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                <title>Lifestyle Diseases - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Lifestyle Diseases RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>योग दिवस: सिर्फ इवेंट बनकर न रह जाए</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">  </p>
<blockquote class="format2"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">21<span lang="hi" xml:lang="hi">  जून </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi">  को </span>11<span lang="hi" xml:lang="hi">वां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस देशभर में मनाया गया। राजधानी दिल्ली के साथ साथ देश के हर शहर और कस्बों में हजारों जगहों पर कार्यक्रम हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रधानमंत्री मोदी कोलकाता में विशेष सत्र में शामिल हुए। तस्वीरें अच्छी आईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बयानबाजी हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अगले दिन सब सामान्य हो गया। अब सवाल ये है कि क्या योग दिवस सिर्फ एक दिन का इवेंट बनकर रह गया है या इसका जमीनी असर भी दिख रहा है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतीकवाद: जो दिखता है- हर साल </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi">  जून को योग दिवस का मतलब हो जाता है: सरकारी</span>,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181923/yoga-day-should-not-remain-just-an-event"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images.jpeg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
<blockquote class="format2"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> को </span>11<span lang="hi" xml:lang="hi">वां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस देशभर में मनाया गया। राजधानी दिल्ली के साथ साथ देश के हर शहर और कस्बों में हजारों जगहों पर कार्यक्रम हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रधानमंत्री मोदी कोलकाता में विशेष सत्र में शामिल हुए। तस्वीरें अच्छी आईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बयानबाजी हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अगले दिन सब सामान्य हो गया। अब सवाल ये है कि क्या योग दिवस सिर्फ एक दिन का इवेंट बनकर रह गया है या इसका जमीनी असर भी दिख रहा है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतीकवाद: जो दिखता है- हर साल </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून को योग दिवस का मतलब हो जाता है: सरकारी अधिकारी मैट पर बैठे हुए फोटो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल-कॉलेज में अनिवार्य ड्रिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोशल मीडिया पर सेलेब्स के वीडियो</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विदेशों में भारतीय दूतावासों के कार्यक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये सब जरूरी है। इसने योग को ग्लोबल ब्रांड बनाया। </span>2014<span lang="hi" xml:lang="hi"> से पहले योग को "हिंदू प्रैक्टिस" कहकर खारिज किया जाता था। आज </span>190+ <span lang="hi" xml:lang="hi">देश इसे मनाते हैं। यूएन ने </span>2014<span lang="hi" xml:lang="hi"> में </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया था। लेकिन प्रतीकवाद की सीमा यही है कि वो एक दिन में ही खत्म हो जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जमीनी हकीकत: आंकड़े क्या कहते हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सकारात्मक पक्ष- आयुष मंत्रालय के मुताबिक </span>2024<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक </span>1.2<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख से ज्यादा योग इंस्ट्रक्टर ट्रेंड हो चुके हैं। अब योग को भी स्कूलों में शामिल किया जाने लगा है। सीबीएसई ने </span>6-12<span lang="hi" xml:lang="hi"> क्लास में योग को पार्ट बनाया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेडिकल टूरिज्म-</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषिकेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैसूर में योग-आयुर्वेद के लिए विदेशी आ रहे हैं। ये </span>8000<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ का इंडस्ट्री बन गया है। इसका एक कमजोर पक्ष यह है कि ग्रामीण भारत में इसकी पहुंच बहुत कम या ना के बराबर है। एनसीआरबी का हेल्थ सर्वे कहता है कि </span>70%<span lang="hi" xml:lang="hi"> ग्रामीण लोग रोज योग नहीं करते। उनके लिए योग "शहरियों का शौक" है। क्वालिटी का सवाल- </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिन के सर्टिफिकेट कोर्स से बने इंस्ट्रक्टर स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। इससे गलत प्रैक्टिस का खतरा है। निरंतरता नहीं-  </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून के बाद ज्यादातर लोग मैट समेट देते हैं। रोजाना योग करने वालों की संख्या </span>15%<span lang="hi" xml:lang="hi"> से ज्यादा नहीं बढ़ी। असर कहां दिखना चाहिए था</span>?- <span lang="hi" xml:lang="hi">योग को स्वास्थ्य नीति का हिस्सा बनना था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन हुआ नहीं। नॉन-कम्यूनिकेबल डिजीज पर रोक-  भारत में डायबिटीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाई </span>BP, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्ट्रेस के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। </span>ICMR <span lang="hi" xml:lang="hi">कहता है कि </span>2030<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक </span>13.4<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ लोग डायबिटिक होंगे। योग प्रिवेंटिव हेल्थ में काम करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आयुष बजट कुल हेल्थ बजट का सिर्फ </span>2.3%<span lang="hi" xml:lang="hi"> है। मानसिक स्वास्थ्य-</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">NIMHANS <span lang="hi" xml:lang="hi">के डेटा के मुताबिक भारत में </span>15% <span lang="hi" xml:lang="hi">लोग मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। योग और प्राणायाम का असर डिप्रेशन-एंग्जाइटी में साबित है। लेकिन मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में योग को मेनस्ट्रीम नहीं किया गया। स्कूलों में योग पीरियड है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन परीक्षा में नहीं पूछा जाता। बच्चे </span>45 <span lang="hi" xml:lang="hi">मिनट करके भूल जाते हैं। अगर इसे फिजिकल एजुकेशन का ग्रेड हिस्सा बनाया जाए तो आदत बने। दूसरे देशों ने क्या किया</span>?- <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका में </span>20,000 <span lang="hi" xml:lang="hi">से ज्यादा स्कूलों में "</span>Yoga in Schools" <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोग्राम चलता है। इंश्योरेंस कंपनियां योग करने वालों को प्रीमियम में छूट देती हैं। चीन में ताई-ची को नेशनल फिटनेस प्रोग्राम बनाया। हर पार्क में सुबह ग्रुप प्रैक्टिस होती है। भारत में हम इवेंट कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पब्लिक हेल्थ सिस्टम में योग को इंटीग्रेट नहीं किया। सवाल यह उठता है कि अब क्या करना चाहिए</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतीकवाद से हटकर पॉलिसी बनाओ। योग दिवस को सिर्फ इवेंट न रखो। हर जिला अस्पताल में योग थेरेपी सेंटर हो। आयुष्मान भारत में योग कवर हो। क्वालिटी कंट्रोल ऐसा हो जो भी योग सिखाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी ट्रेनिंग और सर्टिफिकेशन सख्त हो। गलत आसन से स्पाइन इंजरी के केस बढ़ रहे हैं। ग्रामीण फोकस-  हर पंचायत में एक योग मित्र हो। जैसे आशा वर्कर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही योग वर्कर। उन्हें स्टाइपेंड मिले। डेटा पर काम करो- योग से कितने लोगों का शुगर कंट्रोल हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कितनों की दवा कम हुई - ये डेटा इकट्ठा करो। तभी