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                <title>Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>अधिवक्ता मंच, इलाहाबाद की ओर से बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्र के नाम खुला पत्र</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्यूरो प्रयागराज  </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मान्यवर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपका यह बयान कि “देश में </span>35<span lang="hi" xml:lang="hi">  से </span>40<span lang="hi" xml:lang="hi">  प्रतिशत वकील फर्जी हैं” केवल एक असंवेदनशील टिप्पणी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे अधिवक्ता समुदाय के आत्मसम्मान पर हमला है। यह बयान किसी टीवी बहस के प्रवक्ता ने नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस संस्था के अध्यक्ष ने दिया है जिसे देश के अधिवक्ताओं की गरिमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता और पेशेवर मानकों की रक्षा करनी चाहिए। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सच यह है कि आपका यह बयान अधिवक्ताओं पर आरोप कम और आपकी अपनी विफलताओं का सार्वजनिक इकबाल ज्यादा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि वास्तव में देश में इतनी बड़ी संख्या में फर्जी वकील मौजूद हैं</span>,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180339/open-letter-from-advocates-forum-allahabad-to-bar-council-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/750x450_360885-mannan-kumar-mishra.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्यूरो प्रयागराज  </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मान्यवर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपका यह बयान कि “देश में </span>35<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>40<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत वकील फर्जी हैं” केवल एक असंवेदनशील टिप्पणी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे अधिवक्ता समुदाय के आत्मसम्मान पर हमला है। यह बयान किसी टीवी बहस के प्रवक्ता ने नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस संस्था के अध्यक्ष ने दिया है जिसे देश के अधिवक्ताओं की गरिमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता और पेशेवर मानकों की रक्षा करनी चाहिए। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सच यह है कि आपका यह बयान अधिवक्ताओं पर आरोप कम और आपकी अपनी विफलताओं का सार्वजनिक इकबाल ज्यादा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि वास्तव में देश में इतनी बड़ी संख्या में फर्जी वकील मौजूद हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सबसे पहले कठघरे में आप स्वयं खड़े हैं। क्योंकि वर्षों से बार काउंसिल ऑफ इंडिया का नेतृत्व आपके हाथों में रहा है। डिग्री सत्यापन से लेकर नामांकन व्यवस्था तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लॉ कॉलेजों की मान्यता से लेकर विधि शिक्षा की निगरानी तक — हर महत्वपूर्ण तंत्र आपकी अध्यक्षता और प्रभाव के अधीन संचालित होता रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर यह बताइए कि—</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बिना भवनों वाले लॉ कॉलेजों को मान्यता किसने दी</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बिना योग्य शिक्षकों और पुस्तकालयों के संस्थानों को “लीगल एजुकेशन” का लाइसेंस किसने दिया</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विधि शिक्षा को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त निजी दुकानों में बदलने दिया किसने</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निरीक्षणों को औपचारिक भ्रष्टाचार और कागजी खानापूर्ति में बदलने दिया किसने</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज अदालतों में जो गुणवत्ता-विहीन विधि स्नातकों की भीड़ दिखाई देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह किसी संयोग का परिणाम नहीं है। यह आपकी अध्यक्षता में वर्षों तक चलाए गए उस विनाशकारी मॉडल का परिणाम है जिसमें शिक्षा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान्यता का कारोबार फलता-फूलता रहा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना यह है कि इस पूरे पतन की जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय आपने पूरे अधिवक्ता समाज को ही “फर्जी” घोषित कर दिया। यह वही मानसिकता है जिसमें नेतृत्व अपनी असफलता छिपाने के लिए जनता को दोषी ठहराने लगता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश का अधिवक्ता समाज यह भी देख रहा है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया धीरे-धीरे अधिवक्ताओं की स्वतंत्र संस्था कम और सत्ता प्रतिष्ठान के अनौपचारिक सहयोगी मंच में अधिक बदलती गई। अदालतों में संघर्षरत युवा अधिवक्ताओं की समस्याओं पर आपकी आवाज़ कभी उतनी मुखर नहीं रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितनी सत्ता के प्रति आपकी विनम्रता रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आपके सार्वजनिक आचरण से यह धारणा गहरी हुई है कि बार काउंसिल का नेतृत्व अब अधिवक्ताओं की लड़ाई लड़ने के बजाय सत्ता की कृपा प्राप्त करने में अधिक रुचि रखता है। राज्यसभा की राजनीति और सत्ता के गलियारों में स्वीकार्यता की आकांक्षा ने बार काउंसिल की संस्थागत गरिमा को गंभीर क्षति पहुँचाई है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के तीन नए आपराधिक कानूनों—</span>Bharatiya Nyaya Sanhita,Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita<span lang="hi" xml:lang="hi">और</span>Bharatiya Sakshya Adhiniyam <span lang="hi" xml:lang="hi">को लेकर जब देशभर के अधिवक्ताओं में व्यापक असंतोष था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब जिला बारों से लेकर उच्च न्यायालयों तक गंभीर आपत्तियाँ उठ रही थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वकील समुदाय लोकतांत्रिक विमर्श और प्रतिरोध चाहता था — तब आपने उस असंतोष को संगठित करने के बजाय उसे ठंडा करने की भूमिका निभाई। आपने अधिवक्ताओं की आवाज़ बनने के बजाय सत्ता को असुविधा से बचाने का काम किया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक स्वतंत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्भीक और लोकतांत्रिक संस्था होना चाहिए था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आपके कार्यकाल में यह संस्था लगातार केंद्रीकृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपारदर्शी और सत्ता-अनुकूल होती गई। अधिवक्ताओं का विश्वास कमजोर हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विधि