<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.swatantraprabhat.com/tag/88104/family-and-children" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Swatantra Prabhat RSS Feed Generator</generator>
                <title>परिवार और बच्चे - Swatantra Prabhat</title>
                <link>https://www.swatantraprabhat.com/tag/88104/rss</link>
                <description>परिवार और बच्चे RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>स्वयं को 'फ्री' रखने के लिए बच्चों को मोबाइल सौंपते माता-पिता</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लेखक:प्रो (डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">​बच्चे और माता-पिता का संबंध केवल जैविक नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और मार्गदर्शन का जीवंत सूत्र है। भारतीय संस्कृति में माता-पिता को बच्चे का प्रथम गुरु माना गया है, जो उन्हें न केवल चलना-बोलना बल्कि जीवन-मूल्य और सामाजिक उत्तरदायित्व भी सिखाते हैं। बच्चों के सर्वांगीण विकास में अभिभावकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।</div>
<div style="text-align:justify;">​एक स्वस्थ परिवार वही है जहाँ बच्चों को स्नेह, संवाद और अपनों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय मिले। किंतु आधुनिक जीवनशैली, करियर की अंधी दौड़ और तकनीक पर बढ़ती निर्भरता ने इन संबंधों को बदल दिया है। आज अधिकांश माता-पिता के पास समय</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178856/parents-handing-over-mobile-phones-to-children-to-keep-themselves"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images7.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>लेखक:प्रो (डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​बच्चे और माता-पिता का संबंध केवल जैविक नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और मार्गदर्शन का जीवंत सूत्र है। भारतीय संस्कृति में माता-पिता को बच्चे का प्रथम गुरु माना गया है, जो उन्हें न केवल चलना-बोलना बल्कि जीवन-मूल्य और सामाजिक उत्तरदायित्व भी सिखाते हैं। बच्चों के सर्वांगीण विकास में अभिभावकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।</div>
<div style="text-align:justify;">​एक स्वस्थ परिवार वही है जहाँ बच्चों को स्नेह, संवाद और अपनों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय मिले। किंतु आधुनिक जीवनशैली, करियर की अंधी दौड़ और तकनीक पर बढ़ती निर्भरता ने इन संबंधों को बदल दिया है। आज अधिकांश माता-पिता के पास समय का अभाव है। इसकी भरपाई के लिए वे बच्चों को मोबाइल, टीवी या टैबलेट उपलब्ध करा देते हैं ताकि वे स्वयं को “फ्री” रख सकें। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि बच्चा रोए, जिद करे या खाना न खाए, समाधान के रूप में उसके हाथ में मोबाइल थमा दिया जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;">​यह केवल तकनीक का उपयोग नहीं, बल्कि पालन-पोषण की बदलती मानसिकता का संकेत है। आज का समाज व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आर्थिक प्रतिस्पर्धा पर अधिक ध्यान दे रहा है। परिणामस्वरूप, संयुक्त परिवारों का स्थान डिजिटल स्क्रीन और झूलाघरों  ने ले लिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डालता है। इससे उनकी एकाग्रता और स्मरण शक्ति  घटती है, भाषा विकास धीमा होता है और चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">​बचपन, जो कभी खेल, प्रकृति और किस्सों का समय होता था, अब स्क्रीन तक सिमट गया है। बच्चे मैदानों और पारिवारिक सानिध्य से दूर होकर आभासी दुनिया में अकेले होते जा रहे हैं। शारीरिक स्तर पर भी कम उम्र में आँखों की कमजोरी, मोटापा और नींद के विकार बढ़ रहे हैं। इंटरनेट पर अनियंत्रित सामग्री और हिंसक खेलों की लत बच्चों को अवसाद की ओर धकेल रही है।</div>
<div style="text-align:justify;">​पालन-पोषण का अर्थ केवल अच्छी सुविधाएँ देना नहीं, बल्कि बच्चों के मन की दुनिया को समझना है। माता-पिता के साथ किया गया संवाद बच्चों में आत्मविश्वास और सुरक्षा का भाव पैदा करता है। आज दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है। बच्चों को गैजेट्स के बजाय पुस्तकों, बागवानी, योग और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना चाहिए। परिवार के साथ भोजन करना और घर के बड़े-बुजुर्गों के साथ समय बिताना उनके व्यक्तित्व को गढ़ने में सहायक होगा।</div>
<div style="text-align:justify;">​तकनीक शिक्षा के लिए उपयोगी हो सकती है, किंतु यह माता-पिता के स्नेह का विकल्प नहीं है। यदि आज हम बच्चों को समय और संस्कार देंगे, तभी वे भविष्य में जिम्मेदार नागरिक बन पाएंगे। वास्तव में बच्चों को महंगे गैजेट्स की नहीं, बल्कि माता-पिता के साथ और प्यार की आवश्यकता होती है।</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/178856/parents-handing-over-mobile-phones-to-children-to-keep-themselves</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/178856/parents-handing-over-mobile-phones-to-children-to-keep-themselves</guid>
                <pubDate>Sun, 10 May 2026 13:22:47 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-05/images7.jpg"                         length="8894"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        