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                <title>jawaharlal nehru - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>जब तिरंगा बना भारत की पहचान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस भारतीय इतिहास का एक ऐसा गौरवपूर्ण अवसर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हमें स्वतंत्रता संग्राम की महान विरासत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की याद दिलाता है। प्रत्येक वर्ष </span>22<span lang="hi" xml:lang="hi">  जुलाई को मनाया जाने वाला यह दिवस उस ऐतिहासिक निर्णय का स्मरण कराता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब </span>22<span lang="hi" xml:lang="hi">  जुलाई </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi">  को संविधान सभा ने भारत के वर्तमान तिरंगे को स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में औपचारिक रूप से स्वीकार किया। यह निर्णय केवल एक ध्वज के चयन तक सीमित नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक ऐसे राष्ट्र की सामूहिक चेतना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मसम्मान और भविष्य की</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183898/when-the-tricolor-became-the-identity-of-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/indian-flag-detail.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस भारतीय इतिहास का एक ऐसा गौरवपूर्ण अवसर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हमें स्वतंत्रता संग्राम की महान विरासत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की याद दिलाता है। प्रत्येक वर्ष </span>22<span lang="hi" xml:lang="hi"> जुलाई को मनाया जाने वाला यह दिवस उस ऐतिहासिक निर्णय का स्मरण कराता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब </span>22<span lang="hi" xml:lang="hi"> जुलाई </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> को संविधान सभा ने भारत के वर्तमान तिरंगे को स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में औपचारिक रूप से स्वीकार किया। यह निर्णय केवल एक ध्वज के चयन तक सीमित नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक ऐसे राष्ट्र की सामूहिक चेतना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मसम्मान और भविष्य की दिशा का उद्घोष था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सदियों की दासता के बाद स्वतंत्रता की दहलीज पर खड़ा था। इस अवसर पर संविधान सभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय ध्वज संबंधी प्रस्ताव प्रस्तुत किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। इसके साथ ही भारत को ऐसा राष्ट्रीय प्रतीक मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो आज भी करोड़ों भारतीयों की आशाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकांक्षाओं और राष्ट्रीय गौरव का प्रतिनिधित्व करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी राष्ट्र का ध्वज केवल रंगों से बना हुआ वस्त्र नहीं होता। वह उस देश के इतिहास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल्यों और भविष्य की आकांक्षाओं का जीवंत प्रतीक होता है। जब कोई नागरिक अपने राष्ट्रीय ध्वज को सम्मानपूर्वक देखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके मन में स्वाभाविक रूप से अपने देश के प्रति प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान और समर्पण का भाव जागृत होता है। भारत का तिरंगा भी इसी भावना का प्रतीक है। यह हमें बताता है कि हमारी पहचान केवल किसी क्षेत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाति या धर्म से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक राष्ट्र के नागरिक होने से है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का राष्ट्रीय ध्वज तीन समान क्षैतिज पट्टियों से बना है। सबसे ऊपर गहरा केसरिया रंग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो साहस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक माना जाता है। मध्य में सफेद रंग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शांति और पारदर्शिता का संदेश देता है। सबसे नीचे हरा रंग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकास और जीवन की निरंतरता का प्रतीक है। सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का अशोक चक्र अंकित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें चौबीस तीलियां हैं। यह चक्र सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ के धर्मचक्र से प्रेरित है। अशोक चक्र निरंतर गति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्तव्य और प्रगतिशील जीवन का संदेश देता है। इसका अर्थ यह है कि कोई भी राष्ट्र तभी आगे बढ़ सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वह निरंतर कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नैतिकता और विकास के मार्ग पर चलता रहे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तिरंगे का वर्तमान स्वरूप एक लंबी ऐतिहासिक यात्रा का परिणाम है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अनेक प्रकार के राष्ट्रीय ध्वज प्रस्तावित किए गए। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में कई क्रांतिकारियों और राष्ट्रवादियों ने ऐसे ध्वज तैयार किए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो भारत की स्वतंत्रता की आकांक्षा को व्यक्त करते थे। वर्ष </span>1921<span lang="hi" xml:lang="hi"> में आंध्र प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया ने महात्मा गांधी के समक्ष एक ध्वज का प्रारूप प्रस्तुत किया। समय के साथ उसमें परिवर्तन हुए। वर्ष </span>1931<span lang="hi" xml:lang="hi"> में कांग्रेस ने एक तिरंगे ध्वज को स्वीकार किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें मध्य में चरखा था। यही ध्वज आगे चलकर स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज का आधार बना। </span>22<span lang="hi" xml:lang="hi"> जुलाई </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> को संविधान सभा ने निर्णय लिया कि चरखे के स्थान पर अशोक चक्र को स्थान दिया जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे ध्वज राष्ट्रीय और सार्वभौमिक मूल्यों का अधिक व्यापक प्रतिनिधित्व कर सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण का निर्णय ऐसे समय लिया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब भारत स्वतंत्रता प्राप्ति से कुछ ही सप्ताह दूर था। देश विभाजन की पीड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांप्रदायिक तनाव और अनिश्चित भविष्य जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा था। ऐसे समय में एक ऐसा राष्ट्रीय प्रतीक आवश्यक था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध सके। तिरंगा इसी राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनकर सामने आया। इसने भारतवासियों को यह विश्वास दिलाया कि विविधताओं से भरे इस विशाल देश की आत्मा एक है और उसका भविष्य भी साझा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता है। यहां सैकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक धर्मों का पालन किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अलग</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">अलग परंपराएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहनावे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोजन और जीवन शैली देखने को मिलती हैं। फिर भी जब राष्ट्रीय ध्वज लहराता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब यह सभी भेदभाव स्वतः गौण हो जाते हैं। तिरंगा हमें याद दिलाता है कि हम सबसे पहले भारतीय हैं। यही भावना भारत की लोकतांत्रिक शक्ति और राष्ट्रीय एकता की सबसे बड़ी आधारशिला है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब