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                <title>देश सेवा - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>देश सेवा RSS Feed</description>
                
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                <title>हर घर तिरंगा से हर हृदय तिरंगा तक</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो. (डॉ.) मनमोहन प्रकाश</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">हर भारतीय के लिए यह समझना आवश्यक है कि तिरंगा केवल तीन रंगों से बना एक राष्ट्रीय ध्वज नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता, संप्रभुता, अखंडता, लोकतांत्रिक चेतना और राष्ट्रीय अस्मिता का जीवंत प्रतीक है। इसके प्रत्येक रंग और प्रत्येक प्रतीक के पीछे एक गहरा राष्ट्रीय दर्शन निहित है। इसमें स्वतंत्रता संग्राम के असंख्य ज्ञात-अज्ञात सेनानियों के बलिदान, संविधान निर्माताओं की लोकतांत्रिक आकांक्षाएं और एक न्यायपूर्ण, समतामूलक एवं समृद्ध भारत का स्वप्न प्रतिबिंबित होता है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इसीलिए तिरंगे का सम्मान केवल उसे हाथ में थामने, घर पर फहराने, उसके सामने सिर झुकाने या राष्ट्रीय पर्वों पर सलामी देने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185111/from-tricolor-in-every-house-to-tricolor-in-every-heart"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/img-20241207-wa0003.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रो. (डॉ.) मनमोहन प्रकाश</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हर भारतीय के लिए यह समझना आवश्यक है कि तिरंगा केवल तीन रंगों से बना एक राष्ट्रीय ध्वज नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता, संप्रभुता, अखंडता, लोकतांत्रिक चेतना और राष्ट्रीय अस्मिता का जीवंत प्रतीक है। इसके प्रत्येक रंग और प्रत्येक प्रतीक के पीछे एक गहरा राष्ट्रीय दर्शन निहित है। इसमें स्वतंत्रता संग्राम के असंख्य ज्ञात-अज्ञात सेनानियों के बलिदान, संविधान निर्माताओं की लोकतांत्रिक आकांक्षाएं और एक न्यायपूर्ण, समतामूलक एवं समृद्ध भारत का स्वप्न प्रतिबिंबित होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसीलिए तिरंगे का सम्मान केवल उसे हाथ में थामने, घर पर फहराने, उसके सामने सिर झुकाने या राष्ट्रीय पर्वों पर सलामी देने तक सीमित नहीं होना चाहिए। ध्वज का वास्तविक सम्मान तब होगा, जब उसके प्रति श्रद्धा हमारे आचरण में दिखाई दे और उसमें निहित आदर्श हमारे विचार, व्यवहार तथा दैनिक जीवन का हिस्सा बनें। ‘हर घर तिरंगा’ तभी सार्थक होगा, जब उसके साथ ‘हर हृदय तिरंगा’ भी स्थापित हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के तीन रंग अपने भीतर व्यापक संदेश समेटे हुए हैं। शीर्ष पर स्थित केसरिया रंग साहस, त्याग और निःस्वार्थ सेवा की प्रेरणा देता है। यह स्मरण कराता है कि राष्ट्र निर्माण केवल अधिकारों की मांग से नहीं, बल्कि कर्तव्यों के निर्वहन, अनुशासन और आवश्यकता पड़ने पर व्यक्तिगत स्वार्थ के त्याग से होता है। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में असंख्य लोगों ने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का त्याग कर राष्ट्र को सर्वोच्च प्राथमिकता दी थी। आज भी राष्ट्र निर्माण के लिए उसी भावना की आवश्यकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ध्वज का श्वेत रंग सत्य, शांति और पारदर्शिता का संदेश देता है। लोकतांत्रिक समाज में सत्यनिष्ठा, सहिष्णुता, संवाद और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व केवल आदर्श शब्द नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता की आवश्यक शर्तें हैं। जब सार्वजनिक जीवन में सत्य और पारदर्शिता कमजोर होती है तथा असहमति को शत्रुता समझा जाने लगता है, तब लोकतांत्रिक मूल्यों को क्षति पहुंचती है। इसलिए श्वेत रंग हमें विचार और व्यवहार दोनों में संयम तथा सत्य का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हरा रंग जीवन, विकास, समृद्धि और प्रकृति के साथ संतुलन का प्रतीक माना जाता है। भारत जैसे कृषि प्रधान और जैव-विविधता से समृद्ध देश के लिए इसका संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आर्थिक विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करे, आने वाली पीढ़ियों के हितों की उपेक्षा करे, वह वास्तविक प्रगति नहीं हो सकता। इसलिए हरे रंग का संदेश हमें विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की जिम्मेदारी का भी बोध कराता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तिरंगे के मध्य स्थित नीले रंग का अशोक चक्र इसकी दार्शनिक आत्मा को और गहरा करता है। अशोक चक्र भारतीय परंपरा में धर्म, न्याय और नैतिक व्यवस्था से जुड़े धर्मचक्र की स्मृति को अभिव्यक्त करता है। इसके 24 आरे निरंतर गति और कर्म की प्रेरणा देते हैं। इसका व्यापक संदेश है कि जीवन, समाज और राष्ट्र में ठहराव नहीं, बल्कि निरंतर प्रगति आवश्यक है। स्वतंत्रता का अर्थ निष्क्रियता नहीं, बल्कि जिम्मेदार कर्म है; अधिकारों के साथ कर्तव्य और स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज भारत विश्व में तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। अंतरिक्ष विज्ञान, डिजिटल प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी, विनिर्माण, स्टार्टअप, रक्षा