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                <title>वसुधैव कुटुम्बकम् - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>वसुधैव कुटुम्बकम् RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>विविधता से एकात्मता की ओर</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश</strong></div>
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<div style="text-align:justify;">आज विश्व के तमाम देश धार्मिक पहचान, नस्ली अस्मिता, अतिराष्ट्रवाद, युद्ध, सांस्कृतिक टकराव, धार्मिक असहिष्णुता, सामाजिक ध्रुवीकरण और बढ़ती वैचारिक दूरियों जैसी अनेक चुनौतियों से गुजर रहे है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।विज्ञान, परिवहन और संचार प्रौद्योगिकी ने भौगोलिक दूरियां कम जरूर की हैं, लेकिन अनेक मामलों में मनुष्यों के बीच वैचारिक और भावनात्मक दूरियां बढ़ी हैं। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में दिया गया संबोधन विशेष आकर्षण बना हुआ है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. भागवत के संबोधन का</div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186883/the-message-of-one-world-one-humanity-from-diversity-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/img-20241207-wa00031.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज विश्व के तमाम देश धार्मिक पहचान, नस्ली अस्मिता, अतिराष्ट्रवाद, युद्ध, सांस्कृतिक टकराव, धार्मिक असहिष्णुता, सामाजिक ध्रुवीकरण और बढ़ती वैचारिक दूरियों जैसी अनेक चुनौतियों से गुजर रहे है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।विज्ञान, परिवहन और संचार प्रौद्योगिकी ने भौगोलिक दूरियां कम जरूर की हैं, लेकिन अनेक मामलों में मनुष्यों के बीच वैचारिक और भावनात्मक दूरियां बढ़ी हैं। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में दिया गया संबोधन विशेष आकर्षण बना हुआ है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. भागवत के संबोधन का केंद्रीय विचार भारत की उस सभ्यतागत दृष्टि से जुड़ा था, जिसमें विविधता को एकता के विरोधी के रूप में नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। उन्होंने कहा कि भारत के लिए ‘विविधता में एकता’ केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि भारतीय समाज के डीएनए में रची-बसी है। उन्होंने अमेरिका में प्रचलित ‘बहुलतावाद’ की अवधारणा की तुलना भारत की ‘विविधता में एकता’ की दृष्टि से करते हुए कहा कि विविधता को समाप्त करने के बजाय उसे स्वीकार, सम्मान और संरक्षित किया जाना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह विचार भारतीय चिंतन की उस परंपरा से भी जुड़ता है, जिसमें सत्य की अनेक अभिव्यक्तियों को स्वीकार करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध वचन ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ और महोपनिषद् का ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इसी व्यापक दृष्टि के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। इन प्राचीन सूत्रों को आधुनिक लोकतंत्र, बहुलतावाद या मानवाधिकारों का सीधा पर्याय मानना उचित नहीं होगा, लेकिन वे भारतीय दार्शनिक परंपरा में सह-अस्तित्व, व्यापकता और मानवीय एकात्मता की गहरी भावना को अवश्य व्यक्त करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय दृष्टि में एकता का अर्थ एकरूपता नहीं है। वास्तविक एकता तभी संभव है, जब अलग-अलग धर्म, भाषा, संस्कृति और जीवन-पद्धति से जुड़े लोग समान मानवीय गरिमा तथा पारस्परिक सम्मान के साथ रह सकें। यही कारण है कि भारतीयता को किसी एक धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान तक सीमित कर देना भारत की बहुस्तरीय ऐतिहासिक और सामाजिक संरचना को अत्यधिक सरल बना देगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">धार्मिक विविधता के प्रश्न पर भी यही कसौटी लागू होती है। भारत की सामाजिक संरचना सदियों से अनेक धर्मों, संप्रदायों, भाषाओं, जातीय समूहों, क्षेत्रों और परंपराओं के सह-अस्तित्व से निर्मित हुई है। इसलिए विविधता का सम्मान केवल सहिष्णुता तक सीमित नहीं होना चाहिए; उसका आधार समान नागरिक गरिमा, कानून के समक्ष समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और पारस्परिक उत्तरदायित्व होना चाहिए।