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                <title>देशभक्ति - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>देशभक्ति RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>राजस्थान के बीकानेर आर्मी कैंप में आतंकी हमले में बस्ती का अग्निवीर जवान वीरगति को प्राप्त होने की खबर से क्षेत्र में शोक की लहर</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div style="text-align:justify;">
<blockquote class="format1">बस्ती।</blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">बस्ती जिले के मुंडेरवा नगर पंचायत अंतर्गत उमरी अहरा गांव निवासी 22 वर्षीय अग्निवीर नरेंद्र कुमार यादव के वीरगति को प्राप्त होने की सूचना से पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है।परिजनों के अनुसार शनिवार को ड्यूटी के दौरान हुई घटना के बाद रात करीब 8 बजे छोटे भाई के मोबाइल पर शहादत की सूचना मिली। खबर मिलते ही परिवार में कोहराम मच गया और पूरे गांव में मातम छा गया। ग्रामीण बड़ी संख्या में शोक संतप्त परिवार को ढांढस बंधाने पहुंच रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">नरेंद्र कुमार यादव गरीब किसान रामरक्षा यादव के पुत्र थे और परिवार के</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182763/there-is-a-wave-of-mourning-in-the-area-due"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/img-20260705-wa0091.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<blockquote class="format1">बस्ती।</blockquote>
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<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बस्ती जिले के मुंडेरवा नगर पंचायत अंतर्गत उमरी अहरा गांव निवासी 22 वर्षीय अग्निवीर नरेंद्र कुमार यादव के वीरगति को प्राप्त होने की सूचना से पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है।परिजनों के अनुसार शनिवार को ड्यूटी के दौरान हुई घटना के बाद रात करीब 8 बजे छोटे भाई के मोबाइल पर शहादत की सूचना मिली। खबर मिलते ही परिवार में कोहराम मच गया और पूरे गांव में मातम छा गया। ग्रामीण बड़ी संख्या में शोक संतप्त परिवार को ढांढस बंधाने पहुंच रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नरेंद्र कुमार यादव गरीब किसान रामरक्षा यादव के पुत्र थे और परिवार के सबसे बड़े सहारा माने जाते थे। वर्ष 2024 में अग्निवीर योजना के तहत भारतीय सेना में भर्ती हुए नरेंद्र ने छह माह का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद बीकानेर में अपनी पहली तैनाती संभाली थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गांव के लोगों ने नरेंद्र को मेहनती, अनुशासित, सरल स्वभाव और मिलनसार युवा बताते हुए कहा कि उन्होंने कम उम्र में ही देश सेवा का संकल्प लिया था। उनकी वीरगति की सूचना से पूरे क्षेत्र में गहरा शोक व्याप्त है और हर आंख नम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परिजनों को उम्मीद है किराजस्थान के बीकानेर स्थित एक आर्मी कैंप पर कथित आतंकी हमले की सूचना के बीच जनपद बस्ती के मुंडेरवा नगर पंचायत अंतर्गत उमरी अहरा गांव निवासी 22 वर्षीय अग्निवीर नरेंद्र कुमार यादव के वीरगति को प्राप्त होने की सूचना से पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परिजनों के अनुसार शनिवार को ड्यूटी के दौरान हुई घटना के बाद रात करीब 8 बजे छोटे भाई के मोबाइल पर शहादत की सूचना मिली। खबर मिलते ही परिवार में कोहराम मच गया और पूरे गांव में मातम छा गया। ग्रामीण बड़ी संख्या में शोक संतप्त परिवार को ढांढस बंधाने पहुंच रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नरेंद्र कुमार यादव गरीब किसान रामरक्षा यादव के पुत्र थे और परिवार के सबसे बड़े सहारा माने जाते थे। वर्ष 2024 में अग्निवीर योजना के तहत भारतीय सेना में भर्ती हुए नरेंद्र ने छह माह का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद बीकानेर में अपनी पहली तैनाती संभाली थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गांव के लोगों ने नरेंद्र को मेहनती, अनुशासित, सरल स्वभाव और मिलनसार युवा बताते हुए कहा कि उन्होंने कम उम्र में ही देश सेवा का संकल्प लिया था। उनकी वीरगति की सूचना से पूरे क्षेत्र में गहरा शोक व्याप्त है और हर आंख नम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परिजनों को उम्मीद है कि शहीद जवान का पार्थिव शरीर सोमवार प्रातः लगभग 6 बजे उनके पैतृक गांव उमरी अहरा पहुंचेगा, जहां पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाएगी। क्षेत्रवासियों ने वीर सपूत को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी शहादत को राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान बताया।मां भारती के वीर सपूत नरेंद्र कुमार यादव की शहादत को शत-शत नमन। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोकाकुल परिवार को इस असहनीय दुख को सहने की शक्ति प्रदान करें।"</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
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</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 21:00:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत की एकता और प्रगति के प्रति समर्पित एक जीवन-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182749/a-life-dedicated-to-the-unity-and-progress-of-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/whatsapp-image-2026-07-05-at-17.40.45.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद जी ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका संकल्प और सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी। जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे। इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप थे। शिक्षाविदों के एक सम्मेलन में डॉ. मुखर्जी ने कहा था, ‘’शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना गलत है। हमें विद्यार्थियों को ऐसे तैयार करना होगा ताकि वे नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। हमारी स्वशासी संस्थाओं जैसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो सकें। इसके साथ ही वे वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें।’’</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने नेतृत्व में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें लाइब्रेरी की सुविधाओं में सुधार, विज्ञान में रिसर्च को बढ़ावा देना, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करना शामिल था। उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना विकसित हो, इसके लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न 'दीपक' यानि मिट्टी का दीया रखा गया। एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनका विजन बहुत विराट था। वे उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वे वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे। उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल की। इसके माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे।  </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहां मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूं। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को  निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे।  </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">75 वर्ष पहले पंडित नेहरू पहला संविधान संशोधन लेकर आए। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया। तब डॉ. मुखर्जी इसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे। वे भली-भांति समझ चुके थे कि कांग्रेस किस हद तक जा सकती है। समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई। जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा। इतना ही नहीं, 50 वर्ष पहले 42वां संविधान संशोधन अधिनियम लाकर एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर कुठाराघात किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों को भोजन मिल सके, जिसके लिए कई कैंटीन और रिलीफ सेंटर शुरू किए गए। एक ओर वे लोगों की पीड़ा से बहुत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से अत्यंत आक्रोशित भी थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए पंचाशेर मन्वंतर नाम की एक किताब भी लिखी। 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया था, ‘’आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।’’ आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उस भारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<blockquote class="format1"><strong>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी</strong></blockquote>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 17:49:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>महुआ डाबर महोत्सव में गूंजा शहीदों का स्मरण, मशाल यात्रा से क्रांतिवीरों को दी श्रद्धांजलि</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की अमर गाथा और गुमनाम शहीदों की स्मृति को समर्पित तीन दिवसीय “महुआ डाबर महोत्सव-2026” के दूसरे दिन ऐतिहासिक क्रांति स्थल पर भावपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया। महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा आयोजित इस महोत्सव में स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास को याद करते हुए कई प्रेरणादायी आयोजन हुए।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के दौरान भारत सरकार द्वारा निर्मित आधे घंटे की ऐतिहासिक एवं मार्मिक ऑडियो डॉक्यूमेंट्री ‘महुआ डाबर: निशां अभी बाक़ी हैं’ का श्रवण कराया गया। डॉक्यूमेंट्री सुनकर उपस्थित लोग भावुक हो उठे। इसमें ‘गैर-चिरागी’ महुआ डाबर के आम लोगों के अनुभवों के</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180938/remembrance-of-martyrs-echoed-in-mahua-dabur-mahotsav-tribute-paid"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260610-wa0028.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की अमर गाथा और गुमनाम शहीदों की स्मृति को समर्पित तीन दिवसीय “महुआ डाबर महोत्सव-2026” के दूसरे दिन ऐतिहासिक क्रांति स्थल पर भावपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया। महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा आयोजित इस महोत्सव में स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास को याद करते हुए कई प्रेरणादायी आयोजन हुए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के दौरान भारत सरकार द्वारा निर्मित आधे घंटे की ऐतिहासिक एवं मार्मिक ऑडियो डॉक्यूमेंट्री ‘महुआ डाबर: निशां अभी बाक़ी हैं’ का श्रवण कराया गया। डॉक्यूमेंट्री सुनकर उपस्थित लोग भावुक हो उठे। इसमें ‘गैर-चिरागी’ महुआ डाबर के आम लोगों के अनुभवों के साथ महुआ डाबर का उत्खनन करने वाले लखनऊ विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार, महुआ डाबर संग्रहालय के निदेशक डॉ. शाह आलम राना तथा उत्तर प्रदेश पर्यटन की पूर्व विशेष सचिव ईशा प्रिया के विचार शामिल हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">‘महुआ डाबर: निशां अभी बाक़ी हैं’ की स्क्रिप्ट एवं प्रस्तुति नवोदिता मिश्रा ने की है। वाचन स्वर रितु राजपूत तथा नाट्यांश स्वर मनोज मयंकर का है। गीत के रचयिता कर्नल तिलकराज और गायक डॉ. ग़ज़ल श्रीनिवास हैं। आकाशवाणी संवाददाता दीपांकर मिश्र, प्रस्तुति सहयोगी शिवाली एवं संयोजन राम अवतार बैरवा का रहा।</div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम के समापन पर महुआ डाबर के क्रांतिवीरों को मशालों के साथ श्रद्धांजलि अर्पित की गई। सैकड़ों युवाओं ने हाथों में जलती मशाल लेकर क्रांति स्थल की परिक्रमा की और शहीदों के प्रति सम्मान व्यक्त किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर क्रांतिकारी वंशज डॉ. शाह आलम राना ने कहा कि वर्ष 1857 में अंग्रेजों ने महुआ डाबर को ‘गैर-चिरागी’ घोषित कर यहां दीपक और चिराग जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। आज मशाल जलाकर यह संदेश दिया गया है कि शहीदों की स्मृति का चिराग 169 वर्ष बाद भी बुझा नहीं है। उन्होंने कहा कि मशाल क्रांति की वह ज्वाला है जो कभी बुझनी नहीं चाहिए। युवाओं को मशाल सौंपकर यह संकल्प दिलाया गया कि वे महुआ डाबर के गौरवशाली इतिहास को देश-दुनिया तक पहुंचाएंगे।</div>
<div style="text-align:justify;">आयोजकों ने बताया कि 10 जून को ‘शौर्य दिवस’ के अवसर पर सुबह शहीद स्थल पर सशस्त्र पुलिस गारद द्वारा सलामी दी जाएगी। इसके बाद ‘विरासत संरक्षण संकल्प सभा’ का आयोजन होगा।</div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों, इतिहास प्रेमियों, युवाओं एवं समाजसेवियों का विशेष सहयोग रहा।</div>
<div style="text-align:justify;">इस अवसर पर अतुल सिंह, नासिर खान, केपी राठौर, मोहम्मद कैफ, ऋतिक कुमार, सुनील पंडित, श्रवण कुमार, फ़कीर मोहम्मद, विनोद कुमार यादव, मुमताज़ खान, अनूप कुमार एडवोकेट, रमजान खान, धर्मेन्द्र, प्रणब मुखर्जी, आदिल खान, रामकेश गौतम, प्रभाकर चौधरी, नागेंद्र प्रताप</div>
<div style="text-align:justify;">आदि लोग मौजूद रहे.</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 17:49:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>11जून को पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की जयंती है!इस अवसर पर यह आलेख है</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>शाहजहाँपुर </strong>की मिट्टी ने 11 जून 1897 को मुझे जन्म दिया था। माँ का नाम मूलमती, पिता का नाम मुरलीधर। घर गरीब था, पर सीना गर्व से भरा था। दादा ग्वालियर से अकाल के दिनों में भागकर यहाँ आए थे। दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष देखा, इसलिए बचपन से ही मन में ठान लिया था कि इस गुलामी को उखाड़ फेंकना है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">तुम मुझे आज "सरफरोशी की तमन्ना" वाले शायर के नाम से जानते हो। पर मैं पहले क्रांतिकारी था, बाद में कवि बना। कलम और बंदूक दोनों मेरे हथियार थे। आज मैं तुम्हें वही रात सुनाऊँगा जिसने</div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180928/11th-june-is-the-birth-anniversary-of-pandit-ram-prasad"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260610-wa0050.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div><div><div style="text-align:justify;"><strong>शाहजहाँपुर </strong>की मिट्टी ने 11 जून 1897 को मुझे जन्म दिया था। माँ का नाम मूलमती, पिता का नाम मुरलीधर। घर गरीब था, पर सीना गर्व से भरा था। दादा ग्वालियर से अकाल के दिनों में भागकर यहाँ आए थे। दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष देखा, इसलिए बचपन से ही मन में ठान लिया था कि इस गुलामी को उखाड़ फेंकना है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">तुम मुझे आज "सरफरोशी की तमन्ना" वाले शायर के नाम से जानते हो। पर मैं पहले क्रांतिकारी था, बाद में कवि बना। कलम और बंदूक दोनों मेरे हथियार थे। आज मैं तुम्हें वही रात सुनाऊँगा जिसने मेरी ज़िंदगी बदल दी। 