अस्थिरता कम हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि तेल की बढ़ती धार ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार को धीमा कर दिया है। महंगाई, उत्पादन लागत, बेरोजगारी, व्यापार घाटा और आर्थिक असंतुलन जैसी समस्याएं इसी ऊर्जा संकट की परछाईं बनकर उभरी हैं। यदि विश्व को स्थिर और संतुलित आर्थिक विकास की ओर बढ़ना है तो ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों, संतुलित नीतियों और वैश्विक सहयोग को प्राथमिकता देनी होगी। अन्यथा पेट्रोल-डीजल की यह बढ़ती आग केवल इंजन ही नहीं, अर्थव्यवस्था की पूरी संरचना को धीरे-धीरे झुलसाती रहेगी।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 22:07:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>होर्मुज पर ईरान की हुकूमत: दुनिया की नब्ज पर हाथ</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद होर्मुज को खोल दिया गया है। युद्ध के बाद पहली बार यहां से </span>35<span lang="hi" xml:lang="hi">  पोत पास हुए जिसमें </span>11<span lang="hi" xml:lang="hi">  पोत भारत आ रहे हैं। इनमें कच्चा तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलपीजी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्वरक व अन्य सामान है। लेकिन ईरान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि होर्मुज पर उसकी हुकूमत चलती रहेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे छोटा लेकिन सबसे खतरनाक गलियारा है। चौड़ाई सिर्फ </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi">  किलोमीटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसी से होकर हर दिन दुनिया के </span>20%<span lang="hi" xml:lang="hi">  तेल और </span>30% LNG <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरती है। मार्च </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi">  में ईरान ने इस गलियारे को</span>700</p></div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182049/irans-rule-on-hormuz-has-its-hand-on-the-pulse"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas21.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद होर्मुज को खोल दिया गया है। युद्ध के बाद पहली बार यहां से </span>35<span lang="hi" xml:lang="hi"> पोत पास हुए जिसमें </span>11<span lang="hi" xml:lang="hi"> पोत भारत आ रहे हैं। इनमें कच्चा तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलपीजी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्वरक व अन्य सामान है। लेकिन ईरान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि होर्मुज पर उसकी हुकूमत चलती रहेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे छोटा लेकिन सबसे खतरनाक गलियारा है। चौड़ाई सिर्फ </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi"> किलोमीटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसी से होकर हर दिन दुनिया के </span>20%<span lang="hi" xml:lang="hi"> तेल और </span>30% LNG <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरती है। मार्च </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> में ईरान ने इस गलियारे को बंद कर दिया। </span>700<span lang="hi" xml:lang="hi"> टैंकर फंस गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेल </span>80<span lang="hi" xml:lang="hi"> डॉलर पार कर गया। ये सिर्फ युद्ध की घोषणा नहीं थी। ये ईरान का ये कहना था कि "दुनिया की ऊर्जा की नब्ज मेरे हाथ में है"। होर्मुज क्या है और ईरान इसे क्यों चाहता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। सऊदी अरब</span>, UAE, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुवैत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कतर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इराक का पूरा तेल इसी रास्ते से जाता है। ईरान का दक्षिणी तट इस जलडमरूमध्य के उत्तर में है। भूगोल ने ईरान को स्ट्रेटेजिक लीवरेज दिया है। फरवरी </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> में अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद ईरान ने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के जरिए - पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी बना दी। अब नियम ये है: होर्मुज से गुजरने वाले हर जहाज को </span>40<span lang="hi" xml:lang="hi"> सवालों का घोषणा पत्र जमा करना होगा। माल क्या है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मालिक कौन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रू की नेशनलिटी क्या है। जो नहीं मानेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस पर मिसाइल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ड्रोन हमला या कब्जे का खतरा है। मार्च </span>2026: <span lang="hi" xml:lang="hi">जब ईरान ने नल बंद कर दिया- </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> मार्च </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> को ईरान ने आधिकारिक रूप से होर्मुज बंद करने का ऐलान कर दिया। बंद होते ही</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्य तेल यातायात में </span>86%<span lang="hi" xml:lang="hi"> गिरावट आई</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक मार्च को </span>19.8<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिलियन बैरल/दिन की जगह सिर्फ </span>2.8<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिलियन बैरल गुजरे। </span>706<span lang="hi" xml:lang="hi"> गैर-ईरानी टैंकर कतार में फंस गए। ब्रेंट क्रूड </span>10%<span lang="hi" xml:lang="hi"> उछलकर </span>80<span lang="hi" xml:lang="hi"> डॉलर पर पहुंच गया। ईरान ने कहा कि ये बंद सिर्फ अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इजरायल और यूरोपीय जहाजों के लिए है। चीन के झंडे वाले जहाजों को छूट दी गई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या ईरान कानूनी तौर पर ऐसा कर सकता है</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका छोटा सा जवाब है नहीं। </span>UNCLOS <span lang="hi" xml:lang="hi">यानी संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि की धारा </span>37-44<span lang="hi" xml:lang="hi"> के तहत होर्मुज जैसे अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य में सभी देशों को "ट्रांजिट पैसेज" का अधिकार है। न ईरान और न ओमान एकतरफा तरीके से इसे बंद कर सकते हैं। समुद्री कानून विशेषज्ञ रेड्जा जकारिया कहते हैं कि ईरान आत्मरक्षा का हवाला दे सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अगर वो नेविगेशन रोकता है तो ये </span>UNCLOS <span lang="hi" xml:lang="hi">का उल्लंघन होगा। लेकिन असलियत में ईरान सैन्य शक्ति और भौगोलिक स्थिति से यातायात को प्रभावित कर रहा है। ये कानूनी संप्रभुता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन "डिफैक्टो कंट्रोल" है। ईरान ने अब "टोल-पास" सिस्टम शुरू कर दिया है। जहाजों को </span>PGSA <span lang="hi" xml:lang="hi">से पास लेना होगा। रिपोर्ट्स कहती हैं कि सुरक्षित गुजरने के लिए जहाजों से </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख डॉलर तक मांगे जा रहे हैं। ईरान ने इनकार किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अमेरिका ने जहाजों को चेतावनी दी है कि टोल न दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इससे </span>IRGC <span lang="hi" xml:lang="hi">को फंड मिलेगा। दुनिया पर असर-</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तेल और गैस: भारत अपनी जरूरत का </span>90%<span lang="hi" xml:lang="hi"> तेल आयात करता है। </span>2025<span lang="hi" xml:lang="hi"> में </span>160<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर का तेल आयात हुआ था। होर्मुज बंद होने से भारत सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। यूरोप: कतर ने </span>LNG <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्पादन रोका तो यूरोपीय गैस कीमतें </span>40%<span lang="hi" xml:lang="hi"> बढ़ गईं। </span>LNG <span lang="hi" xml:lang="hi">टैंकर का किराया </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख डॉलर/दिन से ऊपर चला गया। अफ्रीका- </span>UN <span lang="hi" xml:lang="hi">महासचिव गुटेरेश ने चेताया कि अफ्रीका के तेल और उर्वरक आयात का </span>13%<span lang="hi" xml:lang="hi"> होर्मुज से आता है। बंद रहा तो महंगाई और खाद्य संकट बढ़ेगा। लेबनान में सीजफायर के बाद ईरान ने </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिन के लिए होर्मुज खोल दिया। विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि ये सिर्फ सीजफायर की अवधि के लिए है। भारत के लिए क्या मायने हैं- भारत के लिए होर्मुज "लाइफलाइन" है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">- <span lang="hi" xml:lang="hi">विकल्प सीमित हैं: केप ऑफ गुड होप से रास्ता </span>15 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन लंबा और </span>20% <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगा पड़ता है। रणनीति: चाबहार पोर्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान के साथ डिप्लोमेसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बढ़ाना। लेकिन ये सब शॉर्ट टर्म सॉल्यूशन हैं। अगर होर्मुज पर ईरान का कंट्रोल स्थायी हो गया तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा हर </span>6 <span lang="hi" xml:lang="hi">महीने में दांव पर लगेगी। होर्मुज पर ईरान की हुकूमत कानून से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूगोल और मिसाइल से चलती है। वो जानता है कि दुनिया तेल के बिना </span>10 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन नहीं चल सकती। इसलिए वो कभी पूरी तरह बंद नहीं करेगा। वो सिर्फ "नल" को धीमा-तेज करेगा ताकि अमेरिका झुके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेल महंगा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उसकी बात मानी जाए। ये </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं सदी की नाकेबंदी है। बंदूक की जगह टोल-पास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध की जगह </span>40 <span lang="hi" xml:lang="hi">सवालों का फॉर्म। और दांव पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था।</span></p>