यहां भारतीय संविधान का संदर्भ स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। संविधान की प्रस्तावना न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता को भारतीय गणराज्य के मूल आदर्शों के रूप में स्थापित करती है। अतः विविधता के प्रति सम्मान केवल किसी संगठन या विचारधारा की अपेक्षा नहीं, बल्कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था की भी मूल प्रतिबद्धता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> भारतीय परंपरा में ‘धर्म’ का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि कर्तव्य, आचरण, मर्यादा और उत्तरदायित्व से भी जुड़ा रहा है। इस व्यापक अर्थ को समझना आज सभी धर्मावलंबियों के लिए जरूरी है। न्यूयॉर्क प्रवास के दौरान डॉ. भागवत ने न्यूयॉर्क स्थित इस्कॉन के ऐतिहासिक केंद्र का भी दौरा किया और सेवा-कार्य में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि आज दुनिया अनेक संघर्षों और द्वंद्वों से गुजर रही है और लोगों को जोड़ने वाली चेतना ही शांति का आधार बन सकती है; उन्होंने इसे ‘कृष्ण चेतना’ से जोड़ा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए डॉ. भागवत ने एक महत्वपूर्ण बात कही,जिस देश में भारतीय मूल के लोग रहते हैं, वह उनकी ‘कर्मभूमि’ है और वहां के प्रति उनकी जिम्मेदारी सर्वोपरि है। उन्होंने अमेरिका में रहने वाले भारतीयों से अमेरिकी समाज और देश के प्रति निष्ठापूर्वक अपने दायित्व निभाने का आग्रह किया, साथ ही अपनी ‘जन्मभूमि’ भारत से प्राप्त मूल्यों को बनाए रखने की बात कही। यह संदेश प्रवासी भारतीयों को दो पहचानों के बीच संघर्ष में खड़ा करने के बजाय, अपनी सांस्कृतिक जड़ों को संजोते हुए जिस देश में वे रहते हैं, उसके संविधान ,नियम-कानून के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा देता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डॉ. भागवत ने सामाजिक परिवर्तन में राजनीति की सीमाओं और समाज की भूमिका पर भी बल दिया। शिक्षा, संवाद, सेवा और सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन को स्थायी परिवर्तन का आधार माना जा सकता है। सामाजिक समरसता केवल कानून या सत्ता के माध्यम से निर्मित नहीं होती; इसके लिए समाज की मानसिकता, पारस्परिक व्यवहार और सार्वजनिक जीवन में दूसरे के प्रति सम्मान की आवश्यकता होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज जब दुनिया युद्ध, विस्थापन, धार्मिक संघर्ष, आर्थिक असमानता और जलवायु संकट जैसी साझा चुनौतियों का सामना कर रही है, तब ‘एक विश्व, एक मानवता’ का विचार निश्चित रूप से प्रासंगिक है। लेकिन किसी भी वैश्विक आदर्श की सार्थकता उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार में उतरने से सिद्ध होती है। परिवार, शिक्षा मंदिर, कार्यस्थल और सार्वजनिक जीवन में दूसरे व्यक्ति की पहचान, आस्था, विचार और गरिमा का सम्मान ही इस विचार की वास्तविक परीक्षा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत यदि अपनी सभ्यतागत परंपरा के आधार पर विश्व को कोई संदेश देना चाहता है, तो वह यह हो सकता है कि विविधता को मिटाकर स्थायी एकता स्थापित नहीं की जा सकती। स्थायी एकता का आधार सम्मान, संवाद, सह-अस्तित्व और साझा मानवीय गरिमा है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ भी तभी सार्थक होगा, जब वह केवल संस्कृत का एक सुंदर वाक्य या समारोहों में उद्धृत किया जाने वाला श्लोक न रहकर सामाजिक आचरण का सिद्धांत बने।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अतः विविधताओं को समाप्त किए बिना एकता, मतभेदों को मिटाए बिना संवाद और पहचान को नकारे बिना मानवता  उस व्यापक विचार की कसौटी है जिसे आज ‘एक विश्व, एक मानवता’ के रूप में अभिव्यक्त किया जा सकता है। डॉ. मोहन भागवत का न्यूयॉर्क संबोधन इसी दृष्टि से विचार और विमर्श का विषय बनता है। इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि एकता और मानव-एकात्मता का यह संदेश भाषणों से निकलकर समाज के दैनिक व्यवहार में कब और कितना उतरता है।</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 20:46:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मैं सूतपुत्र कर्ण से नहीं करूंगी विवाह – द्रोपद पुत्री द्रौपदी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>पाकुड़िया, पाकुड़, झारखण्ड:-</strong> द्रौपदी के स्वयंवर सभा में जब अंगराज कर्ण ने नीचे पात्र में रखे तेल की छाया में मछली की आंख में निशान लगाने के लिए धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना चाहा तभी पांचाली बोल पड़ी—मैं नहीं करूंगी सूतपुत्र से विवाह। इस पर तर्क-वितर्क होने पर धृष्टद्युम्न ने कहा—स्वयंवर की घोषणा में बताया गया है कि कन्या की इच्छा पर निर्भर है कि वह किसे वरण करना चाहती है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">      पांचाली पांचाल देश के राजा द्रोपद की कन्या थी और वह अग्निकुंड से प्रकट हुई थी। इस कारण इन्हें अग्निसूता भी कहा जाता है। स्वयंवर सभा में वीर-महावीरों ने</div>