9 अगस्त 1925 की काकोरी की रात।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">बैठो, ये कहानी छोटी नहीं है। ये वो दास्तान है जो खून, पसीने और मिट्टी की खुशबू से लिखी गई है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1925 का हिंदुस्तान देखो। अंग्रेज़ हर चीज़ पर टैक्स लगा रहे थे। नमक पर, कपड़े पर, रेल के टिकट पर। किसान की फसल सस्ते में लूट ली जाती, और उसी फसल को दुगने दाम पर बेचा जाता। लगान न दे पाने पर गाँव के गाँव उजड़ जाते थे। कांग्रेस वाले सत्याग्रह कर रहे थे, लाठी खा रहे थे, जेल जा रहे थे। मैं उनका सम्मान करता हूँ। गांधी जी का अहिंसा का रास्ता लाखों को जोड़ रहा था। पर मेरा दिल कहता था कि जो राज़ बंदूक के दम पर आया है, वो बंदूक के दम पर ही जाएगा।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1924 में हमने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाई। मैं, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी, सचिंद्र बख्शी, मनमथनाथ गुप्त। सबकी उम्र 25 से कम थी। पर हौसला पहाड़ से ऊँचा था। हमारा मकसद साफ था। अंग्रेजों के पास हथियार हैं, पैसा है, ताकत है। हमारे पास कुछ नहीं। तो हम उनका ही खजाना लूटेंगे। उसी पैसे से हथियार खरीदेंगे। उसी हथियार से क्रांति का अलाव जलाएंगे। लोग कहते थे ये डकैती है। मैं कहता हूँ, जब एक देश को लूटा जा रहा हो, तो लुटेरों से लूटना डकैती नहीं, कर्तव्य है।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मौका मिला 9 अगस्त 1925 को। लखनऊ से सहारनपुर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन रोज़ सरकारी खजाना ले जाती थी। लखनऊ, शाहजहाँपुर, बरेली, मुरादाबाद के सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह इसी ट्रेन में होती थी। गार्ड के डिब्बे में लोहे की पेटियाँ रखी होती थीं। वही हमारा निशाना था। काकोरी लखनऊ से 15 मील दूर एक छोटा स्टेशन है। हमने तय किया कि ट्रेन जैसे ही काकोरी पार करेगी, चेन खींचकर रोक देंगे। गार्ड का डिब्बा तोड़ेंगे, खजाना निकालेंगे और जंगल में गायब हो जाएंगे।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">टीम में दस लोग थे। मैं "राम" बनकर बैठा था। अशफाक "अहमद" बनकर। चंद्रशेखर आज़ाद हमारा बाहुबल था। राजेंद्र लाहिड़ी का दिमाग ठंडा था, निशाना पक्का था। मनमथनाथ सबसे छोटा था, पर हिम्मत में सबसे बड़ा। सचिंद्र बख्शी, मुरारी शर्मा, मुकुंदी लाल, केशव चक्रवर्ती भी साथ थे। हमने हफ्तों तक रिहर्सल की। शाहजहाँपुर के जंगलों में रात-रात भर अभ्यास किया। कैसे चेन खींचनी है, कैसे ताला तोड़ना है, कैसे भागना है। मैंने उस दिन अपनी डायरी में लिखा था: "अगर हम मर गए तो शहीद कहलाएँगे। अगर बच गए तो क्रांति का बीज बो देंगे।"</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">9 अगस्त की दोपहर। धूप आग बरसा रही थी। हम अलग-अलग स्टेशनों से ट्रेन में चढ़े। टिकट लेकर, आम मुसाफिर बनकर। ट्रेन चली। दिल की धड़कनें तेज थीं। पर चेहरे पर कोई भाव नहीं था। जैसे ही ट्रेन काकोरी स्टेशन पार कर जंगल की तरफ बढ़ी, मनमथनाथ ने चेन खींच दी। कड़क की आवाज़ आई। ट्रेन हिली और रुक गई। हम आठ लोग एक साथ उठे। गार्ड के डिब्बे की तरफ लपके। ताला तोड़ा। अंदर लोहे की पेटियाँ थीं। चंद्रशेखर ने रिवॉल्वर तान दी और कहा, "खोलो जल्दी!" गार्ड का चेहरा पीला पड़ गया। उसने कांपते हाथों से चाबी दे दी।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पेटियाँ खुलीं। नोटों की गड्डियाँ, सिक्के, सरकारी कागज। हमने अंदाजा लगाया, लगभग आठ हजार रुपये। आज के हिसाब से करीब पंद्रह लाख। लेकिन तभी गलती हो गई। शायद गार्ड ने ब्रेक छोड़ा, या ट्रेन अपने आप हिल गई। राजेंद्र ने जल्दी में एक पेटी धक्का देकर नीचे फेंक दी। धमाके की आवाज़ हुई। उसी धमाके में एक यात्री अहमद अली नीचे गिर गया। सिर पर चोट लगी और उसकी मौत हो गई। उस पल मेरा कलेजा बैठ गया। हम लुटेरे नहीं थे। हमारा मकसद किसी की जान लेना नहीं था। पर क्रांति में खून बहता ही है। उस दिन मैंने जाना कि आज़ादी की कीमत सिर्फ हमारा खून नहीं होता, कभी-कभी बेगुनाहों का खून भी बहता है। उस यात्री की मौत का बोझ आज भी मेरे सीने पर है। हमने जितना हो सका खजाना समेटा और जंगल में भागे। पीछे पुलिस की सीटी बज रही थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लूट के बाद हम बिखर गए। पर अंग्रेज़ों की सीआईडी कोई कम नहीं थी। गाँव-गाँव, घर-घर छान मारा। मुखबिरों को पैसा दिया गया। सबसे पहले राजेंद्र लाहिड़ी पकड़े गए। फिर मैं 1 नवंबर 1925 को शाहजहाँपुर में पकड़ा गया। अशफाक दिल्ली में गिरफ्तार हुआ। चंद्रशेखर आज़ाद बच निकले। वो 1931 तक लड़े, और जब चारों तरफ से घिर गए तो खुद को गोली मार ली। जिंदा पकड़े जाने से बेहतर मौत थी उनके लिए।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मुकदमा चला लखनऊ में। नाम दिया गया "काकोरी षड्यंत्र केस"। कठघरे में खड़े होकर मैंने जज से कहा: "हम चोर नहीं हैं। हम वो लोग हैं जो अपनी माँ भारत को आज़ाद कराना चाहते हैं। अगर इसके लिए फाँसी भी मिले, तो वो हमारे लिए माला है।" अदालत ने 40 लोगों पर मुकदमा चलाया। 16 को सज़ा हुई। मुझे, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को फाँसी की सज़ा सुनाई गई। फैसला सुनकर मैं हँस पड़ा। "मौत से डरते तो हम 14 साल की उम्र में आर्य समाज न ज्वाइन करते।" मुकदमे के दौरान हमने कोर्ट को ही अपना मंच बना लिया। हर पेशी पर देशभक्ति के नारे लगते थे। "इंकलाब ज़िंदाबाद" की गूँज पूरे लखनऊ में सुनाई देती थी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मुझे गोरखपुर जेल की कोठरी नंबर 11 में रखा गया। फाँसी 19 दिसंबर 1927 को तय हुई। मेरे पास 40 दिन थे। मैं रोया नहीं। माफी नहीं माँगी। मैंने कलम उठाई। पेंसिल से 120 पन्ने लिखे। मेरी आत्मकथा _कातिल की कलम से_। मैंने लिखा कि कैसे मेरा दादा अकाल में ग्वालियर छोड़कर आया था। कैसे माँ ने मुझे भूखे पेट सुलाया था। कैसे 14 साल की उम्र में स्वामी दयानंद सरस्वती की _सत्यार्थ प्रकाश_ ने मेरे अंदर आग लगा दी थी। कैसे मैंने "मैनपुरी षड्यंत्र" में हिस्सा लिया था 1918 में।  </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">रात को नींद नहीं आती थी। अशफाक पास वाली कोठरी में था। हम दीवार के उस पार बात करते थे। एक रात मैंने उससे कहा, "अशफाक, अगर हम बच गए तो साथ मिलकर मदरसा खोलेंगे। जहाँ हिंदू-मुस्लिम दोनों पढ़ेंगे।" उसने जवाब दिया, "बिस्मिल भाई, हम बचेंगे नहीं। लेकिन हमारे मरने के बाद हिंदुस्तान देखेगा कि हिंदू-मुस्लिम एक साथ मर सकते हैं।" उसी जेल में मैंने "मेरा रंग दे बसंती चोला" लिखा।  </div><div style="text-align:justify;">_"मेरा रंग दे बसंती चोला,  </div><div style="text-align:justify;">माय रंग दे बसंती चोला।"_  </div><div style="text-align:justify;">सोचो, जिसे कल फाँसी होनी है, वो बसंत की बात कर रहा है। मौत से डरने वाला ऐसा नहीं लिखता। जेल में मुझे रोज़ गीता पढ़ने का मौका मिलता था। मैंने पाया कि गीता में भी कर्म और त्याग की बात है। कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, "कर्म करो, फल की चिंता मत करो।" वही मैं कर रहा था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लोग पूछते हैं, हिंदू-मुस्लिम एक साथ कैसे लड़ सकते हैं? मैं कहता हूँ, देखो अशफाक को। अशफाक उल्ला खाँ शाहजहाँपुर का ही था। उसकी उम्र मुझसे दो साल छोटी थी। जब पहली बार मिला था, तो लगा जैसे बरसों का साथी हो। वो उर्दू का शायर था। मैं हिंदी का। वो कुरान पढ़ता था, मैं गीता। पर जब देश की बात आती, तो हम एक थे। काकोरी की रात उसने मुझसे कहा था, "बिस्मिल भाई, अगर आज हम मर गए तो हिंदुस्तान देखेगा कि हिंदू-मुस्लिम अलग नहीं हैं।" और वही हुआ। 