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                <title>election trends 2026 - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>भाजपा का बढ़ता जनादेश: विपक्ष के लिए आत्ममंथन का समय</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि नए युग का भारतीय मतदाता अब जात-पात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नफरत और अहंकार की राजनीति से ऊपर उठ चुका है। आज का मतदाता विकास और सुरक्षा को सर्वोपरि मानता है। वह अपने गांव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनपद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिला पंचायत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विधानसभा और लोकसभा में ऐसे प्रतिनिधि को चुनना चाहता है जो उसके जीवन स्तर को बेहतर बनाने और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की ठोस गारंटी दे सके।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इन चुनाव परिणामों को यदि खुले मन से विश्लेषित किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह भी स्पष्ट होता है कि</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178221/bjps-increasing-mandate-is-a-time-for-introspection-for-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20250331-wa01632.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि नए युग का भारतीय मतदाता अब जात-पात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नफरत और अहंकार की राजनीति से ऊपर उठ चुका है। आज का मतदाता विकास और सुरक्षा को सर्वोपरि मानता है। वह अपने गांव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनपद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिला पंचायत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विधानसभा और लोकसभा में ऐसे प्रतिनिधि को चुनना चाहता है जो उसके जीवन स्तर को बेहतर बनाने और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की ठोस गारंटी दे सके।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इन चुनाव परिणामों को यदि खुले मन से विश्लेषित किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह भी स्पष्ट होता है कि हारने वाले कई दल अपनी पराजय का ठीकरा चुनाव आयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईवीएम या सरकारी तंत्र पर फोड़ने का प्रयास करते हैं। किंतु यह केवल आत्मसंतोष का एक माध्यम है। वास्तविकता यह है कि यदि ये दल ईमानदारी से आत्ममंथन करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उन्हें अपनी हार के कारण अपने भीतर ही मिल जाएंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान भारतीय राजनीति की यह विडंबना बन चुकी है कि जनप्रतिनिधि अपने ही क्षेत्र में जनता द्वारा नकारे जाने के बाद भी अपनी कमियों का आत्मविश्लेषण करने के बजाय बाहरी कारणों को दोष देते हैं। यही कारण है कि विपक्षी दल लगातार चुनाव दर चुनाव कमजोर होते जा रहे हैं। बिना गंभीर आत्ममंथन के केवल औपचारिक समीक्षा कर पुनः चुनावी मैदान में उतरना उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हो रही है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके विपरीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय जनता पार्टी की सफलता का प्रमुख आधार उसका सतत आत्ममंथन और संगठनात्मक अनुशासन है। भाजपा की कार्यप्रणाली शुरू से ही ऐसी रही है कि वह छोटे से छोटे चुनावी पराजय का भी गहन विश्लेषण कर भविष्य की रणनीति तैयार करती है। इस दल में व्यक्ति से अधिक संगठन को महत्व दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण एक सामान्य कार्यकर्ता भी उच्च पदों तक पहुंचकर अपनी पहचान बना सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह भी स्पष्ट है कि जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनबल या बाहुबल के सहारे मतदाता को सीमित समय तक ही प्रभावित किया जा सकता है। यदि किसी राजनीतिक दल को दीर्घकाल तक जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता बनाए रखनी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे विकास और सुरक्षा की ठोस गारंटी बनना होगा। आज का मतदाता जागरूक है और वह राजनीतिक दलों की नीतियों तथा उनके व्यवहार का