<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.swatantraprabhat.com/tag/83411/worker-exploitation-india" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Swatantra Prabhat RSS Feed Generator</generator>
                <title>Worker Exploitation India - Swatantra Prabhat</title>
                <link>https://www.swatantraprabhat.com/tag/83411/rss</link>
                <description>Worker Exploitation India RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>भारत में मजदूरों की दशा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>डा अशोक कुमार चौबे </strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>सेवानिवृत्त प्रोफेसर क़ृषि पसार शिक्षा </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व  भर मे हर वर्ष एक म ई मजदूर दिवस  के रूप में मनाया जाता है।नारा आसमान में गूंजता है दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ।परन्तु नारो से विश्व के मजदूरों की दशा में बहुत कोई बदलाव नहीं आया है। आज भी मजदूर मजबूर हैं।  काम के स्थल पर बहुत सी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं फिर भी वह मजदूर किसी के लिए धन अपने पसीने से बढा रहा है। परन्तु उसका परिवर आज भी  झूग्गी में ही पाल रहा है।गन्दे पानी पी रहा है बिना बिजली के साथ जीवन जी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177754/condition-of-workers-in-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas20.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>डा अशोक कुमार चौबे </strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>सेवानिवृत्त प्रोफेसर क़ृषि पसार शिक्षा </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व  भर मे हर वर्ष एक म ई मजदूर दिवस  के रूप में मनाया जाता है।नारा आसमान में गूंजता है दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ।परन्तु नारो से विश्व के मजदूरों की दशा में बहुत कोई बदलाव नहीं आया है। आज भी मजदूर मजबूर हैं।  काम के स्थल पर बहुत सी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं फिर भी वह मजदूर किसी के लिए धन अपने पसीने से बढा रहा है। परन्तु उसका परिवर आज भी  झूग्गी में ही पाल रहा है।गन्दे पानी पी रहा है बिना बिजली के साथ जीवन जी रहा है ।जिसको बड़े शहरों में मजदूरों की बस्ती मलिन बस्ती के नाम से जाना जाता है। उन्हीं बस्तियों में रह रहा है क ई मजदूरों का परिवार सड़को के किनारे पटरियों पर तो कुछ नाले के किनारे बैठे है । सरकार गाहे बेगाहे उनके पालीथीन के घर  को उठा ले जाती है।अतिक्रमण हटाने के नाम पर ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भारतके हर शहर के उघोग  में काम करनेवाले संगठित और असंगठित मजदूरों की कहानी है।मजदूरों को समय से मजदूरी नहीं ।तो काम का समय बारह घन्टें होते हैं।  मजदूरी दस हजार तक सीमित है। न उनके लड़कों को स्कुल नहीं मुफ्त चिकित्सा है फिर भी हम ढोल पीटते है मजदूर देश के विकास में रीढ़ की हड्डी के समान है।  और हर रोज उघोग पति इसी रीढ़ की हड्डी को तोड़ता रहता है । और अपनी आय बढ़ाता रहता  है।मजदूरों को कम मजदूरी देने की होड़ लग गई  है ।विश्व के हर‌ देश के उघोग पति हर समय सस्ते मजदुर खोजते रहते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व के विकसित और अविकसित देशों में भारतके मजदूर सबसे सस्ते में काम कर रहे हैं।  वह जिस भी देश में है बस एक मजबूर मजदूर हैं।  रहने की वहां भी सुविधा बहुत अच्छी नहीं है ।यह कहनें के लिए कि लड़का विदेश में हैं काम कर रहा यही तस्ली जैसे बिहार यूपी बंगाल के मजदूर दिल्ली हरियाणा पंजाब गुजरात  में  रहते हैं। कामोवेश यही स्थिति भारतीय मजदूरो की विश्व के हर देश में है।