19 दिसंबर 1927 को हम एक साथ फाँसी पर चढ़े। अशफाक की आखिरी ख्वाहिश थी कि उसकी लाश को शाहजहाँपुर में दफनाया जाए। अंग्रेजों ने मना कर दिया। उसे फैजाबाद में दफनाया गया। आज भी उसकी मजार पर हिंदू-मुस्लिम दोनों चादर चढ़ाते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">18 दिसंबर की रात जेलर आया। बोला, "बिस्मिल, कल सुबह छह बजे फाँसी है।" मैंने नहाया, नए कपड़े पहने, गीता का पाठ किया। अशफाक ने कुरान पढ़ी। रोशन सिंह ने गुरुवाणी गाई। रात को मैंने आखिरी शेर लिखा:  </div><div style="text-align:justify;">_"अगर एक झटके में कुर्बानी दे दूँ तो क्या है,  </div><div style="text-align:justify;">बार-बार मरूँ वतन पर यही आरजू है।"_  </div><div style="text-align:justify;">सुबह पाँच बजे दरवाजा खुला। मैं बाहर निकला। फाँसी का तख्ता तैयार था। जेलर ने पूछा, "आखिरी इच्छा?" मैंने कहा, "मेरे शरीर को तिरंगे में लपेट देना। और हाँ, मेरे मरने के बाद मेरी कविताएँ मत जलाना।" फंदा मेरे गले में डाला गया। मैंने ऊपर देखा। आसमान साफ था। और मेरे मुँह से निकला:  </div><div style="text-align:justify;">_"देश हित पैदा हुए हैं, देश पर मर जाएंगे।  </div><div style="text-align:justify;">मरते-मरते देश को ज़िंदा मगर कर जाएंगे।"_  </div><div style="text-align:justify;">धड़ाम की आवाज़ आई। और सब शांत हो गया। उसी दिन अशफाक, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी भी फाँसी पर चढ़े। चार नौजवान। चार धर्म। एक मकसद।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हमारी फाँसी ने हिंदुस्तान को झकझोर दिया। अखबारों में लिखा गया, "चार नौजवान, चार धर्म, एक मकसद"। हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बन गई हमारी फाँसी। काकोरी के बाद क्रांति की आग और भड़क गई। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाई। भगत सिंह कहते थे, "बिस्मिल का खून बेकार नहीं जाएगा।" उन्होंने "मेरा रंग दे बसंती चोला" को अपना नारा बनाया। लाहौर षड्यंत्र केस में फाँसी से पहले वही गीत गाया था। 1947 में जब आज़ादी मिली, तो नेहरू ने लाल किले से कहा था कि आज़ादी में उन अनाम शहीदों का खून शामिल है जिनके नाम इतिहास में नहीं लिखे गए। मेरा नाम लिखा गया। पर मैं अनाम रहना पसंद करता। क्योंकि क्रांति किसी एक नाम से नहीं होती।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आज 2025 है। हिंदुस्तान आज़ाद है। पर मैं देखता हूँ कि तुम लोग आपस में लड़ रहे हो। हिंदू-मुस्लिम, जाति-धर्म, भाषा-प्रांत। अशफाक और मैं अगर आज ज़िंदा होते, तो हमारा पहला काम ये होता कि तुम्हें समझाते। दुश्मन बाहर नहीं, अंदर है। नफरत ही असली अंग्रेज है। मेरी कविता याद रखो:  </div><div style="text-align:justify;">_"देश हित पैदा हुए हैं, देश पर मर जाएंगे।"_  </div><div style="text-align:justify;">देश हित मतलब सिर्फ सीमा पर लड़ना नहीं। देश हित मतलब भूखे को खाना खिलाना, बीमार का इलाज करना, लड़की को पढ़ाना। अगर तुम ऐसा करोगे, तो मेरी फाँसी बेकार नहीं जाएगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">काकोरी कांड में हमने आठ हजार रुपये लूटे थे। पर जो हमने लूटा वो पैसा नहीं था। हमने अंग्रेजों का डर लूटा था। हमने नौजवानों का खौफ तोड़ा था। हमने साबित किया कि 20-25 साल के लड़के भी साम्राज्य को चुनौती दे सकते हैं। आज तुम मोबाइल चलाते हो, मैं कलम चलाता था। ज़माना बदला है, लेकिन दुश्मन वही है। अन्याय, गरीबी, नफरत। मेरी कलम अब तुम्हारे हाथ में है। लिखो। बोलो। लड़ो। लेकिन याद रखो, बंदूक से पहले दिल जीतना ज़रूरी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जेल में मैंने कई गीत लिखे। कुछ छपे, कुछ खो गए। "सरफरोशी की तमन्ना" तो तुम जानते ही हो। पर एक और गीत था जो मैं अक्सर गाता था:  </div><div style="text-align:justify;">_"वतन पर जो फिदा होगा,  </div><div style="text-align:justify;">अमर वो नौजवान होगा।  </div><div style="text-align:justify;">रहेगा याद दुनिया में,  </div><div style="text-align:justify;">वही बेनामो-निशान होगा।"_  </div><div style="text-align:justify;">मैं चाहता था कि नौजवान डरना छोड़ दे। मरना नहीं, जीना सीखे। पर ऐसे जीना जो गुलामी में न हो। भगत सिंह ने लिखा था कि वो मेरी कविताएँ पढ़कर ही क्रांतिकारी बना। अगर मेरी एक कविता ने भगत सिंह को बना दिया, तो मेरा जीवन सफल है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मैं रामप्रसाद बिस्मिल। शाहजहाँपुर का बेटा। हिंदुस्तान का दीवाना। 30 साल की उम्र में फाँसी पर चढ़ गया। पर मेरे शब्द आज भी ज़िंदा हैं। अगर तुम "सरफरोशी की तमन्ना" गुनगुनाओगे, तो मैं मरा नहीं कहलाऊँगा।  </div><div style="text-align:justify;">_"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,  </div><div style="text-align:justify;">देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-कातिल में है।"_  </div><div style="text-align:justify;">मेरी कहानी खत्म हुई। अब तुम्हारी शुरू होती है। तुम क्या करोगे? क्या तुम भी देश के लिए कुछ करोगे? या सिर्फ इतिहास पढ़कर भूल जाओगे? फैसला तुम्हारा है।</div></div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt"><div class="hp"><br /></div><div class="eqJbab cZD3Qb"><br /></div></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 16:34:28 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>स्वाधीनता संग्राम में अमर नाम है राम प्रसाद बिस्मिल का</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr"><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वैचारिक चेतना और सशस्त्र क्रांति का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जिसने दमनकारी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलाकर रख दी थी। इस अद्वितीय संगम के सबसे प्रखर प्रतीक पुरुष थे अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल। वे केवल एक निर्भीक सेनानी ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुवादक और बहुभाषाविद भी थे। उनकी कलम से निकले शब्द जहाँ युवाओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधका देते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनके हाथों में थमी पिस्तौल विदेशी शासकों के मन में भय का संचार करती थी। कलम और पिस्तौल का</span></p></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180910/ram-prasad-bismils-immortal-name-in-the-freedom-struggle"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr"><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वैचारिक चेतना और सशस्त्र क्रांति का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जिसने दमनकारी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलाकर रख दी थी। इस अद्वितीय संगम के सबसे प्रखर प्रतीक पुरुष थे अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल। वे केवल एक निर्भीक सेनानी ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुवादक और बहुभाषाविद भी थे। उनकी कलम से निकले शब्द जहाँ युवाओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधका देते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनके हाथों में थमी पिस्तौल विदेशी शासकों के मन में भय का संचार करती थी। कलम और पिस्तौल का ऐसा अद्भुत संतुलन इतिहास में विरला ही देखने को मिलता है। उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति हंसते-हंसते दे दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रवाद