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                <title>news hindi lekh - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>चुनाव के अंतिम चरण में मुजरा करती राजनीति</title>
                                    <description><![CDATA[<p>लोकसभा चुनाव के लिए मतदान का अंतिम चरण १  जून को समाप्त होगा,इससे पहले राजनीति में मुजरा बाकी रह गया था ,लेकिन पाटिलीपुत्र में माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी वो भी करा ही दिया। मोदी जी के ' मुजरा ' उल्लेख के बाद समूचा विपक्ष ' मुजरा ' करता नजर आ रहा है।  मुझे लगता है की मोदी जी ने जिस तरिके से मुजरा शब्द का इस्तेमाल किया है उसे लेकर बिदकने की जरूरत नहीं है ,क्योनी मोदी जी खुद मुजरा का वास्तविक अर्थ शायद नहीं जानते। उन्होंने मुजरा का इस्तेमाल तंज के रूप में किया है।</p>
<p>प्रधानमंत्री ने पाटलिपुत्र लोकसभा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141592/politics-doing-mujra-in-the-last-phase-of-elections"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/pm-narendra-modis-‘mujra-remark-sparks-row.jpg" alt=""></a><br /><p>लोकसभा चुनाव के लिए मतदान का अंतिम चरण १  जून को समाप्त होगा,इससे पहले राजनीति में मुजरा बाकी रह गया था ,लेकिन पाटिलीपुत्र में माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी वो भी करा ही दिया। मोदी जी के ' मुजरा ' उल्लेख के बाद समूचा विपक्ष ' मुजरा ' करता नजर आ रहा है।  मुझे लगता है की मोदी जी ने जिस तरिके से मुजरा शब्द का इस्तेमाल किया है उसे लेकर बिदकने की जरूरत नहीं है ,क्योनी मोदी जी खुद मुजरा का वास्तविक अर्थ शायद नहीं जानते। उन्होंने मुजरा का इस्तेमाल तंज के रूप में किया है।</p>
<p>प्रधानमंत्री ने पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र में एक रैली में  कहा कि- ‘‘बिहार वह भूमि है जिसने सामाजिक न्याय की लड़ाई को एक नई दिशा दी है. मैं इसकी धरती पर यह घोषणा करना चाहता हूं कि मैं एससी, एसटी और ओबीसी के अधिकारों को लूटने और उन्हें मुसलमानों को देने की ‘इंडिया' गठबंधन की योजनाओं को विफल कर दूंगा. वे गुलाम बने रह सकते हैं और अपने वोट बैंक को खुश करने के लिए 'मुजरा' कर सकते हैं.''जाहिर है की मोदी जी को मुजरा करना या तो आता नहीं है या फिर वे इसे रोज करते हैं लेकिन जानते नहीं हैं।</p>
<p>मेरी दृष्टि में मुजरा कोई असंसदीय शब्द नहीं है ,लेकिन इसमें सामानवाद की बू जरूर आती ह।  चूंकि मुजरा प्रथा मुगलकालीन है और बाद में सभी जातियों कि सामंतों ने इसे इस्तेमाल किया इसलिए इसे आप सामंती तो कह सकते हैं किन्तु असंसदीय नहीं। दरअसल मुजरा संस्कृति हुजूर से निकल क्र जब कोठों में प्रतिष्ठित हो गयी तो लोग इससे बचने लगे। मै चूंइक आजादी कि पहले की एक बड़ी रियासत रहे ग्वालियर में रहता हूँ इसलिए मुजरे कि बारे में बाखूबी जानता हो।  हमारे यहां सिंधिया कि महल में आज भी मुजरा किया जाता है।  छोटे बड़ों को मुजरा करते ही है। मैंने इसी महल में स्वर्गीय अर्जुन सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह तक को मुजरा करते देखा है।</p>
<p>कहते हैं की जब आप किसी कि हुजुर [दरबार या अदालत ] में जायेंगे तो आपको झुककर नमस्कार तो करना ही होता है।  यही मुजरा है। मुजरा आदर प्रकट करने का तरीका भर है कोटों पार तवायफों द्वारा किया जाने वाला मुजरा भी करीबन-करीबन इसी सभ्यता का सांस्कृतिक स्वरूप ह।  वैश्याएं बैठकर मुजरा करतीं हैं ,बाद में इसमें हिन्दुस्तानी नृत्यशैली कि अनेक अंग शामिल कर लिए गए। मुरा सलीका है और इसे सीखने कि लिए पुराने जमाने में वैश्याएं बाकायदा एक ट्यूटर की भूमिका में होतीं थी ।  सामंतों कि बच्चों को मुजरा करने का अंदाज इन्हीं वैश्यों से सीखना पड़ता थी। मुजरा ईश्वर   कि साथ ही आपके मौजूदा   मालिक   [स्वामी] को भी प्रसन्न करने की एक विधा है।  </p>
<p>मोदी जी को आपत्ति मुजरा करने पर नहीं है।  उनकी आपत्ति इस पर है की ये मुजरा अव्वल कांग्रेस क्यों करती है और मुसलमानों कि लिए क्यों करती है ? मुजरा विनम्रता की निशानी है। खुश करने का तौर-तरीका है। मोदी जी बहुसंख्यकों कि सामने मुजरा करते हैं ,लेकिन उन्हें पता नहीं होता की वे जो कर रहे हैं वो मुजरा है। आरक्षण कि मुद्दे पर मोदी जी बहके  हुए हैं और इसीलिए बार-बार कहते हैं की वे मर जायेंगे लेकिन पिछड़ों कि आरक्षण पर किसी को डाका नहीं डालने देंगे। मोदी जी हर चीज पर अपना एकाधिकार चाहते है।  मुजरे पर भी उन्हें एकाधिकार चाहिए। मोदी जी बीते एक दशक से बहुसंख्यक हिन्दुओं कि सामने मुजरा कर रहे हैं लेकिन किसी ने कभी उज्र नहीं किया। कांग्रेस ने तो बिलकुल नहीं।</p>
<p>एक हकीकत ये भी है की राजनीति कि अलावा किसी और धंधे में मुजरा करने की न तो जरूरत पड़ती है और न मुजरे की कोई परम्परा है। चाय बेचने में तो कोई किसी का मुजरा नहीं करता। पैसा फैंको और चाय पियो '। सियासत में तो बिना मुजरा करे न आपको संगठन में कोई पद मिलेगा और न टिकिट। जीत गए तो मंत्रिपद पाने कि लिए मुजरा करना पडेगा ही। मुझे याद है कि  एक जमाने में जब रानी महल में राजमाता संप्रभु थीं और जनसंघ का जमाना था तब जनसंघ कि तमाम नेता महल में राजमाता विजयराजे सिंधिया के सामने पूरी श्रद्धा से मुजरा करते थे। भाजपा कि तमाम छोटे-बड़े नेताओं ने भी मुजरा करते देखे जा सकते हैं।</p>
<p>मुझे नहीं पता की मोदी जी ने अपने मुसलमान विरोधी रवैये की वजह से अपनी युवावस्था में 'मुगलेआजम ' फिल्म देखी या नहीं देखी। यदि देखी होती तो वे मुजरे को अपने व्यंग्य के लिए  इस्तेमाल नहीं  करते। मोदी जी की टिप्पणी से आहत विपक्ष ने तो अपने गुस्से का मुजाहिरा कर दिया लेकिन मुजरा करने वाली वेश्याएं खामोश हैं। वैश्याएं मतदान करने जाती हैं या नहीं मुझे नहीं  पता। लेकिन यदि जातीं होंगी तो वे चुनाव  के  बाद इसका संज्ञान अवश्य लेंगीं। मुजरा साष्टांग दंडवत से ज्यादा अच्छा तरीका है। दंडवत प्रणाम करने के लिए लकुटी की भांति भूमि पर लेटकर अपने छहों अंगों को जमीन से मिलना पड़ता है। मोदी जी को मुजरा करना नहीं आता लेकिन दंडवत प्रणाम करना आता है ।  वे मुजरा करते नहीं बल्कि कराते है। वे चाहते हैं कि कांग्रेस और समूचा विपक्ष अल्पसंखयकों का मुजरा करना छोड़ उनके सामने मुजरा करे।</p>
<p>वर्ष 2024  के आम चुनाव में सियासत ने सब कुछ तो करवा डाला ? पहले एक के बाद  एक नया  हौवा खड़ा किया गया और जब इन हौवों से भी मतदाता का मिजाज नहीं बदला  तो वे मुजरे पर आ गए। 4  जून की तारीख वो तारीख है  जो बताएगी की मुजरा कौन कर रहा है और कौन देख रहा है ? मुजरे में नृत्य,संगीत ,अंग संचालन का बड़ा महत्व है। मुजरा वैश्याएं करें या नेता करें । कोई फर्क नहीं पड़ता ,लेकिन फर्क तो तब पड़ता है जब मुजरा करने के बाद कोई खुश होता है या नहीं। जिन लोगों ने मोदी जी के हुजूर में मुजरा नहीं किया उन्हें चुनाव से पहले ही ब्लैकलिस्ट कर दिया गया और जिन्होंने किया उन्हें पुरस्कृत भी किया गया।मोदी जी के इजलास में मुजरा करने से बचने की कोशिश करने वालों को क्या-क्या नहीं भुगतना पड़ा।</p>
<p> मुजरा करने की आगे भी ये रिवायत  आगे भी जारी रहने वाली है। वोट के लिए साष्टांग  दंडवत   प्रणाम करने से अच्छा तो मुजरा है। झुको लेकिन आधे झुको। पूरा झुकना तो गुलामी का प्रतीक है।पिछले दो महीने  से बड़े  से बड़े तुर्रम खान जनता के इजलास में मुजरा ही तो कर रहे थे। अभी एक जून तक ये परम्परा जारी रहेगा ।  मुजरा करने पर न तो किसी को तड़ीपार जाना पड़ता है और न ही संसद से बाहर किया जा सकता। मुजरा करने वाले का कभी कोई नुक्सान नहीं होता । बेहतर है कि  देश कि नेताओं में ' मुजरत्व' बचा रहे। ताली बजाने या थाली बजाने से बेहतर है की आप मुजरा करें। मै मुजरा शब्द कि इस्तेमाल कि लिए माननीय प्रधानमंत्री की निंदा नहीं करता। लेकिन उनकी  सराहना   भी नहीं करना चाहता,क्योंकि वे इस हबड का इस्तेमाल किये बिना भी अपनीबात कह सकते थे। मोदी जी ने ' मुजरा ' शब्द का इस्तेमाल गुस्से में किया है, जो उचित नहीं है।</p>
<p><strong>राकेश अचल</strong></p>
<div class="yj6qo"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 May 2024 15:31:18 +0530</pubDate>
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                <title>नतीजों से पहले नए यादवत्व की स्थापना</title>
                                    <description><![CDATA[<p>देश में 4  जून को आने वाले लोकसभा चुनाव परिणामों से पहले सत्तारूढ़ दल में नए प्रयोग तेजी से चल रहे है।  सत्तारूढ़ दल हाल ही में संघ से छोड़-छुट्टी का ऐलान कर ही चुका है और अब लगता है कि भाजपा ने पार्टी की सरकारों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विकल्प के तौर पर मध्य्प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव को नए यादव नेता के रूप में स्थापित करने की मुहिम  शुरू कर दी है। भाजपा और उसके नेतृत्व वाला गठबंधन चाहे सरकार बना पाए या न बना पाए लेकिन अब उसे योगी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141566/establishment-of-new-yadavatva-before-the-results"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/dsfa.jpg" alt=""></a><br /><p>देश में 4  जून को आने वाले लोकसभा चुनाव परिणामों से पहले सत्तारूढ़ दल में नए प्रयोग तेजी से चल रहे है।  सत्तारूढ़ दल हाल ही में संघ से छोड़-छुट्टी का ऐलान कर ही चुका है और अब लगता है कि भाजपा ने पार्टी की सरकारों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विकल्प के तौर पर मध्य्प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव को नए यादव नेता के रूप में स्थापित करने की मुहिम  शुरू कर दी है। भाजपा और उसके नेतृत्व वाला गठबंधन चाहे सरकार बना पाए या न बना पाए लेकिन अब उसे योगी जी किसी   भी सूरत में बर्दाश्त होने वाले नहीं है।</p>
<p>पिछले दो महीने की गतिविधियों की समीक्षा के बाद ये तथ्य सामने आया है कि मोशा की जोड़ी 4  जून के बाद यदि सबसे पहले किसी के आभामंडल को कम करेगी तो वो होंगे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। योगी जी ने अपने तरीके से उत्तर प्रदेश को बनाया है और और प्रदेश में ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में उनका कथित सुशासन मॉडल की तरह लोकप्रिय हो रहा है ,और यही मोशा की जोड़ी को बर्दाश्त नहीं। लोकसभा चुनावों के हर चरण में भाजपा प्रत्याशियों ने यदि मोशा के बाद किसी नेता की मांग की है तो वो नाम है योगी आदित्यनाथ का। अब नाथ मोशा के सबसे बड़े प्रतिद्वंदी   बनकर उभरे हैं। पहले उनकी  जगह केन्दीय मंत्री नितिन गडकरी का नाम सबसे ऊपर लिया जाता था।</p>
