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                <title>कांतिलाल मांडोत - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>कांतिलाल मांडोत RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>ऑपरेशन मिलाप : बिछड़ों को अपनों से मिलाने का मानवीय अभियान, परिवारों के आंसुओं में लौटी खुशियों की रोशनी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">किसी घर का बेटा, बेटी, बहन, भाई या माता-पिता अचानक लापता हो जाएं तो उस परिवार पर क्या गुजरती है, इसका अंदाजा वही लगा सकता है जिसने इस पीड़ा को करीब से महसूस किया हो। गुमशुदगी केवल किसी व्यक्ति का घर से दूर हो जाना नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार की खुशियों, उम्मीदों और मानसिक शांति के खो जाने जैसा होता है। हर गुजरते दिन के साथ परिजनों की चिंता बढ़ती जाती है। हर दरवाजे की आहट उन्हें उम्मीद देती है कि शायद उनका अपना लौट आया हो। हर फोन कॉल उन्हें चौंका देती है। ऐसे में जब वर्षों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181002/operation-milap-a-humanitarian-campaign-to-reunite-separated-people-with"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/delhi-police.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">किसी घर का बेटा, बेटी, बहन, भाई या माता-पिता अचानक लापता हो जाएं तो उस परिवार पर क्या गुजरती है, इसका अंदाजा वही लगा सकता है जिसने इस पीड़ा को करीब से महसूस किया हो। गुमशुदगी केवल किसी व्यक्ति का घर से दूर हो जाना नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार की खुशियों, उम्मीदों और मानसिक शांति के खो जाने जैसा होता है। हर गुजरते दिन के साथ परिजनों की चिंता बढ़ती जाती है। हर दरवाजे की आहट उन्हें उम्मीद देती है कि शायद उनका अपना लौट आया हो। हर फोन कॉल उन्हें चौंका देती है। ऐसे में जब वर्षों या महीनों से बिछड़ा कोई व्यक्ति अचानक परिवार से मिल जाता है तो वह क्षण किसी चमत्कार से कम नहीं होता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">गुजरात पुलिस द्वारा चलाया गया “ऑपरेशन मिलाप” इसी मानवीय संवेदना का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर सामने आया है। इस विशेष अभियान के अंतर्गत मात्र एक महीने में 1470 गुमशुदा व्यक्तियों को खोजकर उनके परिवारों से मिलाया गया। यह केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि हजारों टूटते हुए परिवारों के जीवन में आशा, विश्वास और खुशियों की वापसी का अभियान है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस अभियान में 852 महिलाओं, 342 पुरुषों तथा 276 नाबालिग बच्चों और किशोरियों को खोजकर उनके परिजनों तक पहुंचाया गया। विशेष रूप से यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि बड़ी संख्या में किशोरियां और महिलाएं अपने परिवारों से बिछड़ गई थीं। ऐसे मामलों में समय के साथ परिवारों की चिंता कई गुना बढ़ जाती है। उन्हें हर पल किसी अनहोनी की आशंका सताती रहती है। ऐसे में पुलिस द्वारा इन लोगों को सुरक्षित ढूंढ़ निकालना निश्चित रूप से सराहनीय कार्य है।</div><div style="text-align:justify;">गुजरात पुलिस ने केवल औपचारिक जांच तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि पुराने और लंबित मामलों को दोबारा खोलकर नए सिरे से जांच की। आधुनिक तकनीक, मोबाइल फोन विश्लेषण, सोशल मीडिया गतिविधियों की निगरानी, विभिन्न राज्यों की पुलिस के साथ समन्वय, सार्वजनिक परिवहन केंद्रों और आश्रय गृहों की जांच जैसे अनेक माध्यमों का उपयोग किया गया। शिकायतकर्ताओं और गवाहों से दोबारा संपर्क कर नए सुराग जुटाए गए। यह दर्शाता है कि यदि इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता हो तो वर्षों पुराने मामलों में भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।</div><div style="text-align:justify;">सूरत पुलिस द्वारा सर्वाधिक 341 गुमशुदा व्यक्तियों का पता लगाना भी इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय स्तर पर समर्पित प्रयास किस प्रकार बड़े परिणाम दे सकते हैं। पुलिस और प्रशासन की यह सक्रियता उन परिवारों के लिए राहत का कारण बनी है जो वर्षों से अपने प्रियजनों की प्रतीक्षा में दिन गिन रहे थे।