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                <title>High Court news - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>High Court news RSS Feed</description>
                
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                <title>'भगवान मंत्रियों का इंतजार नहीं करते, सब बराबर हैं'</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>भारत में लगभग हर छोटे-बड़े प्रसिद्ध मंदिर में वीआईपी दर्शन के लिए एक अलग लाइन या विशेष पास की व्यवस्था होती है। कुछ तय रकम या टिकट के पैसे देने के बाद कोई भी व्यक्ति घंटों लंबी लाइनों से बचकर सीधे भगवान के गर्भगृह तक दर्शन के लिए पहुंच जाता है। हालांकि, पैसे और रसूख के दम पर मिलने वाली इस विशेष सुविधा पर समय-समय पर सवाल भी उठते रहे हैं। ऐसा ही एक गंभीर मामला अब मद्रास हाई कोर्ट की चौखट पर पहुंचा है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हाई कोर्ट ने मंदिरों में पैसे और</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180385/god-does-not-wait-for-ministers-all-are-equal"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/vmyzo_hj.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>भारत में लगभग हर छोटे-बड़े प्रसिद्ध मंदिर में वीआईपी दर्शन के लिए एक अलग लाइन या विशेष पास की व्यवस्था होती है। कुछ तय रकम या टिकट के पैसे देने के बाद कोई भी व्यक्ति घंटों लंबी लाइनों से बचकर सीधे भगवान के गर्भगृह तक दर्शन के लिए पहुंच जाता है। हालांकि, पैसे और रसूख के दम पर मिलने वाली इस विशेष सुविधा पर समय-समय पर सवाल भी उठते रहे हैं। ऐसा ही एक गंभीर मामला अब मद्रास हाई कोर्ट की चौखट पर पहुंचा है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हाई कोर्ट ने मंदिरों में पैसे और वीआईपी दर्जे के आधार पर दी जाने वाली इस विशेष सुविधा पर गहरी चिंता व्यक्त की है। अदालत ने दोटूक शब्दों में कहा कि भगवान के दरबार में कोई मंत्री हो या आम आदमी, उनमें कोई भेद नहीं हो सकता। ईश्वर के सामने सभी इंसान बराबर हैं, ऐसे में मंदिरों के भीतर वीआईपी दर्शन की इस कुप्रथा का कोई औचित्य नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी आर स्वामीनाथन और जस्टिस लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ (बेंच) ने इस मामले की सुनवाई के दौरान बेहद तीखे सवाल उठाए। अदालत ने मंदिरों में वीआईपी दर्शन की प्रथा पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या भगवान के सामने किसी रसूखदार मंत्री और एक आम नागरिक में कोई फर्क है? कोर्ट ने कड़े लहजे में कहा कि दर्शन के लिए कोई भी प्रशासनिक प्रक्रिया तय की जाए, लेकिन उससे मंदिर की कतारों में खड़े आम श्रद्धालुओं को किसी भी तरह की परेशानी या मानसिक ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस जी आर स्वामीनाथन की बेंच ने वीआईपी संस्कृति पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा, “मंत्रियों और विधायकों को अपने मन से यह गलतफहमी निकाल देनी चाहिए कि मंदिर में भगवान उनका इंतजार कर रहे हैं, और वे अपने रसूख के दम पर किसी भी समय मंदिर में सीधे प्रवेश कर सकते हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए। आखिर हमें इस वीआईपी दर्शन की क्या आवश्यकता है? जब ईश्वर के समक्ष सभी लोग पूरी तरह समान हैं, तो फिर वहां क्या मंत्री और क्या आम जनता।”।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट के इन कड़े और तीखे सवालों पर सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल पी वी बालासुब्रमण्यम ने अपना पक्ष रखा। उन्होंने वीआईपी दर्शन की पैरवी करते हुए दलील दी कि इस तरह की प्रथा का पालन करने से एक तरफ जहां विशिष्ट लोगों के कारण लगने वाली लंबी-लंबी कतारों से मुक्ति मिलती है, वहीं दूसरी तरफ वीआईपी टिकटों से मंदिरों को भी काफी बड़ी आय (राजस्व) प्राप्त होती है। अपनी इस दलील के साथ ही उन्होंने इस विषय पर सरकार का विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए अदालत से कुछ समय की मांग की। हाई कोर्ट ने सरकार के इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए उन्हें पूरा जवाब पेश करने के लिए छह सप्ताह का समय दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दरअसल, यह पूरा कानूनी विवाद हाल ही में विजय सरकार में मंत्री बने आर निर्मल कुमार के एक मंदिर दौरे को लेकर शुरू हुआ है। मंत्री निर्मल कुमार पर बेहद गंभीर आरोप लगे थे कि जब वे दर्शन के लिए पहुंचे, तो उनके रसूख के कारण तिरुपरनकुंड्रम स्थित ऐतिहासिक सुब्रमण्य