<p>जानकार बताते हैं कि चुनाव के पांचवें चरण  के बाद जहाँ-जहाँ से योगी की मांग आयी,वहां-वहां मोशा की जोड़ी ने विकल्प के तौर  पर मप्र के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव को भेजा ।  खासतौर पर यादव बाहुल्य वाले राज्यों और चुनाव क्षेत्रों में। मोहन यादव हालाँकि अभी प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तरह आम जनता  के मामा नहीं बन पाए हैं किन्तु भाजपा नेतृत्व उन्हें योगी के स्थान पर पार्टी का नया यादव नेता बनाने में जरूर रूचि ले रही है। डॉ मोहन यादव ने भी योगी की तरह प्रदेश में आल्प्सख्यकों को हड़काना शुरूकर दिया है।  हाल ही में उन्होंने प्रदेश के मुस्लिमों को चेतावनी दी है कि यदि किसी ने भी सड़कों पर नमाज पढ़ने की कोशिश की तो उसकी खैर नहीं।</p>
<p>डॉ मोहन यादव को मुख्यमंत्री बने छह महीने से ज्यादा का समय हो गया है,लेकिन उनकी पहचान अभी तक मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित नहीं हो पायी है ,लेकिन एक यादव नेता के रूप में स्थापित होने में उन्हें ज्यादा कामयाबी मिली है। मोशा   की जोड़ी ने उन्हें अप्रत्याशित  रूप से शिवराज सिंह चौहान की जगह मप्र का मुख्यमंत्री बनाया था ,जबकि राज्य विधानसभा का चुनाव चौहान के चेहरे और उनकी सरकार की उपलब्धियों के आधार पर ही लड़ा गया था। कहा जाता है कि शिवराज सिंह का कद एक मुख्यमंत्री के रूप में तो बड़ा हो ही चुका था लेकिन वे लोगों को [ पार्टी के भीतर भी और बाहर भी ] प्रधानमंत्री माननीय मोदी जी का विकल्प लगने लगे थे ,इसलिए उन्हें राज्य सत्ता  से बेदखल कर दिया गया।  अब वे पहले की तरह मात्र  एक लोकसभा सदस्य की हैसियत में रहेंगे। सरकार बनने पर जरूर उन्हें  नरेंद्र सिंह तोमर के प्रदेश वापस आने से हुई रिक्त कुर्सी दी जा सकती है।</p>
<p>चुनाव के छठवें चरण   को पार कर चुकी भाजपा का नेतृत्व इस बात को लेकर बहुत सतर्क है की पार्टी में कोई भी चूहे से बिल्ली बनकर मोशे की जोड़ी की तरफ म्याऊं न करे। मोशा कोई जोड़ी ने चुन-चुनकर चूहे से बिल्ली बनने की कोशिश कर रहे तमाम नेताओं को कमजोर कर दिया है। चूहों को बिल्ली बनाने वाले आरएसएस से भी मोशा ने तर्के -ताल्लुक करने के संकेत  दे दिए हैं। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्ढा के जरिये ये कहलाया जा चुका है कि भाजपा को अब संघ की जरूरत नहीं है। संघ अपनी बिल्ली को अपने ऊपर म्याऊं करते हुए देखकर खुद सन्निपात   में हैं। संघ नेतृत्व को खुद ये आशंका है कि यदि 4  जून के बाद भाजपा फिर से बहुमत में आयी तो मोशा संघ को ही कहीं अपना चूहा न बना ले ! संघ की पशोपेश देखते ही बनती है।</p>
<p>अब तक मिले संकेतों से लगता है कि भाजपा का सत्ता में बने रहना आसान नहीं है ,किन्तु ' मोदी है तो मुमकिन है ' के नारे के साथ भाजपा ईवीएम की मदद से सत्ता सिंहासन पहुंच भी सकती है।  पिछले साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने ये चमत्कार करके दिखा भी दिया था। जब पूरा देश पांच में से तीन राज्यों में कांग्रेस की वापसी का राग अलाप रहा था तब भाजपा ने पांच में से चार पर अपना कब्जा बना लिया था। तमाम अटकलें गलत  साबित   हो गयीं थीं। मुमकिन है कि लोकसभा चुनाव में भी यही सब फिर से दोहराया जाये। आखिर भाजपा को 400  पर करना है।</p>
<p>बहरहाल अभी सभी की   नजर 25  मई को समाप्त हुए मतदान के छठवें चरण के बाद अंतिम चरण पर टिकी हुईं है।अंतिम चरण  में जिन राज्यों में मतदान होना है उन राज्यों की यादव बाहुल्य वाली सीटों पर मोशा मप्र के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर रही है। योगी से भी ज्यादा महत्व मोहन जी को दिया जा रहा है। खुद योगी जी भी इस तब्दीली को महसूस कार रहे हैं। अब देखना ये होगा कि देश में अगला मॉडल गुजरात का चलेगा या उत्तर प्रदेश का? उत्तर प्रदेश का चलेगा या मध्यप्रदेश का ?आप भी इस तब्दीली पर नजर रखियर और बताइये की आपको या महसूस होता है?</p>
<p><strong> राकेश अचल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
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                <pubDate>Sat, 25 May 2024 16:53:49 +0530</pubDate>
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                <title>मतदाता को पढ़ नहीं पाए राजनैतिक दल </title>
                                    <description><![CDATA[<div>मतदाता खामोश है लेकिन बहुत कुछ उसके मन में है। कभी कभी गुस्सा तो हमारे मन में होती है लेकिन हम उसको उजागर नहीं करते। यही हाल इस समय देश की जनता का है। तमाम मुद्दे ऐसे हैं जिसकी वजह से जनता खुश नहीं है। यदि आरोप सत्ता पक्ष पर लगता है तो विपक्ष ने भी वह काम अपनी सरकार के समय में नहीं किए। और यही कारण है कि इस चुनाव में कुछ तो नया होगा। आज लोकसभा चुनाव का छठा चरण चल रहा है और आज के बाद एक और चरण बचेगा। चार जून को जब मतगणना शुरू</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141565/political-parties-could-not-read-the-voters%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/csdf.jpg" alt=""></a><br /><div>मतदाता खामोश है लेकिन बहुत कुछ उसके मन में है। कभी कभी गुस्सा तो हमारे मन में होती है लेकिन हम उसको उजागर नहीं करते। यही हाल इस समय देश की जनता का है। तमाम मुद्दे ऐसे हैं जिसकी वजह से जनता खुश नहीं है। यदि आरोप सत्ता पक्ष पर लगता है तो विपक्ष ने भी वह काम अपनी सरकार के समय में नहीं किए। और यही कारण है कि इस चुनाव में कुछ तो नया होगा। आज लोकसभा चुनाव का छठा चरण चल रहा है और आज के बाद एक और चरण बचेगा। चार जून को जब मतगणना शुरू होगी तो परिणाम काफी कुछ चौंकाने वाले हो सकते हैं। कुछ राजनैतिक विश्लेषकों ने तो यह पहले से ही घोषणा कर दी है कि परिणाम कैसे आने वाले हैं लेकिन अभी सब इस छठे चरण और अंतिम चरण के मतदान का इंतजार कर रहे हैं। किसी भी सरकार के बनने और गिरने के लिए दो चरण बहुत होते हैं।</div>
<div> </div>
<div>योगेन्द्र यादव और प्रशांत किशोर एक जाने-माने राजनैतिक विश्लेषक हैं यदि इनकी मानें तो किसी एक दल को बहुमत नहीं मिल रहा है हां किसी एक गठबंधन एनडीए या इंडी गठबंधन तो बहुमत की करीब पहुंच सकता है। ऐसा नहीं है कि यह भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ गुस्सा है। दरअसल देश में इतनी समस्याएं हैं जो एकाएक समाप्त नहीं हो सकतीं और न ही हम उनको खत्म कर सकते हैं। जो यह कहता है वह झूठ बोल रहा है। वैसे तो भारतीय जनता पार्टी ने गरीबों के लिए बहुत सी योजनाएं चलाई लेकिन इसका बोझ मध्यम वर्ग पर सीधे पड़ गया और महंगाई ने अपने उच्चतम स्तर को छू लिया जब कि आम व्यक्ति की आमदनी उस हिसाब से नहीं बढ़ी।</div>
<div> </div>
<div>भारतीय जनता पार्टी ने गरीबों के लिए एक बहुत बड़ी योजना फ्री राशन की चलाई। सरकार लगभग अस्सी करोड़ जनता को फ्री राशन दे रही है इसका सीधा मतलब यह हुआ कि अभी भी हमारे देश की आधी आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे है। यह एक बहुत बड़ी योजना है इसकी बुराई विपक्ष भी नहीं कर पा रहा है। बल्कि अखिलेश यादव ने तो यह तक कह दिया कि हमारी सरकार यदि सत्ता में आती है तो हम जनता को पोष्टिक आहार देंगे। यानि कि कोई भी सरकार सत्ता में आए लेकिन इस योजना को खत्म नहीं कर सकती, बढ़ा तो सकती है। भारतीय जनता पार्टी ने भी जब इस योजना को शुरू किया था तो यह पूर्ण कालिक योजना नहीं थी लेकिन उनको इस योजना को पांच साल के लिए फिर से बढ़ाना पड़ा। लेकिन जनता की मांग फ्री नहीं है। हालांकि इस राशन योजना से भारतीय जनता पार्टी को पिछले कुछ चुनाव में काफी सफलता मिली है।</div>
<div> </div>
<div>आवास योजना भी भारतीय जनता पार्टी की एक बहुत बड़ी योजना थी। हालांकि इस तरह की योजना मायावती ने कांशीराम आवास योजना के रुप में पहले शुरू की थी। फिर इसी योजना को केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना के नाम से लेकर आ गई। सरकार जब कोई भी योजना बनाती है तो बजट को इधर से उधर करना पड़ता है। और यहीं कारण है कि इन योजनाओं में धन की पूर्ति के लिए अन्य जगहों से पैसे की आवश्यकता की पूर्ति की जाती है। जिससे महंगाई बढ़ती है तो मध्यम वर्ग के साथ साथ निचले वर्ग पर भी महंगाई की मार पड़ती है। कुल मिलाकर जनता इस चुनाव में बिल्कुल खामोश है और अब वह परिणाम की प्रतीक्षा कर रही है।</div>
<div> </div>
<div>यहां हम यह नहीं कह सकते कि मतदान बदलाव के लिए हो रहा है। क्यों कि विपक्ष को सरकार में जितना मौका मिला वह अभी तक भारतीय जनता पार्टी को नहीं मिला है इसलिए मतदाता उनसे भी खुश नहीं है। वोट बराबर का मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है। लेकिन सरकार भारतीय जनता पार्टी समर्थित एनडीए की ही बनती दिख रही है। हां जो नारा भारतीय जनता पार्टी ने अबकी बार 400 पार का दिया था ऐसा होता कठिन दिखाई दे रहा है। बंगाल में ममता बनर्जी और भारतीय जनता पार्टी की सीधी टक्कर है। वहां ममता कुछ आगे दिखाई दे रहीं हैं। महाराष्ट्र में मामला 50-50 का नजर आ रहा है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी आगे दिख रही है लेकिन विपक्ष की सीट भी पिछले बार से बढ़ती नजर आ रहीं हैं। </div>
<div> </div>
<div> बिहार में यदि पिछले विधानसभा चुनाव से तुलना करें तो मामला 50-50 ही नजर आ रहा है लेकिन नितीश कुमार के एनडीए में शामिल हो जाने से भारतीय जनता पार्टी को फायदा पहुंचते दिखाई दे रहा है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी आगे निकलती दिखाई दे रही है। पंजाब में लड़ाई सीधे आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच है। दिल्ली में भी इस बार टक्कर होती दिखाई दे रही है। क्यों कि दिल्ली में इस बार कांग्रेस और आम आदमी पार्टी मिल कर चुनाव लड़ रही है। दक्षिण भारत की बात करें तो वहां कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी से मतबूत स्थिति में नजर आ रही है। हालांकि वहां ऐसा नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी को बिल्कुल नकार दिया जाए। इस बार दक्षिण में भारतीय जनता पार्टी ने रणनीति के तहत पूरी ताकत झोंक दी है।</div>
<div> </div>
<div>आज जनता का मन राजनीति से ऊबने लगा है और पढ़ा लिखा वर्ग राजनीति पर बहस नहीं करना चाहता है। क्यों कि उसको राजनीति में अब हर दल एक से ही दिखाई दे रहे हैं। इस बार वास्तव में मतदाताओं का मन पढ़ने में राजनैतिक दल असफल रहे हैं। या यह कहें कि वह तमाम प्रयासों के वावजूद भी जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सके हैं। जिस तरह दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने एक प्रकार की नई राजनीति की शुरुआत की थी तो वहां की जनता ने उसको भरपूर सहयोग दिया था। इस चुनाव में यह भी साफ हो जाएगा कि आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता आज भी दिल्ली में है या वहां की जनता भी अब आम आदमी पार्टी से ऊब चुकी है।</div>
<div> </div>