का एक ऐसा अनुपम आदर्श स्थापित किया जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस महान क्रांतिकारी का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर नामक नगर में हुआ था। उनके पिता मुरलीधर एक साधारण और स्वाभिमानी व्यक्ति थे जबकि उनकी माता मूलमती धार्मिक और दृढ़ संकल्प वाली महिला थीं। बिस्मिल के व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी माता का प्रभाव सबसे गहरा था जिन्होंने उन्हें सदा सत्य और देशप्रेम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। बचपन में उनकी शिक्षा-दीक्षा स्थानीय स्तर पर हुई जहाँ उन्होंने हिंदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्दू और संस्कृत भाषाओं का गहन अध्ययन किया। वे उर्दू में बिस्मिल उपनाम से कविताएँ लिखते थे जबकि हिंदी में राम और अज्ञात के नाम से उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। किशोरावस्था में स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों और आर्य समाज के सिद्धांतों ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी जिससे उनके भीतर अनुशासन और राष्ट्र सेवा का संकल्प और अधिक सुदृढ़ हो गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की पराधीनता और देशवासियों पर होने वाले अत्याचारों ने उन्हें सक्रिय क्रांति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए विवश कर दिया। वर्ष 1918 में उन्होंने मैनपुरी षड्यंत्र के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी जहाँ उन्होंने युवाओं का एक दल बनाकर देशभक्ति साहित्य का वितरण किया। इसके बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन को एक अधिक संगठित और राष्ट्रव्यापी रूप देने के प्रयास में जुट गए। इसी उद्देश्य से उन्होंने अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान गणतंत्र संघ नामक एक शक्तिशाली क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य लक्ष्य भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाना और एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना था। बिस्मिल इस संगठन के मुख्य रणनीतिकार और सेनापति थे। उनके नेतृत्व में चंद्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ जैसे महान क्रांतिकारियों ने अपनी देशभक्ति का पाठ सीखा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांतिकारी गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने और अस्त्र-शस्त्र खरीदने के लिए धन की अत्यधिक आवश्यकता थी। विदेशी सरकार से धन मांगना असंभव था और देश की गरीब जनता को लूटना क्रांतिकारियों के सिद्धांतों के विरुद्ध था। इसलिए बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की एक अत्यंत साहसिक योजना बनाई। 9 अगस्त 1925 को उनके कुशल नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने लखनऊ के समीप काकोरी नामक स्थान पर सहारनपुर से लखनऊ जा रही एक यात्री रेलगाड़ी को रोककर सरकारी खजाने को अपने नियंत्रण में ले लिया। इस ऐतिहासिक घटना को काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है। इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य को भीतर तक झकझोर दिया और सरकार ने क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। व्यापक धरपकड़ के बाद बिस्मिल सहित कई प्रमुख क्रांतिकारियों को बंदी बना लिया गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कारागार की चारदीवारों के भीतर भी बिस्मिल का हौसला तनिक भी कम नहीं हुआ। उन्होंने बंदीगृह को ही अपनी साधना स्थली बना लिया और वहाँ रहते हुए प्रचुर मात्रा में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा वहीं लिखी जो आज भी भारतीय क्रांतिकारी साहित्य का एक अनमोल रत्न मानी जाती है। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई विदेशी क्रांतिकारी ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद किया और अनेक प्रेरणादायक गीतों की रचना की। कारागार में रहते हुए उन्होंने अपने देशवासियों और विशेष रूप से युवाओं के नाम कई संदेश भेजे जिसमें उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने पर बल दिया। उनके विचार अत्यंत दूरदर्शी थे जो केवल अंग्रेजों को भगाने तक सीमित नहीं थे बल्कि वे एक शोषणमुक्त समाज का निर्माण करना चाहते थे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रिटिश अदालत ने काकोरी घटना का मुख्य सूत्रधार मानते हुए राम प्रसाद बिस्मिल को मृत्युदंड की सजा सुनाई। 19 दिसंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर कारागार में उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। फांसी के चबूतरे की ओर बढ़ते हुए उनके चेहरे पर कोई भय नहीं था बल्कि एक अलौकिक तेज था। उन्होंने हंसते हुए फंदे को चूमा और अपनी मातृभूमि की वंदना करते हुए प्राण त्याग दिए। उनकी अंतिम इच्छा यही थी कि वे बार-बार भारत भूमि पर जन्म लें और तब तक देश की सेवा करते रहें जब तक कि वह पूरी तरह से स्वतंत्र न हो जाए। उनका यह सर्वोच्च बलिदान व्यर्थ नहीं गया और इसने पूरे देश में क्रांति की एक ऐसी लहर पैदा कर दी जिसने अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत को औपनिवेशिक दासता से मुक्ति दिलाई।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राम प्रसाद बिस्मिल का जीवन और उनका कृतित्व इस बात का साक्षात प्रमाण है कि एक सच्चा देशभक्त केवल अस्त्रों से ही नहीं बल्कि अपने विचारों और नैतिक मूल्यों से भी लड़ता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए। आज भले ही वे हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं लेकिन उनकी कविताएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके विचार और उनका अदम्य साहस हर भारतीय के हृदय में सदैव जीवित रहेगा। राष्ट्र निर्माण और देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए उनका जीवन सदैव एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ की भांति हमें प्रेरणा देता रहेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 15:31:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>भारतीय अस्मिता के प्रतीक: वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>- महेन्द्र तिवारी </strong></div>
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<div style="text-align:justify;">भारतीय इतिहास की गौरवशाली परंपरा में महाराणा प्रताप का नाम एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र के समान है जिसकी आभा शताब्दियों के पश्चात भी तनिक भी फीकी नहीं पड़ी है। उनका व्यक्तित्व साहस, त्याग, अद्वितीय स्वाभिमान और अटूट राष्ट्रभक्ति का एक ऐसा संगम है जो विश्व इतिहास में विरले ही देखने को मिलता है। राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि पर अनेक योद्धाओं ने जन्म लिया, किंतु महाराणा प्रताप की विशिष्टता इस बात में निहित है कि उन्होंने उस समय की सबसे बड़ी वैश्विक शक्ति कहे जाने वाले मुगल साम्राज्य के सम्मुख सिर झुकाने के स्थान पर संघर्ष और</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178922/draft-add-your-titledraft-add-your-title"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/771a6d49-8b72-46dd-90b0-84b47203603f_1778316179956.