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                <title>कार्बन उत्सर्जन - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>कार्बन उत्सर्जन RSS Feed</description>
                
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                <title>पेट्रोल में एथेनॉल: सस्ते ईंधन का सपना या गाड़ियों के लिए खतरा? लोगों में बढ़ता डर</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote><p style="text-align:justify;">कानपुर। 2020 से सरकार ने E20 यानी 20% एथेनॉल वाला पेट्रोल पूरे देश में लागू करने का लक्ष्य रखा है। 2025 तक ज्यादातर शहरों में यही पेट्रोल मिल रहा है। मकसद साफ है: तेल आयात कम करना, किसानों को फायदा पहुंचाना और प्रदूषण घटाना। लेकिन सड़कों पर एक अलग बहस चल रही है - "क्या एथेनॉल मेरी गाड़ी का इंजन खराब कर देगा?" अभी तक ईरान - इजरायल युद्ध से पहले पेट्रोल में 10 प्रतिशत एथेनॉल मिला कर बेचा जा रहा था।</p><p style="text-align:justify;"> एक्सपर्ट बताते हैं कि दस फीसदी मिलावट को भारत की सभी गाड़ियां सह लेंगी लेकिन जैसे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181925/ethanol-in-petrol-dream-of-cheap-fuel-or-danger-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(1).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote><p style="text-align:justify;">कानपुर। 2020 से सरकार ने E20 यानी 20% एथेनॉल वाला पेट्रोल पूरे देश में लागू करने का लक्ष्य रखा है। 2025 तक ज्यादातर शहरों में यही पेट्रोल मिल रहा है। मकसद साफ है: तेल आयात कम करना, किसानों को फायदा पहुंचाना और प्रदूषण घटाना। लेकिन सड़कों पर एक अलग बहस चल रही है - "क्या एथेनॉल मेरी गाड़ी का इंजन खराब कर देगा?" अभी तक ईरान - इजरायल युद्ध से पहले पेट्रोल में 10 प्रतिशत एथेनॉल मिला कर बेचा जा रहा था।</p><p style="text-align:justify;"> एक्सपर्ट बताते हैं कि दस फीसदी मिलावट को भारत की सभी गाड़ियां सह लेंगी लेकिन जैसे ही ईरान - इजरायल युद्ध शुरू हुआ और देश में पेट्रोल की कमी हुई सरकार ने ई- 20 पेट्रोल सभी पेट्रोल पंप पर बेचना शुरू कर दिया। सरकार की इस नीति से लोगों में एक नई बहस छिड़ गई है। बहुत से एक्स्पर्ट बताते हैं कि ई-20 पेट्रोल 2023 से पहले की गाड़ियों के लिए ठीक नहीं है एक तो इससे माइलेज पर असल पड़ रहा है और दूसरा यह इंजन के कई पार्ट्स को भी ख़राब कर देगा।</p><p style="text-align:justify;"> केन्द्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने लोगों की इस बात को गलत बताया है और कहा है कि ऐसी कोई शिकायत नहीं मिली है। ई-20 के बाद, केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने ई-85 और इसके बाद 100 फीसदी एथेनॉल को भी मंजूरी दे दी। सरकार का मानना है कि इससे करोड़ों डालर का फायदा होगा जिसे हम अन्य विकास कार्यों में लगा सकते हैं।</p><p style="text-align:justify;"><br />एथेनॉल क्यों बढ़ाया जा रहा है? आर्थिक कारण - भारत हर साल 85% कच्चा तेल आयात करता है। 2024 में इस पर $180 बिलियन खर्च हुए। ई-20 से हर साल 4-5 बिलियन डॉलर की बचत का अनुमान है। किसान हित- एथेनॉल गन्ना, मक्का और अनाज से बनता है। इससे चीनी मिलों और किसानों को नया बाजार मिला है। पर्यावरण-  एथेनॉल जलने पर CO और CO2 कम निकलता है। सरकार का दावा है कि ई20 से सालाना 50 लाख टन CO2 कम होगी।