उत्पादन और नवाचार जैसे अनेक क्षेत्रों में भारत ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। चंद्रयान मिशनों से लेकर डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना तक और स्वदेशी तकनीकी क्षमता से लेकर वैश्विक स्तर पर बढ़ती उद्यमिता तक, भारत की क्षमता का विस्तार हुआ है। लेकिन किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद, सैन्य सामर्थ्य या तकनीकी उपलब्धियों से निर्धारित नहीं होती। उसकी स्थायी शक्ति उसके नागरिकों के चरित्र, सामाजिक सद्भाव, संस्थाओं के प्रति सम्मान, कानून के पालन और सार्वजनिक जीवन की नैतिकता में निहित होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यही ‘हर हृदय तिरंगा’ की अवधारणा का मूल है। इसका अर्थ है कि तिरंगा हमारे हाथ में दिखाई देने के साथ-साथ हमारे विचारों और कर्मों में भी दिखाई दे। राष्ट्रप्रेम केवल बड़े अवसरों पर देशभक्ति प्रदर्शित करने का नाम नहीं है। यह अपने दैनिक दायित्वों को ईमानदारी, निष्ठा और दक्षता से निभाने की सतत प्रक्रिया है। शिक्षक का ईमानदारी से पढ़ाना, विद्यार्थी का अनुशासन और परिश्रम अपनाना, चिकित्सक का पेशा-गत नैतिकता का पालन करना, व्यापारी का ईमानदार व्यवहार, कर्मचारी का अपने दायित्व के प्रति समर्पण, किसान का परिश्रम और वैज्ञानिक का नए ज्ञान के सृजन के प्रति समर्पण आदि सभी राष्ट्र निर्माण के रूप हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रप्रेम सोशल मीडिया पर तिरंगे की तस्वीर लगाने, देशभक्ति के नारे लगाने या राष्ट्रीय पर्वों पर देशभक्ति के गीत गाने, मिठाई बांटने तक सीमित नहीं हो सकता। वास्तविक देशभक्ति हमारे छोटे-छोटे नागरिक व्यवहारों में प्रकट होती है। यातायात नियमों का पालन करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, स्वच्छता बनाए रखना, जल और ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग करना, करों का ईमानदारी से भुगतान करना, महिलाओं और वंचित वर्गों का सम्मान करना तथा संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के मूल्यों को व्यवहार में उतारना आदि सभी राष्ट्र के प्रति हमारी जिम्मेदारियों का हिस्सा हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की पहचान उसकी एकरूपता में नहीं, बल्कि विविधता में एकता की उसकी अद्वितीय क्षमता में है। अनेक भाषाएं, संस्कृतियां, परंपराएं, जीवन-पद्धतियां और विचारधाराएं भारत की सामाजिक संरचना को समृद्ध बनाती हैं। इसलिए तिरंगे को हृदय में स्थापित करने का अर्थ किसी धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र या राजनीतिक विचारधारा के प्रति घृणा पैदा करना नहीं है। इसके विपरीत, इसका अर्थ है कि मतभेदों के बावजूद हम ‘भारतीय’ होने की साझा पहचान को सर्वोच्च नागरिक बंधन के रूप में स्वीकार करें और प्रत्येक नागरिक की गरिमा का सम्मान करें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्र की रक्षा केवल सीमा पर तैनात सैनिक नहीं करते। सैनिक बाहरी सीमाओं की सुरक्षा करता है, तो नागरिक अपने आचरण से राष्ट्र की आंतरिक शक्ति, सामाजिक स्थिरता और वैश्विक प्रतिष्ठा को मजबूत करता है। सीमा पर सैनिक का साहस जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण खेत में किसान का परिश्रम, प्रयोगशाला में वैज्ञानिक का शोध, कारखाने में श्रमिक का श्रम, कक्षा में शिक्षक का ज्ञान, उद्यमी का नवाचार और सार्वजनिक जीवन में नागरिक की ईमानदारी है। राष्ट्र निर्माण वास्तव में करोड़ों नागरिकों के सामूहिक कर्म का परिणाम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसलिए जब हम इस वर्ष अपने घर पर तिरंगा फहराएं, तो कुछ क्षण रुककर स्वयं से भी प्रश्न करें—क्या तिरंगे के प्रति हमारा सम्मान केवल ध्वज तक सीमित है, या उसके आदर्श हमारे जीवन में भी दिखाई देते हैं? क्या हमारे भीतर केसरिया रंग का साहस और त्याग, श्वेत रंग की सत्यनिष्ठा और शांति, हरे रंग का विकास और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता तथा अशोक चक्र की निरंतर कर्म-शीलता जीवित है? क्या हम अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी उतनी ही गंभीरता से निभाते हैं?यदि इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक है, तभी ‘हर घर तिरंगा’ का अभियान अपने व्यापक राष्ट्रीय उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगा और ‘हर हृदय तिरंगा’ की भावना को जन्म देगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तिरंगा केवल हमारे घरों की छतों पर नहीं, हमारे चरित्र में भी दिखाई देना चाहिए। वह केवल हाथों में नहीं, हमारे विचारों में होना चाहिए; केवल राष्ट्रीय पर्वों पर नहीं, हमारे दैनिक आचरण में उपस्थित होना चाहिए। जब राष्ट्रध्वज के रंग हमारे व्यवहार के रंग बन जाएंगे और अशोक चक्र की गति हमारे कर्म की प्रेरणा बनेगी, तभी तिरंगे के प्रति हमारी श्रद्धा वास्तविक राष्ट्रभक्ति में परिवर्तित होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">‘हर घर तिरंगा’ राष्ट्रीय गौरव का उत्सव है, लेकिन ‘हर हृदय तिरंगा’ उस गौरव को जीवन में उतारने का संकल्प है। यही सच्ची देशभक्ति है, यही सच्ची राष्ट्रसेवा है और यही स्वतंत्र भारत के प्रति हमारी सबसे बड़ी नागरिक जिम्मेदारी है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 22:25:57 +0530</pubDate>