<div> प्रशांत किशोर और योगेन्द्र यादव ने जिस तरह से अपना विष्लेषण जनता के समक्ष रखा है उसे एक दम से सटीक तो नहीं माना जा सकता। क्यों कि अभी हाल ही में चार राज्यों में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने एक राज्य की सत्ता बरकरार रखी है जब कि दो राज्यों की सत्ता कांग्रेस से छीनी है। अब लोकसभा से तुलना की जाए तो ऐसा नहीं हो सकता कि वहां भारतीय जनता पार्टी का ग्राफ नीचे गिरेगा। हरियाणा में किसानों की कुछ समस्याएं हैं जिससे कुछ नाराजगी दिख रही है। लेकिन वहां भी अभी तक भारतीय जनता पार्टी मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है।</div>
<div> </div>
<div><strong> जितेन्द्र सिंह पत्रकार </strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 May 2024 16:45:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोट से भविष्य में नौकरियों को खतरा ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p>आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोट के भारतीय संदर्भ में जहां जनसंख्या 141 करोड़ हो चुकी है और बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार है ज्यादा प्रयोग से लोगों की नौकरियां जाने का बड़ा खतरा उत्पन्न हो सकता है। यह बात दुनिया के बड़े अरबपति कारोबारी टेस्ला और एक्स के कारोबारी एलन मस्क ने स्टार्टअप के एक कार्यक्रम में फ्रांस में महत्वपूर्ण अंदाज में कहीं, भविष्य के लिए यह बात एकदम सटीक एवं सार्थक है। एक अन्य अरबपति कारोबारी इयान बैंक्स ने भी इस पर गंभीर चिंता जताई है। यह बात सभी विकासशील देशों के लिए भी लागू हो सकती है। अब आर्टिफिशियल</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141563/artificial-intelligence-and-robots-threaten-jobs-in-the-future"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/download3.jpg" alt=""></a><br /><p>आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोट के भारतीय संदर्भ में जहां जनसंख्या 141 करोड़ हो चुकी है और बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार है ज्यादा प्रयोग से लोगों की नौकरियां जाने का बड़ा खतरा उत्पन्न हो सकता है। यह बात दुनिया के बड़े अरबपति कारोबारी टेस्ला और एक्स के कारोबारी एलन मस्क ने स्टार्टअप के एक कार्यक्रम में फ्रांस में महत्वपूर्ण अंदाज में कहीं, भविष्य के लिए यह बात एकदम सटीक एवं सार्थक है। एक अन्य अरबपति कारोबारी इयान बैंक्स ने भी इस पर गंभीर चिंता जताई है। यह बात सभी विकासशील देशों के लिए भी लागू हो सकती है। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नफ्ज़ पढ़कर आपके मस्तिष्क की बात तुरंत पकड़कर उस पर अमल करने लगेगा। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पल्स रेट द्वारा आपके मन की हर बात जानने में सक्षम हो सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तकनीक को वैज्ञानिकों ने मानव की सहायता के लिए और देश की बेहतरी के लिए अविष्कार किया है।</p>
<p>अभी तक तो अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, इजरायल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मामले में काफी आगे पर अब खाड़ी के देशों विगत 5 साल में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति केवल तेल के कुए पर न रह कर अन्य योजनाओं पर भी काम करना शुरू कर दिया है और आश्चर्यजनक रूप से यूएई ,सऊदीअरबिया, कतर, मिस्र, जॉर्डन, मोरक्को और अन्य देशों में यूरोप की तुलना में अब और ज्यादा खर्च करके आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तकनीक को अपने देश में बहुत मजबूत बना लिया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जितने फायदे हैं उससे ज्यादा विकासशील देशों के लिए यह नुकसान देह भी हो सकता है</p>
<p>आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आपकी पल्स रीडिंग और मानसिक विचारधारा को केवल थंब इंप्रेशन में ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का डिवाइस पढ़ कर उस पर अमल कर सकता है।इस टेक्नोलॉजी से अमेरिका तथा यूरोपीय देश अब तक दुश्मन की अनेक सूचनाएं बड़ी आसानी से प्राप्त कर उसका सामरिक उपयोग करने में लगे हुए हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग रूस अपनी टेक्नोलॉजी का उपयोग कर मिसाइल दागने में यूक्रेन यूक्रेन के विरुद्ध कर रहा है और अब तक यूक्रेन यूरोपीय तथा नाटो देश की मदद से इसी तकनीक के सहारे रूस के विरुद्ध अब तक टिका हुआ है वैसे तो यूक्रेन और रूस का युद्ध में काफी नुकसान हुआ है पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भरपूर उपयोग दोनों देश एक दूसरे पर कर रहे हैंl</p>
<p>विकासशील देशों में इस टेक्नोलॉजी का विकास अभी काफी एडवांस नहीं है इन परिस्थितियों में उनके लिए उनके सामरिक महत्व की चीजें छुपाना दुश्मन देशों के सामने कठिन हो जाएगा और उनकी खुफिया जानकारी शक्तिशाली देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस केवल एक सूत्र प्राप्त करने के बाद ही पूरी प्राप्त कर सकते हैं.<br />खाड़ी के देश जिनमें सऊदी अरबिया, कतर ,मिस्र, जॉर्डन, यूएई अपने बजट का 34% बढ़ा हुआ हिस्सा एआई तकनीक पर लगातार कर रहे हैं। खाड़ी के देश इस टेक्नोलॉजी का उपयोग इस वजह से कर रहे हैं क्योंकि यह उनकी भविष्य की योजनाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है</p>
<p>जिससे वे तेल की कमाई से हटकर अन्य साधनों से अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार ला सकेंl यूं एई पहला देश है जिसने 2017 ने इस तकनीक को अपनाया था इसके बाद खाड़ी के देशों में अब टेक्नोलॉजी को अपनाने में होड़ हो गई हैl यह सभी देश एआई टेक्नोलॉजी पर लगभग 3 अरब डॉलर खर्च कर चुके हैंl दूसरी तरफ यदि इसका इस्तेमाल अति विशेषज्ञों द्वारा नहीं किया गया तो इसका दुरुपयोग जिन देशों के पास इन टेक्नोलॉजी से एडवांस टेक्नोलॉजी है वह पूरी जानकारी निकालने में सक्षम होंगे।</p>
<p>आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग यूरोपीय देश न सिर्फ सामरिक महत्व की चीजों में कर रहे हैं बल्कि मेडिकल साइंस और अंतरिक्ष विज्ञान में भी पूरी तरह हो रहा है और इससे बहुत फायदे भी मिल रहे हैंl आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मानव प्रजाति के लिए जितना फायदेमंद है दूसरी तरफ उतना ही नुकसान दे और इससे वैश्विक शांति को खतरा भी हो सकता हैl राइट एक्टिविस्ट मानते हैं कि रोबोट की तरह इस तरह की विज्ञान पर आधारित चीजें माननीय प्रजाति को खत्म कर सकती है बल्कि उनकी चिंता डेटा सुरक्षा प्रपो गेंडा सर्विलांस के विरुद्ध होने वाले नुकसान पर भी ज्यादा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर खाड़ी के देशों ने एआई के इस्तेमाल पर दिशा निर्देश तय कर उसे जारी किया है हालांकि इस पर कोई कानूनी बाध्यता नहीं है फिर भी इसका दुरुपयोग होने से मानव को खतरा भी हो सकता है यह एक वैश्विक चिंता की बात है।</p>
<p><strong>संजीव ठाकुर,</strong><br /><strong>वर्ल्ड रिकॉर्ड धारक लेखक, कवि,स्तंभकार,</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 May 2024 16:38:56 +0530</pubDate>
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                <title>राम को नहीं 'झुठाराम ' को हराना चाहता है देश</title>
                                    <description><![CDATA[<p>इस लोकसभा चुनाव में जितना मजा आ रहा है उतना मजा मैंने पिछले एक दर्जन लोकसभा चुनावों में नहीं उठाया। पहले चुनाव में जोकरों,मुंगेरी लालों,और शेखचिल्लियों ,और तो और धरती पकड़ों के लिए सीमित स्थान था। अब चौतरफा इन्हीं की गूँज है ,धूम है। कौन ,किसे क्या ,समझता है ये बता पाना कठिन है ,लेकिन एक बात मै दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस चुनाव में ' राम ' नहीं बल्कि ' झूठाराम ' निशाने पर हैं और देश की जनता [ जिसमें विपक्ष भी शामिल है ] झूठाराम को हराना चाहती है। राम का नाम लेकर झूठाराम</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141532/the-country-wants-to-defeat-jhutaram-not-ram"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/ramnavami-2.jpg" alt=""></a><br /><p>इस लोकसभा चुनाव में जितना मजा आ रहा है उतना मजा मैंने पिछले एक दर्जन लोकसभा चुनावों में नहीं उठाया। पहले चुनाव में जोकरों,मुंगेरी लालों,और शेखचिल्लियों ,और तो और धरती पकड़ों के लिए सीमित स्थान था। अब चौतरफा इन्हीं की गूँज है ,धूम है। कौन ,किसे क्या ,समझता है ये बता पाना कठिन है ,लेकिन एक बात मै दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस चुनाव में ' राम ' नहीं बल्कि ' झूठाराम ' निशाने पर हैं और देश की जनता [ जिसमें विपक्ष भी शामिल है ] झूठाराम को हराना चाहती है। राम का नाम लेकर झूठाराम अपने आपको बचने की कोशिश कर रहे हैं।</p>
<p>चुनाव के छठवें चरण से ठीक पहले झूठाराम का आर्त्तनाद सुनाई दिया कि विपक्ष राम को चुनाव हराना चाहता है। सवाल ये है कि ये रामजी क्या सचमुच इस चुनाव में लोकसभा की 543  सीटों में से किसी एक पर ,किसी एक दल के या निर्दलीय प्रत्याशी हैं ? राम को हारने की एडवाइजरी पढ़ी तो मै पूरे दो दिन केंद्रीय चुनाव आयोग की वेबसाइट पर राम को तलाशता रहा ।  मुझे एक भी सीट पर दशरथ नंदन राम की और से दाखिल कोई पर्चा नजर नहीं आया। मेवाराम,सेवाराम,दाताराम,सियाराम,झुठाराम जैसे प्रत्याशी जरूर नजर आये। जब राम चुनाव लड़ ही नहीं रहे तो कोई उन्हें कैसे हरा सकता है?</p>
<p>राम को समझना आसान भी है और कठिन भी। राम दीनबंधु भी हैं और दीनानाथ भी। वे अपराजेय भी है।  दशानन भी उन्हें हरा नहीं पाया । परशुराम भी उनके सामने युद्ध करने के बजाय शीश नवकार वापस रंगभूमि छोड़ गए थे।  राम से लड़ना   किसी के बूते की बात है ही नही।  कांग्रेस और समूचे विपक्ष की तो बिसात  ही क्या है ? कांग्रेस में या किसी भी दल में [भाजपा में भी ] राम के सामने खड़े होने की कूबत किसी में भी नहीं है। हाँ रामनामी चादर ओढ़कर चुनाव लड़ने वालों से लड़ने और हारने की ताकत बहुतों में है। चुनावी जंग में कोई भी किसी का भी 'राम नाम सत्य है 'करने की ताकत और हैसियत रखता है भले ही उसके पास इलेक्टोरल बांड से मिला पैसा हो या न हो।</p>
<p>हारा हुआ हर खिलाड़ी अंत में या तो अपनी माँ का नाम लेता है या राम का। छठवें चरण से ठीक पहले जो लोग राम का नाम ले रहे हैं वे सचमुच मन से हार चुके है।  ऐसे मन से हारे हुए लोग आखिर में कह उठे हैं कि -' फलां साहब राम को हराना चाहते हैं। 'राम के नाम पर मतदाता को बरगलाने की ये आखरी कोशिश है ,क्योंकि इसके बाद यदि मतदाता ने अपना मन बना लिया तो रामजी भी  उसे नहीं बदल सकते ,हाँ ईवीएम है जो ये काम कर सकती है। शायद यही वजह है कि केंचुआ देश कि सबसे बड़ी अदालत में हलफनामा देकर कह रहा है कि यदि -मतदान केंद्र स्तर के आंकड़े जाहिर किये गए तो देश में अराजकता फ़ैल जाएगी। 'मेरे अनुभव में ये झूठी सरकार के झूठे केंचुए का अब तक का बोलै गया सबसे बड़ा झूठ है।</p>
