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                <title>economic inequality - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>economic inequality RSS Feed</description>
                
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                <title>धमकी से नहीं चलेगा पानी का रिश्ता, पाकिस्तान को आतंकवाद का हिसाब देना होगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div>पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक बार फिर भारत को सिंधु जल समझौते के मुद्दे पर धमकी देने की कोशिश की है। उनका कहना है कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी में कोई कमी करने या उसे रोकने की कोशिश हुई तो पाकिस्तान इसका मुंहतोड़ जवाब देगा। साथ ही उन्होंने कश्मीर पर पाकिस्तान के पुराने रुख को दोहराते हुए कहा कि इस मुद्दे पर उनका देश कभी पीछे नहीं हटेगा। अपने भाषण में उन्होंने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की प्रशंसा करते हुए यह दावा भी किया कि उनके नेतृत्व में पाकिस्तान ने भारत को पराजित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185260/water-relations-will-not-work-through-threats-pakistan-will-have"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1002151168.jpg" alt=""></a><br /><div>पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक बार फिर भारत को सिंधु जल समझौते के मुद्दे पर धमकी देने की कोशिश की है। उनका कहना है कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी में कोई कमी करने या उसे रोकने की कोशिश हुई तो पाकिस्तान इसका मुंहतोड़ जवाब देगा। साथ ही उन्होंने कश्मीर पर पाकिस्तान के पुराने रुख को दोहराते हुए कहा कि इस मुद्दे पर उनका देश कभी पीछे नहीं हटेगा। अपने भाषण में उन्होंने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की प्रशंसा करते हुए यह दावा भी किया कि उनके नेतृत्व में पाकिस्तान ने भारत को पराजित किया। शहबाज शरीफ के इन बयानों से साफ है कि पाकिस्तान आज भी वास्तविकता को स्वीकार करने के बजाय धमकी, दुष्प्रचार और भावनात्मक नारों का सहारा लेकर अपनी जनता को भ्रमित करना चाहता है।</div><div><br /></div><div>सबसे बड़ा सवाल यह है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को आज अचानक सिंधु नदी का पानी इतना याद क्यों आ रहा है? क्या वे यह भूल गए हैं कि भारत ने दशकों तक एक अंतरराष्ट्रीय समझौते का सम्मान करते हुए पाकिस्तान को उसके हिस्से का पानी दिया? क्या वे यह भूल गए हैं कि भारत ने हमेशा यह माना कि पड़ोसी देशों के साथ संबंध केवल सीमा और सुरक्षा से नहीं, बल्कि मानवता, सहयोग और आपसी विश्वास से भी चलते हैं? लेकिन पाकिस्तान ने बार-बार उस विश्वास को चोट पहुंचाई है। जब पाकिस्तान की धरती से प्रशिक्षित आतंकवादी भारत में निर्दोष नागरिकों का खून बहाते हैं और उसके बाद पाकिस्तान पानी के सवाल पर भारत को धमकी देता है, तो यह उसकी दोहरी नीति का सबसे बड़ा उदाहरण बन जाता है।</div><div><br /></div><div>पहलगाम में निर्दोष पर्यटकों को निशाना बनाकर की गई आतंकवादी घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। नाम पूछकर लोगों की हत्या करने जैसी अमानवीय घटना का दर्द केवल उन परिवारों का दर्द नहीं है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया। यह पूरे भारत की पीड़ा है। किसी व्यक्ति की मौत गोली से हो, आतंकवादी हमले में हो या किसी अन्य कारण से, उसके परिवार के लिए उसका दुख समान होता है। ऐसे में पाकिस्तान यदि आतंकवादियों को संरक्षण देने के आरोपों से स्वयं को अलग नहीं करता और दूसरी तरफ भारत से पानी की मांग भी धमकी के स्वर में करता है, तो उसके रवैये पर सवाल उठना स्वाभाविक है।