पॉलिसी मेकर मानेंगे। योग दिवस का महत्व कम नहीं हुआ है। इसने भारत की सॉफ्ट पावर बढ़ाई है। लेकिन अगर अगले </span>10 <span lang="hi" xml:lang="hi">साल भी हम सिर्फ </span>21 <span lang="hi" xml:lang="hi">जून को मैट बिछाते रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो योग "इंस्टाग्रामेबल एक्टिविटी" बनकर रह जाएगा। योग का असली मकसद था - "योगः कर्मसु कौशलम्"। काम में कुशलता। वो कुशलता तब आएगी जब योग स्कूल की क्लास से निकलकर अस्पताल की </span>OPD, <span lang="hi" xml:lang="hi">फैक्ट्री के ब्रेक रूम और गांव के चौपाल तक पहुंचे। तस्वीरें अच्छी लगती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बदलाव तब दिखता है जब किसी गांव के डायबिटिक मरीज की दवा आधी हो जाए क्योंकि उसने रोज </span>30 <span lang="hi" xml:lang="hi">मिनट अनुलोम-विलोम किया।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>एशिया</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 16:27:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>योग मानव जीवन की समस्याओं का समाधान और आत्मिक उत्कर्ष का मार्ग</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
<div>
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<div style="text-align:justify;">प्रत्येक वर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पूरे विश्व में उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह केवल एक दिवस नहीं, बल्कि मानव जीवन को स्वस्थ, संतुलित और सार्थक बनाने की एक वैश्विक चेतना का प्रतीक है। योग भारत की प्राचीन संस्कृति की वह अमूल्य धरोहर है जिसने आज विश्व के करोड़ों लोगों को शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दिखाया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की घोषणा के बाद योग की महत्ता और भी अधिक बढ़ी है तथा आज दुनिया का लगभग हर देश इसकी उपयोगिता को स्वीकार कर रहा है।</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181570/yoga-is-the-solution-to-the-problems-of-human-life"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas15.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
<div>
<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div style="text-align:justify;">प्रत्येक वर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पूरे विश्व में उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह केवल एक दिवस नहीं, बल्कि मानव जीवन को स्वस्थ, संतुलित और सार्थक बनाने की एक वैश्विक चेतना का प्रतीक है। योग भारत की प्राचीन संस्कृति की वह अमूल्य धरोहर है जिसने आज विश्व के करोड़ों लोगों को शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दिखाया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की घोषणा के बाद योग की महत्ता और भी अधिक बढ़ी है तथा आज दुनिया का लगभग हर देश इसकी उपयोगिता को स्वीकार कर रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान समय का मनुष्य अनेक प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा है। जीवन की भागदौड़, प्रतिस्पर्धा, तनाव, असुरक्षा, आर्थिक दबाव और सामाजिक अपेक्षाएँ उसे निरंतर मानसिक रूप से विचलित करती रहती हैं। कभी शरीर रोगों से ग्रस्त होता है तो कभी मन चिंता, अवसाद और असंतोष से भर जाता है। व्यक्ति एक समस्या का समाधान खोजता है तो दूसरी उसके सामने खड़ी हो जाती है। परिणामस्वरूप उसका जीवन तनाव, भय, निराशा और मानसिक द्वंद्व का शिकार बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज अधिकांश लोग सुख की तलाश में हैं, परंतु वास्तविक सुख उनसे दूर होता जा रहा है। बाहरी उपलब्धियों के बावजूद भीतर शांति का अभाव दिखाई देता है। ऐसे समय में योग एक प्रकाश स्तंभ की भाँति मनुष्य को सही दिशा प्रदान करता है। योग व्यक्ति को समस्याओं से भागना नहीं सिखाता, बल्कि उनका संतुलित और सकारात्मक ढंग से सामना करना सिखाता है।