भी किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय खिलाड़ी पदक जीतते हैं और तिरंगा ऊंचा उठता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब करोड़ों भारतीयों की आंखें गर्व से भर जाती हैं। चाहे ओलंपिक हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व कप हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरिक्ष अभियान हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक उपलब्धियां हों या वैश्विक मंचों पर भारत की सफलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर उपलब्धि के साथ तिरंगा केवल एक ध्वज नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे राष्ट्र की उपलब्धि का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि प्रत्येक भारतीय अपने राष्ट्रीय ध्वज के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ महसूस करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय सशस्त्र बलों के लिए तिरंगे का महत्व और भी अधिक है। देश की सीमाओं पर तैनात सैनिक इसी ध्वज की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। अनेक वीर सैनिकों ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन तिरंगे की शान को कभी झुकने नहीं दिया। जब किसी शहीद का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर अपने घर पहुंचता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह दृश्य पूरे राष्ट्र को भावुक कर देता है और प्रत्येक नागरिक को अपने कर्तव्य की याद दिलाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान केवल राष्ट्रीय पर्वों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसका वास्तविक सम्मान तभी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब हम अपने दैनिक जीवन में संविधान के आदर्शों का पालन करें। ईमानदारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुशासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिश्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक सद्भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यावरण संरक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानून का सम्मान और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा जैसे व्यवहार ही तिरंगे के प्रति सच्ची श्रद्धा के प्रतीक हैं। यदि कोई नागरिक राष्ट्रहित को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर रखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वही राष्ट्रीय ध्वज का वास्तविक सम्मान करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान और उसके उचित उपयोग के लिए ध्वज संहिता बनाई गई है। समय के साथ इसमें परिवर्तन भी किए गए हैं ताकि नागरिक अधिक सहजता से राष्ट्रीय ध्वज के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर सकें। हालांकि ध्वज का उपयोग करते समय उसकी गरिमा और सम्मान बनाए रखना प्रत्येक नागरिक का नैतिक और कानूनी दायित्व है। राष्ट्रीय ध्वज कभी भी किसी प्रकार के अपमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यावसायिक दुरुपयोग या अनुचित प्रदर्शन का माध्यम नहीं बनना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस विशेष रूप से नई पीढ़ी के लिए अत्यंत प्रेरणादायक अवसर है। आज के युवाओं के सामने विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रौद्योगिकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेल और नवाचार जैसे अनेक क्षेत्र खुले हुए हैं। यदि युवा अपने ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिभा और परिश्रम के माध्यम से भारत को विश्व में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यही तिरंगे के प्रति उनकी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। केवल हाथ में तिरंगा लेकर उत्सव मनाना पर्याप्त नहीं है। आवश्यक यह है कि उसके आदर्शों को अपने व्यक्तित्व और कार्यों में भी उतारा जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विद्यालयों और महाविद्यालयों में राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस का आयोजन विद्यार्थियों में राष्ट्रप्रेम और नागरिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने का उत्कृष्ट माध्यम बन सकता है। इस अवसर पर ध्वज के इतिहास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता संग्राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संविधान सभा की भूमिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय प्रतीकों के महत्व और नागरिक कर्तव्यों पर आधारित कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। इससे विद्यार्थियों में इतिहास के प्रति सम्मान और भविष्य के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज जब भारत विश्व मंच पर तेजी से अपनी पहचान मजबूत कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब राष्ट्रीय ध्वज का महत्व और भी बढ़ जाता है। चंद्रयान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदित्य मिशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल प्रगति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक कूटनीति और खेलों में उपलब्धियां यह सिद्ध करती हैं कि भारत निरंतर आगे बढ़ रहा है। इन सभी सफलताओं के केंद्र में वही तिरंगा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हमें निरंतर प्रगति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविश्वास और राष्ट्रीय एकता की प्रेरणा देता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस केवल इतिहास को याद करने का अवसर नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भविष्य के लिए संकल्प लेने का भी दिन है। यह हमें स्मरण कराता है कि स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उत्तरदायित्व भी है। जिस तिरंगे को लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान की विरासत प्राप्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी गरिमा बनाए रखना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है। जब तक भारत का प्रत्येक नागरिक सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईमानदारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिश्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता को अपने जीवन का आधार बनाए रखेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक तिरंगा सदैव गर्व के साथ लहराता रहेगा। यही राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस का सबसे बड़ा संदेश है और यही स्वतंत्र भारत की अमर पहचान भी है। जय हिंद।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 21:51:07 +0530</pubDate>
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                <title>भारत की एकता और प्रगति के प्रति समर्पित एक जीवन-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182749/a-life-dedicated-to-the-unity-and-progress-of-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/whatsapp-image-2026-07-05-at-17.40.45.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद जी ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका संकल्प और सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी। जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे। इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप थे। शिक्षाविदों के एक सम्मेलन में डॉ. मुखर्जी ने कहा था, ‘’शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना गलत है। हमें विद्यार्थियों को ऐसे तैयार करना होगा ताकि वे नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। हमारी स्वशासी संस्थाओं जैसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो सकें। इसके साथ ही वे वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें।’’