गहराई से आकलन करता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान समय में नफरत और अहंकार की राजनीति के लिए कोई स्थान नहीं बचा है। राष्ट्र का विकास और सुरक्षा ही अब राजनीति का केंद्र बिंदु बन चुके हैं। जो भी दल इन मूल मुद्दों से भटकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे जनता अपने मत के माध्यम से नकार देती है। वैश्विक अस्थिरता और राष्ट्रीय चुनौतियों के इस दौर में विपक्ष से यह अपेक्षा की जाती है कि वह राष्ट्रहित के मुद्दों पर सरकार के साथ खड़ा रहे। किंतु जब विपक्ष संकीर्ण राजनीति करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जागरूक मतदाता उसे भली-भांति पहचान लेता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष का होना अत्यंत आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन दुर्भाग्यवश वर्तमान परिदृश्य में विपक्ष निरंतर कमजोर होता जा रहा है। इसका प्रमुख कारण सकारात्मक राजनीति के स्थान पर नकारात्मकता और व्यक्तिवाद को प्राथमिकता देना है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आज आवश्यकता इस बात की है कि विपक्षी दल भाजपा के बढ़ते जनादेश से ईर्ष्या करने के बजाय उससे सीख लें। उन्हें जनता के बीच जाकर यह विश्वास दिलाना होगा कि वे भी विकास और जनहित के लिए प्रतिबद्ध हैं। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रहित के मुद्दों पर एकजुट होकर सरकार के कार्यों पर रचनात्मक निगरानी रखना भी उनकी जिम्मेदारी है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अंततः</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह कहना उचित होगा कि भाजपा का बढ़ता जनादेश विपक्ष के लिए एक स्पष्ट संदेश है यदि राजनीति में प्रासंगिक बने रहना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आत्ममंथन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सकारात्मक सोच और जनहित को सर्वोपरि रखना ही होगा। अन्यथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल विरोध की राजनीति करते रहना विपक्ष को और अधिक कमजोर ही करता जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अरविंद रावल</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 17:48:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>परिवर्तन की बयार और सत्ता के बदलते समीकरण</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान विधानसभा चुनावों के परिणाम केवल सत्ता के हस्तांतरण की कहानी नहीं कहते, बल्कि वे भारतीय लोकतंत्र के विकसित होते स्वरूप का एक जीवंत दस्तावेज हैं। भारत के राजनीतिक मानचित्र पर पूरब से दक्षिण तक जो लहर दिखाई दी है, उसने स्थापित मान्यताओं को ध्वस्त करते हुए एक नई वैचारिक धरातल तैयार की है। पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाडु और केरल से लेकर असम तक, मतदाताओं ने जिस प्रकार का विवेक प्रदर्शित किया है, वह यह स्पष्ट करता है कि अब भारतीय राजनीति केवल प्रतीकों के सहारे नहीं, बल्कि ठोस परिणामों और नए विकल्पों के आकर्षण पर आधारित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178219/winds-of-change-and-changing-equations-of-power"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/election-(11)-5432758.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान विधानसभा चुनावों के परिणाम केवल सत्ता के हस्तांतरण की कहानी नहीं कहते, बल्कि वे भारतीय लोकतंत्र के विकसित होते स्वरूप का एक जीवंत दस्तावेज हैं। भारत के राजनीतिक मानचित्र पर पूरब से दक्षिण तक जो लहर दिखाई दी है, उसने स्थापित मान्यताओं को ध्वस्त करते हुए एक नई वैचारिक धरातल तैयार की है। पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाडु और केरल से लेकर असम तक, मतदाताओं ने जिस प्रकार का विवेक प्रदर्शित किया है, वह यह स्पष्ट करता है कि अब भारतीय राजनीति केवल प्रतीकों के सहारे नहीं, बल्कि ठोस परिणामों और नए विकल्पों के आकर्षण पर आधारित हो चुकी है। इन चुनावों में सबसे चौंकाने वाला और ऐतिहासिक परिवर्तन पश्चिम बंगाल की धरती पर देखा गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय जनता पार्टी ने यहाँ पहली बार पूर्ण बहुमत प्राप्त कर राज्य में अपनी सरकार बनाने की स्थिति हासिल की है। यह परिवर्तन साधारण नहीं