<p>इस देश में अराजकता आंकड़ों से नहीं अदावत कि सियासत से फ़ैल रही है ।  हिकारत की बोलियों से फ़ैल रही है।  एक जाति विशेष को ,एक दल विशेष को हौवा बनाकर खड़ा करने से फ़ैल रही है। देश कि सबसे बड़ी अदालत इस झूठ का संज्ञान लेती है या नहीं ,मुझे नहीं पता। किन्तु देश इस झूठ का संज्ञान ले रहा है। सब जानते हैं कि मनुष्य निर्मित मशीने झूठ नहीं बोलतीं ,उनसे झूठ बुलवाया जाता है ,बुलवाया जा रहा है। मशीने आदमी की गुलाम है।  वे चुनाव ही नहीं करतीं अब तो झाड़ू,पौंछा करने के साथ ही बर्तन भी धोतीं हैं। इसलिए मशीनों की और राम की आड़ लेकर न कोई जनाक्रोश से बच सकता है और  न चुनाव  की  दशा और दिशा को मोड़ सकता है।</p>
<p>अपनी कहूँ तो मै आज भी बिना राम का नाम लिए,बिना राम कथा का परायण किये बिना अन्न-जल ग्रहण नहीं करता ,हालाँकि मै आज तक न अयोध्या गया और न श्रीलंका। मुझे पीले चावल देकर भाजपा वालों ने बुलाया भी था ,किराया भी दे रही थी लेकिन मैं  नहीं गया। अयोध्या  जाना या न जाना आपके रामभक्त  होने के लिए आवश्यक नहीं है। तमाम कांग्रसी,समाजवादी ,वामपंथी भी अभी तक अयोध्या नहीं गए। चारों शंकराचार्य नहीं गए तो इसका अर्थ ये तो नहीं है कि सबके सब रामद्रोही है।  या अयोध्या न जाने वाले लोग राम के ठेकदार झुठाराम और उनकी पार्टी को वोट नहीं देंगे।</p>
<p>इस चुनाव में  झूठाराम को भी खूब वोट मिलेंगे लेकिन राम के नाम पर नहीं। जो वोट मिलेंगे वे हिन्दू-मुसलमान के नाम पर ,मंगलसूत्र के नाम पर ,भैंस के नाम पर मिलेंगे।तीन तलाक कानून या नारी शक्ति वंदना के नाम पर नहीं मिलेंगे।  इसलिए जिन मतदाताओं को छठवें और सातवें  चरण में मतदान का अवसर मिल रहा है वे इस गलतफमी का शिकार न हों कि झुठाराम के खिलाफ दिया उनका वोट राम के खिलाफ चला जाएगा। राम को आपके वोट कि जरूरत कभीं थी ही नहीं ,और न हैं  न होगी। राम तो विरासत से ही राजाराम बने थे। उन्होंने मर्यादाएं स्वीकार   की  उन्हें तोड़ा नहीं। सत्ता के लिए तो बिलकुल नहीं तोड़ा। राम ने धनुष भी तोड़ा तो अपने गुरु की आज्ञा पर। यहां तो झुठाराम और उनकी पार्टी कह रही है कि हमें गुरु रुपी संस्था की जरूरत ही नहीं है। जय सियाराम।</p>
<p><strong>राकेश अचल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 May 2024 16:59:22 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सियासत में शेखचिल्ली की शिनाख्त</title>
                                    <description><![CDATA[<p>चुनाव का पूरा मौसम निकला जा रहा था और श्रीमती मेनका गांधी गुड़ खाकर बैठीं थीं ।  वे अपने बेटे वरुण गांधी का टिकिट काटने पर भी मिमियाकर रह गयीं थीं ,लेकिन खुदा का शुक्र है कि वे अपने बेटे को तो नहीं पहचान पायीं लेकिन उन्होंने अपने रक्त संबंधी भतीजे राहुल गांधी को ठीक-ठीक  पहचान लिया। बकौल मेनका जी राहुल गांधी शेखचिल्ली हैं। हम तो उन्हें पंडित राहुल गांधी मानते थे लेकिन वे भी शेख हैं ये अब पता चला।</p>
<p>भारत की राजनीति शेखचिल्लियों से भरी पड़ी है ,लेकिन उन्हें पहचानने का जोखिम मेनका जी की तरह हर कोई</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141515/sheikh-chillis-identity-in-politics"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/bjp_sultanpur_maneka_gandhi_on_robert_vadra_rahul_gandhi_varun_lok_sabha_elections_1712833483.jpg" alt=""></a><br /><p>चुनाव का पूरा मौसम निकला जा रहा था और श्रीमती मेनका गांधी गुड़ खाकर बैठीं थीं ।  वे अपने बेटे वरुण गांधी का टिकिट काटने पर भी मिमियाकर रह गयीं थीं ,लेकिन खुदा का शुक्र है कि वे अपने बेटे को तो नहीं पहचान पायीं लेकिन उन्होंने अपने रक्त संबंधी भतीजे राहुल गांधी को ठीक-ठीक  पहचान लिया। बकौल मेनका जी राहुल गांधी शेखचिल्ली हैं। हम तो उन्हें पंडित राहुल गांधी मानते थे लेकिन वे भी शेख हैं ये अब पता चला।</p>
<p>भारत की राजनीति शेखचिल्लियों से भरी पड़ी है ,लेकिन उन्हें पहचानने का जोखिम मेनका जी की तरह हर कोई नहीं लेता। जाहिर है कि यदि राहुल गांधी शेखचिल्ली हैं तो मेनका जी भी उसी परिवार की बहू हैं जिस परिवार के चश्मों-चिराग को मेनका जी के सबसे बड़े नेता शाहजादा  कहते हैं। जब राहुल शेखचिल्ली हैं तो बिलासुबा उनके चचेरे भाई यानि मेनका जी के पुत्र वरुण  गांधी भी पैदायशी शेखचिल्ली हुए। उनके पिता  भी जाहिर है  शेखचिल्ली ही रहे होंगे। जैसे खग ही खग की भाषा जानता है वैसे ही रक्त संबंधी ही अपने रक्त संबंधी को पहचान लेता है।</p>
<p>शेखचिल्ली होना कोई बुरी बात नहीं है । शेखचिल्ली को गाली या अपशब्द मानने वाले बुरे हैं।  शेखचिल्ली एक ऐसा किरदार है जो हंसी-मजाक करते हुए भी बड़ी से बड़ी गुत्थी को सुलझा देता है । शेख चिल्ली का रिश्ता दुर्भाग्य से गुजरात से नहीं बल्कि हमारे उस हरियाणा से बताया जाता है जहाँ से हमारे मित्र अरुण जैमिनी आते हैं। हरियाणा के डीएनए में शेखचिल्लीपना भरा पड़ा है ।  एक हरियाणवीं ही अपने आप पर हंस सकता है। लेकिन यदि शेखचिल्ली यूपी से है तो भी उसे हंसना -रोना खूब आता है।  आप उसे गंगा किनारे रोते देख सकते हैं ,क्रूज पर इंटरव्यू देते देख सकते हैं , या रायबरेली में हँसते हुए भी।</p>
<p>भारत की सियासत में यदि शेखचिल्ली न हों तो सियासत बेरौनक हो जाये। शायद इसीलिए हर दशक की सियासत में एक न एक शेखचिल्ली हमेशा मौजूद रहता है। देश को आपातकाल का स्वाद चखाने वाली प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के जमाने में ठेठ समाजवादी राजनारायण को लोग शेखचिल्ली कहते थे ,लेकिन उन्हीं राजनारायण ने इंदिरा जी का तख्ते ताउस [मयूर सिंहासन ] पलट दिया था। राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी भी अपने जमाने के रंगरेज शेखचिल्ली वीपी सिंह के शिकार बने थे। और तो और 2014  में महान अर्थशास्त्री डॉ मन मोहन सिंह को एक गुजराती शेखचिल्ली ने चारों खाने चित कर दिया था।नेहरू जी के जमाने में प्रख्यात समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया को शेखचिल्ली कहा जाता था।</p>
<p>मुझे लगता है कि मेनका जी अपने भतीजे की शिनाख्त करने में शायद इसीलिए अब तक भय खा रहीं थीं   कि कहीं भाजपा वाले उनका शेखचिल्ली डीएनए देखकर टिकिट न काट दें। दरअसल भाजपा ने मेनका जी को तो टिकिट नारीशक्ति वंदन क़ानून का सम्मान करते हुए दिया है। उनके बेटे का टिकट तो काट ही दिया ,क्योंकि वे शेखचिल्ली परिवार से जो आते हैं।मेनका जी   का शुक्रिया अदा करना चाहिए राहुल गांधी को, लेकिन वे खामोश है।  परिवार कि रिवायतें होतीं है। मेनका जी भले उनके साथ नहीं रहतीं,दूसरे दल में हैं ,लेकिन हैं तो सगी चाची। राहुल के लिए मेनका के लिए शायद उतना ही सम्मान होगा जितना कि अपनी माँ श्रीमती सोनिया गाँधी के लिए है। इसलिए शायद राहुल गाँधी पलटकर जबाब नहीं देंगे। देना भी नहीं चाहिए।</p>
<p>सोनिया इटली से आतीं हैं लेकिन भारतीय माँ के सारे गुण जानतीं हैं।  उन्होंने शायद एक बार भी अपनी देवरानी या भतीजे के लिए किसी हल्के शब्द का इस्तेमाल नहीं किया ।  कम से कम वरुण गांधी को तो शेखचिल्ली नहीं कहा ,लेकिन मेनका जी ने एक भारतीय माँ होते हुए भी अपनी मर्यादा तोड़ दी। मुमकिन है कि वे मजबूर हों।  उनसे जबरन ये सब कहलाया गया हों ।  मुमकिन है कि उनके मन में राहुल को लेकर कोई कुंठा हो ? लेकिन यदि वे ये सब न भी कहतीं तो उन्हें भारतरत्न नहीं मिलने वाला था। वे भाजपा के लिए एक अतिथि कलाकार से ज्यादा न कल थीं और न आज हैं और न कल रहेंगीं।</p>
<p>भारत के लोग बहुत शिष्ट होते है।  काने को को काना नहीं कहते । वे सम्मान से उसे 'एक नयन ' कहते है।  ' सूरदास ' कहते हैं।  इस समय देश के सबसे बड़े शेखचिल्ली को भी किसी ने आजतक शेखचिल्ली नहीं कहा ।  कांग्रेस ने भी नहीं कहा।  ये शिष्टाचार के खिलाफ है। जनता सब  जानती है कि कौन शेखचिल्ली है और कौन नहीं ? मेनका जी ने खामखां  ये जहमत उठाई और देश को बताया कि उनका भतीजा यानि जेठानी का लड़का शेखचिल्ली है। अब है तो है ।  इसका खंडन कोई नहीं कर सकता। इसका खंडन देश कि जनता कर सकती है ।  देश को 4  जून को ही पता चल पायेगा कि शेखचिल्ली किस दल का बड़ा है ? इस बार के चुनाव लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के साथ ही श्रेष्ठ शेखचिल्ली के चयन के लिए भी हो रहे हैं। </p>
<p>चूंकि आज का मुद्दा शेखचिल्ली हैं इसलिए अपने पाठकों को बताता चलूँ कि असली शेखचिल्ली   मुगल शहजादे दारा शिकोह  के गुरु थे।  शाहजहां खुद उनका बहुत सम्मान करते थे।   मुग़ल बादशाह शाहजहां का बेटा दारा शिकोह शेख चिल्ली का बड़ा प्रशंसक था।  उसने उनसे कई महत्त्वपूर्ण बातें सीखी।  शेखचिल्ली को  अब्दउर्र रहीम, अलैस अब्द उइ करीम, अलैस अब्द उर्र रज्जाक के नाम से भी जाना जाता था।  सत्रहवीं सदी के  लोग शेखचिल्ली को  महान दरवेश  मानते थे। शेखचिल्ली का  मकबरा हरियाणा के कुरुक्षेत्र के थानेश्वर में है।</p>
<p>धारणा है  कि शेख चिल्ली का जन्म बलूचिस्तान के खानाबदोश कबीले में हुआ था।  वो लगातार घुमक्कड़ी करते थे।  यही घुमक्कड़ी उन्हें भारत ले आई।  वैसे शेखचिल्ली ऐसी कहानियों के नायक हैं, जो आम लोक-जीवन के संघर्षों से बार-बार उबारता  है. बार-बार उन्हीं संघर्षों में जुट जाता है।  उसमें ईमानदारी है, निष्ठा है, मर्यादा है, परिस्थितिजन्य विवेक है।  सबसे बड़ी बात ये भी कि कि वो वर्तमान में जीता है आज के शेखचिल्ली राहुल गांधी की तरह।<br /><strong>राकेश अचल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 May 2024 17:20:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के सामने नई चुनौतिंयाँ ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p>ब्रिटेन की समाचार न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ब्रिटिश इतिहास के 127 सालों में 42 वर्षीय ऋषि सुनक सबसे युवा प्रधानमंत्री बने हैं और उन्हें बोरिस जॉनसन तथा लीज ट्रस के इस्तीफे के बाद विरासत में प्रधानमंत्री का पद प्राप्त हुआ है। कोविड-19 के समय ऋषि सुनक ने वित्त मंत्री रहते हुए ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति को वहां के उद्योगपतियों तथा पर्यटन, होटल एजेंसी के साथ मिलकर काफी हद तक संभाल कर रखा था। अब ब्रिटेन की खराब अर्थव्यवस्था का भारी-भरकम बोझ ऋषि सुनक के कंधे पर आ गया है। खराब अर्थव्यवस्था ऋषि सुनक के लिए आगामी आने वाले जनवरी 2025</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141514/new-challenges-before-british-prime-minister-rishi-sunak"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/gdfsg.jpg" alt=""></a><br /><p>ब्रिटेन की समाचार न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ब्रिटिश इतिहास के 127 सालों में 42 वर्षीय ऋषि सुनक सबसे युवा प्रधानमंत्री बने हैं और उन्हें बोरिस जॉनसन तथा लीज ट्रस के इस्तीफे के बाद विरासत में प्रधानमंत्री का पद प्राप्त हुआ है। कोविड-19 के समय ऋषि सुनक ने वित्त मंत्री रहते हुए ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति को वहां के उद्योगपतियों तथा पर्यटन, होटल एजेंसी के साथ मिलकर काफी हद तक संभाल कर रखा था। अब ब्रिटेन की खराब अर्थव्यवस्था का भारी-भरकम बोझ ऋषि सुनक के कंधे पर आ गया है। खराब अर्थव्यवस्था ऋषि सुनक के लिए आगामी आने वाले जनवरी 2025 को आम चुनाव में बड़ी परेशानी का सबब बन सकता है।</p>