</div><div style="text-align:justify;">इस अभियान का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे समाज के सामने गुमशुदगी के वास्तविक कारण भी उजागर हुए हैं। पुलिस के विश्लेषण में सामने आया कि 14 से 17 वर्ष की आयु वर्ग की अनेक किशोरियां प्रेम संबंधों, पारिवारिक विवादों, अभिभावकों की डांट-फटकार अथवा पढ़ाई में असफलता जैसी परिस्थितियों के कारण घर छोड़कर चली गई थीं। कुछ मामले रोजगार की तलाश में पलायन करने वाले परिवारों से भी जुड़े पाए गए।</div><div style="text-align:justify;">यहां एक गंभीर सामाजिक संदेश छिपा हुआ है। जीवन में कठिनाइयां, असफलताएं, पारिवारिक मतभेद या भावनात्मक उलझनें आना स्वाभाविक है। किशोरावस्था में भावनाएं अधिक संवेदनशील होती हैं और कई बार छोटी घटनाएं भी बहुत बड़ी लगने लगती हैं। लेकिन घर छोड़ देना किसी समस्या का समाधान नहीं है। यह निर्णय क्षणिक आवेश में लिया जा सकता है, पर उसके परिणाम बहुत गंभीर होते हैं।</div><div style="text-align:justify;">कई बार बच्चों और किशोरों को लगता है कि उनके जाने से परिवार को कोई फर्क नहीं पड़ेगा या कुछ दिनों बाद सब सामान्य हो जाएगा। वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत होती है। जिस दिन कोई बच्चा या किशोर घर से लापता होता है, उसी दिन से उसके माता-पिता का चैन और नींद समाप्त हो जाती है। मां की आंखें दरवाजे पर लगी रहती हैं। पिता बाहर से मजबूत दिखने का प्रयास करता है, लेकिन भीतर से टूट चुका होता है। भाई-बहन चिंता और असुरक्षा के बीच जीते हैं। पूरा परिवार हर संभावित स्थान पर तलाश करता है, पुलिस थानों के चक्कर लगाता है और अनिश्चितता के अंधेरे में जीवन बिताता है।</div><div style="text-align:justify;">गुमशुदगी का दर्द केवल भावनात्मक नहीं होता, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी परिवारों को प्रभावित करता है। अनेक परिवार अपनी बचत तक खर्च कर देते हैं। कई लोग कामकाज छोड़कर अपने प्रियजन की तलाश में जुट जाते हैं। मानसिक तनाव के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी उत्पन्न होने लगती हैं। इसलिए किसी भी परिस्थिति में घर छोड़कर चले जाना न तो समझदारी है और न ही समस्याओं का समाधान।</div><div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता इस बात की है कि परिवारों और बच्चों के बीच संवाद को मजबूत बनाया जाए। अभिभावक बच्चों की भावनाओं को समझें और बच्चे अपने माता-पिता पर विश्वास करें। यदि पढ़ाई में असफलता मिली है, किसी बात पर डांट पड़ी है या जीवन में कोई परेशानी आई है, तो उसका समाधान बातचीत से निकाला जा सकता है। परिवार ही वह स्थान है जहां व्यक्ति को सबसे अधिक सुरक्षा, प्रेम और सहयोग मिलता है।</div><div style="text-align:justify;">ऑपरेशन मिलाप की सफलता केवल आंकड़ों में नहीं मापी जा सकती। इसकी वास्तविक सफलता उन हजारों मुस्कानों में दिखाई देती है जो बिछड़ने के बाद फिर से लौट आईं। उन माताओं की आंखों में दिखाई देती है जिन्होंने वर्षों बाद अपने बच्चों को गले लगाया। उन परिवारों की खुशी में दिखाई देती है जिनकी उम्मीदें लगभग समाप्त हो चुकी थीं।</div><div style="text-align:justify;">यह अभियान यह भी सिद्ध करता है कि पुलिस केवल कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली संस्था नहीं है, बल्कि समाज के दुख-दर्द में सहभागी बनने वाली संवेदनशील व्यवस्था भी है। जब पुलिस किसी गुमशुदा व्यक्ति को उसके परिवार तक पहुंचाती है, तब वह केवल एक केस बंद नहीं करती बल्कि एक टूटे हुए परिवार को फिर से जोड़ती है।</div><div style="text-align:justify;">ऑपरेशन मिलाप ने हजारों परिवारों को नई जिंदगी दी है। यह अभियान मानवता, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का उत्कृष्ट उदाहरण है। साथ ही यह हम सभी को यह संदेश भी देता है कि जीवन की किसी भी कठिन परिस्थिति में घर और परिवार से दूर जाना समाधान नहीं है। संवाद, धैर्य और विश्वास ही हर समस्या का सबसे मजबूत उत्तर हैं। यदि यह संदेश समाज के प्रत्येक बच्चे और किशोर तक पहुंच जाए तो शायद भविष्य में अनेक परिवार गुमशुदगी की उस पीड़ा से बच सकेंगे, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं है।