</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने नेतृत्व में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें लाइब्रेरी की सुविधाओं में सुधार, विज्ञान में रिसर्च को बढ़ावा देना, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करना शामिल था। उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना विकसित हो, इसके लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न 'दीपक' यानि मिट्टी का दीया रखा गया। एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनका विजन बहुत विराट था। वे उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वे वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे। उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल की। इसके माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे।  </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहां मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूं। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को  निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे।  </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">75 वर्ष पहले पंडित नेहरू पहला संविधान संशोधन लेकर आए। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया। तब डॉ. मुखर्जी इसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे। वे भली-भांति समझ चुके थे कि कांग्रेस किस हद तक जा सकती है। समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई। जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा। इतना ही नहीं, 50 वर्ष पहले 42वां संविधान संशोधन अधिनियम लाकर एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर कुठाराघात किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों को भोजन मिल सके, जिसके लिए कई कैंटीन और रिलीफ सेंटर शुरू किए गए। एक ओर वे लोगों की पीड़ा से बहुत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से अत्यंत आक्रोशित भी थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए पंचाशेर मन्वंतर नाम की एक किताब भी लिखी। 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया था, ‘’आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।’’ आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उस भारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<blockquote class="format1"><strong>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी</strong></blockquote>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 17:49:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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                <title>परमाणु शक्ति संपन्न भारत में कब होगी बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181062/when-will-girls-education-be-100-in-nuclear-power-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/4.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज में ऐसे कर्मचारियों का वर्ग तैयार करना था जो अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक कार्यों को संचालित कर सके। आधुनिक विज्ञान और अंग्रेजी भाषा के प्रसार में इस शिक्षा प्रणाली का योगदान रहा, किंतु इसने भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक शिक्षा और कौशल आधारित शिक्षण को काफी हद तक हाशिए पर पहुंचा दिया। उस समय महिलाओं की शिक्षा लगभग नगण्य थी। समाज में बाल विवाह, पर्दा प्रथा और लैंगिक असमानता जैसी कुरीतियां लड़कियों की शिक्षा में बड़ी बाधा थीं।<br />समाज सुधारकों का योगदान</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">+<br />ऐसे कठिन समय में सावित्रीबाई फुले और महात्मा ज्योतिराव फुले ने बालिका शिक्षा की अलख जगाई। 1848 में उन्होंने लड़कियों के लिए पहला आधुनिक विद्यालय प्रारंभ किया।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने महिला शिक्षा और सामाजिक सुधारों को नई दिशा दी। बाद में महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर तथा स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना।<br />डॉ. अंबेडकर का प्रसिद्ध संदेश</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।"<br />स्वतंत्र भारत में शिक्षा का विकास</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की साक्षरता दर लगभग 18 प्रतिशत थी। महिलाओं की साक्षरता तो 10 प्रतिशत से भी कम थी। संविधान निर्माताओं ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार माना।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />समय-समय पर कोठारी आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968, 1986, सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 तथा नई शिक्षा नीति 2020 जैसे प्रयास किए गए। इन प्रयासों से शिक्षा का दायरा बढ़ा और लड़कियों की विद्यालयों तक पहुंच बेहतर हुई।.आज भारत की साक्षरता दर 77 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुकी है, जबकि महिला साक्षरता दर 70 प्रतिशत से अधिक है। यह प्रगति उत्साहजनक है, किंतु अभी भी पुरुषों और महिलाओं की साक्षरता में अंतर बना हुआ है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व के सर्वाधिक शिक्षित देशों से सीख<br />विश्व में फिनलैंड, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जापान और नॉर्वे जैसे देशों की शिक्षा व्यवस्था विश्व में आदर्श मानी जाती है। फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />फिनलैंड में शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन कौशल विकसित करना है। वहां बच्चों पर अनावश्यक परीक्षा का दबाव नहीं होता। शिक्षकों को अत्यंत सम्मान और स्वायत्तता प्राप्त है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> बालिका और बालक के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता। सिंगापुर ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा साधन बनाया। वहां विज्ञान, गणित, तकनीक और कौशल आधारित शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता है। शिक्षा को उद्योगों और रोजगार से जोड़ा गया है।<br />जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में अनुशासन, नैतिकता, समयबद्धता और तकनीकी दक्षता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। परिणामस्वरूप ये देश सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद आर्थिक महाशक्ति बन गए।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत में प्रतिभा की कोई कमी कभी भी नहीं रही है, किंतु शिक्षा व्यवस्था अभी भी परीक्षा-केंद्रित बनी हुई है। रटंत प्रणाली, विद्यालयों की असमान गुणवत्ता, शिक्षकों की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों का अभाव आज भी चुनौतियां हैं।नई शिक्षा नीति 2020 ने इन समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसमें मातृभाषा आधारित शिक्षा, कौशल विकास, डिजिटल शिक्षण और बहुविषयक अध्ययन पर बल दिया गया है। किंतु इसके वास्तविक लाभ तभी मिलेंगे जब इसका प्रभावी क्रियान्वयन हो। बालिका शिक्षा का सत प्रतिशत होना इसलिए भी आवश्यक है कि शिक्षित बेटी, समृद्ध परिवार</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />एक शिक्षित महिला अपने परिवार को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कार प्रदान करती है। वह अगली पीढ़ी की प्रथम शिक्षिका होती है।सामाजिक कुरीतियों का अंत भी।बाल विवाह, दहेज प्रथा, लैंगिक भेदभाव और घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं को समाप्त करने में शिक्षा सबसे प्रभावी साधन है</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व बैंक सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का मानना है कि महिलाओं की शिक्षा में निवेश किसी भी देश के आर्थिक विकास को तीव्र गति देता है। यदि भारत की प्रत्येक बेटी शिक्षित होगी तो देश की उत्पादकता और आर्थिक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />शिक्षित महिलाएं स्वास्थ्य, पोषण और परिवार नियोजन के प्रति अधिक जागरूक होती हैं। इससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी आती है।