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                <title>11जून को पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की जयंती है!इस अवसर पर यह आलेख है</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>शाहजहाँपुर </strong>की मिट्टी ने 11 जून 1897 को मुझे जन्म दिया था। माँ का नाम मूलमती, पिता का नाम मुरलीधर। घर गरीब था, पर सीना गर्व से भरा था। दादा ग्वालियर से अकाल के दिनों में भागकर यहाँ आए थे। दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष देखा, इसलिए बचपन से ही मन में ठान लिया था कि इस गुलामी को उखाड़ फेंकना है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">तुम मुझे आज "सरफरोशी की तमन्ना" वाले शायर के नाम से जानते हो। पर मैं पहले क्रांतिकारी था, बाद में कवि बना। कलम और बंदूक दोनों मेरे हथियार थे। आज मैं तुम्हें वही रात सुनाऊँगा जिसने</div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180928/11th-june-is-the-birth-anniversary-of-pandit-ram-prasad"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260610-wa0050.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>शाहजहाँपुर </strong>की मिट्टी ने 11 जून 1897 को मुझे जन्म दिया था। माँ का नाम मूलमती, पिता का नाम मुरलीधर। घर गरीब था, पर सीना गर्व से भरा था। दादा ग्वालियर से अकाल के दिनों में भागकर यहाँ आए थे। दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष देखा, इसलिए बचपन से ही मन में ठान लिया था कि इस गुलामी को उखाड़ फेंकना है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">तुम मुझे आज "सरफरोशी की तमन्ना" वाले शायर के नाम से जानते हो। पर मैं पहले क्रांतिकारी था, बाद में कवि बना। कलम और बंदूक दोनों मेरे हथियार थे। आज मैं तुम्हें वही रात सुनाऊँगा जिसने मेरी ज़िंदगी बदल दी। 9 अगस्त 1925 की काकोरी की रात।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">बैठो, ये कहानी छोटी नहीं है। ये वो दास्तान है जो खून, पसीने और मिट्टी की खुशबू से लिखी गई है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1925 का हिंदुस्तान देखो। अंग्रेज़ हर चीज़ पर टैक्स लगा रहे थे। नमक पर, कपड़े पर, रेल के टिकट पर। किसान की फसल सस्ते में लूट ली जाती, और उसी फसल को दुगने दाम पर बेचा जाता। लगान न दे पाने पर गाँव के गाँव उजड़ जाते थे। कांग्रेस वाले सत्याग्रह कर रहे थे, लाठी खा रहे थे, जेल जा रहे थे। मैं उनका सम्मान करता हूँ। गांधी जी का अहिंसा का रास्ता लाखों को जोड़ रहा था। पर मेरा दिल कहता था कि जो राज़ बंदूक के दम पर आया है, वो बंदूक के दम पर ही जाएगा।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1924 में हमने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाई। मैं, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी, सचिंद्र बख्शी, मनमथनाथ गुप्त। सबकी उम्र 25 से कम थी। पर हौसला पहाड़ से ऊँचा था। हमारा मकसद साफ था। अंग्रेजों के पास हथियार हैं, पैसा है, ताकत है। हमारे पास कुछ नहीं। तो हम उनका ही खजाना लूटेंगे। उसी पैसे से हथियार खरीदेंगे। उसी हथियार से क्रांति का अलाव जलाएंगे। लोग कहते थे ये डकैती है। मैं कहता हूँ, जब एक देश को लूटा जा रहा हो, तो लुटेरों से लूटना डकैती नहीं, कर्तव्य है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मौका मिला 9 अगस्त 1925 को। लखनऊ से सहारनपुर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन रोज़ सरकारी खजाना ले जाती थी। लखनऊ, शाहजहाँपुर, बरेली, मुरादाबाद के सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह इसी ट्रेन में होती थी। गार्ड के डिब्बे में लोहे की पेटियाँ रखी होती थीं। वही हमारा निशाना था। काकोरी लखनऊ से 15 मील दूर एक छोटा स्टेशन है। हमने तय किया कि ट्रेन जैसे ही काकोरी पार करेगी, चेन खींचकर रोक देंगे। गार्ड का डिब्बा तोड़ेंगे, खजाना निकालेंगे और जंगल में गायब हो जाएंगे।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">टीम में दस लोग थे। मैं "राम" बनकर बैठा था। अशफाक "अहमद" बनकर। चंद्रशेखर आज़ाद हमारा बाहुबल था। राजेंद्र लाहिड़ी का दिमाग ठंडा था, निशाना पक्का था। मनमथनाथ सबसे छोटा था, पर हिम्मत में सबसे बड़ा। सचिंद्र बख्शी, मुरारी शर्मा, मुकुंदी लाल, केशव चक्रवर्ती भी साथ थे। हमने हफ्तों तक रिहर्सल की। शाहजहाँपुर के जंगलों में रात-रात भर अभ्यास किया। कैसे चेन खींचनी है, कैसे ताला तोड़ना है, कैसे भागना है। मैंने उस दिन अपनी डायरी में लिखा था: "अगर हम मर गए तो शहीद कहलाएँगे। अगर बच गए तो क्रांति का बीज बो देंगे।"</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">9 अगस्त की दोपहर। धूप आग बरसा रही थी। हम अलग-अलग स्टेशनों से ट्रेन में चढ़े। टिकट लेकर, आम मुसाफिर बनकर। ट्रेन चली। दिल की धड़कनें तेज थीं। पर चेहरे पर कोई भाव नहीं था। जैसे ही ट्रेन काकोरी स्टेशन पार कर जंगल की तरफ बढ़ी, मनमथनाथ ने चेन खींच दी। कड़क की आवाज़ आई। ट्रेन हिली और रुक गई। हम आठ लोग एक साथ उठे। गार्ड के डिब्बे की तरफ लपके। ताला तोड़ा। अंदर लोहे की पेटियाँ थीं। चंद्रशेखर ने रिवॉल्वर तान दी और कहा, "खोलो जल्दी!" गार्ड का चेहरा पीला पड़ गया। उसने कांपते हाथों से चाबी दे दी।