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                <title>Hindi environmental article - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>उद्योगपतियों का बोल बाला हरियाली पर चल रही आरा</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संपादक/लेखक: राजीव शुक्ला</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में हरियाली संरक्षण की बातें सरकारी योजनाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पौधारोपण अभियानों और जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों में खूब होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी भिन्न है। देश के कई हिस्सों में उद्योगपतियों और लकड़ी माफिया के बोल बाले में आरा मशीनें (बैंड सॉ मिल या सॉइंग मशीनें) बेखौफ हरियाली पर आरी चला रही हैं। हरे-भरे पेड़—नीम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीशम या अन्य प्रजातियां—रातोंरात कटकर लकड़ी के ढेर में बदल जा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि प्रशासन या तो आंखें मूंदे बैठा है या जांच की औपचारिकता पूरी कर मामला ठंडा कर देता है। यह न केवल पर्यावरणीय</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177911/industrialists-say-the-saw-is-running-on-greenery"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/istockphoto-1306526998-612x612-1.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संपादक/लेखक: राजीव शुक्ला</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में हरियाली संरक्षण की बातें सरकारी योजनाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पौधारोपण अभियानों और जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों में खूब होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी भिन्न है। देश के कई हिस्सों में उद्योगपतियों और लकड़ी माफिया के बोल बाले में आरा मशीनें (बैंड सॉ मिल या सॉइंग मशीनें) बेखौफ हरियाली पर आरी चला रही हैं। हरे-भरे पेड़—नीम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीशम या अन्य प्रजातियां—रातोंरात कटकर लकड़ी के ढेर में बदल जा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि प्रशासन या तो आंखें मूंदे बैठा है या जांच की औपचारिकता पूरी कर मामला ठंडा कर देता है। यह न केवल पर्यावरणीय आपदा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विकास के नाम पर हो रही व्यवस्थित लूट का प्रतीक भी है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न राज्यों से लगातार खबरें आ रही हैं कि औद्योगिक कॉलोनियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांवों के किनारे या जंगलों के आसपास अवैध आरा मशीनें  संचालित हो रही हैं। मध्य प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजस्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे क्षेत्रों में इन मशीनों पर सैकड़ों क्विंटल हरी लकड़ी रोजाना चीरी जा रही है। कई मामलों में बिना लाइसेंस या एनओसी के आरा मशीनें चल रही हैं और हरे पेड़ों की जड़ें तक उखाड़ी जा रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि सबूत मिट जाएं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वन विभाग  की भूमिका अक्सर संदिग्ध नजर आती है। लकड़ी का स्रोत जांचे बिना आरा संचालकों को छूट मिल रही है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में कभी-कभी बुलडोजर कार्रवाई होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन ये प्रयास छिटपुट और अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। लकड़ी उद्योग की मांग ईंधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फर्नीचर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पैकेजिंग और निर्माण के लिए लगातार बढ़ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका फायदा अक्सर शक्तिशाली उद्योगपतियों और उनके नेटवर्क को पहुंचता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस संदर्भ में ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना एक चिंताजनक उदाहरण है। अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में प्रस्तावित इस </span>₹81,000<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ की मेगा परियोजना में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ड्यूल-यूज एयरपोर्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पावर प्लांट और टाउनशिप का निर्माण शामिल है। परियोजना के तहत लगभग </span>130-166<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें प्राथमिक वर्षावन (</span>rainforest) <span lang="hi" xml:lang="hi">की बड़ी मात्रा शामिल है। </span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुमान है कि इससे करीब </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख से अधिक पेड़ कट सकते हैं। परियोजना को रणनीतिक महत्व (भारतीय महासागर क्षेत्र में भारत की उपस्थिति मजबूत करने) का हवाला देकर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (</span>NGT) <span lang="hi" xml:lang="hi">ने हाल ही में पर्यावरणीय मंजूरी बरकरार रखी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पर्यावरणविद् चेतावनी दे रहे हैं कि इससे जैव विविधता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेदरबैक कछुए के घोंसलों और शोम्पेन जनजाति के निवास पर अपूरणीय क्षति होगी। एक ओर हरियाली बचाने के दावे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर ऐसे बड़े पैमाने पर वन क्षेत्रों का डायवर्शन विकास मॉडल की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आईएसआरओ के उपग्रह डेटा पर आधारित वन सर्वे ऑफ इंडिया (</span>FSI) <span lang="hi" xml:lang="hi">की भारत राज्य वन रिपोर्ट </span>2023 (ISFR 2023) <span lang="hi" xml:lang="hi">में देश की हरियाली की तस्वीर मिश्रित है। रिपोर्ट के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का कुल वन और वृक्ष आवरण </span>8,27,357<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो देश के भौगोलिक क्षेत्र का </span>25.17%<span lang="hi" xml:lang="hi"> है। इसमें वन आवरण </span>7,15,343<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर (</span>21.76%) <span lang="hi" xml:lang="hi">और वृक्ष आवरण </span>1,12,014<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर (</span>3.41%) <span lang="hi" xml:lang="hi">शामिल है। </span>2021<span lang="hi" xml:lang="hi"> की तुलना में कुल वन और वृक्ष आवरण में </span>1,445<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई है (वन आवरण में +</span>156<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर और वृक्ष आवरण में +</span>1,289<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर)। रिपोर्ट </span>ISRO <span lang="hi" xml:lang="hi">के </span>Resourcesat-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> सैटेलाइट के </span>LISS-III <span lang="hi" xml:lang="hi">सेंसर (</span>23.5<span lang="hi" xml:lang="hi"> मीटर रिजोल्यूशन) से प्राप्त मध्यम रिजोल्यूशन वाले उपग्रह डेटा पर आधारित है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञों का कहना है कि यह वृद्धि मुख्य रूप से प्लांटेशनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एग्रोफॉरेस्ट्री और रिकॉर्डेड फॉरेस्ट क्षेत्रों के बाहर वृक्षों के विस्तार से आई है। घने प्राकृतिक वनों में गिरावट जारी है। पिछले दो दशकों में घने वनों की कुल हानि </span>24,651<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर से अधिक हो चुकी है। उत्तर-पूर्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्र और पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील इलाकों में खनन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और अवैध कटाई से वन क्षरण हो रहा है। अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्रों में मैंग्रोव आवरण हालांकि बढ़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बड़े विकास प्रोजेक्ट्स इससे खतरा पैदा कर रहे हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रेट निकोबार जैसी परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को और मजबूत तथा पारदर्शी बनाना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि रणनीतिक विकास और जैव विविधता संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे। आईएसआरओ के उपग्रह डेटा जैसी वैज्ञानिक निगरानी को और प्रभावी बनाकर वास्तविक वन क्षरण पर अंकुश लगाया जा सकता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाली हमारी साझा विरासत है। यदि उद्योगपतियों का बोल बाला बिना रोक-टोक जारी रहा और बड़े प्रोजेक्ट्स में वन क्षेत्रों की बलि चढ़ती रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भविष्य की पीढ़ियां केवल आरा मशीनों की गूंज और सूखे खेतों की कहानियां सुनेंगी। सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासन और नागरिक समाज को मिलकर इस लूट को रोकना होगा। विकास और पर्यावरण के बीच सच्चा संतुलन बनाना संभव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक सख्ती अनिवार्य है। अन्यथा</span>, ‘<span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाली’ शब्द सिर्फ सरकारी फाइलों और भाषणों तक सीमित रह जाएगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 17:47:27 +0530</pubDate>
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