</div><div><br /></div><div>सिंधु जल समझौता भारत की उदारता और दूरदर्शिता का भी प्रतीक रहा है। वर्ष 1960 में हुए इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के पानी का बंटवारा निर्धारित किया गया। पूर्वी नदियों रावी, ब्यास और सतलुज के पानी के उपयोग का अधिकार भारत को मिला, जबकि पश्चिमी नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब के पानी का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। इतने वर्षों तक भारत ने इस समझौते का सम्मान किया। लेकिन परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। जब कोई देश लगातार सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप झेलता है और भारत की सुरक्षा तथा नागरिकों को निशाना बनाने वाली गतिविधियों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं करता, तो भारत के सामने अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा की समीक्षा करना स्वाभाविक है।</div><div><br /></div><div>पाकिस्तान को यह समझना होगा कि पानी कोई धमकी देकर हासिल करने वाली वस्तु नहीं है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में समझौते तभी मजबूत रहते हैं, जब उनके पीछे आपसी विश्वास और जिम्मेदारी की भावना हो। पाकिस्तान यदि भारत से अच्छे संबंध चाहता है तो उसे सबसे पहले आतंकवाद के मुद्दे पर गंभीरता दिखानी होगी। भारत के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने वालों पर कार्रवाई करनी होगी और यह भरोसा पैदा करना होगा कि पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। केवल भाषण देने और भारत को धमकाने से दोनों देशों के बीच विश्वास पैदा नहीं हो सकता।</div><div><br /></div><div>कश्मीर को लेकर भी पाकिस्तान को वास्तविकता समझने की जरूरत है। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और भारत अपनी संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए पूरी तरह सक्षम है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जितनी बार चाहें कश्मीर पर पुराने बयान दोहरा सकते हैं, लेकिन इससे जमीन पर वास्तविकता नहीं बदलेगी। कश्मीर के नाम पर दशकों तक आतंकवाद को बढ़ावा देने की नीति ने पाकिस्तान को क्या दिया, यह पाकिस्तान की आर्थिक और सामाजिक स्थिति देखकर समझा जा सकता है। यदि कश्मीर वास्तव में पाकिस्तान की चिंता का विषय है तो उसे आतंकवाद और हिंसा का रास्ता छोड़कर शांतिपूर्ण संबंधों की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।</div><div><br /></div><div>शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में चीन-पाकिस्तान दोस्ती को हिमालय से भी ऊंचा बताया। पाकिस्तान को यह समझ लेना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति भावनाओं पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों पर चलती है। चीन और पाकिस्तान के बीच भले ही रणनीतिक और आर्थिक संबंध हों, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि चीन भारत के साथ अपने व्यापक हितों को छोड़कर पाकिस्तान की हर नीति का समर्थन करेगा। चीन एक बड़ी आर्थिक शक्ति है और भारत भी विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से आगे बढ़ रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक संबंधों का महत्व पाकिस्तान से कहीं अधिक व्यापक है। इसलिए केवल चीन का नाम लेकर भारत को धमकाने की कोशिश पाकिस्तान की कमजोर रणनीति को ही उजागर करती है।