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div style="text-align:justify;"><strong>- महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय इतिहास की गौरवशाली परंपरा में महाराणा प्रताप का नाम एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र के समान है जिसकी आभा शताब्दियों के पश्चात भी तनिक भी फीकी नहीं पड़ी है। उनका व्यक्तित्व साहस, त्याग, अद्वितीय स्वाभिमान और अटूट राष्ट्रभक्ति का एक ऐसा संगम है जो विश्व इतिहास में विरले ही देखने को मिलता है। राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि पर अनेक योद्धाओं ने जन्म लिया, किंतु महाराणा प्रताप की विशिष्टता इस बात में निहित है कि उन्होंने उस समय की सबसे बड़ी वैश्विक शक्ति कहे जाने वाले मुगल साम्राज्य के सम्मुख सिर झुकाने के स्थान पर संघर्ष और अभावों से भरे जीवन को प्राथमिकता दी। उनका संपूर्ण जीवन केवल युद्धों का संकलन मात्र नहीं है, अपितु यह मनुष्य की उस अदम्य इच्छाशक्ति का प्रमाण है जो किसी भी भौतिक प्रलोभन या भय के आगे पराजित नहीं होती। मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के इस तेजस्वी राजा ने यह सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्रता का मूल्य किसी भी सिंहासन या विलासिता से कहीं अधिक ऊंचा होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के सुप्रसिद्ध कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। उनके पिता महाराणा उदयसिंह द्वितीय मेवाड़ के शासक थे और उनकी माता रानी जयवंता बाई एक अत्यंत धार्मिक और स्वाभिमानी महिला थीं। प्रताप के व्यक्तित्व निर्माण में उनकी माता का प्रभाव सर्वोपरि था जिन्होंने बचपन से ही उन्हें रामायण और महाभारत की वीर कथाएं सुनाकर धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए प्रेरित किया। कुंभलगढ़ की पहाड़ियों में प्रताप का बचपन व्यतीत हुआ जहाँ उन्होंने स्थानीय भील जनजाति के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित किए। यही भील आगे चलकर उनकी सेना की रीढ़ बने और उन्हें प्यार से कीका कहकर पुकारते थे। बचपन से ही प्रताप अस्त्र शस्त्र के संचालन, घुड़सवारी और युद्ध कौशल में निपुण होने लगे थे। उनकी कद काठी अत्यंत प्रभावशाली थी और उनके चेहरे पर एक ऐसा तेज था जो उनके भावी नायक होने की पुष्टि करता था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जब प्रताप युवावस्था में पहुँचे तब भारत की राजनीतिक परिस्थितियाँ बड़ी तेजी से बदल रही थीं। मुगल सम्राट अकबर अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के माध्यम से पूरे भारत को एक ध्वज के नीचे लाने का प्रयास कर रहा था। राजस्थान के अधिकांश शक्तिशाली राजपूत राजाओं ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी और उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर लिए थे। किंतु मेवाड़ इस मार्ग में सबसे बड़ी बाधा था। चित्तौड़गढ़ पर 1568 में अकबर का भीषण आक्रमण हुआ जिसमें भारी रक्तपात हुआ और महाराणा उदयसिंह को सुरक्षित स्थानों की खोज में पहाड़ियों की ओर जाना पड़ा। इसी कठिन समय में 1572 में महाराणा उदयसिंह की मृत्यु के बाद प्रताप का राज्याभिषेक हुआ। उस समय मेवाड़ के पास न तो पर्याप्त धन था, न विशाल सेना और न ही चित्तौड़गढ़ जैसा अभेद्य दुर्ग, क्योंकि वह मुगलों के अधिकार में था। इसके बावजूद प्रताप ने हार मानने के स्थान पर मेवाड़ को पुनः स्वतंत्र कराने की प्रतिज्ञा ली।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अकबर जानता था कि यदि मेवाड़ उसकी अधीनता स्वीकार कर लेता है तो पूरे भारत पर उसका निर्बाध शासन होगा। इसलिए उसने प्रताप को समझाने के लिए चार बार दूत भेजे। सबसे पहले जलाल खान को भेजा गया, उसके बाद आमेर के राजा मानसिंह, फिर राजा भगवंत दास और अंत में टोडरमल को भेजा गया। इन दूतों ने प्रताप को बड़े बड़े प्रलोभन दिए और युद्ध की विभीषिका से डराया, लेकिन प्रताप का उत्तर स्पष्ट था कि वे किसी भी स्थिति में मुगलों के दास बनकर जीवित रहने के स्थान पर स्वतंत्र रहकर मृत्यु को गले लगाना श्रेष्ठ समझते हैं। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मेवाड़ की स्वतंत्रता का कोई सौदा नहीं हो सकता। यह निर्णय एक अत्यंत शक्तिशाली साम्राज्य के विरुद्ध सीधा संघर्ष मोल लेने जैसा था, जो किसी आत्मघाती कदम से कम नहीं जान पड़ता था, लेकिन प्रताप के लिए उनका आत्मसम्मान सर्वोपरि था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परिणामस्वरूप 18 जून 1576 को वह ऐतिहासिक युद्ध हुआ जिसे हम हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से जानते हैं। अरावली की संकरी पहाड़ियों में स्थित इस स्थान की मिट्टी हल्दी जैसी पीली होने के कारण इसे हल्दीघाटी कहा जाता है। एक ओर मुगल सेना थी जिसका नेतृत्व राजा मानसिंह कर रहे थे और उनके पास आधुनिक अस्त्र शस्त्र, हाथियों का विशाल दल और हजारों प्रशिक्षित सैनिक थे। दूसरी ओर महाराणा प्रताप की सेना थी जिसमें लगभग 20000 सैनिक थे जिनमें राजपूतों के साथ साथ हकीम खान सूरी के नेतृत्व में अफगान सैनिक और राणा पुंजा के नेतृत्व में भील धनुर्धारी सम्मिलित थे। युद्ध इतना भीषण था कि बनास नदी का जल सैनिकों के रक्त से लाल हो गया था। महाराणा प्रताप ने अपनी वीरता का ऐसा प्रदर्शन किया कि मुगल सेना के पैर उखड़ गए। उन्होंने अपने भाले के एक ही प्रहार से बहलोल खान को उसके घोड़े समेत दो टुकड़ों में चीर दिया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक भी अमर हो गया। चेतक की स्वामीभक्ति का उदाहरण आज भी जन जन की जुबान पर है। युद्ध के दौरान जब महाराणा प्रताप संकट में थे, तब गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद चेतक उन्हें रणक्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकाल ले गया। उसने अपने घायल पैरों के साथ एक चौड़े नाले को एक ही छलांग में पार कर लिया, जिसे मुगल सैनिक पार नहीं कर सके। अपने स्वामी की रक्षा करने के पश्चात चेतक ने प्राण त्याग दिए। चेतक की मृत्यु पर महाराणा प्रताप की आंखों में आंसू आ गए थे। इस युद्ध के बाद मुगलों को लगा था कि प्रताप की शक्ति समाप्त हो गई है, लेकिन यह तो उनके संघर्ष का केवल एक नया अध्याय था। हल्दीघाटी का युद्ध निर्णायक नहीं रहा क्योंकि अकबर न तो प्रताप को बंदी बना सका और न ही मेवाड़ को पूरी तरह जीत सका।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युद्ध के पश्चात महाराणा प्रताप का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा। उन्होंने अपने परिवार के साथ जंगलों और पहाड़ों में निवास किया। उस समय की कथाएं बताती हैं कि कई बार उनके बच्चों को घास की रोटियां खाकर दिन बिताने पड़े। एक बार जब एक जंगली बिल्ली ने उनके बच्चे के हाथ से घास की रोटी छीन ली और बच्चा रोने लगा, तो प्रताप का हृदय विचलित हुआ, लेकिन उन्होंने तुरंत स्वयं को संभाला और स्वतंत्रता के मार्ग से पीछे नहीं हटे। उन्होंने प्रण लिया था कि जब तक वे चित्तौड़ को मुक्त नहीं करा लेंगे, वे सोने चांदी के बर्तनों में भोजन नहीं करेंगे और कोमल शय्या पर नहीं सोएंगे। उन्होंने अपने महलों का त्याग कर दिया और घास के बिछौनों पर सोने लगे। उनके इस धैर्य और संकल्प ने संपूर्ण मेवाड़ की जनता में देशभक्ति का ज्वार पैदा कर दिया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कठिन समय में महाराणा प्रताप को उनके विश्वसनीय मंत्री और मित्र भामाशाह का सहयोग मिला। जब प्रताप के पास सेना को संगठित करने के लिए धन का अभाव था, तब भामाशाह ने अपनी जीवन भर की संपूर्ण संपत्ति महाराणा के चरणों में अर्पित कर दी। यह धनराशि इतनी अधिक थी कि इससे 25000 सैनिकों का खर्च 12 वर्षों तक उठाया जा सकता था। इस सहायता ने प्रताप के संघर्ष में नई जान फूंक दी। उन्होंने पुनः एक शक्तिशाली सेना का गठन किया और मुगलों के किलों पर आक्रमण करना प्रारंभ किया। प्रताप ने परंपरागत युद्ध पद्धति के स्थान पर छापामार युद्ध नीति अपनाई जिसे गुरिल्ला युद्ध कहा जाता है। पहाड़ियों के भूगोल से परिचित होने के कारण उनकी सेना अचानक मुगलों पर हमला करती और