</p><p style="text-align:justify;"><br />           लोगों का डर कहां से आ रहा है? सोशल मीडिया और मैकेनिकों की दुकानों पर 4 बातें सबसे ज्यादा सुनाई देती हैं: माइलेज घट रहा है- एथेनॉल की कैलोरी वैल्यू पेट्रोल से 30% कम होती है। यानी ई-20 पर गाड़ी को उतनी ही पावर के लिए ज्यादा ईंधन जलाना पड़ता है। टेस्ट में 3-6% तक माइलेज ड्रॉप दिखा है। रोज 50 km चलने वाले के लिए महीने का खर्च 200-400 रु बढ़ सकता है।<br /> रबर और प्लास्टिक पार्ट्स का खराब होना- पुरानी गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले रबर होज, सील और गैस्केट एथेनॉल से जल्दी घिसते हैं। 2010 से पहले की गाड़ियां ई-10 के लिए भी डिजाइन नहीं थीं। अगर टैंक में पानी चला गया तो एथेनॉल उसे एब्जॉर्ब कर लेता है और इंजन में जंग लग सकती है। स्टार्टिंग और परफॉर्मेंस इश्यू- ठंड में एथेनॉल ब्लेंड स्टार्ट होने में दिक्कत करता है। कुछ लोग कहते हैं कि गाड़ी "खींचती" नहीं है, खासकर पहाड़ों और हाईवे पर।</p><p style="text-align:justify;"><br />पारदर्शिता की कमी-  पंप पर अक्सर ये नहीं लिखा होता कि टैंक में E10 है या E20। लोग अनजाने में भरवा लेते हैं और बाद में दिक्कत होने पर एथेनॉल को दोष देते हैं। सरकार और ऑटो कंपनियां क्या कहती हैं? सड़क परिवहन मंत्रालय और IOC का कहना है कि 2023 के बाद बनी सभी गाड़ियां E20 कम्पैटिबल हैं। Maruti, Hyundai, Tata, Mahindra ने अपनी नई गाड़ियों को E20 Ready बताया है। पुरानी गाड़ियों के लिए सरकार ने "E20 मैटेरियल कम्पैटिबल" किट का ऑप्शन दिया है, जिसमें रबर पार्ट्स बदलने पड़ते हैं। खर्च 3,000-8,000 रु तक आ सकता है। तकनीकी हकीकत क्या है? इंजन- अगर गाड़ी E20 कम्पैटिबल है तो इंजन पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ECU सॉफ्टवेयर एथेनॉल के हिसाब से फ्यूल मिक्स एडजस्ट कर देता है। फ्यूल सिस्टम- पुरानी गाड़ियों में नायलॉन और स्टेनलेस स्टील पार्ट्स होते हैं जो ठीक रहते हैं। लेकिन पुराने रबर वाले पार्ट्स 2-3 साल में बदलने पड़ सकते हैं। </p><p style="text-align:justify;">लॉन्ग टर्म इफेक्ट- अभी E20 देश में सिर्फ 2-3 साल हुआ है। 10 साल बाद इंजन पर क्या असर होगा, इसका बड़ा डेटा उपलब्ध नहीं है। दुनिया में क्या हो रहा है? ब्राजील 40 साल से E27 चला रहा है। वहां 90% गाड़ियां Flex Fuel हैं जो E0 से E100 तक चलती हैं। अमेरिका में E10 स्टैंडर्ड है। भारत ने सीधे E10 से E20 पर छलांग लगाई, इसलिए लोगों को झटका लगा। आम आदमी क्या करे? गाड़ी के फ्यूल लिड या मैनुअल पर लिखा होता है - E10, E20 या E20 Compatible। पुरानी गाड़ी है तो- अगर गाड़ी 2015 से पुरानी है और रोज 80-100 km चलती है, तो रबर पार्ट्स की जांच करवा लो। जरूरत लगे तो बदल दो। पंप पर पूछो भरवाने से पहले पूछ लो कि E10 है या E20।</p><p style="text-align:justify;"><br />पैनिक मत करो- 2-3% माइलेज ड्रॉप और थोड़ी मेंटेनेंस के अलावा ज्यादातर नई गाड़ियों में दिक्कत नहीं आ रही। एथेनॉल नीति देश के लिए जरूरी है - विदेशी मुद्रा बचती है, किसान को फायदा होता है, प्रदूषण घटता है। लेकिन सरकार ने कम्युनिकेशन में कमी रखी। लोगों को लगा कि उनकी 5 साल पुरानी गाड़ी एक दिन में "आउटडेटेड" हो गई। अगर ऑटो कंपनियां फ्री सर्विस कैंप लगाकर पुरानी गाड़ियों की जांच करें और पंप पर क्लियर लेबलिंग हो, तो ये डर काफी हद तक कम हो सकता है। अभी समस्या तकनीक से ज्यादा भरोसे की है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 16:33:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जलवायु परिवर्तन का गहराता संकट: युद्ध, समुद्री तापमान और ‘वेस्टर्न वेव्स’ का भारत पर प्रभाव</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ | </strong>अप्रैल..., 2026 अप्रैल का महीना, जो कभी वसंत की सुखद अनुभूति का प्रतीक माना जाता था, आज 40–43°C