</div><div><br /></div><div>पाकिस्तान को यह भी समझना चाहिए कि किसी देश की शक्ति केवल हथियारों से तय नहीं होती। आर्थिक क्षमता, तकनीकी सामर्थ्य, राजनीतिक स्थिरता, कूटनीतिक प्रभाव, मजबूत संस्थाएं और जनता का विश्वास किसी राष्ट्र की वास्तविक ताकत बनते हैं। भारत इन सभी क्षेत्रों में लगातार अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। इसके विपरीत पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद, महंगाई और जल संकट जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे समय में भारत को धमकी देने के बजाय पाकिस्तान को अपनी ऊर्जा अपने देश की समस्याओं के समाधान में लगानी चाहिए।</div><div><br /></div><div>पाकिस्तान में जल संकट गहराता जा रहा है तो उसका समाधान भारत को धमकी देना नहीं है। पाकिस्तान को अपनी सिंचाई व्यवस्था में सुधार करना होगा, पानी की बर्बादी रोकनी होगी, जल संरक्षण बढ़ाना होगा और अपने राज्यों के बीच पानी के बेहतर प्रबंधन की व्यवस्था करनी होगी। सिंध और बलूचिस्तान जैसे क्षेत्रों में पानी की कमी की शिकायतें केवल भारत के कारण नहीं समझी जा सकतीं। पाकिस्तान की आंतरिक जल प्रबंधन व्यवस्था, बढ़ती आबादी, कृषि पर दबाव और जलवायु परिवर्तन भी इसके महत्वपूर्ण कारण हैं। अपनी नाकामी का दोष भारत पर डाल देना आसान है, लेकिन इससे पाकिस्तान की समस्या हल नहीं होगी।</div><div><br /></div><div>भारत के लिए भी यह समय भावनाओं में बहने के बजाय दृढ़ और संतुलित नीति अपनाने का है। भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी चाहिए और आतंकवाद के खिलाफ अपनी नीति में किसी प्रकार की कमजोरी नहीं दिखानी चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष तथ्यों, कानून और जिम्मेदार राष्ट्र की छवि के साथ मजबूती से रखा जाए। भारत ने दुनिया को कई बार दिखाया है कि वह शांति चाहता है, लेकिन शांति को कमजोरी नहीं समझता।</div><div><br /></div><div>शहबाज शरीफ को यह याद रखना चाहिए कि धमकियों से रिश्ते नहीं सुधरते। यदि पाकिस्तान सचमुच भारत के साथ अच्छे संबंध चाहता है तो उसे पहले आतंकवाद की नीति छोड़नी होगी। भारत के नागरिकों के जीवन और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करके पाकिस्तान एक ओर आतंकवाद को बढ़ावा दे और दूसरी ओर पानी के अधिकार की दुहाई दे, यह दोहरा रवैया स्वीकार नहीं किया जा सकता।</div><div><br /></div><div>भारत ने वर्षों तक पड़ोसी होने के नाते उदारता दिखाई है। लेकिन उदारता का अर्थ कमजोरी नहीं होता। भारत शांति का पक्षधर है, पर अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता नहीं कर सकता। पाकिस्तान चाहे जितनी धमकियां दे, भारत अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेने में सक्षम है। उसे यह समझना होगा कि पानी मांगने से पहले विश्वास अर्जित करना पड़ता है और विश्वास के लिए आतंकवाद का रास्ता छोड़ना पड़ता है। पाकिस्तान यदि सच में शांति चाहता है तो उसे बंदूक, आतंकवाद और धमकी की भाषा छोड़कर बातचीत, सहयोग और जिम्मेदारी की भाषा अपनानी होगी। यही उसके लिए भी बेहतर है और पूरे उपमहाद्वीप के भविष्य के लिए भी।</div><div>         *कांतिलाल मांडोत*</div><div><br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 17:19:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय पेज के लिए आलेख </title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>बेरोजगारी गरीबी असमानता भ्रष्टाचार से दबा लोकतंत्र ! </strong></div>
<div>  </div>
<div><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div>  </div>
