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                <title>Media and Democracy - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Media and Democracy RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>पत्रकारिता दिवस के अवसर पर भदपुरा ब्लॉक प्रमुख खंड विकास अधिकारी पत्रकारों को मिष्ठान खिलाकर बधाई दी </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>बरेली/</strong> भदपुरा ब्लॉक प्रमुख रवि शंकर गंगवार खंड विकास अधिकारी कौशल कुमार गुप्ता ने आज ब्लॉक मुख्यालय पर पत्रकारिता दिवस के अवसर पर पत्रकारों को मिष्ठान खिलाकर बधाई दी इस अवसर पर यहां के ब्लॉक प्रमुख रवि शंकर गंगवार ने सभी पत्रकार साथियों को पत्रकारिता दिवस की बधाई दी।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">  और कहा पत्रकारिता की इस देश की व्यवस्था में अपनी अहम भूमिका रखते हैं साथ ही चौथा स्तंभ इसलिए कहा जाता है कि जहां पर भी जो भी अनीत होती है उसे उजागर करने के लिए इस चौथे स्तंभ का यही कार्य है कि उसे सही मार्ग दिखाने की रास्ता</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-05/img20260530144918.jpg" alt="पत्रकारिता दिवस के अवसर पर भदपुरा ब्लॉक प्रमुख खंड विकास अधिकारी पत्रकारों को मिष्ठान खिलाकर बधाई दी " width="431" height="287" /></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परंतु</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180360/on-the-occasion-of-journalism-day-chief-block-development-officer"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20260530-wa0013-(1).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>बरेली/</strong> भदपुरा ब्लॉक प्रमुख रवि शंकर गंगवार खंड विकास अधिकारी कौशल कुमार गुप्ता ने आज ब्लॉक मुख्यालय पर पत्रकारिता दिवस के अवसर पर पत्रकारों को मिष्ठान खिलाकर बधाई दी इस अवसर पर यहां के ब्लॉक प्रमुख रवि शंकर गंगवार ने सभी पत्रकार साथियों को पत्रकारिता दिवस की बधाई दी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> और कहा पत्रकारिता की इस देश की व्यवस्था में अपनी अहम भूमिका रखते हैं साथ ही चौथा स्तंभ इसलिए कहा जाता है कि जहां पर भी जो भी अनीत होती है उसे उजागर करने के लिए इस चौथे स्तंभ का यही कार्य है कि उसे सही मार्ग दिखाने की रास्ता का उजागर करते हैं उन्होंने स्पष्ट किया और कहा प्रजातंत्र देश में पत्रकारिता का अपना अलग महत्व है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-05/img20260530144918.jpg" alt="पत्रकारिता दिवस के अवसर पर भदपुरा ब्लॉक प्रमुख खंड विकास अधिकारी पत्रकारों को मिष्ठान खिलाकर बधाई दी " width="431" height="287"></img></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परंतु कुछ लोग अपना खराब चेहरा देखकर दर्पण को तोड़ देते हैं इस तरह कुछ लोग पत्रकारों के साथ भी इस तरह की मानसिकता रखते हैं जो ठीक नहीं है इन्हें भी भारत के संविधान में स्वतंत्रता दी गई है की सही बात को उजागर कर दर्पण की तरह सामने लाने का कार्य पत्रकारिता ही एक मार्ग है जिसके जरिए शासन व प्रशासन को जानकारी प्राप्त होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> की किस जगह पर क्या अन्याय हो रहा है इसके लिए उन्होंने पत्रकारिता दिवस पर सभी प्रिंट मीडिया एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े पत्रकार साथियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी यहीं पर खंड विकास अधिकारी ने भी पत्रकारों का आभार व्यक्त करते हुए कहा यह वह कड़ी है जो भ्रष्टाचार से लेकर अन्याय को उजागर करने का कार्य करते हैं ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस कार्य में मैं सभी पत्रकार बंधुओ को पत्रकारिता दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देता हूं क्योंकि निष्पक्ष होकर पत्रकार एक ऐसी कड़ी है जिसके पास कोई भी सुविधा का संसाधन नहीं है फिर भी पर लग्न के साथ कार्य करके शासन व प्रशासन को जगाने का कार्य करते हैं इस मौके पर उपस्थित ऑल इंडियन प्रेस जनर्लिट एसोसिएशन नवाबगंज के वरिष्ठ उपाध्यक्ष बी डी राठौर