<br />आज महिलाएं विज्ञान, अंतरिक्ष, प्रशासन, राजनीति, सेना और उद्यमिता के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। शिक्षा उन्हें नेतृत्व और नवाचार की शक्ति प्रदान करती है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />महापुरुषों की दृष्टि में नारी शिक्षा<br />स्वामी विवेकानंद ने कहा</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"राष्ट्र की प्रगति का सबसे अच्छा मापदंड वहां की महिलाओं की स्थिति है।"डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का मत था कि<br />"महिलाओं का सशक्तिकरण और शिक्षा किसी राष्ट्र के विकास का सबसे प्रभावी माध्यम है।"पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था<br />"एक महिला को शिक्षित करना एक पीढ़ी को शिक्षित करना है।"</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />इक्कीसवीं सदी ज्ञान, विज्ञान और नवाचार की सदी है। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब देश की प्रत्येक बेटी शिक्षित, आत्मनिर्भर और सशक्त बनेगी। शिक्षा केवल विद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं है; यह सामाजिक चेतना, आर्थिक समृद्धि और राष्ट्रीय विकास का आधार है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली से लेकर नई शिक्षा नीति तक भारत ने लंबी यात्रा तय की है, किंतु अभी मंजिल दूर है। यदि सरकार, समाज, परिवार और शैक्षणिक संस्थान मिलकर बालिका शिक्षा को शत-प्रतिशत अनिवार्य बनाने का संकल्प लें, तो भारत न केवल विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति बनेगा, बल्कि सबसे विकसित और ज्ञानवान राष्ट्रों की अग्रिम पंक्ति में भी खड़ा होगा।<br />क्योंकि किसी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों में नहीं, बल्कि उसकी शिक्षित बेटियों की आंखों में स्वप्न बनकर पलता है।<br /><br />संजीव ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिंतक, स्तंभकार, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,<div>कविता,</div><div>संजीव-नी।<br />शिक्षा का कवच।<br /><br />शिक्षा का कवच।<br />कुछ देना ही तो आइये,<br />नन्हीं बालिकाओं को<br />स्वर्ण के गहने नहीं,<br />शिक्षा का कवच दें।<br />उनकी हथेलियों में<br />रोटी के साथ-साथ<br />कुछ अक्षर भी रख दें,<br />जो भूख से जुझतीं<br />उन्हें ज्ञान की कुंजी दें<br />अँधेरे बंद कमरों में<br />रोशन-दान बनती,<br />ज्ञान की रोशनी के लिए<br />बंद रास्तों पर<br />एक नया आकाश फैला देती,<br />उनकी आँखों में<br />सिर्फ़ स्वप्न ना रखें ,<br />उन तक पहुँचने के पंख भी दें।<br />उन्हें ज्ञान दें कि<br />अपने हिस्से की धूप<br />खुद चुन सकें।<br />किताबें जब उनके हांथों में होंगी,<br />तो सदियों के कई बोझ<br />आप उतर जाएँगे।<br />कलम उँगलियों से चलेंगीं<br />तक़दीर की कविता भी<br />लिखी जाएगी।<br />शिक्षित बालिका<br />अपना जीवन ही नहीं संवारती,<br />आने वाली पीढ़ियों के लिए<br />उजला दीप बन जाती।<br />आइये,<br />बेटी को शिक्षा का रक्षा-कवच दें,<br />ताकि वह<br />अपने सपनों, अपने अधिकारों<br />अपने अस्तित्व की रक्षा<br />स्वयं कर सके।<br /><br />संजीव ठाकुर, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,</div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 12:57:59 +0530</pubDate>
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                <title>नरेंद्र मोदी के नाम दर्ज होने जा रहा एक नया रिकॉर्ड</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है। यहाँ जनता समय</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर अपने नेताओं का चयन करती है और सत्ता परिवर्तन के माध्यम से लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत बनाती है। स्वतंत्रता के बाद से देश ने अनेक प्रधानमंत्रियों को देखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ नेता ऐसे रहे जिन्होंने केवल शासन नहीं किया बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा और स्वरूप को भी गहराई से प्रभावित किया। जवाहर लाल नेहरू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के बाद यदि किसी प्रधानमंत्री ने सबसे अधिक प्रभाव छोड़ा है तो वह नरेंद्र मोदी हैं। </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>2026</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180808/a-new-record-is-going-to-be-registered-in-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/178054939444.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है। यहाँ जनता समय</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर अपने नेताओं का चयन करती है और सत्ता परिवर्तन के माध्यम से लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत बनाती है। स्वतंत्रता के बाद से देश ने अनेक प्रधानमंत्रियों को देखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ नेता ऐसे रहे जिन्होंने केवल शासन नहीं किया बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा और स्वरूप को भी गहराई से प्रभावित किया। जवाहर लाल नेहरू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के बाद यदि किसी प्रधानमंत्री ने सबसे अधिक प्रभाव छोड़ा है तो वह नरेंद्र मोदी हैं। </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> का दिन इसी कारण राजनीतिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ऐसे रिकॉर्ड के साथ चर्चा के केंद्र में होंगे जो भारतीय राजनीति में उनके लंबे और प्रभावशाली सफर का प्रतीक माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नरेंद्र मोदी ने पहली बार </span>26<span lang="hi" xml:lang="hi"> मई </span>2014<span lang="hi" xml:lang="hi"> को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। उस समय भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था। यह जीत इसलिए ऐतिहासिक थी क्योंकि लगभग </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों बाद किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिला था। उस दौर में देश भ्रष्टाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक सुस्ती और राजनीतिक अस्थिरता जैसे मुद्दों से जूझ रहा था। जनता एक ऐसे नेतृत्व की तलाश में थी जो निर्णायक दिखाई दे और देश को नई दिशा दे सके। नरेंद्र मोदी ने विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुशासन और मजबूत नेतृत्व के नारों के साथ चुनाव अभियान चलाया और जनता ने उन्हें भारी समर्थन दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">2014<span lang="hi" xml:lang="hi"> की जीत केवल एक चुनावी विजय नहीं थी बल्कि भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत थी। लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहने वाली कांग्रेस पार्टी पहली बार इतनी कमजोर स्थिति में पहुँच गई। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय राजनीति की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी। नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व इस परिवर्तन का मुख्य केंद्र बन गया। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहचान पहले से ही एक विकासवादी नेता की बन चुकी थी और उसी छवि को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार मिला।