<div>  इन दिनों देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ का जशन मना रहा है। हुक्मरानों के आह्वान पर देश में घर घर तिरंगा फहराया गया । राजपथ से लेकर जनपथ तक रोशनी की झालर जगमगा रही हैं लेकिन इस खुशहाल भारत के पीछे एक और हकीकत भी छिपी है यह है मुफलिसी, बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता व सस्ते सुलभ न्याय से महरूम हिंदुस्तान, जिसमें आज भी  भूख है, बेगार करने और अन्याय सहने की मजबूरी है, पूंजीवाद के हाथों में जकड़ती लोकतांत्रिक व्यवस्था है इन सबसे इतर नारे हैं</div>
<div>बेरोजगारी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185256/article-for-editorial-page"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/img_20260727_151239.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>बेरोजगारी गरीबी असमानता भ्रष्टाचार से दबा लोकतंत्र ! </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div> </div>
<div> इन दिनों देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ का जशन मना रहा है। हुक्मरानों के आह्वान पर देश में घर घर तिरंगा फहराया गया । राजपथ से लेकर जनपथ तक रोशनी की झालर जगमगा रही हैं लेकिन इस खुशहाल भारत के पीछे एक और हकीकत भी छिपी है यह है मुफलिसी, बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता व सस्ते सुलभ न्याय से महरूम हिंदुस्तान, जिसमें आज भी  भूख है, बेगार करने और अन्याय सहने की मजबूरी है, पूंजीवाद के हाथों में जकड़ती लोकतांत्रिक व्यवस्था है इन सबसे इतर नारे हैं उम्मीद हैं और इनके बीच बेरोजगारी महंगाई भ्रष्टाचार से कराहता आम आदमी है।</div>
<div>बेरोजगारी </div>
<div> </div>
<div>हालिया आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर लगभग 5.5% है, जो वैश्विक औसत (4.9%) के आसपास और कई प्रमुख जी-20 अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में स्थिर स्थिति में है, हालांकि युवाओं के बीच यह दर तुलनात्मक रूप से अधिक बनी हुई है।आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार देश में कुल बेरोजगारी दर स्थिस्थिर है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्र की दर लगभग 5.1% और शहरी क्षेत्र की दर लगभग 6.4% से 6.6% के बीच दर्ज की गई है।युवा बेरोजगारी की समस्या चुनौती बनकठभारत में 15 से 29 आयु वर्ग के युवाओं में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से अधिक (लगभग 15% से 16% के बीच) है, जो कौशल अंतराल और तकनीक-आधारित बदलावों को दर्शाती है। वैश्विक और भारतीय बाजारों में अनौपचारिक रोजगार और गुणवत्तापूर्ण पूर्णकालिक नौकरियों की उपलब्धता एक बड़ी चिंता बनी हुई है।</div>
<div> गरीबी की अंतहीन समस्या </div>
<div> </div>
<div>भारत में आज भी गरीबी की समस्या विकराल बनी हुई है। भारत में 20 करोड़ से भी ज्यादा लोग ऐसे हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे हैं और काफी मुश्किल से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। गरीबी से जुड़े कई ऐसे आंकड़े हैं, जो वाकई डराने वाले हैं। </div>
<div> </div>