<p>ऋषि सुनक को आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए ट्रबल शूटर की हैसियत से प्रधानमंत्री बनाया गया था। ब्रिटेन की एक सर्वे न्यूज़ एजेंसी द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार अपनी कंजरवेटिव पार्टी को वर्तमान में मजबूत बनाने के लिए काफी कवायद करनी पड़ सकती है क्योंकि सर्वे ने बताया है कि सुनक अपनी ब्रिटेन की संसदीय सीट को आम चुनाव में गंवा सकते हैं क्योंकि कुछ महीने पहले की घटनाक्रम में पहले लिस ट्रस से पिछड़ने और फिर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद ऋषि सुनक के सामने नई नई मुसीबतें सामने आई है। ब्रिटेन में आम चुनाव 2025 में आयोजित हैं और कंजरवेटिव पार्टी की छवि बहुत अच्छी नजर नहीं आ रही है।</p>
<p>सर्वे एजेंसी के अनुसार यह सर्वे में ऋषि सुनक अपनी ब्रिटेन की संसदीय सीट को आम चुनाव में कमजोर हो सकती हैं क्योंकि विपक्ष की लेबर पार्टी को प्रधानमंत्री के सत्तारूढ़ कंजरवेटरी से बहुत ज्यादा अंक प्राप्त हुए हैं। सावंत के प्रवक्ता के अनुसार लेबर पार्टी 314 सीटों के बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज हो सकती है। यार्क शायर ऋषि सुनक का निर्वाचन क्षेत्र है अपनी निर्वाचन सीट तथा लिंकनशायर के उत्तर में अन्य सभी सीटों सहित रूढ़िवादी लगभग 300 सीटें गंवा सकते हैं। ब्रिटेन की न्यूज़ एजेंसी सावंता के विगत समय तक किए गए सर्वे के अनुसार 7 हजार नागरिकों बातचीत के आधार पर एक विस्तृत डाटा तैयार किया गया है।</p>
<p>सर्वे में लेबर पार्टी कंजरवेटिव पार्टी पर बढ़त दिखाई गई है जिसके परिणाम स्वरूप ऋषि सुनक को आने वाले समय में सत्ताधारी दल की बढ़त को बढ़ाएं रखने में और कंजरवेटिव पार्टी की किस्मत को बनाने में काफी मेहनत करनी पड़ सकती है। उल्लेखनीय है कि सत्तारूढ़ कंजरवेटिव यानी टोरी पार्टी की लोकप्रियता धीरे धीरे कम होते जा रही है। ऋषि सुनक को खराब अर्थव्यवस्था विरासत में मिलना भी एक बड़ा कारण भी है। हालांकि ब्रिटेन में कंजरवेटिव पार्टी यानी टोरी पार्टी वर्ष 2010 ब्रिटेन की सत्ता में काबिज है और 4 बार आम चुनाव में जीत हासिल कर चुकी है। 4 बार जीतने के बाद भी अब कंजरवेटिव पार्टी की पकड़ ब्रिटिश नागरिकों पर कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। ऋषि सुनक युवा है और अच्छे अर्थशास्त्री भी, अब देखना यह है कि ऋषि सुनक चुनाव की चुनौती को किस तरह अपनी पार्टी के हक में दिशा दे पाते हैं कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था बहुत निचले स्तर पर पहुंच गई है बेरोजगारी तथा महंगाई तथा पेट्रोल, डीजल, बिजली के दाम तब तक की चरम सीमा पर पहुंच चुके हैं।</p>
<p>ब्रिटिश गवर्नमेंट की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए बैलेंस आफ ट्रेड और उत्पादन को 2 साल में तेजी से विकसित करना होगा। कोविड-19 के काल में ब्रिटेन को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा था पर अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए तत्कालीन वित्त मंत्री ऋषि सुनक ने वहां के उद्योगपतियों, पर्यटन तथा होटल उद्योग को विकसित कर कोविड-19 काल में वित्तीय स्थिति को काफी सहारा दिया था। अब ऋषि सुनक के सामने अनेक चुनौतियां आ गई है ऋषि सुनक को न सिर्फ लेबर पार्टी से चुनौती मिल रही है बल्कि उन्हें अपनी पार्टी के सांसदों का 100% समर्थन भी प्राप्त नहीं हो रहा है। ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बने रहने के साथ-साथ उन्हें अपनी पार्टी की लोकप्रियता को बढ़ाने में अपनी पार्टी के सांसदों का विश्वास मत भी हासिल करना होगा तब जाकर आगामी 2025 जनवरी को सत्तारूढ़ पार्टी यानी कंजरवेटिव पार्टी चुनाव में जीत हासिल कर सकेगी।</p>
<p>ब्रिटिश न्यूज़ एजेंसी और सर्वे एजेंसी सावंत के अनुसार कंजरवेटिव पार्टी धीरे-धीरे लोकप्रियता में कमजोर होती जा रही है और लेबर पार्टी ने अभी से चुनाव अभियान का आगाज कर दिया है, फ़ल स्वरूप ऋषि सुनक के सामने आर्थिक व्यवस्था बेरोजगारी महंगाई और चुनाव की बड़ी चुनौती सामने आ गई है ऐसे में ऋषि सुनक ब्रिटेन के शक्तिशाली जुझारू और संघर्षशील प्रधानमंत्री रहकर अपनी पार्टी का सही नेतृत्व कर जीत दिला पाते हैं या नहीं यह भविष्य तय करेगा। इसके अलावा रूस यूक्रेन युद्ध मैं यूक्रेन का साथ देना इसराइल हमास युद्ध में इजराइल का साथ देना भी एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। इसमें ब्रिटेन को यूक्रेन को आर्थिक मदद के साथ सामरिक मदद भी करनी होगी। क्योंकि ब्रिटिश जनता यूक्रेन के साथ हमदर्दी अब तक रखते आई है।</p>
<p><strong>संजीव ठाकुर,(वर्ल्ड रिकॉर्ड धारक कवि, लेखक),</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 May 2024 17:17:21 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट के कटघरे में चुनाव आयोग </title>
                                    <description><![CDATA[<div>आज-कल पूरे भारत पर चुनावी रंग चढा हुआ है। लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व को लोग भरपूर हर्षोल्लास से मना रहे हैं। 543 संसदीय सीटों के लिए हो रहे लोकसभा चुनाव सात चरणों में पूर्णता की ओर बढ रहे है। इन चुनावों में 96 करोड़ से ज्यादा मतदाता अपनी पसंद की सरकार चुनेंगे। अब तक पांच चरणों के चुनाव पूरे हो चुके हैं परन्तु पहले चरण के मतदान होते ही चुनाव आयोग आरोपों और विवादों के घेरे में आ गया हैं। इन आरोपों में से एक आरोप की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। चुनाव आयोग पर मतदान संबंधी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141513/election-commission-in-the-dock-of-supreme-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/vdfg.jpg" alt=""></a><br /><div>आज-कल पूरे भारत पर चुनावी रंग चढा हुआ है। लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व को लोग भरपूर हर्षोल्लास से मना रहे हैं। 543 संसदीय सीटों के लिए हो रहे लोकसभा चुनाव सात चरणों में पूर्णता की ओर बढ रहे है। इन चुनावों में 96 करोड़ से ज्यादा मतदाता अपनी पसंद की सरकार चुनेंगे। अब तक पांच चरणों के चुनाव पूरे हो चुके हैं परन्तु पहले चरण के मतदान होते ही चुनाव आयोग आरोपों और विवादों के घेरे में आ गया हैं। इन आरोपों में से एक आरोप की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। चुनाव आयोग पर मतदान संबंधी आंकड़ों को देरी से जारी करने का आरोप लग रहा है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा सुप्रीम कोर्ट में बूथों पर मतों की संख्या संबंधित फॉर्म 17-सी की स्कैनड कॉपी अपलोड करने संबंधी याचिका दाख़िल की थी। इस याचिका में मांग की गई है कि चुनाव आयोग मतदान में मतों की कुल गिनती की संख्या मतदान खत्म होने के तुरंत बाद अपनी वेबसाइट पर जारी करे।</div>
<div> </div>
<div>इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बीते शुक्रवार को भारतीय चुनाव आयोग को एक सप्ताह के अंदर मतदान संबंधी आंकड़ों को जारी करने से संबंधित याचिका पर अपना पक्ष रखने को कहा है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पार्दीवाला और मनोज मिश्रा की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। तीन जजों की बेंच का नेतृत्व कर रहे भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चंद्रचूड़ ने चुनाव आयोग के वकील से पूछा कि प्रत्येक मतदान अधिकारी शाम 6 या 7 बजे के बाद मतदान रिकॉर्ड जमा करता है, तब तक मतदान पूरा हो जाता है। इसके बाद रिटर्निंग ऑफिसर के पास पूरे निर्वाचन क्षेत्र का डेटा होगा। आप इसे अपलोड क्यों नहीं करते? बेंच का सवाल एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा दायर एक आवेदन पर आधारित था। जिसका प्रतिनिधित्व वकील प्रशांत भूषण, नेहा राठी और चेरिल डिसूजा ने किया था।</div>
<div> </div>
<div>जिसमें मतदान के पहले दो चरणों के मतदाता आंकड़ों के प्रकाशन में अत्यधिक देरी का आरोप लगाया गया है।  निर्वाचन संचालन नियम, 1961 के नियम 49एस और नियम 56सी (2) के अनुसार पीठासीन अधिकारी को फॉर्म 17सी (भाग 1) प्रारूप में दर्ज मतों का लेखा-जोखा तैयार करना आवश्यक है। एनजीओ का कहना है कि मतदान विवरण प्रकाशित करने में देरी के अलावा, चुनाव आयोग द्वारा जारी प्रारंभिक मतदान प्रतिशत के आंकड़ों में भी असामान्य रूप से तेज वृद्धि हुई थी। इस घटनाक्रम ने सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध मतदान डेटा की प्रामाणिकता और यहां तक ​​कि क्या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) को स्विच किया गया है के बारे में जनता के मन में खतरे की घंटी बजा दी है। </div>
<div> </div>
<div>याचिका में कहा गया है कि लोकसभा चुनाव के पहले दो चरणों के लिए मतदान प्रतिशत डेटा चुनाव आयोग द्वारा 30 अप्रैल को प्रकाशित किया गया था, 19 अप्रैल को हुए पहले चरण के मतदान के 11 दिन बाद और दूसरे चरण के मतदान के चार दिन बाद चुनाव आयोग द्वारा 30 अप्रैल की प्रेस विज्ञप्ति में प्रकाशित आंकड़ों में मतदान के दिन घोषित प्रारंभिक प्रतिशत से तेज वृद्धि (लगभग 5-6 प्रतिशत) दिखाई गई थी। 19 अप्रैल को पहले चरण के मतदान के बाद चुनाव आयोग ने एक प्रेस नोट जारी किया था जिसमें कहा गया था कि शाम 7 बजे तक 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदान का अनुमानित आंकड़ा 60 प्रतिशत से अधिक था।</div>
<div> </div>
<div>इसी तरह दूसरे चरण के मतदान के बाद 26 अप्रैल को चुनाव आयोग ने कहा था कि मतदान 60.96% था। भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पार्दीवाला और मनोज मिश्रा की बेंच इस मामले की अगली सुनवाई 24 मई को करेगी। इस आरोप के अलावा चुनाव आयोग पर कई दूसरे आरोप भी लग रहे हैं। विपक्ष सरकारी एजेंसियों का विपक्षी नेताओं के खिलाफ दुरुपयोग का आरोप पहले से लगाता आया है। एडीआर ने अपने याचिका में मांग की है कि चुनाव आयोग वोटिंग के 48 घंटे बाद वोटिंग प्रतिशत का फाइनल डेटा जारी करे। सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने भी यह सवाल चुनाव आयोग के वकील से किया। चुनाव आयोग ने अपनी मजबूरी बताते हुए कहा कि डेटा इतना ज्यादा है कि इसे 48 घंटे के अंदर फाइनल कर लेना संभव नहीं है।</div>
<div> </div>