योग का वास्तविक स्वरूप योग का सामान्य अर्थ जोड़ या मिलन है। भारतीय दर्शन के अनुसार योग आत्मा और परमात्मा के मिलन की प्रक्रिया है। यह केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और अनुशासित बनाने वाली एक समग्र साधना है। योग शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के बीच सामंजस्य स्थापित करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महर्षि पतंजलि ने योग को "चित्तवृत्ति निरोध" कहा है, अर्थात मन की चंचल वृत्तियों को नियंत्रित करना। जब मन स्थिर और शांत होता है, तब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान पाता है। यही योग का मूल उद्देश्य है। योग व्यक्ति को बाहरी संसार के साथ-साथ अपने अंतर्जगत को समझने की प्रेरणा देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्वास्थ्य और योग का गहरा संबंध है।आज चिकित्सा विज्ञान भी स्वीकार करने लगा है कि अनेक रोगों का संबंध केवल शरीर से नहीं, बल्कि मन और जीवनशैली से भी होता है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, अनिद्रा, चिंता और अवसाद जैसी अनेक समस्याएँ तनाव और असंतुलित जीवन का परिणाम हैं। योग इन समस्याओं के समाधान का प्रभावी माध्यम बनकर सामने आया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">योगासन शरीर को लचीला, सशक्त और स्वस्थ बनाते हैं। प्राणायाम श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित कर शरीर में ऊर्जा का संतुलन स्थापित करता है। ध्यान मन को शांत और एकाग्र बनाता है। नियमित योगाभ्यास से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, मानसिक तनाव कम होता है तथा व्यक्ति स्वयं को अधिक ऊर्जावान अनुभव करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्राचीन भारत में योग जीवन का अभिन्न अंग था। उस समय लोगों का स्वास्थ्य प्राकृतिक जीवनशैली और योगाभ्यास पर आधारित था। आधुनिक युग में भी योग उसी परंपरा को पुनर्जीवित कर रहा है तथा स्वस्थ समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">तनावमुक्त जीवन का आधार</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान युग को तनाव का युग कहा जाता है। भौतिक सुविधाओं में वृद्धि होने के बावजूद मनुष्य मानसिक रूप से अधिक अशांत होता जा रहा है। जीवन की जटिलताओं ने उसे भीतर से कमजोर बना दिया है। ऐसे वातावरण में योग तनावमुक्त जीवन का सबसे प्रभावी साधन सिद्ध हुआ है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">योग व्यक्ति को वर्तमान क्षण में जीना सिखाता है। यह मन को अनावश्यक चिंताओं और नकारात्मक विचारों से मुक्त करता है। जब मन शांत होता है तो निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है, आत्मविश्वास विकसित होता है और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण उत्पन्न होता है। योग केवल शरीर को स्वस्थ नहीं बनाता, बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन भी प्रदान करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">व्यक्तित्व विकास का सशक्त माध्यम बनता जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">योग का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। यह व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास करता है। नियमित योगाभ्यास से आत्मानुशासन, धैर्य, सहनशीलता, एकाग्रता और आत्मविश्वास का विकास होता है। व्यक्ति अपने भीतर छिपी हुई शक्तियों को पहचानने लगता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">योग हमें सिखाता है कि वास्तविक शक्ति बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर निहित है। जब मनुष्य अपने अंतर्मन से जुड़ता है, तब उसके भीतर सकारात्मक परिवर्तन प्रारंभ होते हैं। उसके विचार, व्यवहार और दृष्टिकोण में परिष्कार आता है। यही कारण है कि योग को व्यक्तित्व रूपांतरण का माध्यम कहा जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व में  योग की लोकप्रियता बढ़ रही है। एक समय था जब योग केवल भारत तक सीमित माना जाता था, किंतु आज इसकी लोकप्रियता विश्वव्यापी हो चुकी है। अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और एशिया के अनेक देशों में योग केंद्र स्थापित हो चुके हैं। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, कार्यालयों और चिकित्सा संस्थानों में योग को अपनाया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विदेशी समाज भौतिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद मानसिक शांति की खोज में योग की ओर आकर्षित हुआ है। अनेक विदेशी भारत आकर योग का अध्ययन करते हैं और इसकी गहन साधना से लाभान्वित होते हैं। यह भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति का प्रमाण है कि उसकी हजारों वर्ष पुरानी परंपरा आज विश्व का मार्गदर्शन कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;">सामाजिक जीवन में योग की भूमिका अहम मानी जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">योग केवल व्यक्तिगत कल्याण का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी माध्यम है। समाज में बढ़ते अपराध, हिंसा, नशाखोरी और नैतिक पतन के मूल में मानसिक असंतुलन और आत्मसंयम का अभाव है। योग व्यक्ति में आत्मनियंत्रण, करुणा, सहिष्णुता और नैतिक मूल्यों का विकास करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जब व्यक्ति का मन संतुलित होता है तो उसका व्यवहार भी संतुलित हो जाता है। योग परिवार, समाज और राष्ट्र के बीच सकारात्मक संबंधों को मजबूत करता है। यह मानवता, सहयोग और सद्भाव की भावना को विकसित करता है। इसलिए योग केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भी आधार है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अध्यात्म की ओर ले जाने वाला मार्ग है।योग का अंतिम उद्देश्य केवल रोगों से मुक्ति नहीं, बल्कि आत्मबोध और आत्मिक विकास है। यह मनुष्य को भौतिकता से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक चेतना की ओर ले जाता है। योग के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर स्थित अनंत संभावनाओं और दिव्य शक्तियों का अनुभव कर सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अध्यात्म का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि स्वयं को जानना है। योग हमें बाहरी उपलब्धियों के साथ-साथ आंतरिक समृद्धि का भी महत्व समझाता है। जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है, तब जीवन में स्थायी शांति और आनंद का अनुभव होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">योग भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा की अनुपम देन है। यह मानव जीवन की समस्याओं का व्यावहारिक और प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है। योग शरीर को स्वस्थ, मन को शांत, बुद्धि को निर्मल और आत्मा को जागृत करता है। आज जब पूरी दुनिया तनाव, अशांति और असंतुलन से जूझ रही है, तब योग मानवता के लिए आशा की किरण बनकर उभरा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय योग दिवस हमें यह संदेश देता है कि स्वस्थ और सुखी जीवन का मार्ग बाहर नहीं, हमारे भीतर है। यदि हम योग को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बना लें तो न केवल व्यक्तिगत जीवन में परिवर्तन ला सकते हैं, बल्कि एक स्वस्थ, शांतिपूर्ण और नैतिक समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। वास्तव में योग केवल एक अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन जीने की श्रेष्ठ कला है, जो मनुष्य को स्वयं से जोड़कर अनंत आनंद और आत्मिक उत्कर्ष की ओर अग्रसर करती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   <strong> <em>कांतिलाल मांडोत</em></strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="WhmR8e"></div>
</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 16:48:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कोविड के बाद 3 वर्षों में 6 करोड़ मधुमेह रोगी बढ़े: भारत कैसे बन रहा 'डायबिटीज कैपिटल'</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>राजीव शुक्ल </strong></p>