स्वामी मंदिर के कपाट आम जनता के लिए पूरी तरह बंद करवा दिए गए थे। इसके बाद जब मंत्री महोदय ने आराम से दर्शन कर लिए, तब कहीं जाकर आम श्रद्धालुओं के लिए मंदिर को दोबारा खोला गया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि, विपक्ष द्वारा लगाए गए इन गंभीर आरोपों को विजय सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया है। मद्रास हाई कोर्ट में यह जनहित याचिका विश्व हिंदू परिषद (VHP) की तमिलनाडु इकाई के वरिष्ठ नेता पी. चोकलिंगम द्वारा दायर की गई है। उन्होंने कोर्ट में दावा किया कि मंत्री निर्मल कुमार की तरह ही आए दिन कई बड़े नेता, मंत्री और विधायक मंदिरों में वीआईपी दर्शन के लिए प्रोटोकॉल का धौंस जमाते हैं, जिसकी वजह से दूर-दूर से आए आम भक्तों को घंटों धूप और कतारों में खड़े रहकर भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि सनातन धर्म किसी भी व्यक्ति के साथ धन, सामाजिक स्थिति, पद या जाति के आधार पर भेदभाव की अनुमति कतई नहीं देता है, इसलिए मंदिर के भीतर सभी भक्तों के साथ पूरी तरह समान व्यवहार किया जाना चाहिए। हालांकि, याचिकाकर्ता चोकलिंगम ने अपनी गुहार में व्यावहारिक आधार पर कुछ विशेष छूट की भी मांग की है। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों, गर्भवती महिलाओं, नवविवाहित जोड़ों, मंदिर में अपनी कला की प्रस्तुति देने वाले स्थानीय कलाकारों, इसके अलावा देश के राष्ट्राध्यक्षों और संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों (जैसे राष्ट्रपति, राज्यपाल या मुख्य न्यायाधीश) को इस नियम से अलग रखकर कुछ विशेष रियायतें जरूर दी जानी चाहिए, लेकिन इसका फायदा राजनीतिक लाभ के लिए नहीं उठाया जाना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 19:03:31 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मधु किश्वर ने पीएम पर भ्रामक वीडियो किया था साझा, हाईकोर्ट ने खारिज की अग्रिम जमानत याचिका</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े भ्रामक और आपत्तिजनक वीडियो को सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा करने के मामले में फंसी प्रसिद्ध लेखिका और शिक्षाविद् मधु पूर्णिमा किश्वर को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस अमन चौधरी की अदालत ने माना कि मामले की परिस्थितियां अग्रिम जमानत देने के लिए उपयुक्त नहीं हैं और जांच के हित में हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> मधु किश्वर ने गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए अग्रिम जमानत की मांग की थी। उनके खिलाफ चंडीगढ़</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180383/madhu-kishwar-had-shared-a-misleading-video-on-pm"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/5660-1780059936803_m.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े भ्रामक और आपत्तिजनक वीडियो को सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा करने के मामले में फंसी प्रसिद्ध लेखिका और शिक्षाविद् मधु पूर्णिमा किश्वर को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस अमन चौधरी की अदालत ने माना कि मामले की परिस्थितियां अग्रिम जमानत देने के लिए उपयुक्त नहीं हैं और जांच के हित में हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> मधु किश्वर ने गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए अग्रिम जमानत की मांग की थी। उनके खिलाफ चंडीगढ़ के सेक्टर-26 थाना में मामला दर्ज है। याचिका में मधु किश्वर की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने केवल 14 सेकंड का एक वीडियो री-ट्वीट किया था। उनका कहना था कि इसमें कोई दुर्भावना नहीं थी और जालसाजी अथवा वीडियो तैयार करने से उनका कोई संबंध नहीं है। वहीं, चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से अदालत को बताया गया कि यह केवल साधारण री-ट्वीट का मामला नहीं है। जांच में सामने आया कि संबंधित वीडियो पहले अन्य सोशल मीडिया मंचों पर डाला गया था लेकिन मधु किश्वर ने उसे डाउनलोड कर अपने एक्स अकाउंट से दोबारा पोस्ट किया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">प्रशासन ने अदालत को बताया कि उनके लाखों फॉलोअर्स होने के कारण वीडियो को व्यापक प्रसार मिला और उसे करीब 1.74 लाख व्यूज प्राप्त हुए। इससे भ्रामक सूचना फैलाने और एक सांविधानिक पद की छवि को नुकसान पहुंचाने में मदद मिली। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ है कि जांच एजेंसी की ओर से भेजे गए नोटिसों के बावजूद याचिकाकर्ता जांच में शामिल नहीं हुईं जबकि अन्य सह-आरोपी जांच में शामिल हो चुके हैं। कोर्ट ने इसे उनके आचरण का महत्वपूर्ण पहलू माना।