की झुलसा देने वाली गर्मी का संकेतक बन गया है। उत्तर भारत, विशेषकर लखनऊ, दिल्ली, राजस्थान और मध्य गंगा के मैदानों में यह तापमान अब असामान्य नहीं रहा, बल्कि एक नई सामान्य स्थिति (New Normal) के रूप में उभर रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> यह परिवर्तन केवल मौसमी नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैश्विक स्तर पर चल रही जटिल प्रक्रियाएँ—जैसे जलवायु परिवर्तन, समुद्री तापमान में वृद्धि, और अंतरराष्ट्रीय युद्ध—मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार पिछले एक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177842/deepening-crisis-of-climate-change-war-sea-temperature-and-impact"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/4416221.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ | </strong>अप्रैल..., 2026 अप्रैल का महीना, जो कभी वसंत की सुखद अनुभूति का प्रतीक माना जाता था, आज 40–43°C की झुलसा देने वाली गर्मी का संकेतक बन गया है। उत्तर भारत, विशेषकर लखनऊ, दिल्ली, राजस्थान और मध्य गंगा के मैदानों में यह तापमान अब असामान्य नहीं रहा, बल्कि एक नई सामान्य स्थिति (New Normal) के रूप में उभर रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> यह परिवर्तन केवल मौसमी नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैश्विक स्तर पर चल रही जटिल प्रक्रियाएँ—जैसे जलवायु परिवर्तन, समुद्री तापमान में वृद्धि, और अंतरराष्ट्रीय युद्ध—मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार पिछले एक दशक में अप्रैल माह के अधिकतम तापमान में स्पष्ट वृद्धि देखी गई है - यह आकड़ा वर्ष के सापेक्ष अधिकतम तापमान (°C) का 2015-40.7, 2016-43.1, 2017-41.8, 2018-40.7, 2019-44.6, 2020-38.8, 2021-41.9, 2022~43.0, 2023-39.0, 2024-41.0, 2025-42.0, और 2026-43.0 से ऊपर (27 अप्रैल तक)।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">[Chitra-Gragh] इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि तापमान में गिरावट केवल अस्थायी रही है (जैसे 2020 में), जबकि दीर्घकालिक प्रवृत्ति लगातार वृद्धि की [Chitra-Gragh] महामारी और तापमान: एक अस्थायी राहत 2020 में COVID-19 लॉकडाउन के दौरान तापमान 38.8°C तक गिर गया था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> इसका मुख्य कारण था—वाहनों की आवाजाही में कमी, औद्योगिक गतिविधियों का ठहराव और वायु प्रदूषण में गिरावट हालाँकि, यह गिरावट स्थायी नहीं रही। जैसे ही गतिविधियाँ पुनः शुरू हुईं, तापमान फिर से तेजी से बढ़ने लगा। युद्ध और जलवायु परिवर्तन का संबंध वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन और युद्ध के बीच एक खतरनाक संबंध उभरकर सामने आया है, जिनका मुख्य प्रभाव: सैन्य उपकरणों में भारी ईंधन खपत, बमबारी और आग से कार्बन उत्सर्जन और ऊर्जा बुनियादी ढांचे का विनाश ही कहा जा सकता है। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध और 2026 में मध्य-पूर्व के संघर्षों के दौरान तापमान का 43°C के आसपास पहुँचना इस संबंध को मजबूत करता है। युद्ध केवल मानव जीवन ही नहीं, बल्कि पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन को भी गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। ‘वेस्टर्न वेव्स’ (पश्चिमी विक्षोभ) का बदलता स्वरूप भारत में आने वाले पश्चिमी विक्षोभ अब अनियमित और अधिक तीव्र होते जा रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> जिससे प्रमुख परिवर्तन जो महसूस किये गए, वह है -अचानक वर्षा और ओलावृष्टि, उसके तुरंत बाद भीषण हीटवेव और तापमान में तीव्र उतार-चढ़ाव (25°C से 43°C तक) होता रहा । इससे दुष्प्रभाव न ही रबी फसलों (विशेषकर गेहूं) पर संकट छाया बल्कि किसानों की आय पर असर हुआ और तरह–तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं में अप्रत्यासित वृद्धि हुई।