है क्योंकि इसने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले लगभग 15 वर्ष लंबे शासन का अंत कर दिया है। बंगाल की राजनीति, जो दशकों तक वामपंथी और फिर तृणमूल कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही, अब एक बिल्कुल नई दिशा में मुड़ गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यहाँ सत्ता-विरोधी लहर के साथ-साथ सांस्कृतिक और संगठनात्मक बदलाव की जो प्रक्रिया वर्षों से चल रही थी, उसने 2026 में अपना पूर्ण स्वरूप प्राप्त कर लिया। यह जीत केवल एक राज्य की जीत नहीं है, बल्कि इसे पूर्वी भारत में एक बड़ी राष्ट्रीय विचारधारा के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है। बंगाल के मतदाताओं ने इस बार भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जड़ता के विरुद्ध विकास और नई कार्यसंस्कृति को प्राथमिकता दी है। तृणमूल कांग्रेस के लिए यह एक बड़ा झटका है क्योंकि उनकी पकड़ न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर हुई, बल्कि शहरी मध्यम वर्ग ने भी इस बार परिवर्तन के पक्ष में मतदान किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दक्षिण की ओर रुख करें तो तमिलनाडु ने पूरे देश को अपनी राजनीतिक परिपक्वता और नए नेतृत्व के प्रति उत्साह से विस्मित कर दिया है। अभिनेता विजय की नवगठित पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम ने अपने पहले ही चुनाव में जो प्रदर्शन किया है, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। तमिलनाडु की राजनीति दशकों से द्रविड़ मुनेत्र कझगम और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम जैसी दो पारंपरिक पार्टियों के वर्चस्व में बंधी हुई थी। विजय की पार्टी ने इस द्विपक्षीय चक्र को तोड़कर स्वयं को एक सशक्त विकल्प के रूप में स्थापित किया। आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो उनकी पार्टी ने 100 से अधिक सीटों पर अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई है, जिससे वह राज्य की राजनीति में केवल तीसरी ताकत नहीं, बल्कि एक नई धुरी बनती दिख रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह परिणाम इस बात का संकेत है कि तमिलनाडु का युवा वर्ग अब पुरानी द्रविड़ राजनीति के पारंपरिक ढांचों से बाहर निकलकर कुछ नया और आधुनिक देख रहा है। विजय ने अपनी रैलियों में जिस तरह से सामाजिक न्याय और सुशासन की बात की, उसने युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले नागरिकों को गहराई से प्रभावित किया। यह बदलाव आने वाले समय में दक्षिण भारत की पूरी राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केरल में भी इस बार परिवर्तन की परंपरा अक्षुण्ण रही। संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा यानी यूडीएफ ने 10 वर्ष के अंतराल के बाद सत्ता में वापसी की है। पिछले चुनाव में वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चा यानी एलडीएफ ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर जो इतिहास रचा था, उसे इस बार मतदाताओं ने दोहराने नहीं दिया। केरल के चुनावी इतिहास में यह देखा गया है कि जनता प्रायः हर 5 वर्ष में सरकार बदल देती है,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परंतु पिछले कार्यकाल में इस परंपरा के टूटने के बाद यह माना जा रहा था कि वामपंथ की जड़ें और गहरी हो गई हैं। लेकिन 2026 के परिणामों ने सिद्ध कर दिया कि प्रशासनिक थकान और सत्ता के प्रति असंतोष किसी भी शासन के लिए घातक हो सकता है। यूडीएफ की इस जीत में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने अपनी पुरानी ताकत को फिर से संकलित किया। अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यक समुदाय के बीच एक नए प्रकार के संतुलन और विकास के वादों ने यूडीएफ को पुनः सत्ता की दहलीज तक पहुँचाया। वामपंथी दलों के लिए यह आत्ममंथन का समय है क्योंकि उनका यह गढ़ अब ढह चुका है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम की स्थिति इन तीनों राज्यों से बिल्कुल भिन्न रही। यहाँ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने लगातार तीसरी बार सरकार बनाने</div>