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि रचनात्मक आलोचना और सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति अथवा सांविधानिक पद के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण टिप्पणी के बीच स्पष्ट अंतर है। अदालत के अनुसार, बड़े सोशल मीडिया प्रभाव वाले व्यक्तियों की पोस्ट का व्यापक असर पड़ सकता है और ऐसी सामग्री सामाजिक सौहार्द तथा सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। इन सभी तथ्यों, जांच की आवश्यकता और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में तय सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने मधु किश्वर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।l</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>ब्रेकिंग न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 19:00:12 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>नाबालिग स्टूडेंट को बुर्का पहनाने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव के आरोपी स्टूडेंट को इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद।हाईकोर्ट ने स्कूली स्टूडेंट को अग्रिम जमानत दी, जिस पर आरोप है कि उसने नाबालिग स्टूडेंट का कथित रूप से ब्रेनवॉश कर उसे बुर्का पहनने और इस्लाम धर्म अपनाने के लिए दबाव डाला। जस्टिस अवनीश सक्सेना की पीठ ने आरोपी स्टूडेंट मालिश्का उर्फ मालिश्का फातमा को राहत देते हुए कहा कि पीड़िता के बयान के अतिरिक्त रिकॉर्ड पर ऐसा कोई अन्य ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे आरोपी की संलिप्तता प्रथम दृष्टया स्थापित हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">आरोपी के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया गया। FIR पीड़िता</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178545/student-accused-of-forcing-minor-student-to-wear-burqa-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/download2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद।हाईकोर्ट ने स्कूली स्टूडेंट को अग्रिम जमानत दी, जिस पर आरोप है कि उसने नाबालिग स्टूडेंट का कथित रूप से ब्रेनवॉश कर उसे बुर्का पहनने और इस्लाम धर्म अपनाने के लिए दबाव डाला। जस्टिस अवनीश सक्सेना की पीठ ने आरोपी स्टूडेंट मालिश्का उर्फ मालिश्का फातमा को राहत देते हुए कहा कि पीड़िता के बयान के अतिरिक्त रिकॉर्ड पर ऐसा कोई अन्य ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे आरोपी की संलिप्तता प्रथम दृष्टया स्थापित हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">आरोपी के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया गया। FIR पीड़िता के भाई ने दर्ज कराई। उसमें आरोप लगाया गया कि आरोपी ने उसकी नाबालिग बहन का धर्म परिवर्तन कराने के उद्देश्य से उसका ब्रेनवॉश किया। यह भी कहा गया कि 20 दिसंबर 2025 को उसे जबरन बुर्का दिया गया और लगातार धर्म बदलने का दबाव बनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार की ओर से अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा गया कि पीड़िता के बयान से स्पष्ट है कि उस पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला जा रहा था। FIR दर्ज करने में देरी के संबंध में यह दलील दी गई कि पीड़िता आरोपी के प्रभाव में थी, इसलिए जानकारी मिलने में समय लगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं आरोपी की ओर से कहा गया कि वह पीड़िता से पहले से उसी विद्यालय में पढ़ रही थी और उसके खिलाफ किसी अन्य छात्रा को धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालने की कोई शिकायत नहीं है। अदालत को यह भी बताया गया कि मामले के मुख्य आरोप सह-अभियुक्त अलीना के खिलाफ हैं, जिसे हाईकोर्ट की समन्वय पीठ पहले ही अग्रिम जमानत दे चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">पीठ ने पाया कि आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और पीड़िता के बयान के अलावा उसके खिलाफ अन्य स्वतंत्र साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। साथ ही अदालत ने माना कि आरोपी के फरार होने की संभावना कम है तथा उसने जांच और ट्रायल में सहयोग का आश्वासन दिया है। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी स्टूडेंट को अग्रिम जमानत दी।।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 22:07:09 +0530</pubDate>
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