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<div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178243/i-will-not-marry-sutaputra-karna-%E2%80%93-draupada-daughter-draupadi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/news-2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>पाकुड़िया, पाकुड़, झारखण्ड:-</strong> द्रौपदी के स्वयंवर सभा में जब अंगराज कर्ण ने नीचे पात्र में रखे तेल की छाया में मछली की आंख में निशान लगाने के लिए धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना चाहा तभी पांचाली बोल पड़ी—मैं नहीं करूंगी सूतपुत्र से विवाह। इस पर तर्क-वितर्क होने पर धृष्टद्युम्न ने कहा—स्वयंवर की घोषणा में बताया गया है कि कन्या की इच्छा पर निर्भर है कि वह किसे वरण करना चाहती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   पांचाली पांचाल देश के राजा द्रोपद की कन्या थी और वह अग्निकुंड से प्रकट हुई थी। इस कारण इन्हें अग्निसूता भी कहा जाता है। स्वयंवर सभा में वीर-महावीरों ने भरपूर प्रयत्न करने के बाद भी प्रत्यंचा चढ़ाने में विफल रहे। तब ब्राह्मण वेषधारी कौंतेय ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर मछली की आंख को भेदते हुए सभी को अचंभित कर दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   कर्ण महावीर थे और मछली की आंख आसानी से भेद सकते थे, पर पांचाली ने विवाह नहीं करने की बात क्यों कही? क्या सूत होने के कारण ही द्रौपदी ने मना किया या इसके पीछे कई गूढ़ रहस्य छिपे हैं? यद्यपि उक्त प्रसंग हजारों वर्ष पूर्व का है, परन्तु प्रमाणिक तथ्यों की अनदेखी कर लोग, विशेषकर भारतीय ज्ञानपरक व राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा कर, उन गूढ़ रहस्यों को स्वार्थवश नहीं कहते और राष्ट्रीय जनजीवन को भ्रमित करते रहे हैं। इससे देश ही नहीं, भारत विरोधी तत्व भी देश की मान्य छवि को धुंधला करते रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   सनातन संस्कृति, धर्म एवं परम्पराओं में सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग में, ईसा की सातवीं सदी अर्थात भारत पर विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण से पूर्व तक, किसी प्रकार की जातीयता का प्रमाणिक उल्लेख नहीं मिलता। सनातन सांस्कृतिक मूल्य कर्म आधारित रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   कर्ण के संदर्भ में उल्लेखनीय है कि वे कौंतेय थे। गुरु द्वारा प्रदत्त सूर्य मंत्र का परीक्षण करने हेतु कुंती ने आह्वान किया और सूर्य भगवान प्रकट हुए। वहीं वरदान स्वरूप पुत्र की प्राप्ति हुई, लेकिन उन्होंने कुंती को आशीर्वाद दिया कि वे कुमारी ही रहेंगी। लोकलाज के कारण उन्होंने बालक को गंगा में प्रवाहित कर दिया। कर्ण कवच-कुंडल लेकर जन्मे थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   दूसरी ओर कर्ण का पालन-पोषण एक सूत परिवार में हुआ और राधेय इनकी माता कही गईं। इसी कारण कर्ण राधेय भी कहलाए। उन दिनों रथ चलाने वाले को सूत कहा जाता था। जिस प्रकार आज वाहन चलाने वाले को चालक या ड्राइवर कहा जाता है, चाहे वह किसी भी वर्ग का हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   उपमा के तौर पर आज भी कोई सम्पन्न या रईस व्यक्ति किसी चालक से अपनी सुकन्या का विवाह करना पसंद नहीं करता। लोग कहते हैं कि द्रौपदी ने श्रीकृष्ण के संकेत से ऐसा किया। पांचाली को कृष्णा भी कहा जाता है और भाई होने के नाते वे बहन के हित की ही सोचते।</div>
<div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण भगवान थे और पांचाली के पूर्व जन्मों के सभी कर्मों व इच्छाओं को भली-भांति जानते थे कि उनका परिणय किनके साथ होगा तथा भविष्य में कौन-कौन सी घटनाएं घटेंगी और उनका समाधान कैसे होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   कहा जाता है कि कौरव दल में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और कर्ण जैसे महारथी थे। इसे ध्यान में रखते हुए संजय ने धृतराष्ट्र से कहा—महाराज, विजय दुर्योधन की होगी, परन्तु दुर्योधन सहित पांच को छोड़कर सभी मारे जाएंगे और अंततः भारी पराजय होगी। इस पर धृतराष्ट्र ने कहा—संजय, तुमने मुझसे कभी झूठ नहीं कहा, पर ऐसा कैसे हो सकता है?</div>
<div style="text-align:justify;">इस पर संजय ने विनम्र होकर कहा—महाराज, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसके मूल में श्रीकृष्ण थे और वे सदैव सत्य और धर्म का पक्ष लेते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   सनातन धर्म और संस्कृति कर्म आधारित रही है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा के साथ विश्व कल्याण की कामना करती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>बिहार/झारखंड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 20:53:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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