हीरालाल गंगवार अफजाल अहमद नजमुल हसन शकील अहमद हरिओम गंगवार शैलेंद्र गंगवार यशपाल गंगवार राजेश कुमार कश्यप सूरज कुमार । के साथ ही भदपुरा के ब्लॉक प्रमुख रवि शंकर गंगवार प्रधान संघ अध्यक्ष राम प्रताप गंगवार समेत अनेकों लोग उपस्थित थे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पश्चिमी उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>आपका शहर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:55:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>राष्ट्रवाद का सबसे जटिल विरोधाभासी संक्रमण काल</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">वर्तमान समय में राष्ट्रवाद अपने सबसे जटिल, विरोधाभासी और बहुअर्थी दौर से गुजर रहा है, यह वह राष्ट्रवाद नहीं रह गया है जो स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान त्याग, नैतिक साहस, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक समरसता का प्रतीक था, बल्कि यह एक ऐसा राष्ट्रवाद बनता जा रहा है जिसे बार-बार सत्ता की भाषा में परिभाषित किया जा रहा है, आज राष्ट्र सरकार का पर्याय बनने की ओर अग्रसर है और सरकार की आलोचना को राष्ट्रविरोध के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, यही वह बिंदु है जहाँ राष्ट्रवाद अपनी आत्मा खोने लगता है और लोकतंत्र अपने आधार, आज जब चुनावी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178735/the-most-complex-contradictory-transition-period-of-nationalism"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/hindi-divas2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वर्तमान समय में राष्ट्रवाद अपने सबसे जटिल, विरोधाभासी और बहुअर्थी दौर से गुजर रहा है, यह वह राष्ट्रवाद नहीं रह गया है जो स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान त्याग, नैतिक साहस, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक समरसता का प्रतीक था, बल्कि यह एक ऐसा राष्ट्रवाद बनता जा रहा है जिसे बार-बार सत्ता की भाषा में परिभाषित किया जा रहा है, आज राष्ट्र सरकार का पर्याय बनने की ओर अग्रसर है और सरकार की आलोचना को राष्ट्रविरोध के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, यही वह बिंदु है जहाँ राष्ट्रवाद अपनी आत्मा खोने लगता है और लोकतंत्र अपने आधार, आज जब चुनावी सभाओं, टीवी स्टूडियो और सोशल मीडिया मंचों पर राष्ट्रवाद को धर्म, जाति, सैन्य शक्ति और भावनात्मक उन्माद के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है, तब यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या राष्ट्र प्रेम का अर्थ केवल सत्ता के समर्थन तक सीमित रह गया है,</p>
<p style="text-align:justify;">हाल के वर्षों में यह स्पष्ट रूप से देखा गया है कि आतंकी घटनाओं, सीमा विवादों, सैन्य अभियानों और ऐतिहासिक स्मृतियों का चयनित उपयोग कर भावनात्मक ध्रुवीकरण को तेज किया गया है, असहमति को राष्ट्रद्रोह, प्रश्न को साजिश और आलोचना को देश के खिलाफ खड़े होने का प्रमाण बताया गया है, यह प्रवृत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं है बल्कि वैश्विक स्तर पर लोकतंत्रों के भीतर उभरते अति राष्ट्रवाद का साझा संकट है, अमेरिका में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अविश्वास, रूस में सत्ता केंद्रित राष्ट्रवाद, चीन में सर्वव्यापी राज्य और एशिया व अफ्रीका में सैन्य प्रभुत्व की राजनीति यह संकेत देती है कि राष्ट्रवाद अब नागरिकों को सशक्त करने के बजाय उन्हें नियंत्रित करने का माध्यम बनता जा रहा है,</p>
<p style="text-align:justify;">भारत जैसे विविधता से भरे समाज में यह परिवर्तन और भी खतरनाक है क्योंकि यहाँ राष्ट्र का अर्थ बहुलता, सहअस्तित्व और संवैधानिक संतुलन से जुड़ा रहा है, किंतु वर्तमान राजनीतिक विमर्श में बहुलता को कमजोरी और असहमति को बाधा के रूप में चित्रित किया जा रहा है, सत्ता की निरंतरता के लिए जातिगत समीकरणों का सूक्ष्म लेकिन आक्रामक उपयोग, धार्मिक पहचान का राजनीतिकरण और लोकलुभावन योजनाओं की होड़ लोकतंत्र को तात्कालिक लाभ की राजनीति में कैद कर रही है। </p>