विश्व में आज भी मजदूर एक तरह से गुलामी में ही जी रहा है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मजदूरों ने सबसे पहले 1886 मे शिकागो में अपने काम के समय को आठ घन्टे निर्धारित करने को तथा बेहतर सुविधा के लिए आन्दोलन किया जो सफल रहा ।आज हालात फिर1886की तरह मजदूरों की हो गई वह संगठित क्षेत्रों के हो या असंगठित क्षेत्र दोनों जगह मजदूर मजबुर बन गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज पूंजी की दुनिया ने पूरे विश्व को बाजार में बदल दिया है।  जहां हर चीज बिकने को तैयार हैं इसकी कीमत पूजी के मालिक ही तय करते हैं।भारत के किसान खेतों में फसल तैयार करते हैं ।परन्तु बाजार में किस दाम पर बिकेगा वह महाजन ही तय करता है। आज मजदूर खेत की फसल की तरह बिक रहे हैं।शहरों में गांवों में मजदूरों के लिए हर सरकारी घोषणा दिखावा बन कर रह गया है।  गांवों में मनरेगा में क ई क ई महीने सरकार मजदुरी नहीं दे रही है।  दूसरी तरफ मनरेगा में काम कम कर दिया शहरों में मनरेगा नहीं चल रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्ष1886शिकागो में जो मजदूरों को सफलता मिली आज 137साल बाद अपने पुराने मुकाम पर पहुंच ग ई है।अभी कुछ दिनों पहले पूरे देश ने नोएडा के मजदूरों का आन्दोलन‌ देखा है ।मजदूर अपने वेतन को बढाने और काम के घन्टें आठ घन्टें करने तथा कार्यस्थल पर बेहतर सुविधा की मांग थी।पर कुछ थोड़ा सरकार के हस्तक्षेप के बाद मिला परन्तु बीस हजार महीने का वेतन तो नहीं मिला।यह संगठित क्षेत्रों के मजदूरों का हाल है इस से बद्तर हाल असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में पुरुष मजदूरों के साथ संगठित और असंगठित दोनों जगहों पर महिला कार्यबल भी है । परन्तु मजदूरी में भेद भाव आज भी हो रहा है । कहीं कहीं महिलाएं भी बारह घन्टें काम करती है । यह नहीं की उघोगो में पुरूषों का शोषण हो रहा आज विश्व भर में महिला मजदूरों का भी शोषण हो रहा है।बस नारों में ही महिलाओं का सम्मान है विज्ञापनो में ही नारीशक्ति वन्दन है।  जमीनी हकीकत कुछ और है ।मजदूर आन्दोलन में जब महिलाएं शामिल होती है तो उन पर भी पुलिस लाठी चलाती बाल पकड़ कर महिला पुलिस घसीटती हुई ले जाती  है। तब कहीं नहीं किसी मजदूर नेता संगठन का या राजनीतिक नेताओं की आवाज उठता है कि महिलाओं को क्यों लाठी से पुलिस वाले ने पीटा क्यों बाल पकड़ कर घसिटा हर आन्दोलन की यही कहानी होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि भारत को 2047मे विकसित बनाना है फिर सत्तर फीसदी  महिलाओ को महिलाकार्य बल में प्रमुख स्तरो पर भागीदारी सुनिश्चित करना होंगा।भारत का मजदूर बहुत सी कठिनाई से दोक्षचार होता है फिर भी उघोगो पतियों को धन कमा कर देता है। विश्व के किसी देश में यह नियम नही बना है कि उघोगो के लाभ में से कितना प्रतिशत मजदूरों के बेहतर सुविधा पर खर्च होगा । परन्तु सरकारो ने यह एक नया नियम बना लिया कि उघोगपति लाभ का दो प्रतिशत सामाजिक जिम्मेदारी  के तहत और अपने आस पास के गांवों के विकास पर खर्च करेंगे।परन्तु यह नियम नही बना की हर उघोगपति मजदूर के बच्चों की अच्छी शिक्षा चिकित्सा के लिए जिले के स्कुलो और हास्पिटल के लिए अपने लाभ में से दो प्रतिशत हर वर्ष खर्च करेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और साथ में उसी दो प्रतिशत के लाभ से मजदूरों को सुविधायुक्त मकान  बनाकर दे सकता है लेकिन ऐसी सुविधा मजदूरों को बहुत कम उघोगो में उपलब्ध है।जिन उघोगो में यह सुविधा थी धीरे धीरे बन्द होते गये मिल  मजदूरों के अनर्गल आन्दोलन से और मजदूर नेताओं की मिल मालिकों से मिली भगत से आज भी भारत में बहुत सी मिले बंगाल मुम्बई तमिलनाडू यूपी में सरकारी और निजी उघोओ की बन्द है । इन उघोगो को चलाने  में अब सरकार कभी रूचि नहीं लेती है नहीं इनका आधुनिक करण किया इन मिलों में काम करने वाले मजदूर आज भी अपने बकाया के लिए कोर्ट में मुकदमे लड रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">1920मे मजदूरों ने बड़ी सख्या में आन्दोलन में भाग लिया था जीत गये तब आन्दोलन को भारत की स्वतंत्रता से जोड़ कर देखा गयाथा । नोएडा या अन्य शहरों में वेतन को लेकर मजदूर समय समय पर सड़क पर आते  रहते हैं।