<div>एडीआर ने चुनाव आयोग को वोटिंग खत्म होने के 48 घंटे के भीतर मतदान के आंकड़े जारी करने के निर्देश देने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने पूछा कि "मतदान के आंकड़े को वेबसाइट पर डालने में क्या कठिनाई है"। इस पर चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि इसमें समय लगता है,  क्योंकि हमें बहुत सारा डेटा इकट्ठा करना होता है। वहीं 26 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने मतपत्रों की वापसी और ईवीएम पर संदेह की एडीआर की याचिका को खारिज कर दिया था। ईवीएम के खिलाफ संदेश को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था, कि यह विश्वसनीय हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने वोट प्रतिशत बढ़ने का हवाला देते हुए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को बदलने की आशंका जताई थी। बता दें कि चुनाव आयोग के सीनियर वकील मनिंदर सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि आयोग के सीनियर अधिकारियों ने एनजीओ के वकील प्रशांत भषण के सभी संदेशों का जवाब दिया है।</div>
<div> </div>
<div>हालांकि जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस दीपांकर दत्ता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने चुनाव आयोग के अधिकारियों से बात करने के बाद 26 अप्रैल को याचिका को खारिज कर दिया था। चुनाव आयोग के वकील मनिंदर सिंह ने कहा कि क्यों कि एनजीओ के वकील प्रशांत भूषण को 2019 से लंबित याचिका में आवेदन के जरिए कुछ भी लाने का मन है, कोर्ट को इस पर विचार नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि ये चुनाव प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिश है। चुनाव के चार चरण सही ढंग से संपन्न हो चुके हैं। चुनाव आयोग के वकील द्वारा भूषण के साथ तरजीही व्यवहार किए जाने वाली दलील पर सीजेआई की अगुवाई वाली बेंच ने आपत्ति जताते हुए इसे गलत आरोप बताया। उन्होंने कहा कि अदालत को अगर लगता है कि किसी मुद्दे पर कोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत है तो वह ऐसा ही करेंगे।</div>
<div> </div>
<div>चाहे उनके सामने कोई भी हो। जरूरत पड़ने पर सुनवाई के लिए बेंच पूरी रात बैठेगी। चुनाव आयोग के 4 चरणों के अपडेटेड टर्नआउट में 1.07 करोड़ की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। प्रत्येक चरण में मतदान वाले दिन देर रात चुनाव आयोग की तरफ से जारी मतदान के आंकड़ों और अंत में अपडेटेड आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि लोकसभा चुनावों के पहले चार चरणों की तुलना में अंतर करीब 1.07 करोड़ वोटों का हो सकता है। यह  379 निर्वाचन क्षेत्रों, जहां वोटिंग खत्म हो चुकी है, वहां पर हर निर्वाचन क्षेत्र में औसतन 28,000 से अधिक वोट हैं। निस्संदेह इतनी वोटें किसी भी सीट पर हार को जीत और जीत को हार में बदलने के लिए पर्याप्त से कहीं जयादा बड़ा आंकड़ा है। इन्हीं सब आशंकाओं के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय चुनाव आयोग को अपने कटघरे में खड़ा किया है।</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"><strong>(नीरज शर्मा'भरथल)</strong></div>
<div class="adL"> </div>
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<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 May 2024 17:12:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>चिकित्सा विज्ञान को बहुत कुछ करना  होगा</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आजादी के बाद भारत में  चिकित्सा विज्ञान  ने बहुत तरक्की की।इंसान का जीवन काफी सरल कर दिया।गंभीर बीमारी का इलाज खोज  लिया।  दर्द  रहित आपरेशन  होने लगे। दिल −दिमाग समेत सभी क्षेत्र में  तरक्की होने से आदमी बहुत आराम और सुख   महसूस  कर रहा है, किंतु  इतना सब होने के बाद भी अभी  बहुत कुछ किया जाना शेष है।मरीज की छोटी −छोटी परेशानी के इलाज के भी  उपाए करने होंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा विज्ञान इंसान के जीवन को सरल करने की हर बेहतर कोशिश में लगा है,इस सबके बावजूद अभी  बहुत कुछ होना है। हाल में गुजरात में राजकोट के स्टर्लिंग हास्पिटल</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141451/medical-science-has-a-lot-to-do"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/sdffsdf.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आजादी के बाद भारत में  चिकित्सा विज्ञान  ने बहुत तरक्की की।इंसान का जीवन काफी सरल कर दिया।गंभीर बीमारी का इलाज खोज  लिया।  दर्द  रहित आपरेशन  होने लगे। दिल −दिमाग समेत सभी क्षेत्र में  तरक्की होने से आदमी बहुत आराम और सुख   महसूस  कर रहा है, किंतु  इतना सब होने के बाद भी अभी  बहुत कुछ किया जाना शेष है।मरीज की छोटी −छोटी परेशानी के इलाज के भी  उपाए करने होंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा विज्ञान इंसान के जीवन को सरल करने की हर बेहतर कोशिश में लगा है,इस सबके बावजूद अभी  बहुत कुछ होना है। हाल में गुजरात में राजकोट के स्टर्लिंग हास्पिटल में मेरे  हृदय की बाई−पास सर्जरी हुई।छोटे बेटे के पास यहां आए थे।यहीं तबियत खराब होने का पता चला।इसलिए मुझे यहीं आपरेशन कराना पड़ा। मुझे सवेरे सात बजे आपरेशन थियेटर में ले लिया गया।आपरेशन थियेटर की टेबिल पर मुझे  लिटाकर स्टाफ  मेरे  हाथ  टेबिल में  बांधता  है।यहां तक मुझे याद है। अब तक सिर्फ दो आपरेशन थियेटर सहायक ही मेरे आसपास थे।  इसके बाद कब चिकित्सक आ गए। कब आपरेशन हो गया। मुझे कुछ पता नही।  दुपहर बाद दो  बजे के आसपास मुझे  लगा कि रोशनी जली है। मुंह में भी  कोई पाइप का  चुभा।मैनें आख  खोलीं।एक बड़े हाल में कुछ बैड पर  मेरे जैसे मरीज लेटे थे। सामने लगी घड़ी दो  बजा रही थी। मेरे मुंह में दिया हुआ  पाइप हलका चुभ  रहा था। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi"> बोलना चाहा तो लगा कि किसी  चीज से मुंह बंद किया हुआ। थकान महसूस हुई। मैंने आंखे बंद  कर लीं।ये भी लगा कि सात घंटे  बाद होश आया है।कुछ समय बाद लोगों के बोलने की आवाज आई। आंखे खोली तो  डाक्टर के साथ मास्क लगाए  मेरे बिस्तर के पास मेरी पत्नी खड़ी है।उसके पूछने पर मैने  इशारों से कहा कि ठीक हूं। डाक्टर ने मुझे  बताया कि आपरेशन बढिया हुआ है। सब ठीक है। चिंता की कोई बात नहीं। डाक्टर का आभार  जताने के लिए मैं हाथ  जोड़ना   चाहता हूं कि लगता  है कि हाथ अभी टेबिल में बंधे  हैं। पत्नी मुझे देखकर चली जाती हैं। कुछ देर में स्टाफ मुंह से  टेप हटाकर मुंह में दी टयूब  निकाल देता  है। हाथ भी  खोल दिए जाते  हैं। अब मैं  आराम  महसूस  कर रहा हूं ।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आपरेशन कब हो गया पता ही नही चला। स्टाफ ने इतना जरूर कहा कि आपके आपरेशन में छह घंटे लगे हैं।आपरेशन तो दर्द  रहित हो गया किंतु परेशानी की कहानी अब शुरू होती है।लगता है कि होठ  सूख  रहें हैं। जीभ  अकड़  रही है। देखरेख के लिए तैनात स्टाफ नर्स से मैं पीने के लिए पानी मांगता हूं।वह मनाकर देती है।  कहती है कि शाम छह बजे  चाय  दी  जाएगी।  उसके पच जाने पर थोड़ा− थोड़ा पानी  मिलेगा। राउंड  पर आए डाक्टर से मैं होथ सूखने और जीभ के अकड़ने की बात कहतां हूं।वह कहते हैं कि इसे तो  बर्दाश्त करना  होगा।किंतु  होठ भिगोने के लिए एक −दो बूंद  पी देने के कह जाते हैं।एक महीना इसी में निकल जाता है। मुह में छाले हो जाने से कुछ खाना संभव नही होता।  न खाने  से सूखी  उलटी होती हैं।दर्द रहित आपरेशन के बाद चिकित्सा विज्ञान को  इस  एक माह की परेशानी का इलाज भी खोजना होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक बात और उत्तर प्रदेश और दिल्ली एनसीआर में आपरेशन को जाने वाले को आपरेशन की जरूरत के लिए खून का प्रबंध खुद करना  प़ड़ता है। मैं  इसी को लेकर परेशान था कि हम तो घर से बहुत दूर यहां  गुजरात में हैं ,हमें  खून कौन देगा कौन  तीमारदारी करेगा,किंतु अस्पताल में पता भी नही चला।आपरेशन के स्टीमेट में दो बोतल बल्ड का मूल्य  जुड़ा देखकर मैं  संतुष्ठ हो गया कि अब रक्त का प्रबंध  हमें नही करना  होगा। अस्पताल करेगा। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आपरेशन के बाद  और  बाद में आईसीयू और अस्पताल में भर्ती  रहने के दौरान स्टाफ  का व्यवहार और सेवा कार्य लाजवाब था।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">रविवार 12 मई को अंतराष्ट्रीय नर्सेज डे  मनाया गया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय नर्स सप्ताह प्रत्येक वर्ष </span><span lang="hi" xml:lang="hi">छह</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मई को शुरू होता है और </span>12 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई को फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जन्मदिन पर समाप्त होता है। </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">फ़्लोरेन्स नाइटिंगेल</span></strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">को आधुनिक नर्सिग आन्दोलन का जन्मदाता माना जाता है। दया व सेवा की प्रतिमूर्ति फ्लोरेंस नाइटिंगेल "द लेडी विद द लैंप" (दीपक वाली महिला) के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनका जन्म एक समृद्ध और उच्चवर्गीय ब्रिटिश परिवार में हुआ था। लेकिन उच्च कुल में जन्मी फ्लोरेंस ने सेवा का मार्ग चुना।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज अस्पताल के स्टाफ  और  उसके कार्य को  देखता हूं तो  सभी  नर्स में मुझे फ्लोरेंस नाइटिंगेल  नजर आती हैं। सेवा करते वह कभी  बहिन  नजर आती है तो कभी  बेटी  और कभी  मां। ये  अलग बात है कि ये  पैसे के लिए अस्पताल में कार्य कर रही है किंतु इनका समर्पण कही भी फ्लोरेंस नाइटिंगेल से कम मुझे  नजर नही आया।चिकित्सक भी अपने में लाजवाब हैं। मेरे  हृदय का आपरेशन करने  वाले डा सर्वेशवर प्रसाद  हृदय के  प्रतिदिन तीन −चार आपरेशन  करते हैं किंतु न  उनके चेहरे पर कभी तनाव नजर आता है, थकान।  ये ही हालत   डा सर्वेशवर प्रसाद   के जूनियर्स की भी है।फोन पर डाक्टर और उनके सहायक दिन राज− उपलब्ध हैं।उनके कार्य सेवाभाव और समर्पण को देखकर लगता है कि यह सब ऐसे ही नही है।इसके लिए उनका त्याग और मरीज के लिए सेवाभाव उन्हें प्रसिद्धि दे रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आपरेशन के दूसरे दिन स्टाफ मुझे  ही नही,  हृदय के आपरेशन के सभी  मरीज को  सहारा देकर बैठाकर देता है।  बाद में  उसे खड़ाकर धीरे− धीरे हाल में घुमाया जाता है।एक से दो घंटे के लिए कुर्सी पर बैठाया जाता  है। कहा  जाता है कि आपका आपरेशन हो गया। अब नियमित जीवन शुरू की जीइए।घूमिए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतना   सब होने के बाद महसूस होता  है कि अन्य अस्पतालों की तरह इस अस्पताल में भी  लोकल कंपनी की अधिकतर दवाएं मल्टीनेशनल कंपनी से काफी मंहगी है। मेरे आपरेशन के टांकों में पानी आने के कारण मुझे इंट्रावेनस  एंटीबाइटिक इंजैक्शन   लिखा  जाता है।ये  इंजैक्शन अस्पताल में मैडिकल स्टोर पर  1100  रूपये के आसपास   है, जबकि राजकोट के दवाई के होलसेल मार्केट में यह तीन सौ रूपये का मिल रहा है। होलसेल मार्केट में बस दवाई का बिल नही मिलता।सरकार को अस्पताल के  मैडिकल स्टोर पर बिकने वाली दवा पर  नियंत्रण  करना  पडेगा।  एक चीज और  देखने में आई कि प्रधानमंत्री आयुष्मान कार्ड योजना के कार्डधारक अब अस्पताल में निशुल्क  चिकित्सा  सुविधा का लाभ  उठा रहे हैं।लगभग  सभी अस्पताल में आपरेशन के लिए आने वालों  से रिसेप्शन पर ही  पूछा  जाता  है कि आयुष्मान कार्ड  है। कार्ड  देने पर मरीज के प्राय− लगभग सभी  आपरेशन पूरी तरह निशुल्क  हैं। इसमें कोई भेदभाव नही। मरीज हिंदू हो या मुस्लिम बस कार्डधारक होना   चाहिए। प्रधानमंत्री आयुष्मान कार्डधारक की चिकित्सा सरकार ने निशुल्क करके आम आदमी का उपचार बहुत सरल कर दिया।उसका जीवन सरल बना दिया। इस योजना में अभी  सुधार की जरूरत है।किसी भी प्राइवेट  मेडिक्लेम में आपरेशन के बाद दो  महीने का  दवा का व्यय भी  कंपनी की ओर से देय  है,  जबकि आयुष्मान योजना में अस्पताल की ओर से  मात्र  दस दिन की दवा देने का प्रबंध है, जबकि काफी मरीजों का  उपचार लंबा  चलता है। देखने में आया है कि कुछ अस्पताल आपरेशन के बाद की दस दिन की दवा भी मरीज को नही देते।इसलिए इस योजना में अभी  बहुत सुधार की जरूरत है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं) </span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 May 2024 16:54:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