<div style="text-align:justify;">मुफ्त उपहार, नकद हस्तांतरण और प्रतीकात्मक घोषणाएँ जनता को क्षणिक संतोष तो देती हैं लेकिन दीर्घकालिक आर्थिक अनुशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्थागत सुधार जैसे मूल प्रश्नों को हाशिए पर धकेल देती हैं, लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन को कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति माना जाता है, किंतु आज सत्ता को स्थायित्व और राष्ट्रहित को सत्ता की निरंतरता से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है। इससे अधिनायकवादी प्रवृत्तियों को वैधता मिलने लगती है, हाल के वर्षों में दलबदल की बढ़ती घटनाएँ, विचारधारा से अधिक सत्ता की प्राथमिकता और राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का क्षरण यह दर्शाता है कि राजनीति सिद्धांत से नहीं बल्कि अवसर से संचालित हो रही है,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जातिवादी मतदान और पहचान आधारित ध्रुवीकरण के कारण खाप पंचायतों जैसी समानांतर सत्ता संरचनाएँ पुनः सामाजिक स्वीकृति पाने लगी हैं, जो संवैधानिक लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के संवैधानिक आदर्शों के बावजूद धार्मिक आस्थाओं के नाम पर नीतिगत हस्तक्षेप और व्यक्तिगत जीवनशैली पर नियंत्रण यह प्रश्न उठाता है कि राष्ट्रवाद कहीं नागरिक स्वतंत्रताओं का शत्रु तो नहीं बनता जा रहा, पशु व्यापार, भोजन की पसंद और सांस्कृतिक व्यवहार जैसे विषय जब राज्य के नियंत्रण का विषय बनते हैं तब लोकतंत्र का स्वरूप धीरे-धीरे नैतिक निगरानी में बदलने लगता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अति राष्ट्रवाद का सबसे खतरनाक पक्ष यह है कि वह भय पैदा करता है, भय बाहरी शत्रु का, भय आंतरिक दुश्मन का और भय असहमति का, और भय जब राजनीति का आधार बनता है तब लोकतंत्र केवल चुनावी औपचारिकता बनकर रह जाता है, इतिहास साक्षी है कि बीसवीं सदी में जर्मनी, इटली और स्पेन में इसी भय आधारित राष्ट्रवाद ने फासीवाद को जन्म दिया, एशिया में पाकिस्तान, म्यांमार और उत्तर कोरिया में सुरक्षा और राष्ट्ररक्षा के नाम पर सैन्य प्रभुत्व लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करता रहा है।भारत में भी यदि राष्ट्रवाद को केवल सैन्य शक्ति, बहुमत की भावना और नेता-केंद्रित आस्था से जोड़ा गया तो यह संविधान द्वारा प्रदत्त संतुलन को कमजोर करेगा,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा, संस्थाओं की स्वायत्तता और कानून के समक्ष समानता का नाम है, किंतु वर्तमान विमर्श में बहुमत को अंतिम सत्य और संख्या को नैतिक वैधता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, मीडिया के एक बड़े हिस्से द्वारा सत्ता समर्थक राष्ट्रवादी नैरेटिव का प्रसार, सोशल मीडिया पर ट्रोल संस्कृति और चयनित सूचना का उग्र प्रसार लोकतांत्रिक संवाद को संकीर्ण और आक्रामक बना रहा है। ऐसे समय में सिविल सोसाइटी, लेखक, पत्रकार, शिक्षाविद और न्यायिक संस्थाओं की भूमिका निर्णायक हो जाती है, यदि यह वर्ग चुप रहता है तो लोकतंत्र धीरे-धीरे आत्मसमर्पण कर देगा, राष्ट्रवाद का पुनर्पाठ आवश्यक है जहाँ राष्ट्र सरकार से बड़ा हो,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संविधान सत्ता से ऊपर हो और नागरिक की गरिमा सर्वोपरि मानी जाए, राष्ट्र प्रेम का अर्थ प्रश्न करना, जवाबदेही माँगना और संस्थाओं को मजबूत करना भी होना चाहिए, न कि केवल नारे लगाना और भीड़ का हिस्सा बन जाना। तात्कालिक लोकप्रियता, भावनात्मक ध्रुवीकरण और सत्ता लोलुपता के स्थान पर दीर्घकालिक नीतिगत दूरदर्शिता, सामाजिक संतुलन और संवैधानिक नैतिकता को केंद्र में लाना ही लोकतंत्र को बचा सकता है, अन्यथा राष्ट्रवाद का यह बदला हुआ रूप राष्ट्र को जोड़ने के बजाय उसे भीतर से खोखला करता चला जाएगा और इतिहास एक बार फिर हमें चेतावनी देगा कि लोकतंत्र का पतन अचानक नहीं बल्कि तालियों, नारों और मौन के बीच धीरे-धीरे होता है।
<div style="text-align:justify;"><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 09 May 2026 17:50:51 +0530</pubDate>
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