<p style="text-align:justify;">कोविड-19 खत्म हुए 3 साल हो गए, लेकिन उसकी एक चुप छाप अब भारत की सेहत पर भारी पड़ रही है। ICMR और इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की रिपोर्ट बताती हैं कि 2021 से 2024 के बीच भारत में मधुमेह के मरीजों की संख्या में 6 करोड़ से ज्यादा का इजाफा हुआ है। 2021मे भारत में डायबिटीज के मरीज करीब 7.7 करोड़ थे। 2024 में ये संख्या बढ़कर 8.98 करोड़ पहुंच गई। यानी 1.28 करोड़ का इजाफा सिर्फ 3 साल में। 2026 तक ICMR के मुताबिक देश में अब 10 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं। 13 करोड़ लोग</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181550/6-crore-diabetic-patients-increased-in-3-years-after-covid"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas13.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>राजीव शुक्ल </strong></p>
<p style="text-align:justify;">कोविड-19 खत्म हुए 3 साल हो गए, लेकिन उसकी एक चुप छाप अब भारत की सेहत पर भारी पड़ रही है। ICMR और इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की रिपोर्ट बताती हैं कि 2021 से 2024 के बीच भारत में मधुमेह के मरीजों की संख्या में 6 करोड़ से ज्यादा का इजाफा हुआ है। 2021मे भारत में डायबिटीज के मरीज करीब 7.7 करोड़ थे। 2024 में ये संख्या बढ़कर 8.98 करोड़ पहुंच गई। यानी 1.28 करोड़ का इजाफा सिर्फ 3 साल में। 2026 तक ICMR के मुताबिक देश में अब 10 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं। 13 करोड़ लोग ऐसी स्थिति में हैं जहां अगर लाइफस्टाइल न बदली तो अगले 5-10 साल में वो डायबिटीज के मरीज बन जाएंगे। IDF की 'डायबिटीज एटलस 2025' कहती है कि भारत में 2050 तक ये संख्या 15.67 करोड़ तक पहुंच सकती है। कोविड का क्या रोल रहा? डॉक्टरों का मानना है कि महामारी ने डायबिटीज की रफ्तार को 5 साल आगे बढ़ा दिया। लाइफस्टाइल ठप- लॉकडाउन में शारीरिक गतिविधि कम हुई, स्क्रीन टाइम और बैठे रहने का समय बढ़ा। मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन की डॉ. अंजना कहती हैं कि कोविड के बाद फिजिकल इनएक्टिविटी डायबिटीज का बड़ा रिस्क फैक्टर बन गई। स्ट्रेस और अनियमित नींद काम का दबाव, अनिश्चितता और नींद का पैटर्न बिगड़ने से इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ा।<br />डाइट में बदलाव- घर पर बैठे-बैठे प्रोसेस्ड फूड, मीठे पेय और फास्ट फूड की खपत बढ़ी। पोस्ट-कोविड इफेक्ट-  कई स्टडी में दिखा कि कोविड से उबरने वाले लोगों में पहले साल में डायबिटीज का खतरा 40% तक बढ़ गया। वायरस अग्न्याशय पर असर डाल सकता है। कौन सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है? शहर या गांव -  रांची, जमशेदपुर, धनबाद जैसे शहरों में 13-14% लोग डायबिटीज से ग्रसित हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में ये 3-5% है। युवा और बच्चे-  अब ये बीमारी सिर्फ 45+ की नहीं रही। दिल्ली में 14 साल से कम उम्र के बच्चों में भी मौतें दर्ज हुई हैं।<br />           आदिवासी इलाके-  झारखंड जैसे राज्यों में आदिवासी समुदाय में भी डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है। इसकी वजह प्रोसेस्ड फूड, मोबाइल-स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल और बदलती जीवनशैली है। <br />मौतें भी बढ़ीं- दिल्ली सरकार के MCCD डेटा के मुताबिक 2024 में डायबिटीज से 2,459 लोगों की मौत हुई, जबकि 2023 में ये 1,823 थी। अस्पतालों में डायबिटीज से मौतें 544 बढ़ीं। राष्ट्रीय स्तर पर 2024 में हर 9 सेकंड में एक मौत डायबिटीज की वजह से हुई। क्यों नहीं रुक रहा ये सिलसिला?<br />डॉक्टर 4 वजहें बताते हैं-  पश्चिमी डाइट तले-भुने, बेकरी प्रोडक्ट, मीठे ड्रिंक्स और परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट का बढ़ता चलन। मोटापा देश में 60 करोड़ लोग ओवरवेट या ओबेस हैं। मोटापा टाइप-2 डायबिटीज का सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर है।<br />जागरूकता की कमी- ज्यादातर लोग तब जांच कराते हैं जब बीमारी बढ़ चुकी होती है। अनियंत्रित दवाएं-  दवाएं बिना डॉक्टर की सलाह के ली जा रही हैं, जिससे किडनी और पैंक्रियाज को नुकसान पहुंच रहा है। आगे का रास्ता-  स्क्रीनिंग बढ़ाओ-  30 साल से ऊपर हर व्यक्ति को साल में एक बार शुगर टेस्ट कराना चाहिए। लाइफस्टाइल रिवर्स करो- रोज 30 मिनट चलना, शुगर-प्रोसेस्ड फूड कम करना, नींद 7-8 घंटे। स्कूल लेवल पर बदलाव-  बच्चों में फास्ट फूड और कोल्ड ड्रिंक पर रोक जरूरी है। सरकारी स्तर पर- NCD स्क्रीनिंग प्रोग्राम को ग्रामीण इलाकों तक ले जाना होगा। कोविड ने सिर्फ फेफड़े ही नहीं, मेटाबॉलिज्म भी खराब किया। 