वह 1886या1920के आन्दोलन की तरह नहीं हो लड पा रहे हैं । तब मजदूरों का संगठन एक साथ आवाज एक थी आज संगठन बहुत है आवाज बहुत है पर सबक्षबटे हुए हैं तभी काटे जा रहै है।यह नारा सच है सकोगे तो कटोगे।आज वास्तव में मजदूर संगठन सत्ता का विपक्ष है तो सत्ता का संगठन आन्दोलन में नहीं है।नोएडा का आन्दोलन मात्र चार दिन चला और लाठी मुकदमे के डर से समझौता होगया हजार पांच सौ की वेतन वृद्धि से सब समस्या का हल  निकल गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार न जाने क्यों निजी क्षेत्रों के श्रमिको के लिए न्यूनतम वेतन शहरों और महानगरों के स्तर को देख कर निर्धारित नहीं कर पा रही है । नहीं कभी सुनिश्चित कर पा रही है । क्या सरकार के न्यूनतम वेतन नियम को निजी उघोग मानरहे हैं।  या मजदूरो का शोषण हो रहा है।आज बेरोजगारी के कारण भी युवा  आठ से दस  हजार पर मजदूरी करने को मजबूर हैं ।शहरों में गीगा वर्कर्स जोमैटो स्वीटी  ईकार्ट आदि आन लाईन सेवा प्रदाता कम्पनियो में अपने मोटर साईकिल से मजदूरी कर रहे है।तो कितना वेतन और सुरक्षा है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन युवाओं का अगर सड़क दूर्घटना में मृत्यु हो जाये सेवा या डिलीवर के समय तो क्या तीस चालीस लाख का जीवन बीमा कम्पनियों ने कराया है शायद जबाब नहीं।अगर विकलांग हो गये तो क्या कम्पनी सहायताराशि कितना देगी कुछ भी आज स्पष्ट नहीं है ।हर तरह मजदूर का शोषण  विकास की  न ई पहचान बन गया है।  मजदूरो के शोषण से उघोगो का विकास यही विकसित भारत का नारा बन रहा है।  आज सरकार भी शोषण के लिए एक नया नौकरी का तरीका अनुबन्धन और आउट सोर्स की नौकरी यह भी सरकारी शोषण है । पर मौन सरकार और अदालतें है । मजदूरों के शोषण पर ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पहली म ई मजदूर दिवस म ई दिवस विश्वभर में मनाया जायेगा नारा भी होगा मजदूरों एक हो जाओ शोषण के विरोध में संघर्ष करो पर शोषण सरकार से शुरू होकर नीजीक्षेत्रो तक नदी की धारा की तरह बहता है।  जो रूकता नहीं है । न रूक पायेगा।सर्रकार भी अब स्थाई नौकरी सामाजिक सुरक्षा पेंशन नहीं देना चाहती है । बस अपने सांसदों विधायोंको पंचायत के स्तर पर नेताओं को हर तरह की सुविधा  देकर देश के युवाओं को मजदूर बनाकर रखना चाह रही  है और रख भी रही है । उदाहरण सरकारी मजदूर बंगाल में वोटर नहीं है। परन्तु वह सब चुनाव में ड्यूटी में लगे हैं यही सरकारी मजदूर की मजबूरी है।मजदूरों का पेंशन चिकित्सा मकान सब बन्द  है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परन्तु सांसद विधायको को हर तरह की सुविधा मुफ्त पेंशन चिकित्सा मकान बिजली पानी यात्रा। इस वर्ष देश के मजदूरों सरकार से एक सवाल  पूछे ।हम मजदूर देश के विकास में श्रम देकर सहभागी है। परन्तु सांसद विधायक कौन सा श्रम दे रहे हैं।  देश के विकास के लिए यह नये राजा देश के विकास में बाधक है ।इनकी हर सुविधाओं को बन्द करने की मांग पहली म ई मजदूर दिवस पर हो।मजदूरों एक हो जाओ हक अपना मांगों म ई दिवस पर जब तक न मिले तब तक हर तरह से संघर्ष करो लड़ो हक के लिए मजदूर मजबूर मत बनो। मजदूर  देश व समाज  का भाग्य विधाता बनो।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/177754/condition-of-workers-in-india</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/177754/condition-of-workers-in-india</guid>
                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 23:21:27 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/hindi-divas20.jpg"                         length="137237"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        