शिक्षा का स्तर गिरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा वकीलों का भविष्य असुरक्षित हुआ और संस्था की नैतिक विश्वसनीयता लगातार क्षीण होती गई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज जब आप पूरे पेशे को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब देश का अधिवक्ता समाज आपसे पूछ रहा है —यदि सब कुछ इतना ही सड़ा हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वर्षों से शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति की जवाबदेही कहाँ तय होगी</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में नैतिकता का न्यूनतम सिद्धांत यह कहता है कि जो व्यक्ति अपने ही कार्यकाल को इतनी भयावह विफलता के रूप में प्रस्तुत कर रहा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं रह जाता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अतः अब समय आ गया है कि आप अधिवक्ता समुदाय को अपमानित करने के बजाय अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करें और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन पद से तत्काल त्यागपत्र दें।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वकालत अभी भी लोकतंत्र का स्वतंत्र स्तंभ है —और इसे किसी व्यक्ति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता-निकटता और प्रशासनिक विफलताओं की ढाल नहीं बनने दिया जा सकता।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">— <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिवक्ता मंच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इलाहाबाद</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:27:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हेट स्पीच को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दिशा-निर्देश जारी करने से इनकार</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच से निपटने के लिए देश में पहले से मौजूद कानून पर्याप्त हैं और किसी विधायी खालीपन की स्थिति नहीं है, जिसके चलते न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत पड़े। अदालत ने कहा कि संविधान के तहत शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत के अनुसार न्यायपालिका अपनी सीमा में रहकर ही काम कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने एक साफ किया है कि किसी भी अपराध के लिए सजा का निर्धारण करना पूरी तरह से विधायिका का अधिकार क्षेत्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने दोहराया कि यह अधिकार संसद और राज्य विधानसभाओं के पास सुरक्षित है।शक्तियों के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177589/supreme-court-refuses-to-issue-guidelines-regarding-hate-speech"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/supream-court5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच से निपटने के लिए देश में पहले से मौजूद कानून पर्याप्त हैं और किसी विधायी खालीपन की स्थिति नहीं है, जिसके चलते न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत पड़े। अदालत ने कहा कि संविधान के तहत शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत के अनुसार न्यायपालिका अपनी सीमा में रहकर ही काम कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने एक साफ किया है कि किसी भी अपराध के लिए सजा का निर्धारण करना पूरी तरह से विधायिका का अधिकार क्षेत्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने दोहराया कि यह अधिकार संसद और राज्य विधानसभाओं के पास सुरक्षित है।शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत पर आधारित संवैधानिक व्यवस्था न्यायपालिका को नए अपराध बनाने या न्यायिक निर्देशों के ज़रिए आपराधिक दायित्व का दायरा बढ़ाने की इजाज़त नहीं देती।" ज़्यादा-से-ज़्यादा कोर्ट सिर्फ़ सुधारों की ज़रूरत के बारे में विधायिका और कार्यपालिका का ध्यान खींच सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा "यह दलील कि हेट स्पीच का क्षेत्र कानूनी तौर पर खाली है, गलत है। मौजूदा आपराधिक कानून का ढांचा—जिसमें IPC के प्रावधान और उससे जुड़े कानून शामिल हैं—उन कामों से निपटने के लिए पर्याप्त है, जो दुश्मनी को बढ़ावा देते हैं, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाते हैं, या सार्वजनिक शांति भंग करते हैं। इसलिए यह क्षेत्र खाली नहीं है।"</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की शिकायत कानून की कमी से नहीं, बल्कि उसके लागू होने में कमी से है। हालांकि, ऐसी चिंताओं के आधार पर न्यायपालिका द्वारा कानून बनाना सही नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' संज्ञेय अपराधों में FIR दर्ज करने का प्रावधान करती है, और पुलिस की लापरवाही के मामले में मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत करने का उपाय भी देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पीठ ने कहा कि मौजूदा आपराधिक कानून हेट स्पीच जैसे मामलों से निपटने में सक्षम हैं। इसलिए इस मुद्दे पर अलग से कोई न्यायिक दिशा-निर्देश जारी करने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक अदालतें कानून की व्याख्या और मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए निर्देश दे सकती हैं, लेकिन वे कानून नहीं बना सकतीं और न ही विधायिका को ऐसा करने के लिए बाध्य कर सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि भविष्य में किसी तरह की नई नीति या कानून की आवश्यकता महसूस होती है, तो इस पर निर्णय लेना पूरी तरह विधायी प्राधिकरणों का काम है। अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कोर्ट ने दोहराया कि भारतीय संविधान शक्ति विभाजन के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका की अलग-अलग भूमिकाएं निर्धारित हैं। इन्हीं सीमाओं के भीतर सभी संस्थाओं को कार्य करना होता है। अदालत ने लॉ कमीशन की 267वीं रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें संभावित सुधारों का सुझाव दिया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह भी कहा: "हालांकि, हम मांगी गई गाइडलाइंस जारी करने से इनकार करते हैं, लेकिन हम यह कहना उचित समझते हैं कि हेट स्पीच और अफ़वाह फैलाने से जुड़े मुद्दे सीधे तौर पर भाईचारे, गरिमा और संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने से जुड़े हैं। केंद्र और राज्यों के लिए यह खुला है कि वे अपनी समझ से विचार करें कि बदलते सामाजिक बदलावों और चुनौतियों को देखते हुए क्या और कानूनी कदम उठाने की ज़रूरत है, या 23 मार्च 2017 की विधि आयोग की रिपोर्ट 267 में सुझाए गए अनुसार उचित संशोधन किए जाएं।"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 17:44:43 +0530</pubDate>
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