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                <title>न जाने कितने मुखौटों में जिंदगी तू है</title>
                                    <description><![CDATA[<p>एक तरफ राजनीति है और दूसरी तरफ जिंदगी ।  दोनों के पास असंख्य मुखौटे हैं। इसीलिए न जिंदगी का असल चेहरा सामने आ पाता है और न राजनीति का।  लोग एक चेहरे पर कई चेहरे लगाए बैठे हैं। हमारे साथी कवि स्वर्गीय प्रदीप चौबे ने सियासत पर कम जिंदगी पार ज्यादा लिखा ।  वे कहते थे -<br />कभी जुकाम,कभी पीलिया,कभी फ़्लू है<br />न जाने कितने मुखौटों में  जिंदगी तू है<br />यकीनन जितनी दुश्वारियां जिंदगी के साथ बाबस्ता हैं ,उतनी ही दुश्वारियां सियासत के साथ भी हैं। दोनों गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर है। आप कह सकते हैं कि</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141447/you-are-life-in-so-many-masks"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/mukhaute1.jpg" alt=""></a><br /><p>एक तरफ राजनीति है और दूसरी तरफ जिंदगी ।  दोनों के पास असंख्य मुखौटे हैं। इसीलिए न जिंदगी का असल चेहरा सामने आ पाता है और न राजनीति का।  लोग एक चेहरे पर कई चेहरे लगाए बैठे हैं। हमारे साथी कवि स्वर्गीय प्रदीप चौबे ने सियासत पर कम जिंदगी पार ज्यादा लिखा ।  वे कहते थे -<br />कभी जुकाम,कभी पीलिया,कभी फ़्लू है<br />न जाने कितने मुखौटों में  जिंदगी तू है<br />यकीनन जितनी दुश्वारियां जिंदगी के साथ बाबस्ता हैं ,उतनी ही दुश्वारियां सियासत के साथ भी हैं। दोनों गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर है। आप कह सकते हैं कि उस्ताद हैं। न आप जिंदगी से पार पा सकते हैं और न सियासत से। जिंदगी और सियासत के बिना काम भी नहीं चलता। आप समाज में वीतरागी होकर तो रह नहीं सकते।</p>
<p> सियासत का का हर फैसला आपकी जिंदगी को प्रभावित करता है ,भले ही आपका सियासत से कोई रिश्ता हो या न हो ? आप किसी दल या विचारधारा के साथ हों या न हों ? मार तो आपको खाना ही पड़ेगी। लेकिन सवाल ये है कि आखिर कब तक और कितनी मार खाई जा सकती है ?<br />आजकल जिंदगी पर मौसम भी भरी पद रहा ह।  पारा 47  डिग्री को पार कर चुका है ।  जैसे  नेताओं को कोई केंचुआ आदर्श आचार संहिंता की धज्जियां उड़ाने से नहीं रोक सकता ,उसी तरह मौसम को भी   कोई अपने तेवर दिखने से नहीं रोक सकता। अकेले वृक्ष रोक सकते थे लेकिन उन्हें भी बेरहमी के साथ कत्ल किया जा रहा है।  कल ही पढ़ा की पांच साल में 53  लाख से ज्यादा छायादार वृक्ष हमारे राष्ट्रवादी,देशभक्त,अंधभक्त समाज ने काट कर फेंक दिए। अब आसमान से बरसती आग को रोकने के लिए कोई छाता हमारे पास नहीं है। एयर कंडीशनर हमें भीतर ठंडक देते हैं लेकिन बाहर वे भी इतनी आग उगलते हैं की सांस लेना मुश्किल हो रहा है। दुर्भाग्य से इस बार सियासी पारा और मौसम का पारा एक साथ चढ़ा हुआ है। इसीलिए गर्मी दो गुना ज्यादा है। परिंदों और पशुओं की तो छोड़िये किसी को इंसानों की जिंदगी की फ़िक्र नहीं है।  सारे फ़िक्र तौसवीं इन दिनों चुनाव में व्यस्त है।  कुछ लड़ रहे हैं और   बाकी के चुनाव लड़ा रहे हैं। दिल्ली में तो केजरीवाल,मालीवाल आपस में ही लड़ रहे हैं। जनता के बारे में सोचे कौन ?</p>
<p>लोकतंत्र में आम चुनाव सत्यनारायण कथा के अध्यायों की तरह होने लगे है।  चुनाव में मौसम  का मिजाज नहीं बल्कि सत्तारूढ़ दल की सहूलियत देखी जाती है ।  इस बार भी केंचुआ ने मतदान की तारीखें तय करते वक्त मौसम विभाग से नहीं भाजपा मुख्यालय से विमर्श किया। इसी का नतीजा है कि इस बार मतदान अपेक्षाकृत कम हो रहा है। अब आप ही सोचिये की आदमी मतदान के जरिये अपना लोकतंत्र ,अपना विचार ,अपना भविष्य बचाये या जिंदगी बचाये ? अगर मतदान के लिए घर से निकले और लू ने आपकी लू-लू कर दी तो न घर के रहिएगा और न घाट के। 'जिंदगी से हाथ धोना पड़ेंगे सो अलग। लू से मरने पर कोई भी सरकार अपने परिजनों को दो-चार लाख रूपये का मुआवजा भी नहीं देने वाली। यदि आपने बीमा करवा रखा होगा तो कम्पनी दावा स्वीकार नहीं करेगी । कहेगी-' भरी दोपहर में घर से निकले ही क्यों थे मरने के लिए ?'</p>
<p>अग्निदग्ध मौसम में नयी सरकार चुनना  भी लोहे के चने चबाने जैसा है ।  एक तरफ अपीलें की जा रहीं हैं कि -' पहले मतदान ,बाद में जलपान 'और दूसरी तरफ मतदान के बाद जलपान कराने वाला कोई दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा। अयोध्या में राम मंदिर में प्राण -प्रतिष्ठा समारोह में जाने के लिए निमंत्रण   के साथ घर-घर पीले चावल बांटने वाले इस बार मतदाता पर्चियां बांटने भी नहीं आये ।  सबने सोच लया है कि राम जी के नाम पर जिसे वोट देना है वो पीले चावलों या मतदाता पर्चियों का इन्तजार थोड़े ही करेंगा ? भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं ने ये मान लिया है कि जिसे अपनी बीबी का मंगलसूत्र बचाना है,पुरखों कि जमीन बचाना है ,आरक्षण बचाना है और मुसलमानों को भगाना है तो हर कोई  झक मारकर वोट डालने आएगा। अर्थात अब अटकी मतदाता की है ,भाजपा की नहीं। भाजपा को तो जो हासिल करना था सो उसने कर लिया।</p>
<p>प्रचंड गर्मी में हो रहे मतदान के नतीजे भी प्रचंड ही आएंगे ।  आप जब इस लेख को पढ़ रहे होंगे तब तक मतदान का पांचवां चक्र समाप्त हो चुका होगा।  टीवी चैनलों  और यू- ट्यूब चैनलों पर एक तरफ गोदी मीडिया और दूसरी तरफ गैर मोदी मीडिया की चिड़ियाँ चहकती नजर आएँगी। वे किस को हरा रही होंगी तो किसी को जिता रही होंगी। पांचवें चरण में   मोदी से लेकर गांधी तक का भविष्य दांव पर  है ।देश के भविष्य की बात कोई नहीं कर रहा और न किसी को देश के भविष्य की फ़िक्र है। सबको अपना-अपना भविष्य दिखाई दे रहा है। इतने आत्मकेंद्रित नेताओं के भविष्य के मुकाबले आपको,हमको देश के भविष्य की चिंता करना चाहिए।</p>
<p><strong>राकेश अचल  </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 May 2024 16:48:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>देखना कहीं लू न लग जाए लोकतंत्र को</title>
                                    <description><![CDATA[<p>आज मै अपनी बात   कविराज सेनापति  से करना  चाहता हूँ ।  सेनापति ऋतु वर्णन के अद्भुत चितेरे रहे ।  आजकल देश के अधिकांश हिस्सों में जिस तरह गर्मी का प्रकोप है ,उसे अनुभव करते हुए मुझे सेनापति बार-बार याद आते हैं ।  वे लिखते हैं -</p>
<p>बृष को तरनि तेज, सहसौ किरन करि,</p>
<p>ज्वालन के जाल बिकराल बरसत हैं।<br />तपति धरनि, जग जरत झरनि, सीरी<br />छाँह कौं पकरि, पंथी-पंछी बिरमत हैं॥<br />'सेनापति नैक, दुपहरी के ढरत, होत<br />घमका बिषम, ज्यौं न पात खरकत हैं।<br />मेरे जान पौनों, सीरी ठौर कौं पकरि कौनौं,<br />घरी एक बैठि, कहूँ  घामै बितवत हैं।</p>
<p><br />कभी-कभी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141423/lets-see-if-democracy-gets-affected"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/hindo-muslman.jpg" alt=""></a><br /><p>आज मै अपनी बात   कविराज सेनापति  से करना  चाहता हूँ ।  सेनापति ऋतु वर्णन के अद्भुत चितेरे रहे ।  आजकल देश के अधिकांश हिस्सों में जिस तरह गर्मी का प्रकोप है ,उसे अनुभव करते हुए मुझे सेनापति बार-बार याद आते हैं ।  वे लिखते हैं -</p>
<p>बृष को तरनि तेज, सहसौ किरन करि,</p>
<p>ज्वालन के जाल बिकराल बरसत हैं।<br />तपति धरनि, जग जरत झरनि, सीरी<br />छाँह कौं पकरि, पंथी-पंछी बिरमत हैं॥<br />'सेनापति नैक, दुपहरी के ढरत, होत<br />घमका बिषम, ज्यौं न पात खरकत हैं।<br />मेरे जान पौनों, सीरी ठौर कौं पकरि कौनौं,<br />घरी एक बैठि, कहूँ  घामै बितवत हैं।</p>
<p><br />कभी-कभी  मुझे लगता है कि आज की गर्मी की तरह आज की राजनीति पर मै भी सेनापति की तरह कुछ ख़ास लिख पाता । लेकिन कहते हैं न ' ये मुंह और मसूर की दाल ? ' मै लोकतंत्र   के नाम पर आजकल देश में बरस रही आग का वर्णन  आखिर कैसे कर सकता हूँ ? यहां तो पल-पल मौसम बदलता  है ।  मौसम और हिन्दुस्तानी नेताओं के बीच एक तरह की होड़ लगी हुई है बदलने को लेकर। इस बदलाव में सबसे आगे हमारे आदिगुरु माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी हैं।</p>
<p><br />आप कहेंगे कि आपका काम आजकल बिना मोदी जी के चलता ही  नहीं,! हकीकत है कि मोदी आजकल सर्वत्र व्याप्त हैं ' हरि व्यापक  सर्वत्र समाना ' की तरह। गोस्वामी तुलसीदास  जी ने राम चरित मानस में कहा है कि<br />-हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥<br />देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥<br />अर्थात मैं तो यह जानता हूँ कि भगवान सब जगह समान रूप से व्यापक हैं, प्रेम से वे प्रकट हो जाते हैं, देश, काल, दिशा, विदिशा में बताओ, ऐसी जगह कहाँ है, जहाँ प्रभु न हों। आज के युग में मुझे भी यही लगता है कि मोदी जी सर्वत्र  व्यापक है।वे केवल प्रेम से ही नहीं आपके सामने क्षोभ से ,घृणा से ,क्रोध से  प्रकट हो सकते है। आप  देश, काल, दिशा, विदिशा में बताओ, ऐसी जगह कहाँ है, जहाँ माननीय मोदी जी न हों ?</p>
<p>'राजनीति में,लोकतांत्र में तंत्रों में ,यंत्रों में ,मंत्रों में  सब कह हैं मोदी जी। ऐसी व्यापकता किसी और नेता की शायद नहीं है। राहुल गांधी या दूसरे नेता आजकल इस मामले में नंबर दो पर ही है।  और ये सब कमाल किसका है ,आप सभी जानते हैं।<br /> दो दिन पहले माननीय मोदी जी जब बनारस में गंगाविहार के दौरान क्रूज पर हमारे पत्रकार मित्रों को साक्षात्कार  दे रहे थे,तब मै उन्हें सुनकर भाव विभोर हो गया था ।  वे कह रहे थे कि -'यदि मै हिन्दू-मुसलमान करूँ तो मुझे पातकी कहिये ' मै माननीय की बातों पर आँखें बंद कर देश की जनता की तरह भरोसा करता आया हूँ ,लेकिन हमेशा कि तरह मोदी जी ने दिल्ली पहुँचते ही फिर से मेरा और देश का दिल तोड़ दिया।</p>