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                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 16:08:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>पश्चिम एशिया में युद्ध के प्रभाव से निबटना भारतीयों की चुनौती </title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181931/challenge-of-indians-to-deal-with-the-impact-of-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hq720-(1).jpg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1">राजीव शुक्ल-संपादक </blockquote>
<p style="text-align:justify;">युद्ध कोई भी हो उसका नुकसान तो सभी को उठाना पड़ता है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में फैली अंशाति का खामियाजा पूरे विश्व को उठाना पड़ रहा है। हम बात कर रहे हैं इजराइल और हमास के मध्य चल रहे युद्ध की जिसमें दुनियां के साथ साथ भारत की भी चिंता बढ़ती जा रही है। व्यापार टूट रहा है महंगाई बढ़ती जा रही है, इस पर कोई देश कंट्रोल नहीं कर पा रहा है। पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का केंद्र रहा है, लेकिन 2023 के बाद से इज़राइल-हमास, इज़राइल-हिज़बुल्लाह और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ा टकराव इस क्षेत्र को एक बड़े युद्ध की कगार पर ले आया है। भारत के लिए यह सिर्फ एक भौगोलिक दूरी की खबर नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, 90 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीयों की रोज़ी-रोटी और खाड़ी देशों से व्यापार का सीधा जुड़ाव रखता है। ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ रहा है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% आयात करता है। इसमें से 50% से ज्यादा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है - सऊदी अरब, UAE, इराक, ईरान और कुवैत मुख्य आपूर्तिकर्ता हैं। जब भी होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें उछलती हैं। 2024-2025 में इज़राइल-ईरान मिसाइल हमलों के दौरान ब्रेंट क्रूड $90 पार कर गया था। भारत के लिए इसका मतलब है महंगा पेट्रोल-डीजल, बढ़ती महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव। एयर इंडिया, इंडिगो जैसी एयरलाइनों का खर्च बढ़ता है, जिसका असर हवाई किराए पर पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />             इस अशांति से 90 लाख भारतीयों का भविष्य दांव पर लग गया है। सरकार बहुत कुछ सोच रही है लेकिन स्थिति उसके नियंत्रण से बाहर है।यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान में 90 लाख से ज्यादा भारतीय काम करते हैं। ये हर साल 35-40 बिलियन डॉलर की रेमिटेंस भारत भेजते हैं। युद्ध बढ़ने पर दो तरह का खतरा है। पहला, अगर खाड़ी देश युद्ध में खिंचे तो वहां नौकरियां घटेंगी और भारतीयों की वापसी शुरू होगी। 1990 में खाड़ी युद्ध के समय 1.5 लाख भारतीयों को एयरलिफ्ट करना पड़ा था।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरा, अगर ईरान-इज़राइल संघर्ष बढ़ा तो ईरान में 4000 और इज़राइल में 18,000 भारतीयों की सुरक्षा बड़ी चुनौती बनेगी। भारत ने ऑपरेशन अजय और ऑपरेशन अजेय के जरिए पहले भी नागरिकों को निकाला है, लेकिन बड़े पैमाने पर निकासी लॉजिस्टिक रूप से जटिल है। युद्ध के कारण व्यापार और निवेश की रफ्तार धीमी पड़ रही है। यूएई और सऊदी अरब भारत के टॉप 5 व्यापारिक साझेदार हैं। I2U2 और IMEC कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं पश्चिम एशिया को भारत से जोड़ने के लिए बनी थीं। लेकिन युद्ध के माहौल में निवेश रुक जाता है। लाल सागर में हूती हमलों के बाद शिपिंग बीमा महंगा हुआ और भारत-यूरोप व्यापार पर असर पड़ा। अगर सूएज नहर या होर्मुज बंद हुआ तो भारत का 80% विदेशी व्यापार प्रभावित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />भारत की पश्चिम एशिया नीति हमेशा "संतुलन" पर टिकी रही है। भारत इज़राइल से रक्षा और तकनीक लेता है, अरब देशों से तेल और निवेश, और ईरान से चाबहार पोर्ट के जरिए मध्य एशिया तक पहुंच चाहता है। वर्तमान युद्ध ने इस संतुलन को कठिन बना दिया है। एक तरफ चुनना पड़ा तो भारत के आर्थिक हित प्रभावित होंगे। इसलिए भारत ने यूएन में शांति की अपील की है, लेकिन सीधे किसी पक्ष का खुलकर समर्थन नहीं किया। ये तटस्थता कूटनीतिक तौर पर जरूरी है, लेकिन घरेलू राजनीति में इसकी आलोचना भी होती है। इस युद्ध का असर घरेलू राजनीति और सामाजिक स्तर पर भी पड़ रहा है। पश्चिम एशिया का युद्ध भारत में धार्मिक और राजनीतिक बहस को भी प्रभावित करता है। फिलिस्तीन और इज़राइल पर भारत के रुख को लेकर सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक ध्रुवीकरण दिखता है। इसके अलावा, अगर तेल 120 डॉलर पार गया तो भारत सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ेगी या महंगाई झेलनी पड़ेगी। दोनों ही स्थिति में आम आदमी की जेब पर असर पड़ता है। भारत सरकार इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है कि भारत के पास क्या विकल्प हैं? रणनीतिक तेल भंडार : भारत ने पहले ही 5.33 मिलियन टन का भंडार बना रखा है, जो 9-10 दिन चल सकता है। इसे बढ़ाने की जरूरत है। वैकल्पिक स्रोत : रूस, अमेरिका और अफ्रीका से तेल आयात बढ़ाकर पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करना। निकासी योजना: खाड़ी देशों में भारतीय दूतावासों को हाई अलर्ट पर रखना और नौसेना की तत्परता बढ़ाना।