<div style="text-align:justify;">की दिशा में जीत दर्ज कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा ने अपनी पकड़ न केवल बनाए रखी, बल्कि उसे और अधिक मजबूत किया। असम का यह परिणाम स्थिरता की मांग को दर्शाता है। जहाँ अन्य राज्यों में परिवर्तन की लहर थी, वहीं असम के मतदाताओं ने मौजूदा नेतृत्व की नीतियों और सुरक्षा संबंधी दृष्टिकोण पर अपना विश्वास जताया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विकास कार्यों की गति और सीमावर्ती मुद्दों पर सरकार की सक्रियता ने जनता के बीच एक सकारात्मक संदेश भेजा। भाजपा के लिए असम पूर्वोत्तर भारत का वह प्रवेश द्वार बना हुआ है, जहाँ से उसकी नीतियां पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर रही हैं। यह जीत यह भी दर्शाती है कि यदि नेतृत्व सक्रिय हो और विकास के जमीनी कार्य दिख रहे हों, तो सत्ता-विरोधी लहर का प्रभाव कम किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय स्तर पर यदि इन चार राज्यों के परिणामों का निचोड़ निकाला जाए, तो कई महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं। मतदाताओं ने इस बार 'परिवर्तन' को एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में देखा है। यह प्रवृत्ति उन राज्यों में अधिक स्पष्ट रही जहाँ सत्ता लंबे समय से एक ही दल के पास थी। भारतीय मतदाता अब बहुत अधिक गतिशील हो गया है। वह केवल पुराने संबंधों या भावनाओं के आधार पर वोट नहीं दे रहा, बल्कि वह परिणामों की समीक्षा कर रहा है। नए नेतृत्व और विकल्पों के लिए खुलापन इस चुनाव की सबसे बड़ी विशेषता रही। तमिलनाडु में विजय की पार्टी का उदय इसका सबसे सटीक उदाहरण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं दूसरी ओर, जहाँ स्थिरता और सुरक्षा का अनुभव हुआ, वहाँ मतदाताओं ने यथास्थिति को बनाए रखने में संकोच नहीं किया, जैसा कि असम में देखा गया। क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय दलों के बीच का संतुलन भी बदल रहा है। जहाँ बंगाल में राष्ट्रीय दल ने क्षेत्रीय शक्ति को विस्थापित किया, वहीं तमिलनाडु में एक नई क्षेत्रीय शक्ति ने राष्ट्रीय स्तर के गठबंधनों को चुनौती दी।</div>
<div style="text-align:justify;">इन चुनावों का एक और महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं और युवाओं की भागीदारी रही। सभी राज्यों में मतदान प्रतिशत में वृद्धि देखी गई, जो लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डेटा के अनुसार, पश्चिम बंगाल में महिला मतदाताओं का झुकाव इस बार निर्णायक साबित हुआ, जिन्होंने सुरक्षा और रोजगार के मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया। केरल में शिक्षित युवाओं ने भ्रष्टाचार के मुद्दों पर वामपंथ के विरुद्ध मतदान किया। तमिलनाडु में सिनेमाई लोकप्रियता का राजनीतिक प्रभाव एक बार फिर सिद्ध हुआ, लेकिन इस बार इसके पीछे एक व्यवस्थित संगठन और नीतिगत ढांचा भी मौजूद था। यह चुनाव यह भी स्पष्ट करते हैं कि भारत की राजनीति अब अधिक गतिशील और प्रतिस्पर्धात्मक हो रही है। अब कोई भी राजनीतिक किला अभेद्य नहीं रह गया है। मतदाताओं की आकांक्षाएं बढ़ रही हैं और वे अब शासन से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि 2026 के ये चुनाव परिणाम आने वाले 2029 के आम चुनावों के लिए एक बड़ी आधारभूमि तैयार कर रहे हैं। इन परिणामों ने यह संदेश दिया है कि भारतीय राजनीति में नए चेहरों और नए विचारों के लिए पर्याप्त स्थान है। क्षेत्रीय अस्मिता और राष्ट्रीय आकांक्षाओं के बीच एक नया सामंजस्य बनता दिख रहा है। बंगाल की जीत भाजपा के लिए एक बड़ी वैचारिक विजय है, जबकि तमिलनाडु में विजय का उदय द्रविड़ राजनीति के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केरल और असम के परिणाम बताते हैं कि सुशासन और विकल्प की उपलब्धता ही सत्ता की कुंजी है। यह संपूर्ण प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र की उस जीवंतता को दर्शाती है, जिसमें जनता ही अंतिम निर्णायक है और उसकी चुप्पी में ही सबसे बड़े परिवर्तन के बीज छिपे होते हैं। 2026 का यह साल भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक बड़े प्रस्थान बिंदु के रूप में याद किया जाएगा, जिसने पुराने दिग्गजों को विश्राम दिया और नए नायकों को मंच प्रदान किया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 17:45:53 +0530</pubDate>
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