<div>विभिन्न अंतरराष्ट्रीय और सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, भारत में अभी भी लगभग 23.4 करोड़ लोग गरीबी के स्तर पर जीवन जीने को मजबूर हैं। यह संख्या इस बात पर निर्भर करती है कि गरीबी को मापने के लिए किस मानक या पैमाने का उपयोग किया जा रहा है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक के संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे संकेतकों के आधार पर भारत में लगभग 23.4 करोड़ लोग घोर या बहुआयामी गरीबी में जी रहे हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक है।विश्व बैंक के अत्यधिक गरीबी के आंकड़े बता रहे हैं कि विश्व बैंक के मानकों ($2.15 प्रतिदिन आय) के अनुसार, भारत में अत्यधिक गरीबी में जीने वाले लोगों की संख्या घटकर लगभग 7.5 करोड़ (75 मिलियन) रह गई है। पिछले एक दशक में लगभग 26.9 से 27 करोड़ लोग इस अत्यधिक गरीबी रेखा से बाहर आए हैं। यदि उच्च स्तर यानी लगभग $4.20 प्रतिदिन के मानक को देखा जाए, तो भारत की लगभग 23.9% आबादी (करीब 34.2 करोड़ लोग) आर्थिक सुरक्षा के उस दायरे से नीचे आती है।</div>
<div> </div>
<div><strong>                                                                                   भुखमरी </strong></div>
<div> </div>
<div>नवीनतम ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 रिपोर्ट के अनुसार, कुल 123 देशों की सूची में भारत को 102वां स्थान मिला है। इस सूचकांक में भारत का कुल स्कोर 25.8 है, जो देश में भूख और कुपोषण की स्थिति को 'गंभीर' श्रेणी में रखता है। 123 देशों की पड़ताल में भारत का स्थान 102 वां है इस के अनुसार 25.8श्रेणी गंभीर प्रमुख स्वास्थ्य व पोषण 12.0%बाल बौनापन उम्र के हिसाब से कम लंबाई 32.9%बाल कमज़ोरी लंबाई के हिसाब से कम वजन 18.7% रिपोर्ट में दूसरी सबसे अधिक बाल मृत्यु दर 2.8% है। </div>
<div> भुखमरी सूचकांक वर्ष 2020 में भारत 94वें स्थान पर था।भूख और कुपोषण पर नजर रखने वाली वैश्विक भुखमरी सूचकांक की वेबसाइट के अनुसार चीन, ब्राजील और कुवैत सहित अठारह देशों ने पांच से कम के जीएचआई स्कोर के साथ अग्रिम पंक्ति में है। </div>
<div> </div>
<div><strong>                                                                     भ्रष्टाचार </strong></div>
<div> </div>
<div> </div>
<div>भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2025 में भारत 182 देशों में 91वें स्थान पर है। भारत का कुल स्कोर 39 (100 में से) है, जो पिछले वर्ष (2024 में 96वीं रैंक) की तुलना में पाँच स्थानों का सुधार दर्शाता है। यह रिपोर्ट ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी की जाती है।डेनमार्क, फिनलैंड और सिंगापुर सबसे कम भ्रष्ट देशों में शामिल हैं। भारत का प्रदर्शन (101रैंक)पाकिस्तान (136वीं रैंक), श्रीलंका (107वीं रैंक), और नेपाल (109वीं रैंक) से बेहतर है, लेकिन चीन (76वीं रैंक) और भूटान (18वीं रैंक) से पीछे है।</div>
<div> </div>
<div><strong>                                                                 गरीब अमीर के बीच खाई </strong></div>
<div> </div>
<div>विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 (तीसरा संस्करण) पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के द्वारा जारी की गई है। यह रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के शीर्ष 10% सबसे अमीर लोगों के पास वैश्विक संपत्ति का तीन-चौथाई (लगभग 75%) हिस्सा है, जबकि सबसे निचले 50% हिस्से के पास केवल 2% संपत्ति है।भारत में शीर्ष 10% लोगों के पास राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा है, जबकि निचले 50% लोगों को केवल 15% ही मिलता है।देश के शीर्ष 1% अमीरों के पास कुल संपत्ति का लगभग 40% हिस्सा है, और शीर्ष 10% के पास करीब 65% संपत्ति है।भारत में केवल 15.7% महिलाएं नौकरी कर रही हैं, और कुल श्रम आय में उनका हिस्सा महज 20% के आसपास है।</div>
<div> </div>