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />कूटनीतिक सक्रियता: भारत G20 और BRICS के मंच पर युद्ध रोकने के लिए आवाज उठा सकता है। पश्चिम एशिया में युद्ध भारत के लिए दूर का युद्ध नहीं है। ये हमारे रसोई गैस के दाम, खाड़ी में काम करने वाले भाई-बहन की नौकरी और रुपये की कीमत से जुड़ा है। भारत की ताकत ये है कि वो अब भी अरब देशों, इज़राइल और ईरान तीनों से बात कर सकता है। लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इस संतुलन को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। आम भारतीय के लिए इसका मतलब है अगले 6-12 महीने महंगाई और अनिश्चितता के साथ जीना।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:36:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमेरिका-ईरान पीस डील पर हस्ताक्षर, यूएस झुका- पैसे भी देगा, होर्मुज़ खुलेगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम एशिया में महीनों से जारी भीषण तनाव और सैन्य टकराव के बीच एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता हाथ लगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने दोनों देशों के बीच जारी दुश्मनी को खत्म करने के लिए एक </span>14-<span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्रीय समझौता ज्ञापन पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर कर इसे आधिकारिक रूप से अंतिम रूप दे दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज समुद्री रास्ते का खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि दुनिया के कुल तेल निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरता है। इस समझौते</span></p></div></div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181546/america-iran-peace-deal-signed-us-bowed-%E2%80%93-will-also-give"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas12.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम एशिया में महीनों से जारी भीषण तनाव और सैन्य टकराव के बीच एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता हाथ लगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने दोनों देशों के बीच जारी दुश्मनी को खत्म करने के लिए एक </span>14-<span lang="hi" xml:lang="hi">सूत्रीय समझौता ज्ञापन पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर कर इसे आधिकारिक रूप से अंतिम रूप दे दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज समुद्री रास्ते का खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि दुनिया के कुल तेल निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरता है। इस समझौते के सफल होने से न केवल तेल की वैश्विक कीमतें स्थिर होंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच दशकों पुराने तनाव को कूटनीतिक रास्ते से सुलझाने का एक नया रास्ता खुलेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस समझौते को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">का नाम दिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन से मुलाकात के दौरान इस समझौते की हार्ड कॉपी पर भी हस्ताक्षर किए। हस्ताक्षर करने के बाद ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">यह साइन हो चुका है। मैंने अभी-अभी इस पर हस्ताक्षर किए हैं।" दूसरी तरफ ईरानी राष्ट्रपति पेज़ेशकियन और अन्य अधिकारियों ने भी इसे डिजिटल रूप से साइन किया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने भी इस पर बयान जारी कर कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">यह समझौता तत्काल प्रभाव से लागू होगा। पहले कदम के रूप में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान तुरंत हॉर्मुज जलडमरूमध्य </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को खोल देगा और अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटा लेगा।"</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्हाइट हाउस और ईरानी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी किए गए समझौते के मुख्य प्वाइंट इस प्रकार हैं:</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तत्काल युद्धविराम: अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान और उनके सहयोगी सभी मोर्चों (लेबनान सहित) पर तत्काल और स्थायी रूप से सैन्य अभियानों को समाप्त करने की घोषणा करते हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ बल प्रयोग की धमकी या हमला नहीं करेंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संप्रभुता का सम्मान: दोनों देश एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा करते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">60<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों की समयसीमा: दोनों पक्ष अधिकतम </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर एक अंतिम समझौते (</span>Final Deal) <span lang="hi" xml:lang="hi">पर बातचीत पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी का अंत: समझौते पर हस्ताक्षर होते ही अमेरिका ईरान के खिलाफ अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया शुरू करेगा और </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर इसे पूरी तरह खत्म कर देगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सेना की वापसी: अंतिम समझौते के </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर अमेरिका ईरान के नजदीकी इलाकों से अपनी सेनाएं