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पेटियाँ खुलीं। नोटों की गड्डियाँ, सिक्के, सरकारी कागज। हमने अंदाजा लगाया, लगभग आठ हजार रुपये। आज के हिसाब से करीब पंद्रह लाख। लेकिन तभी गलती हो गई। शायद गार्ड ने ब्रेक छोड़ा, या ट्रेन अपने आप हिल गई। राजेंद्र ने जल्दी में एक पेटी धक्का देकर नीचे फेंक दी। धमाके की आवाज़ हुई। उसी धमाके में एक यात्री अहमद अली नीचे गिर गया। सिर पर चोट लगी और उसकी मौत हो गई। उस पल मेरा कलेजा बैठ गया। हम लुटेरे नहीं थे। हमारा मकसद किसी की जान लेना नहीं था। पर क्रांति में खून बहता ही है। उस दिन मैंने जाना कि आज़ादी की कीमत सिर्फ हमारा खून नहीं होता, कभी-कभी बेगुनाहों का खून भी बहता है। उस यात्री की मौत का बोझ आज भी मेरे सीने पर है। हमने जितना हो सका खजाना समेटा और जंगल में भागे। पीछे पुलिस की सीटी बज रही थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लूट के बाद हम बिखर गए। पर अंग्रेज़ों की सीआईडी कोई कम नहीं थी। गाँव-गाँव, घर-घर छान मारा। मुखबिरों को पैसा दिया गया। सबसे पहले राजेंद्र लाहिड़ी पकड़े गए। फिर मैं 1 नवंबर 1925 को शाहजहाँपुर में पकड़ा गया। अशफाक दिल्ली में गिरफ्तार हुआ। चंद्रशेखर आज़ाद बच निकले। वो 1931 तक लड़े, और जब चारों तरफ से घिर गए तो खुद को गोली मार ली। जिंदा पकड़े जाने से बेहतर मौत थी उनके लिए।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मुकदमा चला लखनऊ में। नाम दिया गया "काकोरी षड्यंत्र केस"। कठघरे में खड़े होकर मैंने जज से कहा: "हम चोर नहीं हैं। हम वो लोग हैं जो अपनी माँ भारत को आज़ाद कराना चाहते हैं। अगर इसके लिए फाँसी भी मिले, तो वो हमारे लिए माला है।" अदालत ने 40 लोगों पर मुकदमा चलाया। 16 को सज़ा हुई। मुझे, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को फाँसी की सज़ा सुनाई गई। फैसला सुनकर मैं हँस पड़ा। "मौत से डरते तो हम 14 साल की उम्र में आर्य समाज न ज्वाइन करते।" मुकदमे के दौरान हमने कोर्ट को ही अपना मंच बना लिया। हर पेशी पर देशभक्ति के नारे लगते थे। "इंकलाब ज़िंदाबाद" की गूँज पूरे लखनऊ में सुनाई देती थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मुझे गोरखपुर जेल की कोठरी नंबर 11 में रखा गया। फाँसी 19 दिसंबर 1927 को तय हुई। मेरे पास 40 दिन थे। मैं रोया नहीं। माफी नहीं माँगी। मैंने कलम उठाई। पेंसिल से 120 पन्ने लिखे। मेरी आत्मकथा _कातिल की कलम से_। मैंने लिखा कि कैसे मेरा दादा अकाल में ग्वालियर छोड़कर आया था। कैसे माँ ने मुझे भूखे पेट सुलाया था। कैसे 14 साल की उम्र में स्वामी दयानंद सरस्वती की _सत्यार्थ प्रकाश_ ने मेरे अंदर आग लगा दी थी। कैसे मैंने "मैनपुरी षड्यंत्र" में हिस्सा लिया था 1918 में।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">रात को नींद नहीं आती थी। अशफाक पास वाली कोठरी में था। हम दीवार के उस पार बात करते थे। एक रात मैंने उससे कहा, "अशफाक, अगर हम बच गए तो साथ मिलकर मदरसा खोलेंगे। जहाँ हिंदू-मुस्लिम दोनों पढ़ेंगे।" उसने जवाब दिया, "बिस्मिल भाई, हम बचेंगे नहीं। लेकिन हमारे मरने के बाद हिंदुस्तान देखेगा कि हिंदू-मुस्लिम एक साथ मर सकते हैं।" उसी जेल में मैंने "मेरा रंग दे बसंती चोला" लिखा।  </div><div style="text-align:justify;">_"मेरा रंग दे बसंती चोला,  </div><div style="text-align:justify;">माय रंग दे बसंती चोला।"_  </div><div style="text-align:justify;">सोचो, जिसे कल फाँसी होनी है, वो बसंत की बात कर रहा है। मौत से डरने वाला ऐसा नहीं लिखता। जेल में मुझे रोज़ गीता पढ़ने का मौका मिलता था। मैंने पाया कि गीता में भी कर्म और त्याग की बात है। कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, "कर्म करो, फल की चिंता मत करो।" वही मैं कर रहा था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लोग पूछते हैं, हिंदू-मुस्लिम एक साथ कैसे लड़ सकते हैं? मैं कहता हूँ, देखो अशफाक को। अशफाक उल्ला खाँ शाहजहाँपुर का ही था। उसकी उम्र मुझसे दो साल छोटी थी। जब पहली बार मिला था, तो लगा जैसे बरसों का साथी हो। वो उर्दू का शायर था। मैं हिंदी का। वो कुरान पढ़ता था, मैं गीता। पर जब देश की बात आती, तो हम एक थे। काकोरी की रात उसने मुझसे कहा था, "बिस्मिल भाई, अगर आज हम मर गए तो हिंदुस्तान देखेगा कि हिंदू-मुस्लिम अलग नहीं हैं।" और वही हुआ। 19 दिसंबर 1927 को हम एक साथ फाँसी पर चढ़े। अशफाक की आखिरी ख्वाहिश थी कि उसकी लाश को शाहजहाँपुर में दफनाया जाए। अंग्रेजों ने मना कर दिया। उसे फैजाबाद में दफनाया गया। आज भी उसकी मजार पर हिंदू-मुस्लिम दोनों चादर चढ़ाते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">18 दिसंबर की रात जेलर आया। बोला, "बिस्मिल, कल सुबह छह बजे फाँसी है।" मैंने नहाया, नए कपड़े पहने, गीता का पाठ किया। अशफाक ने कुरान पढ़ी। रोशन सिंह ने गुरुवाणी गाई। रात को मैंने आखिरी शेर लिखा:  </div><div style="text-align:justify;">_"अगर एक झटके में कुर्बानी दे दूँ तो क्या है,  </div><div style="text-align:justify;">बार-बार मरूँ वतन पर यही आरजू है।"_  </div><div style="text-align:justify;">सुबह पाँच बजे दरवाजा खुला। मैं बाहर निकला। फाँसी का तख्ता तैयार था। जेलर ने पूछा, "आखिरी इच्छा?" मैंने कहा, "मेरे शरीर को तिरंगे में लपेट देना। और हाँ, मेरे मरने के बाद मेरी कविताएँ मत जलाना।" फंदा मेरे गले में डाला गया। मैंने ऊपर देखा। आसमान साफ था। और मेरे मुँह से निकला:  </div><div style="text-align:justify;">_"देश हित पैदा हुए हैं, देश पर मर जाएंगे।  </div><div style="text-align:justify;">मरते-मरते देश को ज़िंदा मगर कर जाएंगे।"_  </div><div style="text-align:justify;">धड़ाम की आवाज़ आई। और सब शांत हो गया। उसी दिन अशफाक, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी भी फाँसी पर चढ़े। चार नौजवान। चार धर्म। एक मकसद।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हमारी फाँसी ने हिंदुस्तान को झकझोर दिया। अखबारों में लिखा गया, "चार नौजवान, चार धर्म, एक मकसद"। हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बन गई हमारी फाँसी। काकोरी के बाद क्रांति की आग और भड़क गई। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाई। भगत सिंह कहते थे, "बिस्मिल का खून बेकार नहीं जाएगा।" उन्होंने "मेरा रंग दे बसंती चोला" को अपना नारा बनाया। लाहौर षड्यंत्र केस में फाँसी से पहले वही गीत गाया था। 1947 में जब आज़ादी मिली, तो नेहरू ने लाल किले से कहा था कि आज़ादी में उन अनाम शहीदों का खून शामिल है जिनके नाम इतिहास में नहीं लिखे गए। मेरा नाम लिखा गया। पर मैं अनाम रहना पसंद करता। क्योंकि क्रांति किसी एक नाम से नहीं होती।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज 2025 है। हिंदुस्तान आज़ाद है। पर मैं देखता हूँ कि तुम लोग आपस में लड़ रहे हो। हिंदू-मुस्लिम, जाति-धर्म, भाषा-प्रांत। अशफाक और मैं अगर आज ज़िंदा होते, तो हमारा पहला काम ये होता कि तुम्हें समझाते। दुश्मन बाहर नहीं, अंदर है। नफरत ही असली अंग्रेज है। मेरी कविता याद रखो:  </div><div style="text-align:justify;">_"देश हित पैदा हुए हैं, देश पर मर जाएंगे।"_  </div><div style="text-align:justify;">देश हित मतलब सिर्फ सीमा पर लड़ना नहीं। देश हित मतलब भूखे को खाना खिलाना, बीमार का इलाज करना, लड़की को पढ़ाना। अगर तुम ऐसा करोगे, तो मेरी फाँसी बेकार नहीं जाएगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">काकोरी कांड में हमने आठ हजार रुपये लूटे थे। पर जो हमने लूटा वो पैसा नहीं था। हमने अंग्रेजों का डर लूटा था। हमने नौजवानों का खौफ तोड़ा था। हमने साबित किया कि 20-25 साल के लड़के भी साम्राज्य को चुनौती दे सकते हैं। आज तुम मोबाइल चलाते हो, मैं कलम चलाता था। ज़माना बदला है, लेकिन दुश्मन वही है। अन्याय, गरीबी, नफरत। मेरी कलम अब तुम्हारे हाथ में है। लिखो। बोलो। लड़ो। लेकिन याद रखो, बंदूक से पहले दिल जीतना ज़रूरी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जेल में मैंने कई गीत लिखे। कुछ छपे, कुछ खो गए। "सरफरोशी की तमन्ना" तो तुम जानते ही हो। पर एक और गीत था जो मैं अक्सर गाता था:  </div><div style="text-align:justify;">_"वतन पर जो फिदा होगा,  </div><div style="text-align:justify;">अमर वो नौजवान होगा।  </div><div style="text-align:justify;">रहेगा याद दुनिया में,  </div><div style="text-align:justify;">वही बेनामो-निशान होगा।"_  </div><div style="text-align:justify;">मैं चाहता था कि नौजवान डरना छोड़ दे। मरना नहीं, जीना सीखे। पर ऐसे जीना जो गुलामी में न हो। भगत सिंह ने लिखा था कि वो मेरी कविताएँ पढ़कर ही क्रांतिकारी बना। अगर मेरी एक कविता ने भगत सिंह को बना दिया, तो मेरा जीवन सफल है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मैं रामप्रसाद बिस्मिल। शाहजहाँपुर का बेटा। हिंदुस्तान का दीवाना। 30 साल की उम्र में फाँसी पर चढ़ गया। पर मेरे शब्द आज भी ज़िंदा हैं। अगर तुम "सरफरोशी की तमन्ना" गुनगुनाओगे, तो मैं मरा नहीं कहलाऊँगा।  </div><div style="text-align:justify;">_"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,  </div><div style="text-align:justify;">देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-कातिल में है।"_  </div><div style="text-align:justify;">मेरी कहानी खत्म हुई। अब तुम्हारी शुरू होती है। तुम क्या करोगे? क्या तुम भी देश के लिए कुछ करोगे? या सिर्फ इतिहास पढ़कर भूल जाओगे? फैसला तुम्हारा है।</div></div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt"><div class="hp"><br /></div><div class="eqJbab cZD3Qb"><br /></div></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 16:34:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>स्वाधीनता संग्राम में अमर नाम है राम प्रसाद बिस्मिल का</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr"><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वैचारिक चेतना और सशस्त्र क्रांति का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जिसने दमनकारी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलाकर रख दी थी। इस अद्वितीय संगम के सबसे प्रखर प्रतीक पुरुष थे अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल। वे केवल एक निर्भीक सेनानी ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुवादक और बहुभाषाविद भी थे। उनकी कलम से निकले शब्द जहाँ युवाओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधका देते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनके हाथों में थमी पिस्तौल विदेशी शासकों के मन में भय का संचार करती थी। कलम और पिस्तौल का</span></p></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180910/ram-prasad-bismils-immortal-name-in-the-freedom-struggle"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr"><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वैचारिक