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बाद </span>2019<span lang="hi" xml:lang="hi"> का लोकसभा चुनाव आया। सामान्यतः किसी सरकार के </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों के बाद सत्ता विरोधी लहर देखी जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पहले से भी अधिक सीटें जीत लीं। इस विजय ने यह स्पष्ट कर दिया कि मोदी केवल एक लोकप्रिय नेता नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व बन चुके हैं। </span>2019<span lang="hi" xml:lang="hi"> की जीत के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति और मजबूत हुई। जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद </span>370<span lang="hi" xml:lang="hi"> हटाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीन तलाक कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर उनकी सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए जिनका व्यापक राजनीतिक प्रभाव पड़ा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">2024<span lang="hi" xml:lang="hi"> के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह उपलब्धि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। लगातार तीन बार सत्ता में लौटना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आसान नहीं होता। इसके लिए केवल चुनावी रणनीति ही नहीं बल्कि व्यापक जनसमर्थन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजबूत संगठन और प्रभावी नेतृत्व की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि मोदी की तीसरी पारी को भारतीय राजनीति के बड़े घटनाक्रमों में गिना जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">10<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> को नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन को लेकर चर्चा इसलिए तेज है क्योंकि वे लंबे समय तक लगातार प्रधानमंत्री बने रहने वाले नेताओं की सूची में और अधिक मजबूत स्थिति प्राप्त करेंगे। भारतीय राजनीति में लंबे कार्यकाल का विशेष महत्व माना जाता है क्योंकि लोकतंत्र में जनता हर चुनाव में सरकार को बदलने का अधिकार रखती है। ऐसे में यदि कोई नेता लगातार वर्षों तक जनता का समर्थन बनाए रखता है तो यह उसकी राजनीतिक क्षमता और जनस्वीकार्यता को दर्शाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू लगभग </span>16<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष </span>286<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिन तक लगातार प्रधानमंत्री रहे। यह रिकॉर्ड आज भी सबसे लंबा लगातार प्रधानमंत्रित्व माना जाता है। नेहरू ने </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> अगस्त </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> से लेकर </span>27<span lang="hi" xml:lang="hi"> मई </span>1964<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक देश का नेतृत्व किया। उनके सामने विभाजन की त्रासदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक कमजोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्थाओं के निर्माण और अंतरराष्ट्रीय पहचान जैसी अनेक चुनौतियाँ थीं। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव मजबूत करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वजनिक क्षेत्र के विकास और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने का प्रयास किया। आधुनिक भारत के निर्माण में उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर नरेंद्र मोदी ऐसे समय में प्रधानमंत्री बने जब भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था। उनके सामने चुनौती थी कि भारत को आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामरिक और तकनीकी दृष्टि से और अधिक शक्तिशाली बनाया जाए। मोदी ने राष्ट्रवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक पहचान और मजबूत नेतृत्व को अपनी राजनीति का मुख्य आधार बनाया। उन्होंने विदेश नीति में भी सक्रियता दिखाई। अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रांस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जापान और खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों को नई गति मिली। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली दिखाई देने लगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मोदी सरकार के दौरान अनेक कल्याणकारी योजनाएँ भी शुरू की गईं। जन धन योजना के माध्यम से करोड़ों लोगों के बैंक खाते खोले गए। उज्ज्वला योजना के अंतर्गत गरीब परिवारों को गैस कनेक्शन उपलब्ध कराए गए। आयुष्मान योजना के जरिए गरीबों को स्वास्थ्य सुरक्षा देने का प्रयास हुआ। स्वच्छ भारत अभियान ने स्वच्छता को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया। कोरोना महामारी के दौरान मुफ्त राशन योजना ने करोड़ों लोगों को राहत दी। इन योजनाओं ने गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के बीच मोदी सरकार की लोकप्रियता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि विपक्ष लगातार सरकार की आलोचना भी करता रहा है। बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि संकट और सामाजिक तनाव जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश की गई। कई विश्लेषकों का मानना है कि आर्थिक असमानता अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराना आने वाले समय में सरकार के सामने सबसे कठिन कार्यों में से एक होगा। किसान आंदोलन ने भी यह दिखाया कि बड़े जनसमूह सरकार की नीतियों का विरोध कर सकते हैं। लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद नरेंद्र मोदी की राजनीतिक लोकप्रियता लंबे समय तक बनी रही।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय जनता पार्टी की संगठनात्मक शक्ति भी मोदी की सफलता का एक बड़ा कारण रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का विशाल कार्यकर्ता तंत्र बूथ स्तर तक सक्रिय रहता है। चुनाव प्रबंधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रचार अभियान और मतदाताओं तक सीधा संपर्क भाजपा की विशेषता बन चुके हैं। इसके अलावा विपक्ष की एकजुटता की कमी ने भी भाजपा को लाभ पहुँचाया। कई राज्यों में विपक्षी दल आपसी मतभेदों के कारण मजबूत चुनौती प्रस्तुत नहीं कर सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक राजनीति में संचार माध्यमों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। नरेंद्र मोदी ने डिजिटल माध्यमों का प्रभावी उपयोग किया। सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता ने उन्हें युवाओं और नए मतदाताओं से सीधे जोड़ने में सहायता की। रेडियो कार्यक्रमों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीडियो संदेशों और विशाल जनसभाओं के माध्यम से उन्होंने लगातार जनता के साथ संवाद बनाए रखा। यह शैली पहले के प्रधानमंत्रियों से अलग मानी जाती है। नेहरू के समय में संचार के साधन सीमित थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि आज राजनीति का बड़ा हिस्सा डिजिटल मंचों पर भी संचालित होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास केवल आँकड़ों से नहीं बनता बल्कि जनमानस की स्मृतियों से भी बनता है। जवाहर लाल नेहरू को आधुनिक भारत की संस्थाओं के निर्माण के लिए याद किया जाता है। इंदिरा गांधी को निर्णायक नेतृत्व और राजनीतिक साहस के लिए जाना जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी को संवाद और सहमति की राजनीति का प्रतीक माना जाता है। नरेंद्र मोदी की छवि एक ऐसे नेता की बनी है जिसने भारतीय राजनीति को अत्यधिक केंद्रीकृत नेतृत्व की दिशा दी और राष्ट्रवाद को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में स्थापित किया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">10<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह दिन भारतीय राजनीति में नेतृत्व की निरंतरता और बदलते जनादेश दोनों का प्रतीक बन रहा है। लोकतंत्र में लंबे समय तक सत्ता में बने रहना असाधारण उपलब्धि माना जाता है। यह केवल चुनावी जीत नहीं बल्कि जनता के विश्वास का संकेत भी होता है। नरेंद्र मोदी के समर्थक इसे मजबूत नेतृत्व की विजय मानते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि आलोचक इसे भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व आधारित राजनीति के बढ़ते प्रभाव के रूप में देखते हैं। लेकिन दोनों पक्ष इस बात से सहमत दिखाई देते हैं कि पिछले एक दशक से अधिक समय में भारतीय राजनीति का केंद्र नरेंद्र मोदी ही रहे हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य में इतिहास नरेंद्र मोदी के कार्यकाल का मूल्यांकन कई आधारों पर करेगा। आर्थिक विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक समरसता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विदेश नीति की उपलब्धियाँ और आम नागरिक के जीवन में आए बदलाव इन सबके आधार पर उनके शासन को परखा जाएगा। यदि आने वाले वर्षों में भारत आर्थिक और तकनीकी शक्ति के रूप में और मजबूत होता है तो मोदी के कार्यकाल को विशेष महत्व दिया जाएगा। वहीं यदि बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगाई और सामाजिक असंतोष जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं तो आलोचनाएँ भी तेज होंगी। यही लोकतंत्र की विशेषता है कि किसी भी नेता का अंतिम मूल्यांकन इतिहास और जनता दोनों मिलकर करते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार </span>10 <span lang="hi" xml:lang="hi">जून </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल एक तारीख नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण दौर का प्रतीक बनने जा रही है। यह दिन उस राजनीतिक यात्रा की याद दिलाता है जिसमें एक साधारण परिवार से निकला व्यक्ति देश का सबसे प्रभावशाली नेता बनता है और लगातार वर्षों तक सत्ता में बना रहता है। नेहरू से मोदी तक की यह यात्रा भारतीय लोकतंत्र की शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनता के बदलते विश्वास और नेतृत्व की निरंतर बदलती परिभाषा को भी दर्शाती है। भारतीय राजनीति में रिकॉर्ड बनते और टूटते रहेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो इतिहास में स्थायी रूप से दर्ज हो जाते हैं। </span>10 <span lang="hi" xml:lang="hi">जून </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को लेकर चल रही चर्चा भी भारतीय लोकतंत्र के ऐसे ही एक ऐतिहासिक क्षण की ओर संकेत करती है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 18:18:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>भारतवर्ष की गुरु-शिष्य सनातनी परंपरा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">राष्ट्रीय चरित्र और राष्ट्रवाद शालाओं की बुनियादी शिक्षा कक्षाओं और गुरु और शिष्य परंपरा के साथ देश के प्रति समर्पण के भाव से प्रस्फुटित होता हैl राष्ट्रवाद राष्ट्र की रक्षा ,अखंडता एवं सशक्तिकरण नागरिकों के भाग्य को संरक्षित कर सुदृढ़ बनाता हैl स्वतंत्रता के बाद विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के स्वप्न दृष्टा प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश के भावी भविष्य को पहचानते हुए बुनियादी कक्षाओं की राष्ट्रवाद के निर्माण में भूमिका को सहजता से पहचान लिया और अमेरिका की तर्ज पर भारत को तकनीकी तौर पर एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के लिए अमेरिका के एमआईटी की तर्ज पर भारतीय</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180749/indias-guru-disciple-sanatani-tradition"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">राष्ट्रीय चरित्र और राष्ट्रवाद शालाओं की बुनियादी शिक्षा कक्षाओं और गुरु और शिष्य परंपरा के साथ देश के प्रति समर्पण के भाव से प्रस्फुटित होता हैl राष्ट्रवाद राष्ट्र की रक्षा ,अखंडता एवं सशक्तिकरण नागरिकों के भाग्य को संरक्षित कर सुदृढ़ बनाता हैl स्वतंत्रता के बाद विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के स्वप्न दृष्टा प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश के भावी भविष्य को पहचानते हुए बुनियादी कक्षाओं की राष्ट्रवाद के निर्माण में भूमिका को सहजता से पहचान लिया और अमेरिका की तर्ज पर भारत को तकनीकी तौर पर एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के लिए अमेरिका के एमआईटी की तर्ज पर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान स्थापित करवाया था ।जब खड़कपुर आईआईटी की स्थापना की गई थी तब उन्होंने अतिथि के रूप में अपने भाषण में कहा की भारत को वैज्ञानिक महाशक्ति बनाने का दायित्व इन्हीं आई,आई,टी की कक्षाओं शिक्षकों एवं छात्राओं का होगा, वे राष्ट्र को तकनीकी दिशा में मील का पत्थर बनाने में साबित होंगेl</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में भारत आज अंतरिक्ष की बड़ी शक्तियों की कतार में शामिल हैl इसके पीछे भारत के कई वैज्ञानिक सीवी रमन ,विक्रम साराभाई, सतीश धवन जैसे बड़े वैज्ञानिकों द्वारा विकसित इसरो संस्थान है जिसकी कक्षाओं में मंगल तक भारतीय तिरंगे को लहराया. भाभा एटॉमिक परमाणु शक्ति बन गया हैl वैश्विक स्तर पर हर बड़े स्पेस रिसर्च सेंटर पर भारत की इंजीनियर और वैज्ञानिक अपनी सेवाएं दे रहे हैंl</p>
<p style="text-align:justify;">आज अमेरिका आर्थिक महाशक्ति बनने के पीछे उसके विश्वविद्यालय ,संस्थाएं हैं। हावर्ड बिजनेस स्कूल विश्व स्तरीय व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में से एक माना जाता हैl आर्थिक सामाजिक तथा वैज्ञानिक शोध संस्थाओं में अधिकाधिक धनराशि खर्च करके अमेरिका, रूस, ब्रिटेन ,चीन, ऑस्ट्रेलिया ,कनाडा ने विश्व में सर्वश्रेष्ठ बुद्धिजीवी दिए हैंl यह तो तय है कि कोई भी देश का भाग्य तभी उन्नत तथा विकसित होगा जब वहां के छात्र शिक्षक एवं आमजन न्याय, समता ,प्रबुद्धता के प्रति अपनी अडिग प्रतिबद्धता रखें। आने वाली पीढ़ी यानी कि वर्तमान के बच्चे और भविष्य के नागरिक ही किसी देश का भविष्य निर्माण करते हैं और यह भी तय रहता है कि बुद्धिमान शिक्षक अपने छात्रों के माध्यम से किसी महान राष्ट्र की नींव रखते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">किसी भी महान राष्ट्र का निर्माण रातों-रात नहीं होता है इसके लिए पीढीयो का योगदान और श्रेष्ठ शिक्षक एवं छात्रों की लग्न शीलता और मेहनत की प्रतिबद्धता होती है। 1960 और 70 के दशक में चीन में गठित सांस्कृतिक क्रांति कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, खेतों ,कारखानों को एकता में बांधकर सक्रिय नीति का प्रयोग कर सभी को एक सूत्र में बांधा गया था। जापान तो प्राथमिक कक्षाओं से उपजे राष्ट्रवाद, अनुशासन तथा कर्तव्य बोध के लिए सर्वश्रेष्ठ उदाहरण रहा है, जापान में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पराजय का कड़वा घूंट पीने के पश्चात कमजोर एवं मृतप्राय जापान को एक शक्तिशाली आर्थिक राष्ट्र बना दिया। इसके विपरीत वर्तमान कक्षाएं प्रेम, अनुशासन ,करुणा जैसे पाठ ना सिखा कर ईर्ष्या, कंपटीशन, हिंसा ,कटुता जैसे अध्याय सिखा कर राष्ट्र के भविष्य को गर्त में ले जा रही है ।</p>
<p style="text-align:justify;">देश के अनेक विश्वविद्यालय हड़ताल ,हिंसा, जाति भेदभाव, आपत्तिजनक नारों जैसे विसंगतियों का सामना कर रहे हैं। कक्षाओं का नैतिकता, सहिष्णुता ,अनुशासन से कटाव केवल भारत में नहीं पूरे विश्व में इसका फैलाव हो चुका है। अमेरिका तथा यूरोपीय देशों में स्कूलों का कक्षाओं में गोली कांड इसके बड़े विकृत उदाहरण हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने ट्रीस्ट विद डेस्टिनी के भाषण में भूख, भय ,बीमारी, अज्ञान से पूर्णता मुक्ति की बात को भारत की नियति या डेस्टिनी कहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में इस बात पर जोर दिया जाना चाहिए की कक्षाओं को चरित्र निर्माण ,अनुशासन ,उत्कृष्ट नवाचार ,लोकतांत्रिक विचार संरचना का केंद्र बनाकर इसकी शिक्षा दीक्षा दी जानी चाहिए। कक्षाओं से बच्चे आर्थिक रूप से प्रौद्योगिकी स्थापित कर स्वयं अपने पैरों पर खड़े होकर आने वाले वर्षों में कई युवाओं को रोजगार देकर संपूर्ण मानवता ,पर्यावरण की रक्षा तथा राष्ट्र के उत्कर्ष को सही दिशा देने का काम करेंगे। जिससे राष्ट्रीय चरित्र निर्माण तथा राष्ट्रीयता की भावना को एक मजबूत आधार प्राप्त हो सकेगा।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 18:47:12 +0530</pubDate>
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                <title>रिकार्ड तोड मोदी के लिए नेहरू अब भी चुनौती !</title>