<div>भारत में असमानता गहराई से जड़ें जमा चुकी है, जहाँ शीर्ष 10% राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा अर्जित करते हैं और शीर्ष 1% के पास देश की कुल संपत्ति का 40% हिस्सा है। इसे महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर के 15.7% पर स्थिर बने रहने से और बढ़ावा मिलता है।</div>
<div>जलवायु असमानता के लिए सबसे धनी 10% लोग निजी पूंजी से होने वाले उत्सर्जन के 77% के लिये उत्तरदायी हैं; केवल शीर्ष 1% अकेले 41% योगदान करते हैं, जो असमान ज़िम्मेदारी और जोखिम को दर्शाता है।</div>
<div>                               न्याय बना अन्याय</div>
<div>देश में अदालतों में न्याय के लिए लम्बी लाइन लगीं है अगली पेशी अगले साल के चलते लाखों की संख्या में वादी व पीड़ित तारीख पर चक्कर काटते हुए दुनिया से चले जाते हैं पर न्याय नहीं मिलता। स्थिति यह है कि देशभर की अदालतों में निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कुल 5.64 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित (पेंडिंग) हैं।अदालत के स्तर पर लंबित मामलों का विवरणसुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च अदालत): लगभग 96,000 से अधिक केस पेंडिंग हैं।हाई कोर्ट (उच्च न्यायालय): देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में लगभग 63.76 लाख मामले पेंडिंग हैं।जिला और अधीनस्थ अदालतें (निचली अदालतें): कुल पेंडिंग मामलों का सबसे बड़ा हिस्सा यानी करीब 4.98 करोड़ से अधिक मामले निचली अदालतों में अटके हैं, जो कुल लंबित मामलों का लगभग 85% से अधिक है।</div>
<div>साइबर अपराध </div>
<div>देश में अपराध की स्थिति भी बदतर है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अंतिम उपलब्ध आंकड़े बताते हैं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की नवीनतम "क्राइम इन इंडिया" रिपोर्ट के अनुसार, पारंपरिक शारीरिक और हिंसक अपराधों में मामूली कमी दर्ज की गई है, जबकि डिजिटल व वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। देश में समग्र अपराध दर घटकर लगभग 418.9 प्रति लाख जनसंख्या पर आ गई है। विभिन्न डिजिटल और ऑनलाइन धोखाधड़ी में लगभग 17% से 18% की वृद्धि दर्ज की गई है। कुल साइबर मामलों में से लगभग 72% से अधिक का उद्देश्य वित्तीय ठगी रहा है महिलाओं के विरुद्ध मामलों में आंशिक (लगभग 1.5%) कमी आई है, जबकि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में लगभग 7.8% की वृद्धि देखी गई है। हत्या के मामलों में लगभग 2.4% की गिरावट दर्ज की गई है, हालांकि अपहरण और अन्य विवादित मामलों की संख्या में क्षेत्रीय भिन्नता बनी हुई है। वित्तीय गबन और धोखाधड़ी से जुड़े आर्थिक अपराधों में करीब 4.6% की वृद्धि हुई है।</div>
<div>राष्ट्रीय चरित्र में गिरावट </div>
<div>भारतीयों के राष्ट्रीय चरित्र में गिरावट के प्रमुख लक्षणों में अनियंत्रित भ्रष्टाचार, सार्वजनिक संपत्ति के प्रति लापरवाही, नागरिक अनुशासन का अभाव और राष्ट्रहित की तुलना में व्यक्तिगत स्वार्थ को प्राथमिकता देना शामिल है। समाज में नैतिक मूल्यों और सहिष्णुता की कमी भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।</div>
<div>कभी भारतीय लोगों का राष्ट्रीय चरित्र विविधता में एकता, सहिष्णुता, आतिथ्य-सत्कार, परिवार के प्रति अटूट जुड़ाव और कठिन परिस्थितियों में भी उच्च सहनशक्ति (लचीलेपन) पर आधारित है। यहाँ के समाज में धर्म, आध्यात्मिकता और सामूहिक जीवन की भावना गहराई तक समाई हुई है।लेकिन अब स्थिति भिन्न हो चली है। समाज में नैतिक और सामाजिक पतन की शुरुआत हो गई है। भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं बल्कि एक सामान्य और स्वीकृत बात बन गई है। लोग अपने अधिकारों के प्रति अत्यधिक जागरूक हैं, लेकिन अपने मूल कर्तव्यों को भूल रहे हैं। विभिन्न समूहों के बीच सहनशीलता घट रही है और असहिष्णुता बढ़ रही है। 'मेरा क्या फायदा' की सोच ने सामूहिक कल्याण और देशभक्ति की भावना को पीछे छोड़ दिया है।सरकारी संपत्तियों, पार्कों और धरोहरों को गंदा करना या नुकसान पहुँचाना आम हो गया है। यातायात नियमों और सामान्य कानूनों का पालन न करने को शान की बात समझा जाता है। अपराध या दुर्घटना के समय मदद करने के बजाय लोग वीडियो बनाने में व्यस्त रहते हैं।</div>