</div><div style="text-align:justify;">       </div><div style="text-align:justify;"><strong><br /></strong></div><div style="text-align:justify;"><strong>                                                                           *कांतिलाल मांडोत*</strong></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 18:35:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>दिल्ली फिर शर्मसार : निर्भया के बाद भी क्यों नहीं थम रही महिलाओं के खिलाफ दरिंदगी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर ऐसी अमानवीय घटना की गवाह बनी, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। चलती बस में एक महिला के साथ गैंगरेप की घटना ने लोगों को वर्ष 2012 के बहुचर्चित निर्भया कांड की भयावह यादें ताजा कर दीं। यह केवल एक अपराध नहीं, बल्कि समाज की संवेदनहीनता, कानून व्यवस्था की कमजोरी और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर किए जा रहे दावों पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। राजधानी की सड़कों पर सात किलोमीटर तक चलती रही दरिंदगी यह बताने के लिए पर्याप्त है कि आज भी महिलाएं पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारत आज</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/179458/why-is-cruelty-against-women-not-stopping-even-after-delhis"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/1001540406.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर ऐसी अमानवीय घटना की गवाह बनी, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। चलती बस में एक महिला के साथ गैंगरेप की घटना ने लोगों को वर्ष 2012 के बहुचर्चित निर्भया कांड की भयावह यादें ताजा कर दीं। यह केवल एक अपराध नहीं, बल्कि समाज की संवेदनहीनता, कानून व्यवस्था की कमजोरी और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर किए जा रहे दावों पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। राजधानी की सड़कों पर सात किलोमीटर तक चलती रही दरिंदगी यह बताने के लिए पर्याप्त है कि आज भी महिलाएं पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत आज विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और विकास के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। महिलाएं अंतरिक्ष से लेकर सेना तक, प्रशासन से लेकर उद्योग जगत तक हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं। देश की बेटियां लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, सीमा पर देश की रक्षा कर रही हैं, बुलेट ट्रेन और मेट्रो चला रही हैं, बड़े-बड़े पदों पर कार्य कर रही हैं। इसके बावजूद यदि एक महिला रात में सुरक्षित घर नहीं लौट सकती, तो यह विकास अधूरा है। किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से होती है। यदि वहां महिलाओं के साथ भय, हिंसा और अत्याचार जुड़ा हो, तो वह समाज आधुनिक नहीं कहलाया जा सकता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दिल्ली में हुई यह घटना केवल अपराधियों की विकृत मानसिकता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक सोच को भी उजागर करती है, जिसमें महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने में अभी भी संकोच दिखाई देता है। आज भी कई लोग महिलाओं की स्वतंत्रता, पहनावे और जीवनशैली को अपराधों से जोड़ने की कोशिश करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि अपराध का कारण महिला नहीं, बल्कि अपराधी की मानसिकता होती है। जब तक समाज लड़कियों को सम्मान और लड़कों को संस्कार देने की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं करेगा, तब तक ऐसी घटनाएं रुकना कठिन है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी दुखद है कि हर बड़ी घटना के बाद कुछ दिनों तक देश में आक्रोश दिखाई देता है, मोमबत्तियां जलाई जाती हैं, सोशल मीडिया पर अभियान चलाए जाते हैं, राजनीतिक बयान दिए जाते हैं, लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है। अपराधी कुछ समय बाद कानून की प्रक्रियाओं का लाभ उठाने लगते हैं और पीड़िता न्याय के लिए वर्षों तक संघर्ष करती रहती है। यही कारण है कि अपराधियों में कानून का भय कम होता जा रहा है। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में तेजी से और कठोर कार्रवाई आवश्यक है, ताकि समाज में स्पष्ट संदेश जाए कि ऐसी मानसिकता और अपराध के लिए कोई जगह नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दिल्ली की इस घटना का सबसे मार्मिक पक्ष पीड़िता की मजबूरी है। अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी उसने इलाज छोड़कर घर लौटना उचित समझा, क्योंकि उसके बीमार पति और छोटे बच्चों की जिम्मेदारी उसी पर थी। यह केवल एक महिला की कहानी नहीं, बल्कि देश की उन लाखों महिलाओं की सच्चाई है, जो अत्याचार सहने के बाद भी परिवार की जिम्मेदारियों के कारण टूट नहीं सकतीं। यह स्थिति हमारे सामाजिक ढांचे की भी पोल खोलती है, जहां पीड़िता को पर्याप्त सुरक्षा, आर्थिक सहायता और मानसिक सहारा नहीं मिल पाता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून बनाने से सुनिश्चित नहीं हो सकती। इसके लिए समाज, परिवार, प्रशासन और सरकार सभी को मिलकर कार्य करना होगा। सबसे पहले बच्चों को बचपन से ही महिलाओं के प्रति सम्मान की शिक्षा देनी होगी। स्कूलों और कॉलेजों में नैतिक शिक्षा तथा संवेदनशीलता को बढ़ावा देना होगा। इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में युवाओं के सामने जो सामग्री परोसी जा रही है, उसका भी मानसिकता पर प्रभाव पड़ता है। अश्लीलता, हिंसा और महिलाओं को वस्तु की तरह प्रस्तुत करने वाली प्रवृत्तियों पर रोक लगाने की आवश्यकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार को भी महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को अधिक सुरक्षित बनाना समय की मांग है। बसों, टैक्सियों और अन्य वाहनों की नियमित जांच होनी चाहिए। जिन वाहनों पर नियमों के उल्लंघन के मामले दर्ज हों, उन्हें सड़कों पर चलने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। दिल्ली की घटना में जिस बस का उपयोग हुआ, वह पहले से नियमों के उल्लंघन के कारण कार्रवाई का सामना कर चुकी थी। यदि समय रहते कठोर निगरानी होती, तो शायद यह घटना टाली जा सकती थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुलिस व्यवस्था को और अधिक सक्रिय और संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है। महिलाओं की शिकायतों को गंभीरता से सुनना और तुरंत कार्रवाई करना बेहद जरूरी है। कई बार पीड़िताएं सामाजिक भय और पुलिस के व्यवहार के कारण शिकायत दर्ज कराने से भी डरती हैं। यदि उन्हें भरोसा और सम्मान मिले, तो अपराधों की रोकथाम में मदद मिल सकती है। शहरों में सीसीटीवी कैमरों, हेल्पलाइन और महिला पेट्रोलिंग जैसी व्यवस्थाओं को और मजबूत करना होगा।</div>
<div style="text-align:justify;">समाज में बढ़ती संवेदनहीनता भी चिंता का विषय है। लोग घटनाओं को केवल खबर की तरह पढ़ते हैं और कुछ समय बाद भूल जाते हैं। जबकि आवश्यकता इस बात की है कि हर नागरिक महिलाओं की सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी समझे। यदि कहीं कोई महिला संकट में दिखाई दे, तो लोग आगे आकर मदद करें। चुप रहना भी अपराध को बढ़ावा देने जैसा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता केवल आक्रोश व्यक्त करने की नहीं, बल्कि स्थायी समाधान खोजने की है। देश की बेटियों को डर के साए में जीने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। महिलाओं की सुरक्षा केवल महिला का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के सम्मान का प्रश्न है। जब तक हर महिला बिना भय के घर से निकलकर सुरक्षित वापस लौटने का विश्वास महसूस नहीं करेगी, तब तक हमारा विकास अधूरा रहेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">निर्भया कांड के बाद देश ने बहुत कुछ सीखा, कानून बदले, जागरूकता बढ़ी, लेकिन यदि आज भी ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, तो यह आत्ममंथन का समय है। अपराधियों को कठोरतम सजा मिलनी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों के सामने एक उदाहरण स्थापित हो सके। साथ ही समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। महिलाओं का सम्मान केवल भाषणों और नारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि व्यवहार और व्यवस्था में दिखाई देना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;">भारत तभी सच्चे अर्थों में विकसित और सभ्य राष्ट्र कहलाएगा, जब उसकी हर बेटी सुरक्षित, सम्मानित और निर्भय होकर जीवन जी सकेगी।</div>