<p>उन्होंने पांचवें चरण के मतदान से पहले एक बार फिर हिन्दू-मुसलमान किया ।  मंगलसूत्र,विरसे और आरक्षण कि डकैती की बातें कर डालीं। अर्थात उनका काम हिन्दू -मुसलमान और उन हौवों के बिना नहीं चला जो वे पिछले एक महीने से अपने साथ लेकर तमाम रैलियों में उपस्थित होते हैं।<br />मुमकिन है कि मै गलत होऊं लेकिन लगता है कि मोदी जी अपने हौवों के जरिये इस देश के लोकतंत्र को लू लगाकर मानेंगे। वे तीसरी बार सत्ता हासिल करने के लिए इतने व्याकुल  हैं कि पूछिए मत! आप पूछिए भी तो, आपको सच बताएगा कौन ? किसी को मोदी के मन की बात पता नहीं है।  खुद मोदी जी को भी नहीं। वे कांग्रेस को मिटाने के लिए भाजपा और संघ के साथ-साथ देश कि तमाम रिवायतों को मिटा देना चाहते हैं। हिन्दुओं को लेकर वे उतने ही संवेदनशील  हो   गए हैं जितना किसी जमाने में मुसलमानों को लेकर मोहम्मद   जिन्ना हुआ करते थे। जिन्ना साहब आख़िरकार मुसलमानों के लिए पाकिस्तान लेकर ही माने।</p>
<p> और मुझे लगता है कि अब मोदी जी भी हिन्दुओं के लिए हिंदुस्तान से हिन्दू द्वीप लेकर ही मानेंगे।  वे तब तक सत्ता को टा-टा,वाय-वाय नहीं कहेंगे जब तक कि उन्हें हिन्दू द्वीप मिल नहीं जाता ।  वे ऐसा देश चाहते हैं  जहां हिन्दुओं के अलावा अव्वल तो कोई दूसरा हो ही नहीं और हो भी तो हमेशा हिन्दुओं के सामने साष्टांग मुद्रा में खड़ा दिखाई दे।<br />भविष्य के गर्त में क्या है ,ये कोई नहीं जानता। महात्मा गाँधी   भी नहीं जानते थे। उन्होंने भी अपना जीवन उस देश के लिए न्यौछावर किया जिसमें हिन्दू-मुसलमान,सिख और ईसाई ही नहीं बल्कि तमाम लोग शामिल थे और हैं। गांधी के बाद हिंदुस्तान को हिंदुस्तान बनाये रखने के लिए शहादतों का सिलसिला थमा नहीं। लेकिन दुर्भाग्य ये है कि खालिस हिन्दू द्वीप चाहने वालों में से किसी ने कोई शहादत अब तक दी नहीं।</p>
<p>शहादत देना और शहादत का अपमान करना दो अलग-अलग चीजें हैं। इसे समझना आसान नहीं  है। देश को आज शहादत की नहीं मोहब्बत की जरूरत है ।  किस कश्ती को हमारे पुरखे  तूफ़ान से बचाकर निकाल लाये थे उसे सम्हालकर रखने की जरूरत है। किन्तु  हो उलटा रहा है। हम देश कि किश्ती को एक बार फिर हिन्दू -मुसलमान कर एक नए तूफ़ान में फंसता देख रहे हैं।<br />अठरहवीं लोकसभा के लिए चलकर रहे मतदान के शेष तीन चरणों में आप अपने विवेक से सही फैसला कर इस कश्ती को तूफ़ान में घिरने से बचा सकते हैं। नेताओं के श्रीमुख से निकलती आग से बचा सकते हैं। आप यदि चूके तो लोकतंत्र को लू लगना तय है। और हम सब लू लगा लोकतंत्र नहीं एक स्वस्थ्य लोकतंत्र चाहते हैं ,एक ऐसा लोकतंत्र जिसमें राजनीति झूठ की बैशाखियों पर न टिकी हो। अदावत जिसकी रगों में न बहती  हो। तय आपको करना है क्योंकि ये देश हमारा भी है और आपका भी।</p>
<p><strong>राकेश अचल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 May 2024 17:35:07 +0530</pubDate>
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                <title>  गुलदस्त-ए-हिन्द में फलती फूलती ' विष बेल '</title>
                                    <description><![CDATA[<div>  भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व यानी लोकसभा का आम चुनाव अपने समापन की ओर अग्रसर है। देश के चुनावी इतिहास में 2024 का चुनाव हमेशा याद रखा जायेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनके सहयोगी नेताओं ने गोदी मीडिया की जुगलबंदी से इस बार चुनाव प्रचार में जितना ज़हर घोलने व झूठ पर झूठ बोलने का कीर्तिमान स्थापित करने की कोशिश की गयी वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। भारतीय जनता पार्टी ने वैसे तो पिछले दस वर्षों से अपनी सत्ता की पूरी ताक़त इसी में लगा रखी है कि किस तरह अपने विरोधियों को टुकड़े टुकड़े गैंग का</div>
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<div>प्रधानमंत्री</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141421/poison-vine-flourishing-in-guldast-e-hind"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/hate2.jpg" alt=""></a><br /><div> भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व यानी लोकसभा का आम चुनाव अपने समापन की ओर अग्रसर है। देश के चुनावी इतिहास में 2024 का चुनाव हमेशा याद रखा जायेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनके सहयोगी नेताओं ने गोदी मीडिया की जुगलबंदी से इस बार चुनाव प्रचार में जितना ज़हर घोलने व झूठ पर झूठ बोलने का कीर्तिमान स्थापित करने की कोशिश की गयी वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। भारतीय जनता पार्टी ने वैसे तो पिछले दस वर्षों से अपनी सत्ता की पूरी ताक़त इसी में लगा रखी है कि किस तरह अपने विरोधियों को टुकड़े टुकड़े गैंग का नाम दिया जाये,उन्हें पाकिस्तानी बताया जाये ,देश विरोधी व सेना विरोधी बताया जाये ,भ्रष्ट व निकम्मा बताया जाये ,मुस्लिम परस्त व तुष्टीकरण का पैरोकार साबित किया जाये,पिछले सभी शासन व पूर्व प्रधानमंत्रियों को निकम्मा बताया जाये। और साथ ही स्वयं को 'दैवीय शक्ति ' का स्वामी होने के साथ 'अवतरित' होने वाला एक ऐसा महापुरुष जिसे पहले तो गंगा ने केवल बुलाया था परन्तु अब तो 'गोद ' भी ले लिया है। चुनावी बेला में सत्ता पर क़ब्ज़ा बरक़रार रखने के लिये और अपने विरोधियों को नीचा दिखाने व बदनाम करने के लिये प्रधानमंत्री स्तर पर जिस तरह के ज़हरीले बोल इन दिनों बोले जा रहे हैं ऐसी बातों की कभी कल्पना भी नहीं की गयी।    </div>
<div> </div>
<div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के चुनावी दौरे पर सभाओं में फिर कहा है कि -"कांग्रेस व समाजवादी पार्टी अगर सत्ता में आई तो यह लोग रामलला को टेंट में भेज कर मंदिर में बुल्डोज़र चलवा देंगे। कांग्रेस ने तो राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को पलटने की तैयारी भी कर ली है।  उन्होंने कहा कि इनके लिए तो उनका परिवार और पावर यही उनका खेल है। सपा, कांग्रेस की ‘राम’ से इतनी दुश्मनी है कि उन्होंने रामलला का प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकरा दिया"। प्रधानमंत्री मोदी के उपरोक्त आरोपों से दो अहम सवाल सिर्फ़ मोदी से ही पूछे जाने चाहिये। एक तो यह कि प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति की इस सूचना का आख़िर क्या स्रोत है कि  -'सपा-कांग्रेस वाले सरकार में आए तो राम मंदिर पर बुलडोज़र चलवा देंगे'? यदि कोई स्रोत नहीं तो यह सफ़ेद झूठ और लफ़्फ़ाज़ी सिर्फ़ साम्प्रदायिक आधार पर मतों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास नहीं तो और क्या है ?</div>
<div> </div>
<div>और उन्हीं के आरोपों  से जुड़ा दूसरा सवाल यह कि जब सपा व कांग्रेस को उनके अनुसार ‘राम’ से इतनी दुश्मनी है कि उन्होंने रामलला का प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकरा दिया और अब मोदी के अनुसार इस पर बुलडोज़र भी चलवा देंगे ? फिर आख़िर ऐसे 'राम विरोधियों ' को निमंत्रण भिजवाया ही क्यों गया ? क्या सिर्फ़ इसलिये नहीं कि उन्हें अंदाज़ा था कि वे राम जन्म भूमि प्राण प्रतिष्ठा को राजनैतिक रंग में रंगने के इस भाजपा व संघ के आयोजन को अस्वीकार करेंगे और तब इन्हें यह मौक़ा मिलेगा जो आज कहते फिर रहे हैं ? मोदी जी रामलला का प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकराने को लेकर उन चारों शंकराचार्यों पर क्यों नहीं बोलते जिन्होंने उनका निमंत्रण स्वीकार नहीं किया और इस आयोजन को भी विधि विधान के विरुद्ध बताया ? आज भी एक शंकराचार्य वे डंके की चोट पर कह रहे हैं कि प्राण प्रतिष्ठा पुनः की जायेगी,मंदिर निर्माण अभी केवल 30 प्रतिशत हुआ है और अधूरे मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा पूरी तरह अनैतिक व अवैधानिक है। परन्तु शंकराचार्य की इन बातों का कोई जवाब नहीं देता जो ख़ुद 22 जनवरी के इस आयोजन को पूरी तरह राजनैतिक आयोजन बताते रहे हैं ?</div>
<div>
<div> </div>
<div>पिछले दिनों इसी नफ़रती बयानबाज़ियों की एक और बानगी उत्तर पूर्वी दिल्ली के थाना उस्मानपुर इलाक़े के करतार नगर में तब देखने को मिली जब दिल्ली की  जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष और उत्तर पूर्वी दिल्ली से कांग्रेस के लोकसभा उम्मीदवार कन्हैया कुमार को उन्हें माला पहनाने के बहाने से उनके क़रीब पहुंचे दो लोगों ने उनपर पहले स्याही फेंकी फिर अचानक थप्पड़ों से हमला भी कर दिया । इसी बीच आम आदमी पार्टी की महिला निगम पार्षद के साथ भी हाथापाई की गई। निगम पार्षद का आरोप है कि उनके साथ छेड़छाड़ भी की गई है। इस दौरान चार लोगों को चोट भी आई है । बताया जा रहा है कि कन्हैया कुमार व महिला पार्षद से मारपीट करने वाले लोग गोरक्षा दल से जुड़े हुए हैं। घटना की वीडियो में हमलावर यह कहते हुए सुनाई दे रहे हैं कि -'भारत के टुकड़े-टुकड़े का नारा लगाने वालों का वह यही हाल करेंगे। देश का अपमान वह किसी क़ीमत पर नहीं सहेंगे'।</div>
<div> </div>
<div>  यहां भी सवाल यह है कि टुकड़े तिकडे गैंग की अवधारणा किसने बनाई व प्रचारित की ? जिस कन्हैया कुमार के पूर्वजों का जन्म भारत में ही हुआ हो ,जिसकी मां ने आंगनवाड़ी में काम कर अपने बच्चों की परवरिश की हो,जिसका भाई फ़ौजी और बाप किसान हो उस पर सिर्फ़ इसलिये टुकड़े टुकड़े गैंग का लेबल लगा दिया जाये क्योंकि वह वैचारिक रूप से सत्ता का मुखर विरोधी है ? इतना ही नहीं बल्कि उस पूरे जे एन यू को ही बदनाम करने का षड्यंत्र रचा जाये जिसमें पढ़े अनेक नेता आज मंत्री सांसद व सचिव स्तर के अधिकारी हैं ? और यह आरोप भी उनके द्वारा लगाए जाएँ जो ख़ुद या तो अनपढ़ हैं या फ़र्ज़ी डिग्रियां रखते  हैं ?</div>
<div> </div>
<div>यह आरोप उनके द्वारा लगाए जाएं जिनके पारिवारिक व राजनैतिक वंशजों का देश के लिये बलिदान देने का कोई इतिहास नहीं है ? यह आरोप उनके द्वारा लगाये जायें जो ख़ुद समाज को धर्म जाति क्षेत्र व भाषा के नाम पर लड़वाकर देश के टुकड़े टुकड़े करना चाह रहे हों और देश को हिंसा व नफ़रत की आग में झोंकने के लिये प्रयासरत हों ? सवाल यह है कि अनेकता में एकता का दर्शन देने वाले गुलदस्त-ए-हिन्द में गत दस वर्षों से सत्ता व सत्ता की दलाल मीडिया द्वारा जिस  'विष बेल ' को नफ़रत,साम्प्रदायिकता,झूठ.पाखंड व पूंजीवाद से सींचा गया है क्या अब वह फलती फूलती दिखाई देने लगी हैं ? </div>
<div> </div>
<div><strong><span style="font-size:large;">तनवीर जाफ़री  </span></strong></div>
</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sun, 19 May 2024 17:27:54 +0530</pubDate>
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