<div>भारत में राजनीतिक दलों की आपसी प्रतिद्वंद्विता अब इतना बढ़ गया है कि पिछले एक दशक में देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में सबसे कम समय का उपयोग किया जाता है विपक्ष संसद को अखाड़ा बनाने पर तुला है और सत्ता धारी विपक्ष के साथ सूक्ष्मता आम सहमति बनाने में नाकाम रहे हैं। देश ने नीट पेपर लीक के मुद्दे पर हुए प्रदर्शन में जैनजी के भीतर आक्रोश को देखा वहीं जैनजी के कंधे का इस्तेमाल करने की राजनीति को भी देखा वहीं आंदोलन की आड़ में अराजकता अभद्रता असंयमित गालीबाजी को भी सहन किया। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 17:13:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>गुजरा एक और मजदूर दिवस : लेकिन समस्याओं से ग्रस्त ,खुशियों से दूर ,आज भी मजदूर</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">हर साल की तरह इस बार भी एक मई यानी मजदूर दिवस मनाया गया। रैलियां निकल गई। सभाएं हुई। समस्याओं के खिलाफ संघर्ष का ऐलान किया गया। ठीक सब कुछ वैसा ही जैसा मई यानी मजदूर दिवस पर हर साल किया जाता है। और शायद भविष्य में भी हमेशा ऐसा ही किया जाता रहेगा। इसके संदर्भ में यह भी मानना अनुचित नहीं होगा कि गरीबी शब्द ही मजदूर दिवस जैसे शब्द का सृजक है। और अगर गरीबी नहीं होती तो शायद मजदूर दिवस मनाया जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। एक हिसाबसे हम सभी मजदूर ही हैं बस अंतर इतना</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177893/another-labor-day-has-passed-but-laborers-are-still-far"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/1001877835.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">हर साल की तरह इस बार भी एक मई यानी मजदूर दिवस मनाया गया। रैलियां निकल गई। सभाएं हुई। समस्याओं के खिलाफ संघर्ष का ऐलान किया गया। ठीक सब कुछ वैसा ही जैसा मई यानी मजदूर दिवस पर हर साल किया जाता है। और शायद भविष्य में भी हमेशा ऐसा ही किया जाता रहेगा। इसके संदर्भ में यह भी मानना अनुचित नहीं होगा कि गरीबी शब्द ही मजदूर दिवस जैसे शब्द का सृजक है। और अगर गरीबी नहीं होती तो शायद मजदूर दिवस मनाया जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। एक हिसाबसे हम सभी मजदूर ही हैं बस अंतर इतना है। कोई अमीर मजदूर है तो कोई गरीब मजदूर है। - - और इनमें अमीर मजदूरों से ज्यादा है गरीब मजदूर।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह मई दिवस उन्हें गरीब मजदूरों का है। और यह हमेशा यूं ही मनाया जाता रहेगा क्योंकि ऐसा नहीं लगता कि गरीब मजदूरों की संख्या अमीर मजदूरों से ज्यादा हो जाएगी। यहां अमीर मजदूर का मतलब उन सभी से है जो गरीब मजदूरों की तरह आज भी भूखे पेट नहीं सोते। जो आज भी बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं। जिन्हें आज भी अपनी बेटियों की शादी करने के लिए भीख मांगनी पड़ती है। गंभीर बीमारियों के इलाज के अभाव में पैसे की वजह से जो आज भी दम तोड़ देते हैं। ईद पत्थर ढोये बगैर ,रिक्शा चलाए बगैर, बोझ उठाये बगैर और फावड़ा या हल चलाएं बगैर भूखे पेट सोने या नंगे बदन रहने को मजबूत होते हैं।  </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संक्षेप में यह भी कहा जा सकता है कि, जिनके सपने रहते हमेशा चूर-चूर है, वो और कोई नहीं साहब, लोगों के शौक पूरे करने वाला एक मजदूर है।  जैसा कि सर्व विदित है कि इन मजदूरों और श्रमिकों को सम्मान देने के उद्देश्य से हर साल दुनिया भर में मजदूर दिवस मनाया जाता है। मजदूरों के नाम समर्पित यह दिन 1 मई है। मजदूर दिवस को 'लेबर डे, श्रमिक दिवस या मई डे' के नाम से भी जाना जाता है। श्रमिकों के सम्मान के साथ ही मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाने के उद्देश्य से भी इस दिन को मनाते हैं, ताकि मजदूरों की स्थिति समाज में मजबूत हो सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मजदूर किसी भी देश के विकास के लिए अहम भूमिका में होते हैं। हर कार्य क्षेत्र मजदूरों के परिश्रम पर निर्भर करता है। मजदूर किसी भी क्षेत्र विशेष को बढ़ावा देने के लिए श्रम करते हैं। हर बार मजदूर दिवस की एक थीम होती है, जिसके आधार पर इन दिन को मनाया जाता है। इस वर्ष मजदूर दिवस 2024 की थीम 'जलवायु परिवर्तन के बीच काम की जगह पर श्रमिकों के स्वास्थय और सुरक्षा को सुनिश्चित करना।' लेकिन यहां कितना हो पाएगा या सब कुछ करने वालों की मंशा पर ही निर्भर करता है ।       </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अवगत कराते चलें कि पहली बार मजदूर दिवस 1889 में मनाने का फैसला लिया गया। इस दिन को मनाने की रूपरेखा अमेरिका के शिकागो शहर से बनने लगी थी, जब मजदूर एक होकर सड़क पर उतर आए थे। 1886 से पहले अमेरिका में आंदोलन की शुरुआत हुई थी। इस आंदोलन में अमेरिका के मजदूर सड़कों पर आ गए। अपने हक के लिए मजदूर हड़ताल पर बैठ गए। इस आंदोलन का कारण मजदूरों की कार्य अवधि थी। उस दौरान मजदूर एक दिन में 15-15 घंटे काम करते थे। आंदोलन के दौरान मजदूरों पर पुलिस ने गोली चला दी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस दौरान कई मजदूरों की जान चली गई। सैकड़ों श्रमिक घायल हो गए। इस घटना के तीन साल बाद 1889 में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन की बैठक हुई। इस बैठक में तय किया गया कि हर मजदूर से प्रतिदिन 8 घंटे ही काम लिया जाएगा। वहीं सम्मेलन के बाद 1 मई को मजदूर दिवस मनाने का फैसला लिया गया। इस दिन हर साल मजदूरों को छुट्टी देने का भी फैसला लिया गया। बाद में अमेरिका के मजदूरों की तरह अन्य कई देशों में भी 8 घंटे काम करने के नियम को लागू कर दिया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका में मजदूर दिवस मनाने का प्रस्ताव 1 मई 1889 को लागू हुआ, लेकिन भारत में इस दिन को मनाने की शुरुआत लगभग 34 साल बाद हुई। भारत में भी मजदूर अत्याचार और शोषण के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। मजदूरों का नेतृत्व वामपंथी कर रहे थे। उनके आंदोलन को देखते हुए 1 मई 1923 में पहली बार चेन्नई में मजदूर दिवस मनाया गया। लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान की अध्यक्षता में मजदूर दिवस मनाने की घोषणा की गई। कई संगठन और सोशल पार्टी ने इस फैसले का समर्थन किया। लेकिन आज के परिवेश में मजदूर दिवस मनाना न : : तएक खाना पूरी जैसा है क्योंकि मजदूर की वास्तविक परिभाषा में आने वाला व्यक्ति आज भी अपनी समस्याओं को लेकर हताश निराश और परेशान है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>सुनील बाजपेई</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 17:23:35 +0530</pubDate>
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