<div style="text-align:justify;">        <strong> *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 May 2026 17:16:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>बदले की राजनीति और बंगाल का बदलाव</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय तक वैचारिक संघर्ष, सांस्कृतिक चेतना और जन आंदोलनों के लिए जानी जाती रही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य की राजनीति पर भ्रष्टाचार, राजनीतिक प्रतिशोध, तुष्टिकरण, हिंसा और प्रशासनिक दुरुपयोग के आरोप लगातार गहराते गए। तृणमूल कांग्रेस और उसकी प्रमुख ममता बनर्जी पर यह आरोप लगते रहे कि उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों की जगह राजनीतिक बदले की भावना को अधिक महत्व दिया। यही कारण है कि बंगाल की राजनीति में एक बड़े परिवर्तन की मांग लगातार तेज होती गई।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">शारदा और रोजवैली चिटफंड घोटालों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को गहरे संकट में डाल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178848/politics-of-revenge-and-change-of-bengal"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/rajneeti1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय तक वैचारिक संघर्ष, सांस्कृतिक चेतना और जन आंदोलनों के लिए जानी जाती रही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य की राजनीति पर भ्रष्टाचार, राजनीतिक प्रतिशोध, तुष्टिकरण, हिंसा और प्रशासनिक दुरुपयोग के आरोप लगातार गहराते गए। तृणमूल कांग्रेस और उसकी प्रमुख ममता बनर्जी पर यह आरोप लगते रहे कि उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों की जगह राजनीतिक बदले की भावना को अधिक महत्व दिया। यही कारण है कि बंगाल की राजनीति में एक बड़े परिवर्तन की मांग लगातार तेज होती गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शारदा और रोजवैली चिटफंड घोटालों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को गहरे संकट में डाल दिया। इन मामलों में जिन नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों के नाम सामने आए, उनमें अधिकांश का संबंध सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस से बताया गया। विपक्ष का आरोप था कि राज्य सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने के बजाय जांच एजेंसियों पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए। ममता बनर्जी लगातार केंद्र सरकार और सीबीआई पर राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप लगाती रहीं। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेताओं को बचाने का प्रयास कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपों ने उस समय और जोर पकड़ा जब भाजपा नेताओं के खिलाफ विभिन्न मामलों में कार्रवाई शुरू हुई। तत्कालीन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राहुल सिन्हा को कथित रूप से पशु तस्करी के मामले में फंसाने की कोशिश की घटना ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया। राहुल सिन्हा का दावा था कि पुलिसकर्मी निजी व्यक्ति बनकर उनके संपर्क में आए और उन्हें अवैध गतिविधियों में शामिल दिखाने का प्रयास किया। इस घटना के बाद भाजपा ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करने और झूठे मामलों में फंसाने के लिए सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी प्रकार भाजपा नेता जयप्रकाश मजूमदार की गिरफ्तारी और भाजपा महिला मोर्चा की नेता जूही चौधरी पर लगाए गए आरोपों को भी विपक्ष ने राजनीतिक षड्यंत्र बताया। शिशु तस्करी जैसे गंभीर मामले में केवल आरोपों के आधार पर भाजपा नेताओं के नाम सामने आने से राजनीतिक विवाद और बढ़ गया। भाजपा नेताओं का कहना था कि बिना ठोस साक्ष्यों के केवल बयानबाजी के आधार पर कार्रवाई की जा रही है। इससे आम जनता के बीच यह संदेश गया कि राज्य की एजेंसियां निष्पक्षता के बजाय राजनीतिक दबाव में काम कर रही हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में लंबे समय से कानून व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठते रहे हैं। चुनावी हिंसा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्याएं और विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं पर हमलों की घटनाएं लगातार चर्चा में रहीं। भाजपा ने आरोप लगाया कि राज्य में लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन किया जा रहा है और विपक्ष को खुलकर काम नहीं करने दिया जा रहा। इससे आम मतदाताओं में असुरक्षा और असंतोष की भावना बढ़ी।</div>
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<div style="text-align:justify;">तुष्टिकरण की राजनीति भी पश्चिम बंगाल में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनी। भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार वोट बैंक की राजनीति के लिए एक विशेष वर्ग को खुश करने में लगी रही, जबकि सामान्य जनता की समस्याओं की अनदेखी हुई। दुर्गा पूजा विसर्जन, रामनवमी यात्राओं और धार्मिक आयोजनों को लेकर समय-समय पर हुए विवादों ने इस बहस को और तेज किया। विपक्ष ने इसे सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा बनाया।</div>