हटा लेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हॉर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना: ईरान शुरुआती </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के लिए फारस की खाड़ी से ओमान के समुद्र तक वाणिज्यिक जहाजों (</span>Commercial Vessels) <span lang="hi" xml:lang="hi">के सुरक्षित और मुफ्त आवागमन की व्यवस्था करेगा। </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिनों के भीतर नौसैनिक और तकनीकी बाधाओं (जैसे बारूदी सुरंगें हटाना) को दूर किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य का प्रशासन: ईरान इस रणनीतिक जलमार्ग के भविष्य के प्रशासन और समुद्री सेवाओं को परिभाषित करने के लिए ओमान और अन्य तटीय देशों के साथ बातचीत करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">300<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर का पुनर्निर्माण पैकेज: अमेरिका अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम </span>300<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर (</span>USD $300 Billion) <span lang="hi" xml:lang="hi">की योजना विकसित करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिबंधों की समाप्ति: एक तय समय सारणी के तहत अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान के खिलाफ सभी एकतरफा (प्राइमरी और सेकेंडरी) प्रतिबंधों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (</span>UNSC) <span lang="hi" xml:lang="hi">के प्रस्तावों के तहत लगाए गए प्रतिबंधों को समाप्त करने का वचन देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परमाणु हथियारों पर रोक: ईरान ने दोहराया है कि वह परमाणु हथियार विकसित या हासिल नहीं करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरेनियम संवर्धन का निपटारा: ईरान के समृद्ध यूरेनियम के भंडार का निपटारा अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (</span>IAEA) <span lang="hi" xml:lang="hi">की देखरेख में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऑन-साइट डाउन-ब्लेंडिंग</span>' (<span lang="hi" xml:lang="hi">यूरेनियम की क्षमता कम करना) के जरिए किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यथास्थिति (</span>Status Quo) <span lang="hi" xml:lang="hi">बनाए रखना: अंतिम समझौता होने तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को मौजूदा स्तर पर ही रोके रखेगा और अमेरिका कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगा और न ही क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिक तैनात करेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तेल निर्यात को छूट और फंड की बहाली: अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात के लिए तत्काल छूट (</span>Waivers) <span lang="hi" xml:lang="hi">जारी करेगा। साथ ही विदेशों में फ्रीज (जब्त) की गई ईरान की संपत्तियों को वापस इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निगरानी तंत्र की स्थापना: समझौते के सफल कार्यान्वयन और भविष्य के अनुपालन की निगरानी के लिए एक कार्यकारी तंत्र स्थापित किया जाएगा। इस अंतिम समझौते को </span>UNSC <span lang="hi" xml:lang="hi">के एक बाध्यकारी प्रस्ताव द्वारा अनुमोदित किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने पुष्टि की कि पारदर्शिता बनाए रखने के लिए इस समझौते पर अंग्रेजी और फारसी (</span>Farsi) <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों भाषाओं में हस्ताक्षर किए गए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि अनुवाद को लेकर भविष्य में कोई मतभेद या कोई और व्याख्या न हो। ईरान ने अपनी केंद्रीय बैंक के साथ मिलकर जब्त संपत्तियों को वापस पाने के तकनीकी तौर-तरीकों को भी अंतिम रूप दे दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
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</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 14:07:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ट्रंप और मोदी की विदेश यात्राओं के दूरगामी मायने</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डोनाल्ड ट्रम्प  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की तीन दिवसीय चीन यात्रा और दुनिया की सर्वाधिक आबादी वाले भारत के प्रधानमंत्री</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नरेंद्र मोदी </span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की यूएई तथा यूरोप के पाँच देशों की विदेश यात्राओं पर इस समय पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। वैश्विक अस्थिरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा संकट और बदलते आर्थिक समीकरणों के इस दौर में इन यात्राओं को केवल औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम मानना भूल होगी। वास्तव में ये यात्राएँ आने वाले समय की वैश्विक राजनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापार और आर्थिक संतुलन की नई दिशा तय कर सकती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान युद्ध के बाद अमेरिका की वैश्विक साख को</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179246/far-reaching-implications-of-trump-and-modis-foreign-visits"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/narendra-modi-donald-trump-nrg-stadium-houston-2019.