                                    <description><![CDATA[<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू हैं और पीछे उनकी बेटी श्रीमती इंदिरा गांधी. मोदी जी ने श्रीमती इंदिरा गाँँधी के शासन का रिकार्ड पार कर लिया लेकिन वे पूरा कस-बल लगाकर भी न नेहरू जितनी कीर्ति अर्जित कर पाए और न नेहरू जितना शासन कर पाए. नेहरू ने सत्ता के साथ देश और दुनिया के दिलों पर भी शासन किया था.मोदी जी को सत्ता में रहते हुए 11 साल और 60 दिन पूरे हो चुके हैं। इस तरह उन्होंने देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के एक और रिकॉर्ड को तोड़ दिया है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/153476/nehru-still-challenged-for-modi-breaking-record"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-07/sdaa.jpg" alt=""></a><br /><p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू हैं और पीछे उनकी बेटी श्रीमती इंदिरा गांधी. मोदी जी ने श्रीमती इंदिरा गाँँधी के शासन का रिकार्ड पार कर लिया लेकिन वे पूरा कस-बल लगाकर भी न नेहरू जितनी कीर्ति अर्जित कर पाए और न नेहरू जितना शासन कर पाए. नेहरू ने सत्ता के साथ देश और दुनिया के दिलों पर भी शासन किया था.मोदी जी को सत्ता में रहते हुए 11 साल और 60 दिन पूरे हो चुके हैं। इस तरह उन्होंने देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के एक और रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। पीएम मोदी अब सिर्फ जवाहरलाल नेहरू से पीछे चल रहे हैं जिन्होंने लगातार 16 साल 286 दिन तक प्रधानमंत्री की कुर्सी अपने पास रखी थी।</p>
<p><br />वैसे यह जरूर है कि दोनों जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने चार बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, लेकिन इतना फर्क जरूर रहा कि नेहरू लगातार जीतते रहे और सत्ता पर काबिज रहे, वहीं इंदिरा गांधी को आपातकाल के बाद कुछ समय के लिए अपनी सत्ता गंवानी पड़ी थी।लेकिन बात अगर  प्रधानमंत्री शपथ लेने की आएगी तो प्रधानमंत्री मोदी अभी भी जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से पीछे चल रहे हैं क्योंकि नेहरू और इंदिरा ने चार बार पीएम पद की शपथ ली है, ऐसे में अभी पीएम मोदी को एक बार फिर पीएम पद की शपथ लेनी होगी।वैसे इस मामले में मोदी, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के पीछे चल रहे हैं,<br />मोदीजी को नेहरू और इंदिरा गांधी से बडा नेता बताने वाले उनके समर्थक रिकार्ड बनाने और कीर्ति अर्जित करने के भेद को समझ नही पा रहे.कई मामलों में उन्होंने उन दोनों को भी पीछे छोड़ दिया है। मोदी जी ने देश की आजादी की लडाई नहीं लडी. वे आपातकाल में भी जेल नहीं गये जबकि नेहरू ने टुकडों में 13साल जेलों में बिताये. उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने भी जेल यात्राएं की. हाँ मोदीजी पिछले 24 साल से सक्रिय राजनीति का हिस्सा हैं और लगातार चुनाव जीतते हुए आ रहे हैं।वे 2001 से 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और फिर उसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली।मुमकिन है कि उन्हे जेल यात्रा पद से हटने के बाद करने का योग हो.</p>
<p><br />ये  सही है कि मोदी  पहले गैर कांग्रेसी नेता हैं जिन्होंने लगातार दो कार्यकाल अपने पूरे किए हैं। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी भी भाजपा नेता थे लेकिन उनका कार्यकाल सिर्फ 6 साल का रहा लेकिन अटल जी ने तीन बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, इसलिए मोदी जी का ये रिकार्ड भी बेकार गया.<br />मोदीजी को नेहरू और इंदिरा के बराबर खडा करने की कोशिश करने वाले भूल जाते हैं कि नेहरू और इंदिरा गांधी ने कभी बैशाखियों के सहारे कोई सरकार नहीं चलाई. इन दोनों के कार्यकाल में कभी 80 करोड लोग रोटी के लिए सरकार के मोहताज नहीं बने. इंदिरा गांधी ने 1971 में पाकिस्तान को तोडकर बांग्लादेश बनवाया लेकिन मोदी ने 2019  में इंदिरा गांधी की बराबरी करने की सनक में क्शमीर के ही तीन टुकड़े कर दिए, जो आज भी राज्य बनने के लिए तडप रहे हैं. लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है.</p>
<p><br />नेहरू और गांधी ने कभी डबल इंजन लगाकर राज्य सरकारें नहीं चलाईं किंतु मोदी जी को मजबूरन एक के पीछे एक इंजन लगाना पडा. हाँ मोदी जी ने दुनिया के 25 देशों के नागरिक सम्मान जरूर हासिल किए लेकिन नेहरू और इंदिरा गांधी अपने ही देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान लेकर संतुष्ट रहे. मोदीजी को अब इस दिशा में मेहनत करना पडेगी, अन्यथा ब पिता-पुत्री का मुकाबला कैसे कर पाएंगे.<br />पिता -पुत्री की जोडी की बराबरी करना मोदी जी के लिए कदाचित आसान है भी नही.जैसे नेहरूजी 75 साल के होते ही परलोक चले गये. इंदिरा गांधी ने सत्ता में रहते हुए शहादत दी. इस रिकार्ड की बराबरी मोदी जी को भूलकर भी नहीं करना चाहिए, अन्यथा उनके शुभचिंतक उन्हे पानी पर चढा सकते है.नेहरू और इंदिरा गांधी ने दुश्मन के खिलाफ सीधे लडाई लडी जबकि मोदी जी सर्जीकल स्ट्राइक और आपरेशन सिंदूर से आगे नहीं बढ पाए. नेहरू और इंदिरा गांधी के समय में दुनिया के किसी भी देश ने ये दावा नहीं किया कि कोई युद्ध बंदी या सीजफायर उसने कराई है्.किंतु तीन दिन के आपरेशन सिंदूर के बाद सीजफायर को लेकर अमरीका के राष्ट्रपति दो दर्जन बार दावे कर चुके हैं.</p>
<p>ये सच है कि नेहरू और इंदिरा गांधी भारत को दुनिया की चौथी बडी अर्थव्यवस्था नही बना पाए लेकिन मोदीजी ने बना दिया. इसके लिए उन्हें बधाई दी जा सकती है, किंतु इससे भारत को मिला क्या? भारत के पास जो था, वो अस्मिता, संप्रभुता, समरसता, सब जख्मी हो चुकी है. मोदीजी के नेतृत्व में न देश हिंदू बन सका और न जैसा था वैसा रह सका. मोदीजी द्वारा बनाए गये तमाम रिकार्ड देश के लिए कितने फायदेमंद हैं इसका आकलन मोदीजी के बाद ही होगा. अभी तो जितने भी प्रयास हैं वे 'अहो रूपम, अहो ध्वनि'की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं<br />.मोदीजी का जो असल रिकॉर्ड है उसका जिक्र किसी ने नहीं किया.मोदीजी के कार्यकाल में आजादी के बाद का सबसे बडा ककिसान आंदोलन हुआ. 750 किसान मरे.मोदी के राज में सबसे ज्यादा सांसद निलंबित हुए, सबसे ज्यादा असंवैधानिक इलेक्टोरल बांड से चुनावी चंदा वसूल किया गया.</p>
<p>सबसे ज्यादा उद्योगपति देश का धन लेकर विदेश भागे. सबसे ज्यादा कालाधन मोदीजी के राज में बढा. सबसे ज्यादा समय तक मणिपुर जला लेकिन मोदीजी वहां कभी नहीं गये. मोदीजी का ही रिकॉर्ड है कि संसद के चलते एक उप राष्ट्रपति ने इस्तीफा दिया. लेकिन इन रिकार्ड्स से मोदीजी की कीर्ति नहीं बढी उलटे बदनामी ही हुई. मोदी जी का सबसे बडा रिकॉर्ड ये है कि उन्होने एक भी पत्रकार वार्ता में हिस्सा नहीं लिया.बहरहाल मोदीजी को शासन करने में इंदिरा गांधी से आगे निकलने पर बधाइयाँ. वे नेहरू का भी रिकॉर्ड तोडें, पुतिन का भी तोडें, शी जिन पिंग का भी तोडें, साथ ही देश की कीर्ति भी बढाएं. रिकार्ड तो हमारे खिलाडी खेल, खेल में तोड देते हैं.</p>
<p><strong>राकेश अचल</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 26 Jul 2025 16:22:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
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                <title>नेहरू से नरेंद्र तक प्रगति की बधाई</title>
                                    <description><![CDATA[<p>आज कोरी गप्प नहीं लिख रहा । आंकड़े दे रहा हूँ ।  जिससे आप जान सकें कि भारत बैलगाड़ी युग से कहाँ तक आ गया है।पहले आम चुनाव में पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को चुनाव प्रचार केलिए 1612  किमी रेल से ,5682  मील कार से 18348  किमी हवाई जहाज से और 90  किमी की यात्रा नाव से करना पड़ी थी ।  उस जमाने में नेहरू के भारत में इतना पैसा नहीं था की इसरो के रॉकेट ढोने के लिए किसी ट्रक का इंतजाम किया जा सके,बेचारे वैज्ञानिक बैलगाड़ियों पर राकेट लांचर लादकर चलते थे। ये सब नेहरू की गलत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/133984/congratulations-on-progress-from-nehru-to-narendra"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-08/नेहरू-से-नरेंद्र-तक-प्रगति-की-बधाई.jpg" alt=""></a><br /><p>आज कोरी गप्प नहीं लिख रहा । आंकड़े दे रहा हूँ ।  जिससे आप जान सकें कि भारत बैलगाड़ी युग से कहाँ तक आ गया है।पहले आम चुनाव में पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को चुनाव प्रचार केलिए 1612  किमी रेल से ,5682  मील कार से 18348  किमी हवाई जहाज से और 90  किमी की यात्रा नाव से करना पड़ी थी ।  उस जमाने में नेहरू के भारत में इतना पैसा नहीं था की इसरो के रॉकेट ढोने के लिए किसी ट्रक का इंतजाम किया जा सके,बेचारे वैज्ञानिक बैलगाड़ियों पर राकेट लांचर लादकर चलते थे। ये सब नेहरू की गलत नीतियों की वजह से हुआ,लेकिन आज परिदृश्य बदल चुका है। आज भारत के पास सब कुछ है ।  चुनाव प्रचार के लिए प्रधानमंत्री को सेना का विमान किराये से नहीं लेना पड़ता। सीएजी उनके विमान खर्च का हिसाब नहीं ले सकता।</p>