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<div style="text-align:justify;">बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा भी बंगाल की राजनीति में प्रमुखता से उभरा। सीमावर्ती जिलों में अवैध घुसपैठ और उससे बदलते जनसांख्यिकीय संतुलन को लेकर लगातार चिंता व्यक्त की जाती रही। भाजपा ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा विषय बताया। विपक्ष का आरोप था कि राजनीतिक लाभ के लिए राज्य सरकार इस समस्या को नजरअंदाज करती रही। यही कारण रहा कि नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जैसे मुद्दों पर बंगाल में तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली।</div>
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<div style="text-align:justify;">भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी तृणमूल सरकार की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया। शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी, पशु तस्करी और विभिन्न आर्थिक अनियमितताओं के मामलों ने जनता के बीच सरकार की विश्वसनीयता को कमजोर किया। शिक्षित युवाओं में यह भावना बढ़ी कि रोजगार और सरकारी नियुक्तियों में पारदर्शिता समाप्त हो रही है। जब बेरोजगार युवा सड़कों पर आंदोलन कर रहे थे, तब सरकार पर आरोप लगा कि वह समस्याओं के समाधान के बजाय विरोध दबाने में अधिक रुचि रखती है।</div>
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<div style="text-align:justify;">ममता बनर्जी की राजनीतिक शैली भी लगातार विवादों में रही। विपक्ष का आरोप था कि वे आलोचना को सहन नहीं करतीं और विरोधियों के खिलाफ आक्रामक रवैया अपनाती हैं। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी राजनीति में संघर्ष और टकराव का तत्व अधिक दिखाई देता है। यही कारण है कि समय के साथ बंगाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता गया।</div>
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<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर भाजपा ने बंगाल में खुद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सनातन परंपरा और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों से जोड़कर प्रस्तुत किया। पार्टी ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को बचाने और भ्रष्टाचार मुक्त शासन स्थापित करने के लिए राजनीतिक परिवर्तन आवश्यक है। रामनवमी, दुर्गा पूजा और बंगाल की पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत को भाजपा ने अपने अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाया। इससे बड़ी संख्या में युवा और शहरी मतदाता भाजपा की ओर आकर्षित हुए।</div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की मांग केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक असंतोष का भी परिणाम थी। जनता का एक वर्ग मानने लगा था कि राज्य को हिंसा, भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की राजनीति से बाहर निकालकर विकास, पारदर्शिता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की दिशा में ले जाने की आवश्यकता है। इसी सोच ने बंगाल की राजनीति में बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार की।</div>
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<div style="text-align:justify;">आज पश्चिम बंगाल का राजनीतिक संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे विचारधारा, सांस्कृतिक पहचान और प्रशासनिक पारदर्शिता की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि बंगाल किस दिशा में आगे बढ़ता है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि राज्य की जनता अब केवल नारों से संतुष्ट नहीं है। वह सुशासन, सुरक्षा, रोजगार और सांस्कृतिक सम्मान की अपेक्षा रखती है। यही अपेक्षाएं पश्चिम बंगाल की राजनीति का भविष्य तय करेंगी।</div>
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<div style="text-align:justify;">            <strong>*कांतिलाल मांडोत*</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Sun, 10 May 2026 13:06:32 +0530</pubDate>
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