देखते ही देखते पहाड़ियों में ओझल हो जाती। मुगलों की विशाल सेना इस युद्ध पद्धति के आगे असहाय सिद्ध होने लगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">1582 में दिवेर का युद्ध हुआ जो महाराणा प्रताप की एक बड़ी सामरिक विजय थी। इस युद्ध में प्रताप ने मुगल चौकियों को ध्वस्त कर दिया और मुगलों के मनोबल को पूरी तरह तोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने धीरे धीरे मेवाड़ के अधिकांश क्षेत्रों को मुक्त करा लिया। उदयपुर, कुंभलगढ़ और गोगुंदा जैसे महत्वपूर्ण स्थान पुनः प्रताप के अधिकार में आ गए। मुगल सम्राट अकबर अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद प्रताप को झुका नहीं सका। अंततः अकबर ने भी मेवाड़ की ओर अभियान भेजना बंद कर दिया। महाराणा प्रताप ने अपनी नई राजधानी चावंड में स्थापित की जहाँ उन्होंने कला, साहित्य और कृषि को बढ़ावा दिया। उनके शासनकाल में प्रजा अत्यंत सुखी थी और लोग उन्हें अपना रक्षक मानते थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महाराणा प्रताप का अंत समय निकट आया जब 19 जनवरी 1597 को एक शिकार के दौरान उन्हें गहरी चोट लगी। 57 वर्ष की आयु में इस महान योद्धा ने अपनी अंतिम सांस ली। मृत्यु शय्या पर भी उन्हें केवल इस बात की चिंता थी कि कहीं उनके उत्तराधिकारी मुगलों के सामने झुक न जाएं। उनके पुत्र अमर सिंह और सामंतों ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वे मेवाड़ की स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे, तभी प्रताप की आत्मा को शांति मिली। कहा जाता है कि जब प्रताप की मृत्यु का समाचार अकबर को मिला, तो उसकी आंखों में भी आंसू आ गए थे। अकबर ने स्वयं स्वीकार किया था कि प्रताप जैसा महान और अडिग शत्रु मिलना असंभव है। यह एक विजेता की ओर से अपने प्रतिद्वंद्वी को दी गई सबसे बड़ी श्रद्धांजलि थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज भी महाराणा प्रताप का जीवन प्रत्येक भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वे केवल एक क्षेत्रीय राजा नहीं थे, बल्कि भारतीय अस्मिता और अखंडता के प्रतीक थे। उन्होंने यह संदेश दिया कि यदि आपके पास दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस है, तो संसाधनों का अभाव आपकी सफलता में बाधक नहीं बन सकता। उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर आज भी राजस्थान की गलियों में वीरता के गीत गूँजते हैं। साहित्यकारों ने उनकी वीरता पर अनेक काव्य रचे हैं जो आज भी युवाओं के भीतर जोश भर देते हैं। महाराणा प्रताप का नाम लेते ही एक ऐसे वीर का चित्र सामने आता है जो अपनी मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहता है। उनका त्याग, संघर्ष और अटूट निष्ठा आने वाली पीढ़ियों को सदैव यह सिखाती रहेगी कि स्वतंत्रता की रक्षा के लिए किया गया संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता और इतिहास केवल उन्हीं को स्थान देता है जो अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हैं।</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 May 2026 17:22:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>ऑपरेशन सिंदूर में जवानों की सेवा कर 11 वर्षीय श्रवण सिंह बना देशभक्ति, समर्पण और साहस का अद्भुत प्रतीक</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">जब किसी देश की सीमाओं पर सैनिक दिन-रात पहरा दे रहे होते हैं, तब पूरा राष्ट्र उनके साहस और त्याग के भरोसे निश्चिंत होकर जीवन जीता है। लेकिन कभी-कभी इसी देश की मिट्टी से ऐसे अनमोल रत्न जन्म लेते हैं, जो छोटी-सी उम्र में ही राष्ट्रसेवा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर देते हैं कि पूरा देश गर्व से भर उठता है। पंजाब के फिरोजपुर जिले के ‘चक तारा वाली’ गांव का 11 वर्षीय श्रवण सिंह ऐसा ही एक अद्भुत बालक है, जिसकी देशभक्ति और समर्पण की भावना ने करोड़ों भारतीयों का हृदय जीत लिया है। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178865/11-year-old-shravan-singh-became-a-wonderful-symbol-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/4488d7a01b06f10315418667501c682d17484130177341201_original.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">जब किसी देश की सीमाओं पर सैनिक दिन-रात पहरा दे रहे होते हैं, तब पूरा राष्ट्र उनके साहस और त्याग के भरोसे निश्चिंत होकर जीवन जीता है। लेकिन कभी-कभी इसी देश की मिट्टी से ऐसे अनमोल रत्न जन्म लेते हैं, जो छोटी-सी उम्र में ही राष्ट्रसेवा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर देते हैं कि पूरा देश गर्व से भर उठता है। पंजाब के फिरोजपुर जिले के ‘चक तारा वाली’ गांव का 11 वर्षीय श्रवण सिंह ऐसा ही एक अद्भुत बालक है, जिसकी देशभक्ति और समर्पण की भावना ने करोड़ों भारतीयों का हृदय जीत लिया है। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों और खेलों में खोए रहते हैं, उस उम्र में श्रवण सिंह भारतीय सेना के जवानों की सेवा में स्वयं को समर्पित कर चुका था। उसका हर कदम राष्ट्रभक्ति की उस पवित्र भावना से प्रेरित था, जो किसी साधारण बच्चे में नहीं, बल्कि किसी असाधारण आत्मा में ही दिखाई देती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब भारतीय सेना सीमा पर पूरी मुस्तैदी से डटी हुई थी, तब श्रवण सिंह बिना किसी भय और संकोच के जवानों के बीच पहुंचता रहा। सुबह होते ही वह चाय लेकर खेतों और कच्चे रास्तों से गुजरता हुआ सेना के कैंप तक पहुंच जाता। दोपहर की भीषण गर्मी में वह जवानों के लिए बर्फ लेकर जाता ताकि देश की रक्षा में लगे सैनिकों को थोड़ी राहत मिल सके। शाम के समय वह दूध और लस्सी लेकर फिर कैंप में पहुंच जाता। उसके मन में न कोई डर था, न कोई स्वार्थ। उसके भीतर केवल एक ही भावना थी—देश के वीर जवानों की सेवा करना। यह भावना किसी किताब से नहीं आती, यह राष्ट्रप्रेम की वह आग होती है जो आत्मा में जन्म लेती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रवण सिंह जब जवानों के बीच जाता था तो उनके साथ बड़े गर्व से घूमता और उनकी बंदूक हाथ में लेकर कहता, “मैं भी बड़ा होकर सैनिक बनूंगा।” यह केवल एक मासूम इच्छा नहीं थी, बल्कि उस बालक के हृदय में धधकती देशभक्ति की लौ थी। उसकी आंखों में सेना की वर्दी के प्रति जो सम्मान था, वह बताता है कि भारत की नई पीढ़ी में राष्ट्रप्रेम की भावना कितनी गहरी है। श्रवण के भीतर देश के लिए कुछ कर गुजरने का जो जज्बा दिखाई देता है, वह वास्तव में करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा है।