चेतना और सशस्त्र क्रांति का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जिसने दमनकारी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलाकर रख दी थी। इस अद्वितीय संगम के सबसे प्रखर प्रतीक पुरुष थे अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल। वे केवल एक निर्भीक सेनानी ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुवादक और बहुभाषाविद भी थे। उनकी कलम से निकले शब्द जहाँ युवाओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधका देते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनके हाथों में थमी पिस्तौल विदेशी शासकों के मन में भय का संचार करती थी। कलम और पिस्तौल का ऐसा अद्भुत संतुलन इतिहास में विरला ही देखने को मिलता है। उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति हंसते-हंसते दे दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रवाद का एक ऐसा अनुपम आदर्श स्थापित किया जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस महान क्रांतिकारी का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर नामक नगर में हुआ था। उनके पिता मुरलीधर एक साधारण और स्वाभिमानी व्यक्ति थे जबकि उनकी माता मूलमती धार्मिक और दृढ़ संकल्प वाली महिला थीं। बिस्मिल के व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी माता का प्रभाव सबसे गहरा था जिन्होंने उन्हें सदा सत्य और देशप्रेम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। बचपन में उनकी शिक्षा-दीक्षा स्थानीय स्तर पर हुई जहाँ उन्होंने हिंदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्दू और संस्कृत भाषाओं का गहन अध्ययन किया। वे उर्दू में बिस्मिल उपनाम से कविताएँ लिखते थे जबकि हिंदी में राम और अज्ञात के नाम से उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। किशोरावस्था में स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों और आर्य समाज के सिद्धांतों ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी जिससे उनके भीतर अनुशासन और राष्ट्र सेवा का संकल्प और अधिक सुदृढ़ हो गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की पराधीनता और देशवासियों पर होने वाले अत्याचारों ने उन्हें सक्रिय क्रांति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए विवश कर दिया। वर्ष 1918 में उन्होंने मैनपुरी षड्यंत्र के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी जहाँ उन्होंने युवाओं का एक दल बनाकर देशभक्ति साहित्य का वितरण किया। इसके बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन को एक अधिक संगठित और राष्ट्रव्यापी रूप देने के प्रयास में जुट गए। इसी उद्देश्य से उन्होंने अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान गणतंत्र संघ नामक एक शक्तिशाली क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य लक्ष्य भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाना और एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना था। बिस्मिल इस संगठन के मुख्य रणनीतिकार और सेनापति थे। उनके नेतृत्व में चंद्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ जैसे महान क्रांतिकारियों ने अपनी देशभक्ति का पाठ सीखा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांतिकारी गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने और अस्त्र-शस्त्र खरीदने के लिए धन की अत्यधिक आवश्यकता थी। विदेशी सरकार से धन मांगना असंभव था और देश की गरीब जनता को लूटना क्रांतिकारियों के सिद्धांतों के विरुद्ध था। इसलिए बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की एक अत्यंत साहसिक योजना बनाई। 9 अगस्त 1925 को उनके कुशल नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने लखनऊ के समीप काकोरी नामक स्थान पर सहारनपुर से लखनऊ जा रही एक यात्री रेलगाड़ी को रोककर सरकारी खजाने को अपने नियंत्रण में ले लिया। इस ऐतिहासिक घटना को काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है। इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य को भीतर तक झकझोर दिया और सरकार ने क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। व्यापक धरपकड़ के बाद बिस्मिल सहित कई प्रमुख क्रांतिकारियों को बंदी बना लिया गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कारागार की चारदीवारों के भीतर भी बिस्मिल का हौसला तनिक भी कम नहीं हुआ। उन्होंने बंदीगृह को ही अपनी साधना स्थली बना लिया और वहाँ रहते हुए प्रचुर मात्रा में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा वहीं लिखी जो आज भी भारतीय क्रांतिकारी साहित्य का एक अनमोल रत्न मानी जाती है। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई विदेशी क्रांतिकारी ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद किया और अनेक प्रेरणादायक गीतों की रचना की। कारागार में रहते हुए उन्होंने अपने देशवासियों और विशेष रूप से युवाओं के नाम कई संदेश भेजे जिसमें उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने पर बल दिया। उनके विचार अत्यंत दूरदर्शी थे जो केवल अंग्रेजों को भगाने तक सीमित नहीं थे बल्कि वे एक शोषणमुक्त समाज का निर्माण करना चाहते थे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रिटिश अदालत ने काकोरी घटना का मुख्य सूत्रधार मानते हुए राम प्रसाद बिस्मिल को मृत्युदंड की सजा सुनाई। 