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डोनाल्ड ट्रम्प  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की तीन दिवसीय चीन यात्रा और दुनिया की सर्वाधिक आबादी वाले भारत के प्रधानमंत्री</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नरेंद्र मोदी </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की यूएई तथा यूरोप के पाँच देशों की विदेश यात्राओं पर इस समय पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। वैश्विक अस्थिरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा संकट और बदलते आर्थिक समीकरणों के इस दौर में इन यात्राओं को केवल औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम मानना भूल होगी। वास्तव में ये यात्राएँ आने वाले समय की वैश्विक राजनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापार और आर्थिक संतुलन की नई दिशा तय कर सकती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान युद्ध के बाद अमेरिका की वैश्विक साख को जो धक्का लगा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पिछले कई वर्षों से व्यापारिक वर्चस्व को लेकर अमेरिका और चीन के बीच चली आ रही तनातनी ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। ऐसे में यदि दोनों देशों के बीच किसी बड़े व्यापारिक समझौते की शुरुआत होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसका असर वैश्विक बाजारों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर निश्चित रूप से दिखाई देगा। दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक और सामरिक शक्तियाँ यदि अपने संबंधों में नरमी लाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इससे वैश्विक आर्थिक स्थिरता को बल मिल सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान-अमेरिका संघर्ष के कारण पैदा हुए तेल और गैस संकट तथा उससे बढ़ती महंगाई के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूएई और यूरोपीय देशों की यात्रा भारत सहित दुनिया के लिए नई उम्मीद बनकर उभरी है। भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बन चुका है और यही कारण है कि सभी बड़े देश भारत के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंध मजबूत करना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा ऊर्जा सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निवेश और वैकल्पिक संसाधनों की दिशा में महत्वपूर्ण परिणाम दे सकती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संभावना जताई जा रही है कि अमेरिका और चीन तेल तथा गैस व्यापार को लेकर नए समझौते कर वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। वहीं प्रधानमंत्री मोदी ओमान से भारत तक संभावित तेल गैस पाइपलाइन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों तथा यूरोपीय देशों के साथ तकनीकी और आर्थिक साझेदारी को लेकर ठोस पहल कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भारत को ऊर्जा संकट से राहत मिलने के साथ-साथ वैश्विक बाजार में भी स्थिरता आएगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीतिक दृष्टि से भले ही अमेरिका और चीन एक-दूसरे के विरोधी दिखाई देते हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन व्यापारिक दृष्टि से दोनों देशों ने हमेशा अपने हितों को सर्वोपरि रखा है। विश्व राजनीति का यह कठोर सत्य है कि बड़ी शक्तियाँ अपने आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए छोटे देशों का उपयोग करने से भी नहीं हिचकतीं। पाकिस्तान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीलंका और नेपाल जैसे देशों की आर्थिक चुनौतियों तथा राजनीतिक अस्थिरता में बाहरी हस्तक्षेप की भूमिका समय-समय पर चर्चा का विषय रही है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एशिया में लगातार हो रहे राजनीतिक बदलावों और सत्ता विरोधी आंदोलनों के बीच भारत अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है। इसका सबसे बड़ा कारण केंद्र में मजबूत नेतृत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिर शासन और आर्थिक सुधारों की निरंतरता है। वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ कई बड़ी महाशक्तियाँ कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं भारत तेजी से आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्पष्टवादिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्णायक नेतृत्व और वैश्विक मंचों पर सक्रिय भूमिका ने भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को नई मजबूती प्रदान की है। यही कारण है कि आज दुनिया जितनी उम्मीद अमेरिका और चीन से रखती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतनी ही अपेक्षाएँ भारत और उसके नेतृत्व से भी जुड़ने लगी हैं। इसलिए अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीन और भारत के शीर्ष नेताओं की ये विदेश यात्राएँ केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भविष्य की वैश्विक दिशा तय करने वाली महत्वपूर्ण घटनाएँ बन गई हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अरविद रावल</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 May 2026 21:16:02 +0530</pubDate>
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