6 करोड़ नए मरीजों का मतलब है कि हर 2 सेकंड में एक भारतीय डायबिटीज की चपेट में आ रहा है। अगर अभी कदम नहीं उठाए गए तो 2050 तक भारत में हर 7वां व्यक्ति डायबिटिक होगा। ये सिर्फ स्वास्थ्य का नहीं, देश की अर्थव्यवस्था का भी संकट है, क्योंकि डायबिटीज दिल, किडनी और आंखों की बीमारियों का सीधा रास्ता है।  वैज्ञानिक तौर पर भले ही पुष्टि नहीं हुई हो, मगर कोविड काल के बाद लोगों में बीमारियां बढ़ने का रुझान देखा गया है। मधुमेह को लेकर कोविड काल के बाद आए राष्ट्रीय परिवार<br />कल्याण सर्वेक्षण -6 के आंकड़े भी इसकी पुष्टि कर रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 14:16:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>भारत में बढ़ती हृदय रोग महामारी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत में स्वास्थ्य से जुड़ी हालिया तस्वीर चिंताजनक होती जा रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन के ताजा सर्वे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हृदय रोग अब केवल बुजुर्गों तक सीमित समस्या नहीं रह गया है बल्कि यह तेजी से युवाओं को भी अपनी चपेट में ले रहा है। पिछले सात वर्षों में दिल के मरीजों की संख्या लगभग तीन गुना बढ़ जाना किसी साधारण बदलाव का संकेत नहीं बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करता है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि 15 से 29 वर्ष की आयु के युवा भी अब इस बीमारी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177784/growing-heart-disease-epidemic-in-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/2025_7image_23_42_42659755900.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत में स्वास्थ्य से जुड़ी हालिया तस्वीर चिंताजनक होती जा रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन के ताजा सर्वे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हृदय रोग अब केवल बुजुर्गों तक सीमित समस्या नहीं रह गया है बल्कि यह तेजी से युवाओं को भी अपनी चपेट में ले रहा है। पिछले सात वर्षों में दिल के मरीजों की संख्या लगभग तीन गुना बढ़ जाना किसी साधारण बदलाव का संकेत नहीं बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करता है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि 15 से 29 वर्ष की आयु के युवा भी अब इस बीमारी से प्रभावित हो रहे हैं जो पहले अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह बदलाव केवल चिकित्सा आंकड़ों तक सीमित नहीं है बल्कि समाज की बदलती जीवनशैली का सीधा परिणाम है। आज का युवा पहले की तुलना में अधिक तनावग्रस्त है। पढ़ाई का दबाव, करियर की अनिश्चितता, डिजिटल जीवनशैली और शारीरिक गतिविधियों में कमी ने शरीर को कमजोर बना दिया है। इसके साथ ही जंक फूड का बढ़ता चलन, देर रात तक जागना और नींद की कमी भी हृदय रोग के जोखिम को बढ़ा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शहरी क्षेत्रों में यह समस्या और अधिक गंभीर दिखाई देती है। वहां की तेज रफ्तार जिंदगी में लोग अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं दे पाते। लंबे समय तक बैठकर काम करना, व्यायाम की कमी और प्रदूषण भी दिल की बीमारियों को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। पुरुषों में यह समस्या अधिक देखी जा रही है लेकिन महिलाओं में भी बीमार होने की दर अधिक होने के कारण खतरा कम नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हृदय रोग का इलाज अन्य बीमारियों की तुलना में काफी महंगा है। शहरों में इसका खर्च इतना अधिक है कि सामान्य परिवार के लिए इसे वहन करना कठिन हो सकता है। हालांकि सरकारी बीमा योजनाओं का विस्तार एक सकारात्मक कदम है लेकिन केवल इलाज पर निर्भर रहना समाधान नहीं हो सकता। असली जरूरत इस बीमारी को रोकने की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दिल की बीमारियों के बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण जीवनशैली में असंतुलन है। आज के समय में लोग प्राकृतिक जीवन से दूर होते जा रहे हैं। पहले जहां लोग अधिक चलते थे, खेतों में काम करते थे या शारीरिक श्रम करते थे वहीं आज अधिकांश काम मशीनों और कंप्यूटर के जरिए हो रहा है। इससे शरीर की सक्रियता कम हो गई है और मोटापा तेजी से बढ़ रहा है जो हृदय रोग का प्रमुख कारण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तनाव भी एक महत्वपूर्ण कारक बन चुका है। मानसिक दबाव सीधे दिल पर असर डालता है। लगातार चिंता में रहने से रक्तचाप बढ़ता है और धीरे धीरे यह स्थिति गंभीर हो जाती है। इसके अलावा धूम्रपान और शराब का सेवन भी दिल के लिए अत्यंत हानिकारक है। युवा वर्ग में इन आदतों का बढ़ता चलन स्थिति को और बिगाड़ रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस समस्या से बचने के लिए सबसे जरूरी है जागरूकता और जीवनशैली में सुधार। नियमित व्यायाम को जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। रोज कम से कम तीस मिनट तेज चलना, दौड़ना या योग करना दिल को स्वस्थ रखने में बेहद सहायक होता है। योग और प्राणायाम विशेष रूप से तनाव को कम करने में मदद करते हैं और हृदय की कार्यक्षमता को बेहतर बनाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">खानपान में सुधार भी उतना ही आवश्यक है। तैलीय और जंक फूड से दूरी बनाकर संतुलित आहार लेना चाहिए। फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और प्रोटीन युक्त भोजन दिल के लिए लाभकारी होते हैं। नमक और चीनी का सेवन सीमित रखना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही रक्तचाप और मधुमेह को बढ़ाने में योगदान देते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नींद भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पर्याप्त और अच्छी नींद लेने से शरीर को आराम मिलता है और हृदय स्वस्थ रहता है। लगातार नींद की कमी शरीर को कमजोर बनाती है और कई बीमारियों का कारण बनती है। इसलिए हर व्यक्ति को कम से कम सात से आठ घंटे की नींद जरूर लेनी चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नियमित स्वास्थ्य जांच भी अत्यंत जरूरी है। कई बार हृदय रोग के लक्षण शुरुआती अवस्था में स्पष्ट नहीं होते। समय पर जांच कराने से बीमारी का पता जल्दी चल सकता है और इसका इलाज आसान हो जाता है। विशेष रूप से जिन लोगों के परिवार में पहले से हृदय रोग का इतिहास है उन्हें अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार और समाज दोनों को मिलकर इस समस्या का समाधान निकालना होगा। स्कूलों और कॉलेजों में स्वास्थ्य शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए ताकि युवा शुरुआत से ही अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बन सकें। कार्यस्थलों पर भी कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए जिससे वे अपने व्यस्त जीवन में भी फिट रह सकें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डिजिटल युग में तकनीक का सही उपयोग भी मददगार हो सकता है। फिटनेस ऐप्स और स्मार्ट डिवाइस के जरिए लोग अपनी गतिविधियों और स्वास्थ्य पर नजर रख सकते हैं। इससे उन्हें अपने लक्ष्य को हासिल करने में प्रेरणा मिलती है।हृदय रोग केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है बल्कि यह पूरे समाज को प्रभावित करता है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह आने वाले वर्षों में और गंभीर रूप ले सकता है। इसलिए जरूरी है कि हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझे और अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह कहा जा सकता है कि दिल की बीमारी से बचाव संभव है बशर्ते हम अपनी जीवनशैली में सही बदलाव करें। स्वस्थ खानपान, नियमित व्यायाम, तनाव से दूरी और समय पर जांच जैसे छोटे छोटे कदम हमें बड़ी समस्याओं से बचा सकते हैं। यह केवल व्यक्तिगत प्रयास नहीं बल्कि एक सामूहिक जिम्मेदारी है जो पूरे देश को स्वस्थ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कान्तिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 17:05:24 +0530</pubDate>
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