<p>भारत की असली प्रगति दरअसल 2014  से शुरू हुई। आजाद भारत के पहले प्र्धानमंत्री ने अपनी आर्थिक नीतियों से भारत को इतना मजबूत बनाया की हम अपने प्रधानमंत्री  के लिए 8400  करोड़ रूपये का विमान खरीदने के लायक हो गए। आप इसे विमान कहें तो ठीक ,मै तो इसे प्रधानमंत्री की बाइक यानि फटफटिया कहता हूँ,क्योंकि वे कभी इसके नीचे उतरते ही नहीं। नेहरू के पास ये सब कहाँ था ? हालाँकि कहते हैं की उनके कपडे पेरिस से धुलकर आते थे । अब ये पेरिस किसी लाउंड्री का नाम था या देश का भगवान जाने।  </p>
<p>भारत में बीते 76  साल में कांग्रेस के 8 ,भाजपा के 2 ,और जनता पार्टी,समाजवादी जनता पार्टी और इंडियन नेशनल कांग्रेस [आर] के एक-एक प्रधानमंत्री हुए लेकिन नरेंद्र मोदी जी को छोड़ किसी की हिम्मत नहीं हुई जो 8400  करोड़ रूपये का विमान प्रधानमंत्री के लिए खरीद सके। देश का डंका बजाने के लिए आज जितनी जरूरत चनदयान-3  की है उतनी ही जरूरत 8400  करोड़ रूपये के विमान की भी है। ये  आलोचना का विषय नहीं है ।  ये प्रतिष्ठा का विषय है।  हमें मोदी जी का अहसान मानना चाहिए की उन्होंने अमृतकाल में सबसे मंहगा विमान खरीदकर देश का मान बढ़ाया।</p>
<p>मोदी जी के आलोचकों से मुझे बहुत चिढ है ।  वे खामखा मोदी जी से चिढ़ते है।  कांग्रेस ने यानि इंदिरा गांधी ने भारत से गरीबी हटाओ का नारा दिया लेकिन गरीबी हटी नहीं बल्कि गरीब बढ़ गयी ।  इंदिरा गांधी का बोया अब मोदी जी को काटना पड़ रहा है ।  गरीबी  तो वे भी नहीं हटा पाए लेकिन बन्दा 80  करोड़ गरीबों को पांच किलो मुफ्त का अन्न देने की क्षमता तो रखता है। इतनी बड़ी चुनौती का सामना  करते हुए अपने लिए 8400  करोड़ का विमान खरीदना और चंद्रयान -3  के लिए इसरो को 615  करोड़ रूपये देना कोई आसान काम नहीं है ।  मै पूरे यकीन से कह सकता हूं कि यदि मोदी जी न होते तो इसरो को आज भी अपना चंद्रयान -3  चन्द्रमा तक पहुँचाने केलिए किस बैलगाड़ी को किराये पर लेना पड़ता।</p>
<p>कायदे से इस उपलब्धि के लिए माननीय मोदी जी को भारतरत्न देने की घोषणा हो जाना चाहिए ।  नेहरू, गांधी तो बिना कुछ किये ही भारत रत्न का तमगा अपने गले में लटका चुके हैं। अटल बिहारी बाजपेयी जी को भी बहुत पापड़ बेलने पड़े थे भारतरत्न पाने के लिए। लेकिन मोदी जी ने सचमुच काम किया है। वे देश को 5  ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने जा रहे हैं ,लेकिन शर्त एक ही है कि देशवासी उन्हें  तीसरी बार भी देश का प्रधानमंत्री बनाये । यदि देश ने किसी पदयात्री को ये मौक़ा दिया तो तय मानिये कि देश की अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठ जाएगा इस देश ने पहले भी तो नेहरू और इंदिरा गाँधी को तीन बार प्रधानमंत्री बनाने की गलती की है । एक बार एक गलती और सही। क्या फर्क पड़ता है किसी उत्साही को आजमाने में ?</p>
<p>देश के तमाम प्रधानमंत्री ऐसे थे जिन्होने दूसरे और तीसरे टर्म के लिए कोशिश ही नहीं की ।  या उन्हें मौक़ा नहीं मिला ।  लाल बहादुर शास्त्री हों,मोरारजी भाई देसाई हों,चौधरी चरण सिंह हों, राजीव गांधी ,विश्वनाथ प्रताप सिंह ,चंद्रशेखर, पीव्ही नरसिम्हा राव, देवगौड़ा ,इंद्र कुमार गुजराल ऐसे ही प्रधानमंत्री थे ।  ये अपने लिए महंगा विमान कैसे खरीदते ।  अटल जी और डॉ मनमोहन सिंह दो बार प्रधानमंत्री बने भी तो इतना महंगा विमान खरीदने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।जिस देश में आधी आबादी मुफ्त के अन्न पर गुजर-बसर करती हो उस देश में 8400  करोड़ रूपये का विमान खरीदने की हिम्मत जुटाना कोई हंसी-खेल है ?</p>
<p>मै अपने प्रधानमंत्री की हिम्मत की हमेशा दाद देता हूँ।  वे कम से कम इतनी हिम्मत तो रखते हैं की ब्रिक्स सम्मेलन में जाएँ और यदि उनका स्वागत करने राष्ट्रपति न आये तो वे अपने महंगे विमान से नीचे नहीं  उतरे ।  कम से कम दक्षिण अफ्रिका को महंगे विमान की  इज्जत का तो ख्याल रखना चाहिए था ।  ये तो हमारे प्रधानमंत्री जी की दरियादिली है कि वे बाद में उपराष्ट्रपति से अपनी अगवानी कराने पर मान गए। दक्षिण अफ्रीका की हंसी न उड़े इसलिए उन्होंने दरियादिली दिखाई। अन्यथा दक्षिण अफ्रिका वाले तो शी जिनपिंग को भी परेशां करने से पीछे नहीं रहते ।  उन्होंने शी के अंग रक्षकों को रेड कार्पेट पर पांव नहीं रखने दिए ।  बेचारे सही के ऊपर क्या गुजरी होगी ? उनके अंग बिना रक्षको के कैसे सुरक्षित रहे होंगे ?  </p>
<p>हमारे प्रधानमंत्री जिस तरह राजनीति से ऊपर उठकर सबको साथ लेकर सबका विकास कर रहे हैं उसी तरह मान-अपमान से ऊपर उठकर विदेश यात्राएं भी करते है।  कभीकोई उनके पांव छूता है तो कभी कोई नहीं भी छूता। इससे क्या फर्क पड़ता है ।  प्रधान जी की दरियादिली के एक ढूंढो तो सौ उदाहरण मिल सकते है।  प्रधानमंत्री जी की दरियादिली   है कि जिस अमेरिका ने प्रधानमंत्री बनने से पहले उन्हें अमेरिका जाने के लिए वीजा तक नहीं दिया था उसी अमेरिका के उम्रदराज राष्ट्रपति के भारत दौरे के समय वे दिल्ली को चार दिन की छुट्टी पर भेज रहे हैं। अमेरिका ने तो कभी भारत के प्रधानमंत्री के लिए वाशिंगटन में चार दिन की तो छोड़िये एक दिन की भी छुट्टी घोषित नहीं की ! लेकिन हम तो हम हैं। सब भुला देते हैं। हमें तो अपना डंका बजाने से मतलब है।</p>
<p>मै मानता  हूँ तो आप भी माने ये जरूरी नहीं कि हमारे प्रधानमंत्री जी पक्के कर्मयोगी है।  वीतरागी है।  आपने देखा वे 24  में से 18  घंटे काम करते हैं। लगातार चुनाव प्रचार करते है। उद्घाटन,शिलान्यास करते है।  ये सब विकास के लिए ही तो किया जाता है।  आपने देखा हमारा मणिपुर तीन महीने से ज्यादा समय तक जला ,[आज भी जल रहा है ] लेकिन प्रधानमंत्री जी एक दिन भी विचलित हुए । उन्होंने किसी से कुछ कहा ? संसद में हंगामा होता रहा लेकिन उन्होंने अपनी मौन साधना भंग नहीं होने दी। वे बोले,  लेकिन तब बोले जब उनका मन हुआ ।  वे अपने मन की सुनते है।  पक्के मनमौजी है।  मन की मौज न हो तो सब बेकार है ।  मन मौजी होने में और मनमानी करने  में अंतर् है। ठीक वैसा ही अंतर् जैसा पेरिस और पेरिस लॉन्ड्री में।</p>
<p>इस समय देश से ज्यादा देश का विपक्ष प्रधानमंत्री जी से डरा हुआ है ।  विपक्ष को आशंका  है कि प्र्धानमंत्री जी कहीं आने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में चंद्रयान-3  की कामयाबी  को उसी तरह न भुना लें जैसे वे पुलवामा को भुना चुके हैं। सवाल ये है कि प्रधानमंत्री जी को ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए ? उन्हें पूरा हक बनता है कि वे चंद्रयान-3  की कामयाबी को चुनावों में जितना चाहें  भुनाए ।  वे आखिर देश के प्र्धानमंत्री हैं। उन्हें यदि किसी भी घटना-दुर्घटना को भुनाना आता है तो किसी को आपत्ति क्यों ? मुझे तो बिलकुल नहीं हैं। </p>
<p>मै तो चाहता हूँ कि चंद्रयान-3  की कामयाबी के बदले जितने ज्यादा से ज्यादा वोट प्रधानमंत्री जी को और उनकी पार्टी को मिल सकते हैं,जरूर मिलें। विपक्ष को इसका कोई हक नहीं है कि वो प्रधानमंत्री जी को चंद्रयान-3  की कामयाबी को भुनाने से रोके। विपक्ष का काम है सड़कें  नापना  सो  शौक  से नापे  ,किसी ने रोका  है क्या ? बहरहाल पधानमंत्री जी को बहुत-बहुत बधाइयां ,शुभकामनाएं।</p>
<p><strong>राकेश अचल </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 25 Aug 2023 14:34:04 +0530</pubDate>
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