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> शहरी भारत और ‘हीट आइलैंड’ प्रभाव लखनऊ, दिल्ली और पटियाला जैसे शहरों में कंक्रीट संरचनाओं और हरियाली की कमी के कारण “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। जिसके परिणाम स्वरुप शहरों में ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म, रात का भी तापमान 30°C से ऊपर रहता है जिससे शरीर को भी आराम नहीं मिल पा रहा है और आम जनता बेहाल है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भविष्य का संकट (2026–2030) यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में भारत को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि पिछले 15 दिनों से अधिक लंबी हीटवेव, सभी शहरों/देहातों में भी भरी जल संकट और भूजल स्तर में गिरावट पायी जा रही है। इसके साथ ही ऊर्जा  मांग में भी तीव्र वृद्धि हो रही है। उक्त कारणों से GDP में 4–6% तक संभावित कमी से भी नकारा नहीं जा सकता है। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि 2030 के बाद स्थिति और गंभीर हो सकती है, जब तापमान 48–50°C तक पहुँचने की संभावना बनी हुई है। समाधान: क्या किया जा सकता है? इस संकट से निपटने के लिए बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं:</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">1. पर्यावरणीय उपाय-अब हमें वृक्षारोपण और वन संरक्षण में अभियान स्वरुप सरकार के साथ कन्धा से कंधा मिलाकर काम करना होगा तथा जैव विविधता का संरक्षण के लिए प्रभावी कार्य की आवश्यकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">2. ऊर्जा परिवर्तन- यद्यपि भारतवर्ष में वर्तमान सरकार ने आम जनता से लेकर व्यवसायिक संस्थाओं तक तेजी से सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा रहा है , परन्तु इसे वर्ष 2047 तक आत्मनिर्भर भारत के साथ ही ऊर्जा हेतु आत्म निर्भर होना होगा | इसी के साथ – साथ जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना पड़ेगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">3.जल प्रबंधन- अभी तक भारतवर्ष में सरकार प्रयासों के बावजूद भी आम जनता में वर्षा जल संचयन के बारें में नगण्य जानकारी हो पाई है और नहीं जल संरक्षण तकनीकों का उपयोग का उपयोग किया जा रहा है, केवल कागजी कार्यवाही तक सीमित रह गया है । इस क्षेत्र में अभियान चलाकार जागरूक करने और प्रभावी कार्य करने की आवश्यकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">4. शहरी योजना- भारत सरकार ने स्मार्टसिटी व ग्रीन सिटी मॉडल की योजनायें चलाई, इसका कोई प्रभावी असर अभी तक दिखाई न पड़ रहा है और नहीं कम कंक्रीट और अधिक हरियाली ही किसी शहरी अथवा कस्बो पर्याप्त असर छोड़ रहा है। इस पर अधिक प्रभावी कार्य करने की आवश्यकता है ।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">5. सामाजिक भागीदारी- उपरोक्त से स्पष्ट है कि जो योजनाये प्रभावीरूप से संचालित  नहीं हो पा रही हैं, उनमें जन-जागरूकता अभियान चलाना तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए  जन आंदोलन चलाना अत्यंत आवश्यक है ।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 19:44:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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