19 दिसंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर कारागार में उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। फांसी के चबूतरे की ओर बढ़ते हुए उनके चेहरे पर कोई भय नहीं था बल्कि एक अलौकिक तेज था। उन्होंने हंसते हुए फंदे को चूमा और अपनी मातृभूमि की वंदना करते हुए प्राण त्याग दिए। उनकी अंतिम इच्छा यही थी कि वे बार-बार भारत भूमि पर जन्म लें और तब तक देश की सेवा करते रहें जब तक कि वह पूरी तरह से स्वतंत्र न हो जाए। उनका यह सर्वोच्च बलिदान व्यर्थ नहीं गया और इसने पूरे देश में क्रांति की एक ऐसी लहर पैदा कर दी जिसने अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत को औपनिवेशिक दासता से मुक्ति दिलाई।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राम प्रसाद बिस्मिल का जीवन और उनका कृतित्व इस बात का साक्षात प्रमाण है कि एक सच्चा देशभक्त केवल अस्त्रों से ही नहीं बल्कि अपने विचारों और नैतिक मूल्यों से भी लड़ता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए। आज भले ही वे हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं लेकिन उनकी कविताएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके विचार और उनका अदम्य साहस हर भारतीय के हृदय में सदैव जीवित रहेगा। राष्ट्र निर्माण और देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए उनका जीवन सदैव एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ की भांति हमें प्रेरणा देता रहेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 15:31:52 +0530</pubDate>
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                <title>ऑपरेशन सिंदूर में जवानों की सेवा कर 11 वर्षीय श्रवण सिंह बना देशभक्ति, समर्पण और साहस का अद्भुत प्रतीक</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">जब किसी देश की सीमाओं पर सैनिक दिन-रात पहरा दे रहे होते हैं, तब पूरा राष्ट्र उनके साहस और त्याग के भरोसे निश्चिंत होकर जीवन जीता है। लेकिन कभी-कभी इसी देश की मिट्टी से ऐसे अनमोल रत्न जन्म लेते हैं, जो छोटी-सी उम्र में ही राष्ट्रसेवा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर देते हैं कि पूरा देश गर्व से भर उठता है। पंजाब के फिरोजपुर जिले के ‘चक तारा वाली’ गांव का 11 वर्षीय श्रवण सिंह ऐसा ही एक अद्भुत बालक है, जिसकी देशभक्ति और समर्पण की भावना ने करोड़ों भारतीयों का हृदय जीत लिया है। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178865/11-year-old-shravan-singh-became-a-wonderful-symbol-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/4488d7a01b06f10315418667501c682d17484130177341201_original.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">जब किसी देश की सीमाओं पर सैनिक दिन-रात पहरा दे रहे होते हैं, तब पूरा राष्ट्र उनके साहस और त्याग के भरोसे निश्चिंत होकर जीवन जीता है। लेकिन कभी-कभी इसी देश की मिट्टी से ऐसे अनमोल रत्न जन्म लेते हैं, जो छोटी-सी उम्र में ही राष्ट्रसेवा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर देते हैं कि पूरा देश गर्व से भर उठता है। पंजाब के फिरोजपुर जिले के ‘चक तारा वाली’ गांव का 11 वर्षीय श्रवण सिंह ऐसा ही एक अद्भुत बालक है, जिसकी देशभक्ति और समर्पण की भावना ने करोड़ों भारतीयों का हृदय जीत लिया है। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों और खेलों में खोए रहते हैं, उस उम्र में श्रवण सिंह भारतीय सेना के जवानों की सेवा में स्वयं को समर्पित कर चुका था। उसका हर कदम राष्ट्रभक्ति की उस पवित्र भावना से प्रेरित था, जो किसी साधारण बच्चे में नहीं, बल्कि किसी असाधारण आत्मा में ही दिखाई देती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब भारतीय सेना सीमा पर पूरी मुस्तैदी से डटी हुई थी, तब श्रवण सिंह बिना किसी भय और संकोच के जवानों के बीच पहुंचता रहा। सुबह होते ही वह चाय लेकर खेतों और कच्चे रास्तों से गुजरता हुआ सेना के कैंप तक पहुंच जाता। दोपहर की भीषण गर्मी में वह जवानों के लिए बर्फ लेकर जाता ताकि देश की रक्षा में लगे सैनिकों को थोड़ी राहत मिल सके। शाम के समय वह दूध और लस्सी लेकर फिर कैंप में पहुंच जाता। उसके मन में न कोई डर था, न कोई स्वार्थ। उसके भीतर केवल एक ही भावना थी—देश के वीर जवानों की सेवा करना। यह भावना किसी किताब से नहीं आती, यह राष्ट्रप्रेम की वह आग होती है जो आत्मा में जन्म लेती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रवण सिंह जब जवानों के बीच जाता था तो उनके साथ बड़े गर्व से घूमता और उनकी बंदूक हाथ में लेकर कहता, “मैं भी बड़ा होकर सैनिक बनूंगा।” यह केवल एक मासूम इच्छा नहीं थी, बल्कि उस बालक के हृदय में धधकती देशभक्ति की लौ थी। उसकी आंखों में सेना की वर्दी के प्रति जो सम्मान था, वह बताता है कि भारत की नई पीढ़ी में राष्ट्रप्रेम की भावना कितनी गहरी है। श्रवण के भीतर देश के लिए कुछ कर गुजरने का जो जज्बा दिखाई देता है, वह वास्तव में करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा है।</div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय सेना भी इस नन्हे सिपाही के समर्पण और सेवा भावना से अत्यंत प्रभावित हुई। सेना ने श्रवण को केवल सम्मान ही नहीं दिया, बल्कि उसे अपने परिवार का हिस्सा मानते हुए “गोद” ले लिया। यह किसी भी बच्चे के लिए बहुत बड़ा सम्मान है। सेना ने उसकी शिक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी उठाई। जब जवानों को पता चला कि श्रवण डायबिटीज जैसी बीमारी से जूझ रहा है, तब उन्होंने तुरंत उसकी चिकित्सा की व्यवस्था की। उसकी बेहतर पढ़ाई के लिए प्राइवेट स्कूल में दाखिला कराया गया और आगे की शिक्षा के लिए कपूरथला भेजने का निर्णय लिया गया। यह केवल सहायता नहीं, बल्कि उस देशभक्त बालक के प्रति सेना का प्रेम और सम्मान है।</div>