</div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय सेना भी इस नन्हे सिपाही के समर्पण और सेवा भावना से अत्यंत प्रभावित हुई। सेना ने श्रवण को केवल सम्मान ही नहीं दिया, बल्कि उसे अपने परिवार का हिस्सा मानते हुए “गोद” ले लिया। यह किसी भी बच्चे के लिए बहुत बड़ा सम्मान है। सेना ने उसकी शिक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी उठाई। जब जवानों को पता चला कि श्रवण डायबिटीज जैसी बीमारी से जूझ रहा है, तब उन्होंने तुरंत उसकी चिकित्सा की व्यवस्था की। उसकी बेहतर पढ़ाई के लिए प्राइवेट स्कूल में दाखिला कराया गया और आगे की शिक्षा के लिए कपूरथला भेजने का निर्णय लिया गया। यह केवल सहायता नहीं, बल्कि उस देशभक्त बालक के प्रति सेना का प्रेम और सम्मान है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रवण सिंह की कहानी यह सिद्ध करती है कि देशभक्ति उम्र की मोहताज नहीं होती। केवल 11 वर्ष की उम्र में उसने जो कार्य किया, वह बड़े-बड़े लोगों के लिए भी प्रेरणा बन गया। वह न किसी पुरस्कार के लिए काम कर रहा था, न किसी प्रसिद्धि के लिए। उसके मन में केवल भारत माता के प्रति प्रेम था। यही कारण है कि उसकी सेवा भावना को पूरे देश ने सलाम किया और उसे प्रधानमंत्री बाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी श्रवण सिंह की खुलकर प्रशंसा की। बाल पुरस्कार समारोह के दौरान प्रधानमंत्री ने उसके जज्बे को याद करते हुए कहा था कि जिन कपड़ों और चप्पलों में यह बच्चा देश सेवा कर रहा था, उन्हें संभालकर रखा जाए क्योंकि वे इतिहास का हिस्सा हैं। प्रधानमंत्री के ये शब्द केवल तारीफ नहीं थे, बल्कि उस बालक के राष्ट्रप्रेम को दिया गया सर्वोच्च सम्मान थे। देश के प्रधानमंत्री का किसी छोटे बच्चे के समर्पण को इस प्रकार सम्मान देना यह दर्शाता है कि श्रवण का कार्य कितना असाधारण था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रवण सिंह को देशभर की अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया। कश्मीर से लेकर इंदौर तक उसे बुलाकर सम्मान दिया गया। उसे पहली बार हवाई जहाज में बैठाकर इंदौर ले जाया गया। यह सब उस बच्चे के लिए किसी सपने जैसा था, लेकिन इन सब उपलब्धियों के बाद भी श्रवण के स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया। वह आज भी उसी सादगी और विनम्रता के साथ अपने गांव में रहता है। यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आईपीएल में पंजाब किंग्स की मालकिन और प्रसिद्ध अभिनेत्री प्रीति जिंटा ने भी श्रवण को मोहाली आमंत्रित किया। वहां उसने उनके साथ बैठकर क्रिकेट मैच देखा। लेकिन श्रवण के लिए सबसे बड़ा गौरव क्रिकेट मैच देखना नहीं, बल्कि भारतीय सेना के जवानों के बीच रहना था। उसके लिए सैनिकों की वर्दी किसी हीरो से कम नहीं थी। यही कारण है कि वह हर समय सेना के प्रति सम्मान और प्रेम से भरा दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रवण के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत साधारण है। उसके पिता सोना सिंह एक छोटे किसान हैं और मां आंगनवाड़ी में काम करती हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद इस परिवार ने अपने बेटे में देशभक्ति और संस्कारों की जो भावना जगाई, वह वास्तव में अनुकरणीय है। श्रवण के माता-पिता को भी यह अंदाजा नहीं था कि उनका छोटा-सा बेटा एक दिन पूरे देश के लिए प्रेरणा बन जाएगा। लेकिन सच्चाई यही है कि महानता कभी साधनों से नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं से जन्म लेती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज जब समाज में स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ की भावना बढ़ती दिखाई देती है, तब श्रवण सिंह जैसे बच्चे आशा की किरण बनकर सामने आते हैं। वह बताता है कि सच्चा देशप्रेम क्या होता है। देशभक्ति केवल नारों और भाषणों से सिद्ध नहीं होती, बल्कि सेवा, त्याग और समर्पण से प्रकट होती है। श्रवण ने यह साबित कर दिया कि यदि मन में राष्ट्र के प्रति प्रेम हो तो छोटी उम्र भी बड़े कार्य करने से नहीं रोक सकती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">श्रवण सिंह वास्तव में भारत माता का वह वीर पुत्र है, जिसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी। उसकी आंखों में सैनिक बनने का सपना केवल उसका व्यक्तिगत सपना नहीं, बल्कि राष्ट्र के गौरव का सपना है। वह करोड़ों बच्चों के लिए उदाहरण है कि देश के प्रति प्रेम और सम्मान बचपन से ही जीवन का सबसे बड़ा संस्कार होना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह नन्हा सिपाही केवल पंजाब का नहीं, बल्कि पूरे भारत का गौरव बन चुका है। उसकी देशभक्ति, निस्वार्थ सेवा और समर्पण की भावना हर भारतीय के हृदय में राष्ट्रप्रेम की नई ऊर्जा भरती है। श्रवण सिंह जैसे बच्चे ही भारत के भविष्य की असली ताकत हैं, जिनके कारण यह विश्वास और मजबूत होता है कि भारत की आत्मा आज भी देशभक्ति और बलिदान की भावना से ओतप्रोत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div>  <strong>    *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 May 2026 15:59:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>घाटमपुर में निकली 10किमी‌ लंबी महाराणा प्रताप रैली, बुलडोजर पर सजी तस्वीर</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>घाटमपुर।</strong> घाटमपुर में शनिवार को वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की जयंती श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई गई, इस अवसर पर युवाओं सामाजिक संगठनों और क्षेत्रीय लोगों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया,, कार्यक्रम की शुरुआत राहा क्षेत्र से हुई,, जहां महाराणा प्रताप के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई,, इसके बाद बुल्डोजर पर महाराणा प्रताप का चित्र स्थापित कर करीब 10 किलोमीटर लंबी विशाल रैली निकाली गई,</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">रैली राहा से शुरू हो कर घाटमपुर नगर के विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए मठ पंप पहुंची,, जहां इसका सम्मान हुआ पूरे रास्ते युवाओं का उत्साह देखने लायक था,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178846/10km-long-maharana-pratap-rally-held-in-ghatampur-photo-decorated"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/1001898433.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>घाटमपुर।</strong> घाटमपुर में शनिवार को वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की जयंती श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई गई, इस अवसर पर युवाओं सामाजिक संगठनों और क्षेत्रीय लोगों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया,, कार्यक्रम की शुरुआत राहा क्षेत्र से हुई,, जहां महाराणा प्रताप के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई,, इसके बाद बुल्डोजर पर महाराणा प्रताप का चित्र स्थापित कर करीब 10 किलोमीटर लंबी विशाल रैली निकाली गई,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रैली राहा से शुरू हो कर घाटमपुर नगर के विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए मठ पंप पहुंची,, जहां इसका सम्मान हुआ पूरे रास्ते युवाओं का उत्साह देखने लायक था, हाथों में भगवा ध्वज लिए युवा महाराणा प्रताप के जय घोष लगाते हुए आगे बढ़ रहें थें,जगह जगह स्थानीय लोगों ने रैली का स्वागत किया,, जिससे पूरे नगर में देशभक्ति और शौर्य का माहौल बना रहा,,मठ पंप पहुंचने के बाद आयोजित सभा को संबोधित करते हुए घाटमपुर विधायक सरोज कुरील ने कहा कि महाराणा प्रताप केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं बल्कि स्वाभिमान,साहस और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रतीक है, उन्होंने कहा कि हल्दीघाटी का युद्ध आज भी आजादी, आत्मसम्मान और मात।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भूमि के लिए संघर्ष की गाथा सुनाता है,, उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया, और उनका जीवन आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं,, विधायक सरोज कुरील ने युवाओं से आह्वान किया कि वे महाराणा प्रताप के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएं, और समाज व राष्ट्र हित मे सकारात्मक भूमिका निभाएं,, कार्यक्रम के समापन पर विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें काफ़ी संख्या में लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया,,पूरे आयोजन में उत्सव जैसा माहौल बना रहा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 May 2026 13:02:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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