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<div style="text-align:justify;">श्रवण सिंह की कहानी यह सिद्ध करती है कि देशभक्ति उम्र की मोहताज नहीं होती। केवल 11 वर्ष की उम्र में उसने जो कार्य किया, वह बड़े-बड़े लोगों के लिए भी प्रेरणा बन गया। वह न किसी पुरस्कार के लिए काम कर रहा था, न किसी प्रसिद्धि के लिए। उसके मन में केवल भारत माता के प्रति प्रेम था। यही कारण है कि उसकी सेवा भावना को पूरे देश ने सलाम किया और उसे प्रधानमंत्री बाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।</div>
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<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी श्रवण सिंह की खुलकर प्रशंसा की। बाल पुरस्कार समारोह के दौरान प्रधानमंत्री ने उसके जज्बे को याद करते हुए कहा था कि जिन कपड़ों और चप्पलों में यह बच्चा देश सेवा कर रहा था, उन्हें संभालकर रखा जाए क्योंकि वे इतिहास का हिस्सा हैं। प्रधानमंत्री के ये शब्द केवल तारीफ नहीं थे, बल्कि उस बालक के राष्ट्रप्रेम को दिया गया सर्वोच्च सम्मान थे। देश के प्रधानमंत्री का किसी छोटे बच्चे के समर्पण को इस प्रकार सम्मान देना यह दर्शाता है कि श्रवण का कार्य कितना असाधारण था।</div>
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<div style="text-align:justify;">श्रवण सिंह को देशभर की अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया। कश्मीर से लेकर इंदौर तक उसे बुलाकर सम्मान दिया गया। उसे पहली बार हवाई जहाज में बैठाकर इंदौर ले जाया गया। यह सब उस बच्चे के लिए किसी सपने जैसा था, लेकिन इन सब उपलब्धियों के बाद भी श्रवण के स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया। वह आज भी उसी सादगी और विनम्रता के साथ अपने गांव में रहता है। यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">आईपीएल में पंजाब किंग्स की मालकिन और प्रसिद्ध अभिनेत्री प्रीति जिंटा ने भी श्रवण को मोहाली आमंत्रित किया। वहां उसने उनके साथ बैठकर क्रिकेट मैच देखा। लेकिन श्रवण के लिए सबसे बड़ा गौरव क्रिकेट मैच देखना नहीं, बल्कि भारतीय सेना के जवानों के बीच रहना था। उसके लिए सैनिकों की वर्दी किसी हीरो से कम नहीं थी। यही कारण है कि वह हर समय सेना के प्रति सम्मान और प्रेम से भरा दिखाई देता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">श्रवण के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत साधारण है। उसके पिता सोना सिंह एक छोटे किसान हैं और मां आंगनवाड़ी में काम करती हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद इस परिवार ने अपने बेटे में देशभक्ति और संस्कारों की जो भावना जगाई, वह वास्तव में अनुकरणीय है। श्रवण के माता-पिता को भी यह अंदाजा नहीं था कि उनका छोटा-सा बेटा एक दिन पूरे देश के लिए प्रेरणा बन जाएगा। लेकिन सच्चाई यही है कि महानता कभी साधनों से नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं से जन्म लेती है।</div>
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<div style="text-align:justify;">आज जब समाज में स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ की भावना बढ़ती दिखाई देती है, तब श्रवण सिंह जैसे बच्चे आशा की किरण बनकर सामने आते हैं। वह बताता है कि सच्चा देशप्रेम क्या होता है। देशभक्ति केवल नारों और भाषणों से सिद्ध नहीं होती, बल्कि सेवा, त्याग और समर्पण से प्रकट होती है। श्रवण ने यह साबित कर दिया कि यदि मन में राष्ट्र के प्रति प्रेम हो तो छोटी उम्र भी बड़े कार्य करने से नहीं रोक सकती।</div>
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<div style="text-align:justify;">श्रवण सिंह वास्तव में भारत माता का वह वीर पुत्र है, जिसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी। उसकी आंखों में सैनिक बनने का सपना केवल उसका व्यक्तिगत सपना नहीं, बल्कि राष्ट्र के गौरव का सपना है। वह करोड़ों बच्चों के लिए उदाहरण है कि देश के प्रति प्रेम और सम्मान बचपन से ही जीवन का सबसे बड़ा संस्कार होना चाहिए।</div>
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<div style="text-align:justify;">यह नन्हा सिपाही केवल पंजाब का नहीं, बल्कि पूरे भारत का गौरव बन चुका है। उसकी देशभक्ति, निस्वार्थ सेवा और समर्पण की भावना हर भारतीय के हृदय में राष्ट्रप्रेम की नई ऊर्जा भरती है। श्रवण सिंह जैसे बच्चे ही भारत के भविष्य की असली ताकत हैं, जिनके कारण यह विश्वास और मजबूत होता है कि भारत की आत्मा आज भी देशभक्ति और बलिदान की भावना से ओतप्रोत है।</div>
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<div>  <strong>    *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 May 2026 15:59:08 +0530</pubDate>
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